Brahmasutra/C2/S3: Difference between revisions
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| title = तृतीयः पादः | | title = तृतीयः पादः | ||
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जीवपरमात्माधिभूताधिदैवेषु श्रुतीनां परस्परं विरोधमपाकरोत्यनेन पादेन। | जीवपरमात्माधिभूताधिदैवेषु श्रुतीनां परस्परं विरोधमपाकरोत्यनेन पादेन। | ||
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| verse_line1 = ॐ शब्दाच्च ॐ ॥ 04-222 ॥ | | verse_line1 = ॐ शब्दाच्च ॐ ॥ 04-222 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॐ ॥ 05-223 ॥ | | verse_line1 = ॐ स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॐ ॥ 05-223 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॐ ॥ 06-224 ॥ | | verse_line1 = ॐ प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॐ ॥ 06-224 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॐ ॥ 07-225 ॥ | | verse_line1 = ॐ यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॐ ॥ 07-225 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॐ ॥ 08-226 ॥ | | verse_line1 = ॐ एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॐ ॥ 08-226 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॐ ॥ 09-227 ॥ | | verse_line1 = ॐ असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॐ ॥ 09-227 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ तेजोऽतस्तथा ह्याह ॐ ॥ 10-228 ॥ | | verse_line1 = ॐ तेजोऽतस्तथा ह्याह ॐ ॥ 10-228 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरादिभ्यः ॐ ॥ 12-230 ॥ | | verse_line1 = ॐ पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरादिभ्यः ॐ ॥ 12-230 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात् सः ॐ ॥ 13-231 ॥ | | verse_line1 = ॐ तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात् सः ॐ ॥ 13-231 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॐ ॥ 14-232 ॥ | | verse_line1 = ॐ विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॐ ॥ 14-232 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॐ ॥ 15-233 ॥ | | verse_line1 = ॐ अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॐ ॥ 15-233 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ॐ ॥ 16-234 ॥ | | verse_line1 = ॐ चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ॐ ॥ 16-234 ॥ | ||
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| verse_line1 = ॐ नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॐ ॥ 17-235 ॥ | | verse_line1 = ॐ नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॐ ॥ 17-235 ॥ | ||
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Revision as of 06:54, 9 April 2026
जीवपरमात्माधिभूताधिदैवेषु श्रुतीनां परस्परं विरोधमपाकरोत्यनेन पादेन।
वियदधिकरणम्
ॐ न वियदश्रुतेः ॥ 01-219 ॥
न वियदनुत्पत्तिमत् । तथाऽश्रुतेः ॥ 01 ॥
ॐ अस्तितु ॐ ॥ 02-220 ॥
अस्त्येव चोत्पत्तिश्रुतिः- ‘आत्मन आकाशः सम्भूतः’ इत्यादि ॥ 02 ॥
ॐ गौण्यसम्भवात् ॐ ॥ 03-221 ॥
‘अनादिर्वा अयमाकाशः शून्योऽलौकिकः’ इत्यादिश्रुतिर्गौणी । अन्यथोत्पत्तिश्रुतिबाहुल्यासम्भवात् ॥ 03 ॥
ॐ शब्दाच्च ॐ ॥ 04-222 ॥
‘अथ ह वाव नित्यानि पुरुषः प्रकृतिरात्मा काल इति । अथ यान्यनित्यानि प्राणः श्रद्धाभूतानि भौतिकानीति । यानि ह वा उत्पत्तिमन्ति तान्यनित्यानि।यानि ह वा अनुत्पत्तिमन्ति तानि नित्यानि । न ह्येतानि कदाचनोत्पद्यन्ते न विलीयन्ते पुरुषः प्रकृतिरात्मा काल इति । अथैतान्युत्पत्तिमन्ति चानुत्पत्तिमन्ति च प्राणः श्रद्धाऽऽकाश इति भागशो ह्युत्पद्यन्ते’ इति भाल्लवेयश्रुतेश्च ॥ 04 ॥
ॐ स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॐ ॥ 05-223 ॥
स्यादेवैकस्योत्पत्तिमत्त्वमनुत्पत्तिमत्त्वं च गौणमुख्यत्वापेक्षया । यथा ब्रह्मशब्दः ।
‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म बृहति बृंहयति च’ इति श्रुतेः परे ब्रह्मणि मुख्योऽपि गौणत्वेन विरिञ्चादिष्वपि वर्तते । अत एवाब्रह्मत्वं च तेषाम् । एवमत्राप्यनुत्पत्तिमच्छब्दः ॥ 05 ॥
ॐ प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॐ ॥ 06-224 ॥
ब्रह्मणोऽन्यस्य नित्यत्वे’इदं सर्वमसृजत’ इत्यादि प्रतिज्ञाहानिः।आकाशस्यापि सर्वस्मादव्यतिरेकात्।
‘अत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्’ ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’
‘इदं वा अग्रे नैव किञ्चनासीत्’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ 06 ॥
ॐ यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॐ ॥ 07-225 ॥
॥ इति वियदधिकरणम् ॥ 01 ॥
विभक्तत्वाच्च विकारित्वं युक्तम् । विकारिण एव हि विभक्तालोके दृश्यन्ते ।
‘एकोऽविभक्तः परमः पुरुषो विष्णुरुच्यते ।
प्रकृतिः पुरुषः कालस्त्रय एते विभागतः ॥
चतुर्थस्तु महान् प्रोक्तः पञ्चमाऽहङ्कृतिर्मता ।
तद्विभागेन जायन्त आकाशाद्याः पृथक् पृथक् ॥
यो विभागी विकारः सः सोऽविकारः परो हरिः ।अविभागात् परानन्दो नित्यो नित्यगुणात्मकः ।विभागो ह्यल्पशक्तिः स्यान्न तदस्ति जनार्दने’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 07 ॥
मातरिश्वाधिकरणम्
ॐ एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॐ ॥ 08-226 ॥
‘अथ ह नित्याश्चानित्याश्च तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यनित्यानि वायुर्वाव नित्यो वायुना हि सर्वाणि भूतानि नेनीयन्ते’
‘अथ ह चेतनाश्चाचेतनाश्च तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यचेतनानि वायुर्वाव चेतनो वायुना हि सर्वाणि भूतानि विज्ञायन्ते’ ।
‘कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः पुरा देवा अनवद्यास आसन् ।ते वायवे मनवे बाधितायावासयन्नुषसं सूर्येण’।
‘सा वा एषा देवताऽनादिर्योऽयं पवते’ इति ।
‘यस्यानादिर्न मध्यं नान्तो नोदयो न निम्लोचः’।इत्यादिश्रुतिभ्यो वायोरनुत्पत्तिरित्यतो ब्रवीति –॥ इति मातरिश्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥
एतेन मुख्यामुख्यानुत्पत्तिवचनेन विभक्तत्वाच्च वाय्वनुत्पत्तिश्रुतिरपि व्याख्याता ।
‘नित्यः परमनित्यश्च तथाऽनित्यः परस्तथा ।
चतुर्धैतज्जगत् सर्वं परानित्यं तु पार्थिवम्।
अनित्यानि तु भूतानि नित्यो वायुरुदाहृतः ।
परस्तु नित्यः पुरुषः प्रकृतिः काल एव च ।
एतच्चतुष्टयं विष्णुः स्वयं नित्यः परात्परः ।प्रतिव्यूह्य व्यूह्य चासावतीत्या च जनार्दनः ।धारयत्यनिशं देवो नित्यानन्दैकलक्षणः’इति कौर्मे ॥ 08 ॥
असम्भवाधिकरणम्
ॐ असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॐ ॥ 09-227 ॥
इति असम्भवाधिकरणम् ॥ 03 ॥
‘असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत’’असतः सदजायत’। इत्यादि श्रुतिभ्यः सतोऽप्युत्पत्तिरिति चेन्न ।
अनुत्पत्तिरेव सतः । तुशब्देनोक्तव्यवस्थामपाकरोति । न ह्यसतः सदुत्पद्यते । अदृष्टत्वादनुपपत्तेः ।‘तद्वा एतद्ब्रह्माहुर्बृहति बृंहयति चेति । तद्वा एतदसदाहुः न ह्यासादयति कश्चन । तद्वा एतत् परमाहुः परतो हि तदुदीक्ष्यते’इति श्रुतेरसच्छब्दो ब्रह्मवाची ।
‘देवानां पूर्व्ये युगेऽसतः सदजायतेति ब्रह्मवा असत् सद्वाव प्राणः प्राणं वाव महान् सह ओजो बलमित्याचक्षते’इति च पैङ्गीश्रुतिः।
‘त्वं देव शक्त्यां गुणकर्मयोनौ रेतस्त्वजायां कविरादधेऽजः ।ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे बभूविमात्मन् करवाम किं ते’इति भागवते ॥
‘अजायमानो बहुधा विजायत’ इति च ।
‘प्रत्यक्षत्वं हरेर्जन्म न विकारः कथञ्चन ।
पुरुषः प्रकृतिः कालो महानित्यादिषु क्रमात् ॥
विकार एव जननं पुरुषे तद्विशेषणम् ।
परतन्त्रविशेषो हि विकार इति कीर्तितः’इति पाद्मे ॥
‘अविकारोऽपि भगवान् सर्वशक्तित्वहेतुतः ।
विकारहेतुकं सर्वं कुरुते निर्विकारवान् ॥
‘शक्तिशक्तिमतोश्चापि न विभागः कथञ्चन ।अविभिन्नाऽपि सेच्छादिभेदैरपि विभाष्यते’इति भागवततन्त्रे ॥ 09 ॥
तेजोऽधिकरणम्
ॐ तेजोऽतस्तथा ह्याह ॐ ॥ 10-228 ॥
॥ इति तेजोऽधिकरणम् ॥ 04 ॥
‘वायोरग्निः’इत्यादेर्नान्यत उत्पत्तिर्ग्राह्या । अत एव परात् तदपि जायते । ‘तत् तेजोऽसृजत’ इति ह्याह । कारणत्वेनेत्युक्तेऽप्यमुख्यतयाऽन्येषामपि शब्दोक्तत्वात् पुनरुक्तिरुभयकारणत्वनिवृत्यर्थम् ॥ 10 ॥
अबधिकरणम्
ॐ आपः ॐ ॥ 11-229 ॥
॥ इति अबधिकरणम् ॥ 05 ॥
‘ब्रह्मैवेदमग्र आसीत् तदपोऽसृजत तदिदं सर्वम्’ इति श्रुतेः, ‘अग्नेरापः’ इत्युक्तेऽपि ब्रह्मण एवाबादिसृष्टिः ।
‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी’ इत्यादि च ।
‘कर्ता सर्वस्य वै विष्णुः एक एव न संशयः ।इतरेषां तु सत्ताद्या यत एव तदाज्ञया’ इति भविष्यत्पुराणे॥
वामने च-
‘तत्र तत्र स्थितो विष्णुस्तत्तच्छक्तीः प्रबोधयन् ।
एक एव महाशक्तिः कुरुते सर्वमञ्जसा’ इति ॥
घर्मात् स्वेदादिदृष्टेः पुनः प्रतिषेधः ॥ 11 ॥
पृथिव्यधिकरणम्
ॐ पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरादिभ्यः ॐ ॥ 12-230 ॥
‘ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्यामः प्रजायेमेहीति । ता अन्नमसृजन्त’ इत्यद्ब्द्योऽन्नसृष्टिः श्रूयते ।‘अद्ब्यः पृथिवी’ इति कुत्रचित् पृथिवीसृष्टिः । अतो विरुद्धत्वादप्रामाण्यमित्यतो वक्तिः –
॥ इति पृथिव्यधिकरणम् ॥
पृथिवी तत्रान्नशब्देनोच्यते । भूताधिकारत्वात् । कार्ष्ण्यप्रचुरा च पृथिवी । नान्नस्य तथा विशेषः । ‘आपश्च पृथिवी चान्नम्’। ‘पृथिवी वा अन्नम्’ । ‘ता आपोऽन्नमसृजन्त पृथिवी वा अन्नम्’ इत्यादिशब्दान्तराच्च । आदिशब्दाद्युक्तिः अपौरुषेयत्वेनादोषस्य वाक्यस्य नाप्रामाण्यमित्यादि ।
कौर्मे च –
‘विरोधो वाक्ययोर्यत्र नाप्रामाण्यं तदेष्यते ।
यथा विरुद्धता न स्यात् तथाऽर्थः कल्प्य एतयोः’ इति ।
रक्तोऽग्निरुदकं शुक्लं कृष्णैव पृथिवी स्वतः ।
नाभिपद्माभिसम्बन्धात् पीता सेत्यभिधीयते ।
क्षत्ररक्ताभिसम्बन्धाद्रक्तोदकबहुत्वतः ।
शुक्लत्वेमेत्येवमेव वर्णान्तरगतिर्भवेत् ॥
विष्णुवीर्याभियोगाच्च पीतत्वं भुव इष्यते ।स्वर्णवीर्यो हि भगवाननादिः पुरुषोत्तमः॥इति व्योमसंहितायाम् ॥ 12 ॥
तदभिध्यानाधिकरणम्
ॐ तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात् सः ॐ ॥ 13-231 ॥
‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रो मा विशान्तकस्तेनान्नेनाप्यायस्व’ इत्यादिनाऽन्यः संहर्ता प्रतीयत इत्यतो ब्रूते –
॥ इति तदभिध्यानाधिकरणम् ॥ 07 ॥
‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्बूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’
इति बन्धलयस्य तदभिध्याननिमित्तत्त्वलिङ्गात् तत्कर्तृत्वं प्रतीयते, किमु सादेर्जगतः । इत्येतस्मादेव संहारकर्ता विष्णुरिति प्रतीयते, किमु
‘यमप्येते भुवनं साम्पराये स नो हरिर्घृत मीहायुषेऽत्तु देवः’।
‘य इदं सर्वं विलापयति स हरिः परः परात्मा’
इत्यादि श्रुतिभ्यः इति एव शब्दः ।
‘स्रष्टा पाता च संहर्ता स एको हरिरीश्वरः ।स्रष्टृत्वादिकमन्येषान्दारुयोषावदुच्यते ॥ एकदेशक्रिया चात्र न तु सर्वात्मनेरितम् ।सृष्ट्यादिकं समस्तं तु विष्णोरेव पराद्भवेत्’इति च स्कान्दे ॥
‘निमित्तमात्रमीशस्य विश्वसर्गनिरोधयोः ।
हिरण्यगर्भः शर्वश्च कालाख्यारूपिणस्तव’इति भागवते ॥
‘स ब्रह्मणा विसृजति स रुद्रेण विलापयति सोऽनुत्पत्तिरलय एक एव हरिः परः परानन्दः’
इति च महोपनिषदि ॥ 13 ॥
विपर्ययाधिकरणम्
ॐ विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॐ ॥ 14-232 ॥
‘अत एव हीदं परात् क्रमादुत्पद्यते क्रमाद्विलीयते नासावुदेति नास्तमेति’ इति भाल्लवेयश्रुतौ क्रमाल्लयः प्रतीयते ।
‘अक्षरात् परमादेव सर्वमुत्पद्यते क्रमात् ।व्युत्क्रमाद्विलयश्चैव तस्मिन्नेव परात्मनि’ ॥इति चतुर्वेदशिखायां व्युत्क्रमाल्लयः प्रतीयते । अत आह
॥ इति विपर्ययाधिकरणम् ॥
क्रमवचनमपि विपरीतक्रमापेक्षया ।
‘कर्ता प्राणादिकस्यास्य हन्ता भूम्यादिकस्य च ।
यः क्रमाद् व्युत्क्रमाच्चैव स हरिः पर उच्यते’॥
इत्यत एव भाल्लवेयश्रुतिवचनात् ।
‘अनुरूपः क्रमः सृष्टौ प्रतिरूपो लये क्रमः ।इति क्रमेण भगवान् सृष्टिसंहारकृद्धरिः’ इति च पाद्मे ।
पूर्वेषां पूर्वेषां सामर्थ्याधिक्यादुपपद्यते च ।
वामने च –
‘पूर्वे पूर्वे यतो विष्णोः सन्निधानं क्रमाधिकम् ।
सामर्थ्याधिक्यमेतेषां पश्चादेव लयस्तथा ।
व्याप्तिश्चाभ्यधिका तेषामत एव न संशयः’ ॥ इति॥ 14 ॥
अन्तराधिकरणम्
ॐ अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॐ ॥ 15-233 ॥
‘प्राणान्मनो मनसश्च विज्ञानम्’ । ‘यच्छेद्वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ञान आत्मनि’
इति लिङ्गाद्विज्ञानमनसी अन्तरा विपरीतक्रम इति चेन्न, विशेषप्रमाणाभावात् ॥15 ॥
ॐ चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ॐ ॥ 16-234 ॥
॥ इति अन्तराधिकरणम् ॥ 09 ॥
‘मनसश्च विज्ञानम्’ इति व्यपदेशश्चराचरेष्वालोचनाद्विज्ञानं भवतीति भागापेक्षया स्यात् । न विज्ञानतत्त्वापेक्षया ।
स्कान्दे च –
‘परादव्यक्तमुत्पन्नमव्यक्तात् तु महांस्तथा ।
विज्ञानतत्त्वं महतः समुत्पन्नं चतुर्मुखात् ॥
विज्ञानतत्त्वात् तु मनो मनस्तत्त्वाच्च खादिकम् ।
एवं बाह्या परा सृष्टिरन्तस्तद्व्यक्त्यपेक्षया ।
विपरीतक्रमो ज्ञेयो यस्मादन्ते हरेर्दृशिः’ ॥इति॥ 16 ॥
आत्माधिकरणम्
ॐ नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॐ ॥ 17-235 ॥
॥ इति आत्माधिकरणम् ॥ 10 ॥
‘स इदं सर्वं विलाप्यान्तस्तमसि निलीनस्तद्विलाप्य व्युत्तिष्ठते स इदं सर्वं विसृजति विस्थापयति प्रस्थापयत्याच्छादयति प्रकाशयति विमोचयत्येक एव’ इति श्रुतेः परमात्माऽपि न लीयते। अश्रुतत्वाद्ब्रह्मलयस्य। निलीन शब्देनापिहितत्वमुच्यते । तुच्छेनाभ्यपिहितं यदासीत्, इत् श्रतेः ।
‘स एतस्मिंस्तमसि निलीनः प्रकृतिं पुरुषं कालं चानुपश्यति कश्चन’ इति पैङ्गिशृतिः ।
‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’
‘स नित्यो निर्गुणो विभुः परः परमात्मा’।‘नित्यो विभुः कारणो लोकसाक्षी परो गुणैः सर्वदृक् शाश्वतश्च’ इत्यादि श्रुतिभ्यो नित्यत्वाच्च ॥ 17 ॥
ज्ञाधिकरणम्
ॐ ज्ञोऽत एव ॐ ॥ 18-236 ॥
‘नित्यो नित्यानाम्’ इति जीवास्यापि नित्यत्वमुक्तम् ।‘सर्व एते चिदात्मानो व्युच्चरन्ति’इत्युत्पत्तिरुच्यते । अतो विरोध इत्यत आह –
जीवोऽप्यत एव परमेश्वरादुत्पद्यते । शब्दादेव । ‘ते वा एते चिदात्मनोऽविनष्टाः परञ्ज्योतिर्निविशन्त्यविनष्टा एवोत्पद्यन्ते न विनश्यन्ति कदाचन’इति काषायणश्रुतिः ॥ 18 ॥
ॐ युक्तेश्च ॐ ॥ 19-237 ॥
इति ज्ञाधिकरणम् ॥ 11 ॥
नित्यस्यापि ह जीवस्योपाध्यक्षयोत्पत्तिर्युज्यते।
‘उत्पद्यन्ते चिदात्मानो नित्यान्नित्याः परात्मनः ।
उपाध्यपेक्षया तेषामुत्पत्तिरपि गीयते’
इति व्योमसंहितायाम्॥ 19 ॥
उत्क्रान्त्यधिकरणम्
ॐ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॐ ॥ 20-238 ॥
‘व्याप्ताह्यात्मानश्चेतना निर्गुणाश्च सर्वात्मानः सर्वरूपा अनन्ताः’ इति काषायणश्रुतौ व्याप्तत्वं प्रतीयते ।
‘अणुर्ह्येष आत्मायं वा एते सिनीतः । पुण्यं चापुण्यं च’ इति गौपवनश्रुतावणुत्वमित्यतो विरोध इति । अतो ब्रवीति-
हेतूनाम् सकाशादणुरेव ।
‘सोऽस्माच्छरीरादुत्क्रम्यामुं लोकमभिगच्छत्यमुष्मादिमं लोकमागच्छति स गर्भो भवति स प्रसूयते स कर्म कुरुते’
इति पौष्यायणश्रुतेः॥ 20 ॥
ॐ स्वात्मना चोत्तरयोः ॐ ॥ 21-239 ॥
तत्र स्वातन्त्र्य प्रतीतेः-
एकः प्रसूयते जन्तुरेक एव प्रमीयते। एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम्’ इत्यादेश्च ॥ स्वयमेवेत्यतो वक्ति –
‘स एतेनैव स्वात्मना परेणेमं गर्भमनुप्रविशति परेण जायते परेण कर्म कुरुते परेण नीयते परेणोन्नीयते। तं वा एतमभिवदन्ति स्वात्मा’ इति।
‘एष ह्यानन्दमादत्ते एष ह्येनं जीवमभिजीवयत्येष उद्गमयत्येष आगमयति। इत्युत्तरयोर्वाक्ययोः परमात्मनैवोत्क्रान्त्यादयः ॥ 21 ॥
ॐ नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधिकारात् ॐ ॥ 22-240 ॥
‘व्याप्ताह्यात्मानश्चेतना निर्गुणाश्च’ इति व्याप्तिश्रुतेर्नाणुर्जीव इति चेन्न ।
‘स आत्मेदं सृजति स द्विधेदं बिभर्ति अन्तर्बहिश्च । स बहुधेदमनुप्रविश्यात्मनोऽभिनयति । स आत्मा स आत्मानः स ईशः स विष्णुः स परः परोवरीयान्’ इति परमात्माधिकारत्वात् ।
‘एकशब्दैर्द्विशब्दैश्च बहुशब्दैश्च केशवः ।
एक एवोच्यते वेदैस्तावता नास्य भिन्नता’इति भविष्यत्पुराणे ।
‘तदयं प्राणोऽधितिष्ठति। तदुक्तमृषिणाऽऽतेन यातम्’ इत्यादि च ॥ 22 ॥
ॐ स्वशब्दोन्मानाभ्यां च ॐ ॥ 23-241 ॥
‘एषो ह्यात्माऽध्युद्गतो मानशक्तेस्तथाऽप्यसौ प्रमितिं याति वेदैः ।
पूर्णोऽचिन्त्यः सर्ववेदैकयोनिः सर्वाधीशः सर्ववित् सर्वकर्ता’
इति वाक्यशेषे आत्मशब्दोन्मानाभ्यां च।
‘आत्माऽमेयः परं ब्रह्म परानन्दादिकाभिधाः।वदन्ति विष्णुमेवैकं नान्यत्रासां गतिः क्वचित्’ इति च कौर्मे ॥ 23 ॥
ॐ अविरोधश्चन्दनवत् ॐ ॥ 24-242 ॥
अणोरपि जीवस्य सर्वशरीरव्याप्तिर्युज्यते।यथा हरिचन्दनविप्लुष एकदेशपतितायाः सर्वशरीरव्याप्तिः ।
‘अणुमात्रोऽप्ययं जीवः स्वदेहं व्याप्य तिष्ठति ।यथा व्याप्य शरीराणि हरिचन्दनविप्लुषः’ इति च ब्रह्माण्डपुराणे ॥ 24 ॥
ॐ अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि ॐ ॥ 25-243 ॥
सम्यगसम्यगवस्थानविशेषाद्युज्यते चन्दनस्येति चेन्न। ‘हृदि ह्येषा आत्मा’ इति जीवास्यापि तथाऽभ्युपगमात् ॥ 25 ॥
ॐ गुणाद्वाऽऽलोकवत् ॐ ॥ 26-244 ॥
॥ इति उत्क्रान्त्यधिकरणम् ॥ 12 ॥
यथाऽऽलोकस्य प्रकाशगुणेन व्याप्तिर्ज्योतीरूपेणाव्याप्तिः एवं चिद्गुणेन व्याप्तिर्जीवरूपेणाव्याप्तिरिति वा । स्कान्दे च –
‘असम्यक् सम्यगिति च व्यवस्थाभेदतः सुराः।
व्याप्त्यव्याप्तियुतास्त्वन्ये चिद्गुणेनैव नान्यथा॥
चिद्गुणस्य स्वरूपत्वात् तद्व्याप्तिश्चेति युज्यते।
शक्तियोगात् सुराणां तु विविधा च व्यवस्थितिः’ इति ॥ 26 ॥
व्यतिरेकाधिकरणम्
ॐ व्यतिरेको गन्धवत् तथा च दर्शयति ॐ ॥ 27-245 ॥
‘स नित्यो निरवयवः पुण्ययुक् पापयुक् च स इमं लोकममुं चावर्तते स विमुच्यते स एकधा न सप्तधा न शतधा’ इति गौपवनश्रुतावेकस्याबहुत्वं प्रतीयते ।
‘स पञ्चधा स सप्तधा स दशधा भवति स शतधा च सहस्रधा स गच्छति स मुच्यते’ इति पाराशर्यायणश्रुतौ बहुरूपत्वं प्रतीयते ।अतो विरोधं परिहरति-
॥ इति व्यतिरेकाधिकरणम् ॥ 13 ॥
यथा पुष्पाद्गन्धः पृथग्गच्छति एवमंशिनो जीवादंशाः पृथग्गच्छन्ति ।
‘अथैक एव सन् गन्धवद्व्यतिरिच्यते । अथैकीभवति। अथ बह्वीभवति ।
तं यथा यथेश्वरः कुरुते तथा भवति सोऽचिन्त्यः परमो गरीयान्’ इति शाण्डिल्यश्रुतिः ।
‘अचिन्त्ययेशशक्त्यैव ह्येकोऽवयववर्जितः ।आत्मानं बहुधा कृत्वा क्रीडते योगसम्पदा’ इति च पाद्मे ॥ 27 ॥
पृथगुपदेशाधिकरणम्
ॐ पृथगुपदेशात् ॐ ॥ 28-246 ॥
‘तत्वमसि’ ,’अहं ब्रह्मास्मि’ इत्यादिषु जीवस्य परेणाभेदः प्रतीयते ।‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’ ‘द्वा सुपर्णा’ इत्यादिषु भेदः। अत उच्यते-
‘बिन्नोऽचिन्त्यः परमो जीवसङ्घात्पूर्णः परो जीवसङ्घो ह्यपूर्णाः । यतस्त्वसौ नित्यमुक्तो ह्ययं च बन्धान्मोक्षं तत एवा-भिवाञ्छेत्’
इति सोपपत्तिककौशिकश्रुतेर्भिन्न एव जीवः ॥ 28 ॥
ॐ तद्गुणसारत्वात् तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॐ ॥ 29-247 ॥
॥ इति पृथगुपदेशाधिकरणम् ॥ 14 ॥
ज्ञानानन्दादिब्रह्मगुणा एवास्य यतः सारः स्वरूपमतोऽभेदव्यपदेशः । यथा सर्वगुणात्मकत्वात् सर्वात्मकत्वं ब्रह्मण उच्यते‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ इति भविष्यत्पर्वणि च –
‘भिन्ना जीवाः परो भिन्नस्तथापि ज्ञानरूपतः ।
प्रोच्यन्ते ब्रह्मरूपेण वेदवादेषु सर्वशः’ इति॥ 29 ॥
यावदधिकरणम्
ॐ यावदात्माभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॐ ॥ 30-248 ॥
जीवास्याप्युत्पत्तिरुक्ता । अतस्तस्य ‘सोऽनादिना पुण्येन पापेन चानुबद्धः। परेण निर्मुक्त आनन्त्याय कल्पते’ । इत्यानादिकर्मसम्बन्ध आनन्त्यावाप्तिश्च न युज्यत इत्यत आह –
॥ इति यावदधिकरणम् ॥ 15 ॥
यावत्परमात्मा तिष्ठत्यनाद्यनन्तत्वेनैवं जीवोऽपि ।
‘नित्यः परो नित्यो जीवोऽनित्यास्तस्य धातवः ।अत उत्पद्यते च म्रियते च विमुच्यते च’इति च आग्निवेश्यश्रुतिः ।
‘आत्मा नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये, जीवो नित्यो धातुरस्य त्वनित्यः’
इति च भारते ॥ 30 ॥
पुंस्त्वाधिकरणम्
ॐ पुंस्त्वादिवत्त्वस्यसतोऽभिव्यक्तियोगात् ॐ ॥ 31-249 ॥
‘विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः’ । ‘स आनन्दः स बलः स ओजः स परेणामुं लोकं नीयते स विमुच्यत इति जीवस्य ज्ञानानन्दादिरूपत्वमुच्यते । स दुःखाद्विमुक्त आनन्दी भवति । सोऽज्ञानाद्विमुक्तो ज्ञानी भवति ।सोऽबलाद्विमुक्तो बली भवति। स नित्यो निरातङ्कोऽतिष्ठते’ इति पैङ्गीश्रुतावनानन्दादिरूपत्वं प्रतीयते । अत आह –
यथा बालस्य सदेव पुंस्त्वं यौवनेऽभिव्यज्यत एवं सतामेवानन्दादीनां व्यक्त्यपेक्षया तदुक्तिः ।
‘बलमानन्द ओजश्च सहो ज्ञानमनाकुलम् ।स्वरूपाण्येव जीवस्य व्यज्यन्ते परमाद्विभोः’इति च गौपवनश्रुतिः॥ 31 ॥
ॐ नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा ॐ ॥ 32-250 ॥
॥ इति पुंस्त्वाधिकरणम् ॥ 16 ॥
व्यक्तनङ्गीकारे देवानां च नित्योपलब्धिरानन्दादीनामसुराणां नित्यानुपलब्धिर्मनुष्याणां च नित्योपलब्ध्यनुपलब्धी च प्रसज्येते ।‘नित्यानन्दो नित्यज्ञानो नित्यबलः परमात्मा नैवमसुरा एवमनेवं च मनुष्याः’ इति ह्याग्निवेश्यश्रुतिः ।भविष्यत्पर्वणि च-
‘नित्यानन्दज्ञानबला देवा नैवं तु दानवाः ।
दुःखोपलब्धिमात्रास्ते मानुषस्तूभयात्मकाः ॥
तेषां यदन्यथा दृश्यं तदुपाधिकृतं मतम् ।
विज्ञानेनात्मयोगेन निजरूपे व्यवस्थितिः ॥
सम्यज्ज्ञानं तु देवानां मनुष्याणां विमिश्रितम् ।
विपरीतं च दैत्यानां ज्ञानस्यैवं व्यवस्थितिः’ इति ॥ 32 ॥
कर्तृत्वाधिकरणम्
ॐ कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॐ ॥ 33-251 ॥
ईश्वरस्यैव कर्तृत्वमुक्तम् । ’यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते’ इति जीवस्याप्युपलभ्यते । अत आह-
जीवस्य कर्तृत्वाभावे शास्त्रस्याप्रयोजकत्वप्राप्तेर्जीवोऽपि कर्ता ॥ 33 ॥
ॐ विहारोपदेशात् ॐ ॥ 34-252 ॥
‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाऽज्ञातिभिर्वा’ इत्यादिना मोक्षेऽपि ॥ 34 ॥
ॐ उपादानात् ॐ ॥ 35-253 ॥
साधनाद्युपादानप्रतीतेश्च ॥ 35 ॥
ॐ व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देशविपर्ययः ॐ ॥ 36-254 ॥
‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’ इति क्रियायां व्यपदेशाच्च । अन्यथाऽऽत्मैव लोकमिति निर्देशः स्यात् ॥ 36 ॥
तर्हि कथमीश्वरस्यैव कर्तृत्वमित्यतो वक्ति –
ॐ उपलब्धिवदनियमः ॐ ॥ 37-255 ॥
यथा ज्ञान इदं ज्ञास्यामीत्यनियमः प्रतीयते एवं कर्मण्यपि जीवस्य । ‘य आत्मानमन्तरो यमयति’ इति च श्रुतिः ॥ 37 ॥
ॐ शक्तिविपर्ययात् ॐ ॥ 38-256 ॥
कुतः ? –
अल्पशक्तित्वाज्जीवस्य ॥ 38 ॥
ॐ समाध्यभावाच्च ॐ ॥ 39-257॥
समाधानाभावाच्चास्वातन्त्र्यं प्रतीयते ॥ 39 ॥
ॐ यथा च तक्षोभयथा ॐ ॥ 40-258 ॥
यथा तक्ष्णः कारयितृनियतत्वं कर्तृत्वं च विद्यते एवं जीवस्यापि ॥ 40 ॥
ॐ परात् तु तच्छ्रुतेः ॐ ॥ 41-259 ॥
सा च कर्तृत्वशक्तिः परादेव ।
‘कर्तृत्वं करणत्वं च स्वभावश्चेतना धृतिः ।यत्प्रसादादिमे सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’इति हि पैङ्गि श्रुतिः ॥ 41 ॥
ॐ कृतप्रयत्नापेक्षस्तुविहितप्रतिषेधावैयर्थ्यादिभ्यः ॐ ॥ 42-260 ॥
॥ इति कर्तृत्वाधिकरणम् ॥ 17 ॥
ततोऽप्रयोजकत्वं शास्त्रस्य नापद्यते । कृतप्रयत्नापेक्षत्वात् तत्प्रेरकत्वस्य । आदिशब्देनावैषम्यादि ।
‘पूर्वकर्म प्रयत्नं च संस्कारं चाप्यपेक्ष्यतु ।ईश्वरः कारयेत् सर्वं तच्चेश्वरकृतं स्वयम् ॥अनादित्वाददोषश्च पूर्णशक्तित्वतो हरेः’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
‘एतदेवं न चाप्येवमेतदस्ति च नास्ति च’ इति च मोक्षधर्मे ॥ 42 ॥
अंशाधिकरणम्
ॐ अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके ॐ ॥ 43-261 ॥
‘अंशा एव हीमे जीवा अंशी हि परमेश्वरः । स्वयमंशैरिदं सर्वं कारयत्यचलो हरिः’ ॥ इति गौपवनश्रुतौ अंशत्वं जीवस्योपलभ्यते ।
‘नैवांशो न सम्बन्धो नापेक्ष्यो जीवः परस्य । तथाऽपि तु यथायोगं फलदः प्रभुरेकराट् । न नियम्यः स कस्यापि स सर्वस्य नियामकः’ ॥ इति च भाल्लवेयश्रुतौ ॥अतो ब्रवीति-
‘मां रक्षतु विभुर्नित्यं पुत्रोऽहं परमात्मनः’ ।
‘अवः परेण पितरं यो अस्यानुवेद पर एनावरेण’ ।
‘यस्तद्वेद स पितुष्टिताऽसत्’ ।
‘यस्ताविजानात् स पितुष्पिताऽसत्’।
‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’इत्यादिना नावाव्यपदेशादंशो जीवः ।
तथा च पाराशर्यायणश्रुतिः-
‘अंशो ह्येष परस्य योऽयं पुमानुत्पद्यते च म्रियते च नाना ह्येनं व्यपदिशन्ति पितेति पुत्रेति भ्रातेति सखेति’ च इति ।
‘अन्यः परोऽन्यो जीवो नासावस्य कुतश्चन ।
नायं तस्यापि कश्चन’ इत्यन्यथा च काषायणश्रुतिः ।
‘ब्रह्मा दाशा ब्रह्म कितवाः, ब्रह्मैवेमे दाशा’इत्यभेदेनाप्येकेऽधीयते ।
तथा चाग्निवेश्यश्रुतिः-
‘अंशो ह्येष परस्य भिन्नं ह्येनमधीयिरेऽभिन्नं ह्येनमधीयिरे’ इति ॥
वाराहे च-
‘पुत्रभ्रातृसखित्वेन स्वामित्वेन यतो हरिः ।
बहुधा गीयते वेदैर्जीवोंऽशस्तस्य तेन तु ॥
यतो भेदेन तस्यायमभेदेन च गीयते ।
अतश्चांशत्वमुद्धिष्टं भेदाभेदौ न मुख्यतः’ इति ॥ 43 ॥
ॐ मन्त्रवर्णात् ॐ ॥ 44-262 ॥
‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’ इति ॥ 44 ॥
ॐ अपि स्मर्यते ॐ ॥ 45-263 ॥
‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन’ इति ॥ 45 ॥
ॐ प्रकाशादिवन्नैवं परः ॐ ॥ 46-264 ॥
अनंशत्वश्रुतेर्गतिं चाह –
अंशत्वेऽपि न मत्स्यादिरूपी पर एवंविधः।यथा तेजोऽम्शस्यैव कालाग्नेः खद्योतस्य च नैकप्रकारता। यथा जलांशस्यामृतसमुद्रस्य मूत्रादेश्च । यथा च पृथिव्यंशस्य मेरोर्विष्टादेश्च । अभिमानिदेवतापेक्षयैतत् ॥ 46 ॥
ॐ स्मरन्ति च ॐ ॥ 47-265 ॥
‘एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ ।
‘अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।
अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः’ ॥
‘स्वांशश्चाथो विभिन्नांश इति द्वेधाऽम्श इष्यते ।
अंशिनो यत् तु सामर्थ्यं यत् स्वरूपं यथास्थितिः॥
‘तदेव नाणुमात्रोऽपि भेदः स्वांशांशिनोः क्वचित् ।विभिन्नांशोऽल्पशक्तिःस्यात् किञ्चित्सादृश्यमात्रयुक्’ ॥ इति वाराहे ।
‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’ इति च ॥ 47 ॥
ॐ अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरादिवत् ॐ ॥ 48-266 ॥
परानुज्ञया प्रवृत्तिः परतो बन्धनिवृत्तिश्च जीवस्य प्रतीयते, अंशत्वेऽपि देहसम्बन्धात् ।’य आत्मानमन्तरो यमयति’ । ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ इत्यादिना । न तु परस्य।
‘वासुदेव सङ्कर्षणः प्रद्युम्नोऽनिरुद्धोऽहं मत्स्यः कूर्मो वराहो नारसिंहो वामनो रामो रामः कृष्णो बुद्धः कल्किरहं शतधाऽहं सहस्तधाऽहमितेऽहमनन्तोऽहं नैवैते जायन्ते न म्रियन्ते नैषामनुज्ञान बन्धो न मुक्तितो सर्व एव ह्येते पूर्णा अजरा अमृताः परमाः परानन्दाः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ।
युज्यते च ज्योतिरादिवत् यथाऽऽदित्यो वियद्गतस्तत्प्रकाशश्चैकप्रकारः । ‘शुक्लं कृष्णं कनीनिका’ इति तदंशस्याप्यक्ष्णो देहसम्बन्धान्न तादृशी शक्तिः । तदनुग्राह्यत्वं तेनैवावृतिपरिहारश्च । यथा बाह्यामृतजलस्यामृतसमुद्रस्य चैकत्वं तदंशस्यापि श्लेष्मणस्तदनुग्राह्यत्वं तेनैव विरोधिनिवृत्तिश्च ।
मोक्षधर्मे च –
‘यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशाम्पते ।
सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥
ईश्वरो हि महद्भूतं प्रभुर्नारायणो विराट् ।
भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च ॥भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम’ इति ।
वाराहे च-
‘अंशाश्च देहयोग्यत्वाज्जीवा बन्धादिसंयुताः ।
अनुग्राह्याश्चेश्वरेण न तु मत्स्यादिको हरिः ॥
अदेहबन्धयोग्यत्वाद्यथासूर्यप्रभाऽक्षिणी ।
यथाऽमृतसमुद्रस्य श्लेष्मादेश्च द्विरूपता ॥
अनुग्राह्यत्वमन्यस्य तेनैवावृतिरोधनम्’ इति ॥ 48 ॥
ॐ असन्ततेश्चाव्यतिकरः ॐ ॥ 49-267 ॥
अपूर्णशक्तित्वाच्च जीवस्य न मत्स्यादिसाम्यम् । तथा च चतुर्वेदशिखायाम्-
‘तस्य ह वा एतस्य परमस्य त्रीणि रूपाणि, कृष्णो रामः कपिलः इति । तस्य ह वा एतस्य परमस्य पञ्चरूपाणि दशरूपाणि शतरूपाणि सहस्ररूपाण्यमितरूपाणि। तानि ह वा एतानि सर्वाणि पूर्णानि सर्वाण्यनन्तानि सर्वाण्यसम्मितानि । अथावराः सर्व एवापूर्णाः सर्वे एव बध्यन्तेऽथ मुच्यन्ते च केचन’ इति ॥ 49 ॥
ॐ आभास एव च ॐ ॥ 50-268 ॥
॥ इति अंशाधिकरणम् ॥ 18 ॥
‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’ इति प्रतिबिम्बत्वाच्च न साम्यम् ।
वाराहे च–
‘द्विरूपूवंशकौ तस्य परमस्य हरेर्विभोः ।
प्रतिबिम्बांशकश्चाथ स्वरूपांशक एव च ॥
प्रतिबिम्बांशका जीवाः प्रादुर्भावाः परे स्मृताः ।
प्रतिबिम्बेष्वल्पसाम्यं स्वरूपाणीतराणि तु’ इति ॥
‘सोपाधिरनुपाधिश्च प्रतिबिम्बो द्विधेयते ।जीव ईशस्यानुपाधिरिन्द्रचापो यथा रवेः’इति पैङ्गिश्रुतिः ॥
‘यथैषा पुरुषे छाया एतस्मिन्नेतदाततम्’ इति च श्रुतिः ॥ 50 ॥
अदृष्टाधिकरणम्
ॐ अदृष्टनियमात् ॐ ॥ 51-269 ॥
प्रतिबिम्बानां मिथो वैचित्र्ये कारणमाह –
अनादिविद्याकर्मादिवैचित्र्याद्वैचित्र्यम् ॥ 51 ॥
ॐ अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ॐ ॥ 52-270 ॥
इच्छाद्वेषसुखदुःखादिवैचित्र्यं चादृष्टादेव । च शब्देन प्रतिक्षणवैचित्र्यं च ॥52॥
ॐ प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॐ ॥ 53-271 ॥
॥ इति अदृष्टाधिकरणम् ॥ 19 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः॥ 02-03 ॥
न स्वर्गभूम्यादिप्रदेशविशेषाद्वैचित्र्यम् । तत्प्राप्तेरप्यदृष्टापेक्षत्वात्। एकदेशस्थितानामेव वैचित्र्यदर्शनाच्च ॥ 53 ॥