Dwadasha/C4: Difference between revisions
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Revision as of 04:45, 9 April 2026
निजपूर्णसुखामितबोधतनुः परशक्तिरनन्तगुणः परमः ।अजरारमरणः सकलार्तिहरः कमलापतिरीड्यतमोवतु नः ॥1॥
यदसुप्तिगतोपि हरिः सुखवान् सुखरूपिणमाहुरतो निगमाः ।स्वमतिप्रभवं जगदस्य यतः परबोधतनुं च ततः खपतिम् ॥2॥
बहुचित्रजगद्बहुधाकरणात् परशक्तिरनन्तगुणः परमः ।सुखरूपममुष्य पदं परमं स्मरतस्तु भविष्यति तत्सततम् ॥3॥
स्मरणे हि परेशितुरस्य विभोर्मलिनानि मनांसि कुतः करणम् ।विमलं हि पदं परमं स्वरतं तरुणार्कसवर्णमजस्य हरेः ॥4॥
विमलैः श्रुतिशाणनिशाततमैः सुमनोसिभिराशु निहत्य दृढम् ।बलिनं निजवैरिणमात्मतमोभिदमीशमनन्तमुपास्व हरिम् ॥5॥
स हि विश्वसृजो विभुशम्भुपुरन्दरसूर्यमुखानपरानमरान् ।सृजतीड्यतमोवति हन्ति निजं पदमापयति प्रणतान्सुधिया ॥6॥
परमोपि रमेशितुरस्य समो न हि कश्चिदभून्न भविष्यति च ।क्वचिदद्यतनोपि न पूर्णसदागणितेड्यगुणानुभवैकतनोः ॥7॥
इति देववरस्य हरेः स्तवनं कृतवान् मुनिरुत्तममादरतः ।सुखतीर्थापदाभिहितः पठतस्तदिदं भवति ध्रुवमुच्चसुखम् ॥8॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते द्वादशस्तोत्रे चतुर्थोध्यायः ।