Bruhadaranyaka/C6/S5: Difference between revisions
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Revision as of 04:44, 9 April 2026
पञ्चमब्राह्मणम्
अथ वंशः पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात्कात्यायनीपुत्रो गौतमीपुत्रात्
आत्रेयीपुत्रात् आत्रेयीपुत्रोगौतमीपुत्रात् गौतमीपुत्रः
याज्ञवल्क्याद् याज्ञवल्क्यःउद्दालकाद् उद्दालकः
समानमा सांजीवीपुत्रात्सांजीवीपुत्रो माण्डूकायनेः
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषत् समाप्ता ॥
॥ इति बृहद्भाष्ये अष्टमाध्याये वंशब्राह्मणम् ॥ ५ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थ भगवत्पादाचार्यप्रणीतं बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥
पञ्चाग्निविद्यया चैव तथैव प्राणविद्यया ।
प्रजातिकर्मणा चैव तथा ज्ञानप्रदानतः ॥
आचार्यवंशविज्ञानाद्यः पूज्यः पुरुषोत्तमः ।
सर्वान्तर्यामिको नित्यो नमस्तस्मै परात्मने ॥ इति सद्भावे ।नित्यानन्दमनौपमं परमजं सर्वत्रगं सुस्थिरं सर्वज्ञं प्रतिबोधमात्रममलं पूर्णं गुणैरच्युतैः ।
विश्वोत्पत्तिलयस्थितिप्रमितिसन्मोक्षे परं कारणं प्रेष्ठं मे सततं प्रियात् प्रियतमं नित्यं सदोपास्महे ॥
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं
बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुर्मध्वो
यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हि तेन प्रभौ ॥हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः ।
रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि ॥
भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृतः ।
ऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् ॥
प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृताः ।
मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् ॥
मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः ।
इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ॥ यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥ इति चसाधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा ।
हनुमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः ॥
पृतनाक्षयकारी च द्वितीयस्तु तृतीयकः ।
पूर्णप्रज्ञस्तथाऽनन्दतीर्थनामा प्रकीर्तितः ॥
दशेति सर्वमुद्दिष्टं सर्वं पूर्णमिहोच्यते ।
प्रज्ञा प्रमतिरुद्दिष्टा पूर्णप्रज्ञस्ततः स्मृतः ॥
आसमन्तात् पतित्वे तु गूढं कलियुगे हरिम् ।
असत्यमप्रतिष्ठं तु जगदेतदनीश्वरम् ॥
वदद्भिर्गूहितं सन्तं तृतीयोऽसुर्मथायति ।
येन विष्णोर्हि वर्पाख्यान् गुणानज्ञासिषुः परान् ॥
ईशानाशः सूरयश्च निगूढाभिर्गुणोक्तिभिः ।
त्रेतायां द्वापरे चैव कलौ चैते क्रमात् त्रयः ॥
येषां हि परमो विष्णुर्नेता सर्वेश्वरेश्वरः ।
स्वयं तु ब्रह्मसंज्ञोऽसौ परस्मै ब्रह्मणे नमः॥ इति च ॥पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे ।
अमन्दानन्दसांद्राय प्रेयसे विष्णवे नमः ॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्यायः ॥