Bruhadaranyaka/C6/S4: Difference between revisions
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| verse_line1 = एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = स ह प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाऽध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजन् ॥ २ ॥ | | verse_line1 = स ह प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाऽध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजन् ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणो समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृंक्तेऽथ यदिदमविद्वानधोपहासं चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृंजते ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणो समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृंक्तेऽथ यदिदमविद्वानधोपहासं चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृंजते ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्यभिप्राण्यादिंद्रियेण ते आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमार हारीत आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिंद्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्यभिप्राण्यादिंद्रियेण ते आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमार हारीत आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिंद्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = तदभिमृशेदनु वा मंत्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कात्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदप इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मा मैत्विंद्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकांगुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = तदभिमृशेदनु वा मंत्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कात्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदप इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मा मैत्विंद्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकांगुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यद्युदक आत्मानं परिपश्येत् तदभिमंत्रयेत मयि तेज इंद्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = अथ यद्युदक आत्मानं परिपश्येत् तदभिमंत्रयेत मयि तेज इंद्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मात् मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमंत्रयेत ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मात् मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमंत्रयेत ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिंद्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिंद्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = सा चेदस्मै दद्यादिंद्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥ | | verse_line1 = सा चेदस्मै दद्यादिंद्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायाभिप्राण्यापान्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥ | | verse_line1 = अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायाभिप्राण्यापान्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यामिच्छेद् गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्याभिप्राण्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = अथ यामिच्छेद् गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्याभिप्राण्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यस्य जायायै जारः स्यात् तं चेत् द्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमं शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रं पशूंस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशा पराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिंद्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवं विद्वान् ब्राह्मणः शपति तस्मादेवं विच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित् परो भवति ॥१२॥ | | verse_line1 = अथ यस्य जायायै जारः स्यात् तं चेत् द्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमं शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रं पशूंस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशा पराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिंद्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवं विद्वान् ब्राह्मणः शपति तस्मादेवं विच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित् परो भवति ॥१२॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं कंसेन पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥१३॥ | | verse_line1 = अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं कंसेन पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥१३॥ | ||
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| verse_line1 = स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो गौरो जायेत वेदमनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातां ईश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो गौरो जायेत वेदमनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातां ईश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिंगलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिंगलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ य इच्छेद्दुहिता मे पंडिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = अथ य इच्छेद्दुहिता मे पंडिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पंडितो विजिगीथः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयित्वा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पंडितो विजिगीथः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयित्वा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं वेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहाऽनुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं वेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहाऽनुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १९ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथैनामभिपद्यते - अमोऽहमस्मि सा त्वं, सा त्वमस्यमोहं, सामाहमस्मि ऋक् त्वं , द्यौरहं पृथिवी त्वं, तावेहि संरभावहै, सह रेतो दधावहै, पुंसे पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥ | | verse_line1 = अथैनामभिपद्यते - अमोऽहमस्मि सा त्वं, सा त्वमस्यमोहं, सामाहमस्मि ऋक् त्वं , द्यौरहं पृथिवी त्वं, तावेहि संरभावहै, सह रेतो दधावहै, पुंसे पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥ | ||
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| verse_line1 = अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि । | | verse_line1 = अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि । | ||
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| verse_line1 = सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्करिणीं समिंगयति । सर्वत एवा ते गर्भं एजतु सहावैतु जरायुणा इंद्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयस्तमिंद्र निर्जहि गर्भेण सावरं सहेति ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्करिणीं समिंगयति । सर्वत एवा ते गर्भं एजतु सहावैतु जरायुणा इंद्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयस्तमिंद्र निर्जहि गर्भेण सावरं सहेति ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = जातोऽग्निमुपसमाधायांक आधाय कंसे पृषदाज्यं सन्नीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोति अस्मिन् सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्द्यां मा च्छैत्सीः प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा मयि प्राणांस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा । | | verse_line1 = जातोऽग्निमुपसमाधायांक आधाय कंसे पृषदाज्यं सन्नीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोति अस्मिन् सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्द्यां मा च्छैत्सीः प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा मयि प्राणांस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा । | ||
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| verse_line1 = अथास्य दक्षिणं कर्ममभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतं संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः त्वयि सर्वं दधामीति ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = अथास्य दक्षिणं कर्ममभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतं संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः त्वयि सर्वं दधामीति ॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति , यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति , यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥ | ||
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| verse_id = BR_C06_S04_V28 | |||
| id = BR_C06_S04_V28_author-note | |||
| name = Bhashyam | |||
| text = | |||
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये चतुर्थब्राह्मणम् ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
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Revision as of 04:44, 9 April 2026
चतुर्थब्राह्मणम्
एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥
स ह प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाऽध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजन् ॥ २ ॥
तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणो समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृंक्तेऽथ यदिदमविद्वानधोपहासं चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृंजते ॥ ३ ॥
एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्यभिप्राण्यादिंद्रियेण ते आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमार हारीत आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिंद्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥
तदभिमृशेदनु वा मंत्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कात्सीद्यदोषधीरप्यसरद्यदप इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मा मैत्विंद्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकांगुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥ ५ ॥
अथ यद्युदक आत्मानं परिपश्येत् तदभिमंत्रयेत मयि तेज इंद्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति ॥ ६ ॥
श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मात् मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमंत्रयेत ॥ ७ ॥
सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिंद्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ८ ॥
सा चेदस्मै दद्यादिंद्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेत् ।
अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायाभिप्राण्यापान्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥
अथ यामिच्छेद् गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धायापान्याभिप्राण्यादिंद्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥
अथ यस्य जायायै जारः स्यात् तं चेत् द्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमं शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रं पशूंस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशा पराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिंद्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवं विद्वान् ब्राह्मणः शपति तस्मादेवं विच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित् परो भवति ॥१२॥
अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं कंसेन पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥१३॥
स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो गौरो जायेत वेदमनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातां ईश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥
अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिंगलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५ ॥
अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥
अथ य इच्छेद्दुहिता मे पंडिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥
अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पंडितो विजिगीथः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयित्वा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥
अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं वेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहाऽनुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १९ ॥
अथैनामभिपद्यते - अमोऽहमस्मि सा त्वं, सा त्वमस्यमोहं, सामाहमस्मि ऋक् त्वं , द्यौरहं पृथिवी त्वं, तावेहि संरभावहै, सह रेतो दधावहै, पुंसे पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥
अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं सन्धाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि ।विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।
हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ ।तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये ॥
सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्करिणीं समिंगयति । सर्वत एवा ते गर्भं एजतु सहावैतु जरायुणा इंद्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयस्तमिंद्र निर्जहि गर्भेण सावरं सहेति ॥ २३ ॥
जातोऽग्निमुपसमाधायांक आधाय कंसे पृषदाज्यं सन्नीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोति अस्मिन् सहस्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्द्यां मा च्छैत्सीः प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा मयि प्राणांस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा ।यत्कर्मणात्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम् ।
अथास्य दक्षिणं कर्ममभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधि मधु घृतं संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते दधामि भूर्भुवः स्वः त्वयि सर्वं दधामीति ॥ २५ ॥
अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥
अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति , यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥
अथास्य मातरमभिमंत्रयत इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत् ।सा त्वं वीरवती भव याऽस्मान् वीरवतोऽकरदिति
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये चतुर्थब्राह्मणम् ॥ ४ ॥