Bruhadaranyaka/C6/S3: Difference between revisions
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| verse_line1 = स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहं उपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति सम्भृत्य परिसमूह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यं संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थंसन्नीय जुहोति | | verse_line1 = स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहं उपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति सम्भृत्य परिसमूह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यं संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थंसन्नीय जुहोति | ||
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| verse_line1 = अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवस्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवस्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकशफमसि हिंकृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमसि उद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे सन्दीप्तमसि विभुरसि प्रभुरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकशफमसि हिंकृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमसि उद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे सन्दीप्तमसि विभुरसि प्रभुरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथैनमुद्यच्छत्यामं स्यामं हि ते महि स हि राजेशानोऽधिपतिः स मां राजेशानोऽधिपतिं करोत्विति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = अथैनमुद्यच्छत्यामं स्यामं हि ते महि स हि राजेशानोऽधिपतिः स मां राजेशानोऽधिपतिं करोत्विति ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा । भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा । धियो यो नः प्रचोदयात् मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु मां अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशन्ति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशमेकपुंडरीकमसि अहं मनुष्याणामेकपुंडरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा । भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा । धियो यो नः प्रचोदयात् मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु मां अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशन्ति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशमेकपुंडरीकमसि अहं मनुष्याणामेकपुंडरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तं हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = तं हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियंगवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियंगवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥ | ||
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| verse_id = BR_C06_S03_V13 | |||
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| name = Bhashyam | |||
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॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये तृतीयब्राह्मणम् ॥ ३ ॥ | |||
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Revision as of 04:44, 9 April 2026
तृतीयब्राह्मणम्
स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहं उपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति सम्भृत्य परिसमूह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यं संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थंसन्नीय जुहोतियावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामांस्तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि
ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ।
अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा संस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूर्भुवस्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति ॥ ३ ॥
अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकशफमसि हिंकृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमसि उद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे सन्दीप्तमसि विभुरसि प्रभुरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥
अथैनमुद्यच्छत्यामं स्यामं हि ते महि स हि राजेशानोऽधिपतिः स मां राजेशानोऽधिपतिं करोत्विति ॥ ५ ॥
अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा । भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा । धियो यो नः प्रचोदयात् मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु मां अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशन्ति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशमेकपुंडरीकमसि अहं मनुष्याणामेकपुंडरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥
तं हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥
एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैंग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥
एतमु हैव मधुकः पैंग्यश्चूलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ९ ॥
एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकाय आयस्थूणायन्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ १० ॥
एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्च्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ११ ॥
एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरन् शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वाऽनन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥
चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियंगवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये तृतीयब्राह्मणम् ॥ ३ ॥