Jump to content

Bruhadaranyaka/C5/S20: Difference between revisions

From Grantha
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Line 1: Line 1:
{{Adhyaya
{{Adhyaya
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id  = BR_C05
| chapter_num  = 5
| chapter_num  = 5
| chapter_name = सप्तमोऽध्यायः
| section_id  = BR_C05_S20
| section_num  = 20
| title        = विंशं ब्राह्मणम्
| title        = विंशं ब्राह्मणम्
}}
}}
Line 14: Line 10:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C05
| chapter_id    = BR_C05
| section_id    = BR_C05_S20
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
| verse_line1  = हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
Line 39: Line 33:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C05
| chapter_id    = BR_C05
| section_id    = BR_C05_S20
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।
| verse_line1  = पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।
Line 61: Line 53:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C05
| chapter_id    = BR_C05
| section_id    = BR_C05_S20
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
| verse_line1  = योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
Line 81: Line 71:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C05
| chapter_id    = BR_C05
| section_id    = BR_C05_S20
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ॥ ३ ॥
| verse_line1  = वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ॥ ३ ॥
Line 102: Line 90:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C05
| chapter_id    = BR_C05
| section_id    = BR_C05_S20
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ ४ ॥
| verse_line1  = ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ ४ ॥
Line 121: Line 107:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C05
| chapter_id    = BR_C05
| section_id    = BR_C05_S20
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
| verse_line1  = अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
Line 128: Line 112:
}}
}}


{{AuthorNote| text = ॥  इति बृहद्भाष्ये  विंशं ब्राह्मणम् ॥}}
{{Commentary
| verse_id = BR_C05_S20_V06
| id      = BR_C05_S20_V06_author-note
| name    = Bhashyam
| text     =
॥  इति बृहद्भाष्ये  विंशं ब्राह्मणम् ॥
}}


{{AuthorNote| text = इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्यायः ॥}}
{{Commentary
| verse_id = BR_C05_S20_V06
| id      = BR_C05_S20_V06_author-note
| name    = Bhashyam
| text     =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्यायः ॥
}}


{{Commentary
{{Commentary

Revision as of 04:44, 9 April 2026

विंशं ब्राह्मणम्

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १ ॥


सूर्यमंडलनाम्ना तु पात्रेण स्वमुखं हरिः ।
             पिधायैव जगत्सर्वं पश्यत्यमितविक्रमः ॥
             उदकं पीयते तेन तमसस्त्रायते जगत् ।
             यतोऽतः पात्रमुद्दिष्टं विद्वद्भिः सूर्यमंडलम् ॥
             पूषा पूर्णत्वतो विष्णुर्दृष्टये विष्णुधर्मिणः ।
स्वमुखं प्रकाशयेदेकं नान्यथा तु कथञ्चन ॥
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ २ ॥


नान्यो यत्तादृशो ज्ञाता तस्मादेकऋषिर्हरिः ।
             यमो नियमानात् प्रोक्तः सूर्य ऊरीकृतेरयम् ॥
ज्ञेयः प्रजापतेरेव प्राजापत्यस्ततः स्मृतः ।
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥


प्राणे स्थितो यः पुरुषः सोऽसावहमिति स्मृतः ॥ अहेयत्वादसुत्वाच्च मेयत्वाच्चास्मिनामकः ॥
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ॥ ३ ॥


अदोषत्वाद् अ इत्युक्तो वायुस्तन्निलयो यतः ॥
             अनिलं तत एवासावमृतं चेति कीर्त्यते ।
तदाश्रयोऽपि ह्यमृतः किमु साक्षात्स्वयं हरिः ॥
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ ४ ॥


क्रतुश्च ज्ञानरूपत्वात् स एव हि जनार्दनः ।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ ५ ॥


॥ इति बृहद्भाष्ये विंशं ब्राह्मणम् ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्यायः ॥
सोऽग्निरंगप्रणेतृत्वात् विश्वज्ञानविदां वरः ॥ इति च । जुहुराणं अल्पं कुर्वत् । न वा अहमिमं जानातीतिवत् । सर्वत्राप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाच्येव ॥