Bruhadaranyaka/C5/S20: Difference between revisions
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Revision as of 04:44, 9 April 2026
विंशं ब्राह्मणम्
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १ ॥
सूर्यमंडलनाम्ना तु पात्रेण स्वमुखं हरिः ।
पिधायैव जगत्सर्वं पश्यत्यमितविक्रमः ॥
उदकं पीयते तेन तमसस्त्रायते जगत् ।
यतोऽतः पात्रमुद्दिष्टं विद्वद्भिः सूर्यमंडलम् ॥
पूषा पूर्णत्वतो विष्णुर्दृष्टये विष्णुधर्मिणः ।
स्वमुखं प्रकाशयेदेकं नान्यथा तु कथञ्चन ॥पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ २ ॥
नान्यो यत्तादृशो ज्ञाता तस्मादेकऋषिर्हरिः ।
यमो नियमानात् प्रोक्तः सूर्य ऊरीकृतेरयम् ॥ज्ञेयः प्रजापतेरेव प्राजापत्यस्ततः स्मृतः ।
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
प्राणे स्थितो यः पुरुषः सोऽसावहमिति स्मृतः ॥
अहेयत्वादसुत्वाच्च मेयत्वाच्चास्मिनामकः ॥
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ॥ ३ ॥
अदोषत्वाद् अ इत्युक्तो वायुस्तन्निलयो यतः ॥
अनिलं तत एवासावमृतं चेति कीर्त्यते ।तदाश्रयोऽपि ह्यमृतः किमु साक्षात्स्वयं हरिः ॥
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ ४ ॥
क्रतुश्च ज्ञानरूपत्वात् स एव हि जनार्दनः ।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ ५ ॥
॥ इति बृहद्भाष्ये विंशं ब्राह्मणम् ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्यायः ॥
सोऽग्निरंगप्रणेतृत्वात् विश्वज्ञानविदां वरः ॥ इति च ।
जुहुराणं अल्पं कुर्वत् । न वा अहमिमं जानातीतिवत् । सर्वत्राप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाच्येव ॥