Bruhadaranyaka/C5/S13: Difference between revisions
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Revision as of 04:44, 9 April 2026
त्रयोदशं ब्राह्मणम्
एतद्वै परमं तपो यद् व्याधितस्तप्यते परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परमं हैव स लोकं जयति य एवं वेद ॥
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये त्रयोदशं ब्राह्मणम् ॥ ८ ॥
॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये त्रयोदशं ब्राह्मणम् ॥
व्याधीञ्छवहृतिं चैव शवदाहादिकं तथा ।
विष्णवे तप इत्येव चिन्तयन् याति तत्परम् ॥ इति च ॥
ओशितोऽपि क्लेशादीनतीतैष्यानपीह यः ।
विष्णवे तप इत्येव प्रार्पयेत् स परं व्रजेत् ॥
विष्णोः स्वरूपवेत्ता चेदन्यथा न कथञ्चन ।
यथा स्वरूपवेत्तुः स्यादेकैकापि ह्युपासना ॥
मोक्षाय सहिताः सर्वा अप्यज्ञस्य न तु क्वचित् ।
यथावत् केशवं ज्ञात्वा स्वयोग्यैकामुपासनाम् ॥
अपि कृत्वा हरिं दृष्ट्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।