Bruhadaranyaka/C5/S5: Difference between revisions
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Revision as of 04:44, 9 April 2026
पञ्चमं ब्राह्मणम्
आप एवेदमग्र आसुस्ता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म ब्रह्म प्रजापतिं प्रजापतिर्देवांस्ते देवाः सत्यमेवोपासते ॥ १ ॥
सदा सर्वगुणापानादापो नारायणः स्मृतः ।
द्वितीयं रूपमसृजद्वासुदेवं स आत्मनः ॥
ब्रह्म सत्यमिति प्राहुर्वासुदेवाभिधं प्रभुम् ।
तस्माद् ब्रह्माऽजनि ततो देवाः सर्वेऽपि जज्ञिरे ॥
तस्माद्ब्रह्मादयो देवा वासुदेवमुपासते ।तदेतत् त्र्यक्षरं सत्यमिति स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीतं सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वांसमनृतं हिनस्ति ॥ २ ॥
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
ततत्वादन्यथाज्ञानं तीत्येव समुदीर्यते ॥
तस्याधस्तात् सदात्मा तु सादयन्ननृतं हरिः ।
उपरिष्टाच्च यन्नामा नाशयन्ननृतं स्थितः ॥
एवं यो वेद तं विष्णुं नास्य मिथ्यादृशिर्भवेत् ।
योग्यतापेक्षयोपासाऽथापरोक्ष्याच्च तत्फलम् ॥
सम्यग्ददात्यन्यथा च भवेदेवोपकारिणी ।
अत्ययोग्याय चेत् सा स्याद्विपरीतफलप्रदा ॥
वैपरीत्यं तु विघ्नः स्यान्न तु पापं कथञ्चन ॥ इत्याधारे ॥