Bruhadaranyaka/C3/S2: Difference between revisions
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| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं कास्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥१०॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं कास्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥१०॥ | ||
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Revision as of 04:44, 9 April 2026
आर्तभागब्राह्मणम्
अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । कति ग्रहाः कत्यतिग्रहाः इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥
प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्रहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धान् जिघ्रति ॥ २ ॥
वाग्वै ग्रहः स नाम्नाऽतिग्रहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥३॥
जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्रहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति ॥ ४ ॥
चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्रहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥
श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्रहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दान् शृणोति ॥ ६ ॥
मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्रहेण गृहीतो मनसा हि कामान् कामयते ॥ ७ ॥
हस्तो वै ग्रहः स कर्मणाऽतिग्रहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥
त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्रहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं कास्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥१०॥
याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात् प्राणाः क्रामंत्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्याध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच । यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चंद्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागाऽऽवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेत् तत्सजन इति तौ होत्क्रम्य मंत्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ यत्प्रशशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥
॥ इत्यार्तभागब्राह्मणम् ॥
॥ इति आर्तभागब्राह्मणम् ॥
आकाशं परमात्मानमेव ।
केचित्तु मानुषा मुक्तिमनुक्रम्यैव देहतः ।
देहपाते तु देहस्य दोषान् भुक्त्वैव सर्वशः ॥
मरणोच्छूनतादींस्तु स्वकीयारब्धकर्मजान् ।
देहे क्षीणे तु गच्छन्ति दृष्ट्वा विष्णुमनुज्ञया ॥
पुनरत्रैव तिष्ठन्ति नित्यानन्दैकभोगिनः ।
देहादुत्क्रम्य देवास्तु यान्ति विष्णुं सनातनम् ॥
देहादुत्क्रम्य यातानां देवा भागत एव तु ।
स्वाधिदैवं व्रजन्त्यद्धा भागतोऽनुव्रजन्ति तान् ॥
आकाशाख्यं स्वरूपं तु विष्णुस्तद्धृदि संस्थितः ।
भागतो भागतश्चैनाननुयाति जनार्दनः ॥
ज्ञानस्थितेन रूपेण देवानां मुक्तिदो हरिः ।
पुण्यस्थितेन रूपेण स्वर्गं निरयमन्यगः ॥
रहस्यमेतद्देवानां विदुः कर्मेति मानुषाः ।
तस्मान्नैव जनेष्वेतद्विष्णोः कर्म प्रकाशयेत् ॥ इति च ।अत एव याज्ञवल्क्यो न जनेषूवाच ।
कर्मनामा तु भगवान् फलकर्तृत्वतो हरिः ।
पातनात् पापनामासौ पुनातेः पुण्यनामवान् ॥ इति भारते ॥