Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S29: Difference between revisions
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Revision as of 04:43, 9 April 2026
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
श्री शुक उवाच– इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वशक्तिभिः । गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो जगाद सप्रेम मनोहरस्मितः ॥ ७ ॥
'आत्मान्तरात्मा परमात्मेति मूर्तित्रयं हरेः ।जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तीनां सृष्ट्यादेश्च प्रवर्तकम्॥ इति त्रैकाल्ये ॥ ७ ॥
पृथक् सत्रेण वा मह्यं मम यात्रामहोत्सवम् ।कारयेन्नृत्यगीताद्यैर्महाराजविभूतिभिः ॥ ११ ॥
पृथक्स्वयमेव, सत्रेण बहुभिः सह वा, मम यात्रामहोत्सवं कुर्यात् ॥११॥
मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरवस्थितम् ।ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः ॥ १२ ॥
इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते । सभाजयेन्मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रयन् ॥ १३ ॥
ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्यर्के स्फुलिङ्गके । अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४ ॥
'सर्वभूतेष्वस्ति विष्णुरिति भावः सतां मतः ।अनेन सर्वभूतानामादित्ये तद्गतात्मना॥ इति च ॥ १२-१४ ॥
सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया ।परिपश्यन्ति च परं परमात्मानमच्युतम् ॥ १८ ॥
'ब्रह्मणाऽऽत्तमिदं सर्वं यत्किञ्चित्सचराचरम् ।इति पश्येत यो विद्वान् स हि ब्रह्मात्मविन्मतः॥ इति ब्राह्मे ॥ १८ ॥
यो योऽपरो मनोधर्मः कल्पते निष्फलाय ते ।तदायासो निरर्थः स्यान्नयादेरिव सत्तम ॥ २१ ॥
'नयादिर्दुर्नयः प्रोक्तो यन्नयं सोऽत्ति सर्वदाइति शब्दतत्त्वे ॥ २१ ॥
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् ।यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाऽप्नोति माऽमृतम् ॥ २२ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥
'एकदा ज्ञातरूपेण यन्न तिष्ठति सर्वदा ।चञ्चलत्वात् सत्यमपि ह्यनृतं जगदुच्यतेइति च ॥'सर्वदैकप्रकारत्वात् सत्यं ब्रह्म सदोच्यतेइति च ॥ २२ ॥