Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S53: Difference between revisions
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॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे त्रिपञ्चाशोऽध्यायः ॥ | |||
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Revision as of 04:43, 9 April 2026
त्रिपञ्चाशोऽध्यायः
एतस्मिन्नेव काले तु क्षीरोदे सागरोत्तमे ।निवासे देवदेवस्य शङ्खचक्रगदाभृतः ॥ ७ ॥
उपासीनो महाबाहुः श्रीमान् वैरोचनो बलिः ।जहार देवदेवस्य किरीटं रत्नचित्रितम् ॥ ८ ॥
इन्द्रनीलसहस्राढ्यं गोमेदकशताचितम् ।पद्मरागमहानीलमुक्ताफलविराजितम् ॥ ९ ॥
पुष्यरागप्रवालाढ्यं दिव्यकाञ्चननिर्मितम् ।हृतं दानववीरेण विदित्वा पुरपालकः । तमन्वधावत् त्वरितं वैनतेयो विहङ्गराट् ॥ १० ॥
'बहूनि स्थानजातानि कृष्णस्य क्षीरसागरे ।कानिचिन्मुक्तगम्यानि नामुक्तैस्त्रिदशैरपि ।गन्तुं शक्यान्यथान्यानि गम्यान्यन्यैरपि क्वचित् ॥तत्र देवाश्च योगिन्द्रा भक्ताश्चान्ये जनार्दनम् ।गत्वाऽचर्यन्ति देवेशं बलिस्तत्रागमत्क्वचित् ॥तस्य तत्रासुरावेशात् पापबुद्धिरजायत ।तद्व्यक्त्यर्थं जगन्नाथः शिश्ये सुप्तवदव्ययः ॥तदा स पापया बुद्ध्या किरीटमहरत्प्रभोः ।तं जित्वा गरुडस्तत्तु हृत्वा गोमन्तमाव्रजत् ॥तत्र कृष्णस्य शिरसि किरीटममुचत्प्रभोः ॥इति माहात्मे ॥७-१०॥
हिरण्यगर्भत्वमुपेत्य मूले सृजस्यशेषं भुवनं स एव । नारायणात्मन् परिपासि भूयो जहार चान्ते भगवन् शिवात्मन् ॥ १५ ॥
॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे त्रिपञ्चाशोऽध्यायः ॥
'ब्रह्मस्थो ब्रह्मनामाऽसौ रुद्रस्थो रुद्रनामकः ।तयोरपि नियन्तैकः स्वयमेव जनार्दनः ॥इति स्कान्दे ॥