Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S25: Difference between revisions
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Revision as of 04:43, 9 April 2026
पञ्चविंशोऽध्यायः
इन्द्र उवाच– विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥
विशुद्धसत्वं विगतशुद्धसत्वम् । यस्मात्त्रिगुणसम्बन्धस्त्वयि न विद्यते । यत्राग्रहणमनुबद्धम् । तपोमयं ज्ञानात्मकम् ॥ ४ ॥
कुतो नु तद्धेतव ईश मन्युलोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः ।अथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥ ५ ॥
पुनर्गुणसंप्रवाहस्य कारणत्वात्तद्धेतवः ॥ ५ ॥
पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशोदुरत्ययः काल उपात्तदण्डः ।
येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥
'असतां च सतां चैव हरिरेवानुशासकः ।सतां तु श्रेयसे सैव ह्यनुशास्तिर्भविष्यति ॥असतां विपरीताय लङ्घयित्वाऽनुशासनम्॥ इत्याग्नेये ॥ ६-७ ॥
स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये ।सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥ ११ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥
'आवेशो वसुदेवादौ देहादानं हरेः स्मृतम् ।देहादानं तदन्येषां जन्मेति कवयो विदुः ।तथाप्यसुरमोहाय ग्रन्थेषु बहुधैव तु॥ इति पाद्मे ॥ ११ ॥