Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S22: Difference between revisions
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Revision as of 04:43, 9 April 2026
द्वाविंशोऽध्यायः
अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूपः स कर्मणः ।कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥ १४ ॥
फलरूपः स कर्मण इत्याद्यवान्तरेश्वरविषयम् ॥ १४ ॥
किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् ।अनीशेनान्यथाकर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ॥ १५ ॥
स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते । स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ १६ ॥
देहानुच्चावचान् जन्तुः प्राप्योत्सृजति कर्मणा ।शत्रुर्मित्रमुदासीनः कर्मैव गुरुरीश्वरः ॥ १७ ॥
तस्मात् सुपूजयेत् कर्म स्वभावस्थः स्वकर्मकृत् ।अञ्जसा येन वर्तेत तदेवास्य हि दैवतम् ॥ १८ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।रजसोत्पद्यते विश्वमन्योन्यं विविधं जगत् ॥ २१ ॥
रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः ।प्रजास्तैरेव सिध्द्यन्ति महेन्द्रः किं करिष्यति ॥ २२ ॥
तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेश्चारभ्यतां मखः ।य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः ॥ २५ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥
'स्वभावे कर्मणि च यः सत्वादिषु गुणेषु च ।स्थितो विष्णुः सर्वकर्ता पृथक्संस्थश्च सर्वगः ॥गुणकर्मस्वभावादिशब्दवाच्यश्च केशवः ।तेन जातं फलं यस्मात्कर्मणः फलमीर्यते ॥न चासौ कर्मफलवान्नास्य किञ्चिन्न शक्यते ।तदन्यावान्तरेशानां तद्वशत्वं यतः सदा ॥कर्मणः फलरूपत्वमतस्तेषामुदीर्यते ।नान्यकर्मवशत्वं तु तेषां विष्णुं विना क्वचित् ॥स च ब्राह्मणगिर्यादिनामा विष्णुरजः परः ।एतस्मात्कारणात्कृष्णः शक्रस्य विमदाय तु ॥गिर्यादिस्थितमात्मानं पूजयामास बल्लवैः ॥ १५-२५ ॥