Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S11: Difference between revisions
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Revision as of 04:42, 9 April 2026
एकादशोऽध्यायः
नारद उवाच– स एष भगवान् राजन् व्यतनोद् विततं यशः । पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ १ ॥
तदधीनं वा सर्वं न वेति संशयं रुद्रस्याहनत् । अल्पकेनैव मयेन रुद्रस्य प्रतीकारं कृत्वा ॥ १ ॥
राजोवाच– कस्मिन् कर्मणि देवस्य यशोऽभूज्जगदीशितुः । यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ २ ॥
कस्मिन्कर्मणि मयो विपरीतं चकार ॥ २ ॥
वत्स आसीत् तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः ।प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ ॥ तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन् विमोहिताः ॥ १२ ॥
'सापेक्षं न तु दोषाय यत्र सिद्धमपेक्षितम्॥ इति शब्दनिर्णये ॥ १२ ॥
देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन ।आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः ॥ १४ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे एकादशोऽध्यायः ॥
विष्णुनाऽऽदिष्टं व्यपोहितुं देवोऽसुरोऽन्यो वा न समर्थः ॥ १४ ॥