Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S29: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ | |||
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Revision as of 04:41, 9 April 2026
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः ।आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति ॥ २० ॥
'सुखवद्दूरतो दृश्यं तत्काले दुःखमेव यत् ।मृगतृष्णेत्यतः प्राहुर्भोगं वैषयिकं बुधाः॥ इति शब्दनिर्णये ॥२०॥
दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु ।जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्चेत् तत् तत्प्रतिक्रिया ॥ ३३ ॥
तत्प्रतिक्रियाऽपि दुःखमेव ॥ ३३ ॥
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।मनसा लिङ्गरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ ३६ ॥
'संसृतेः स्वप्नसाम्यं तु यथार्थज्ञानवर्जनम्॥ इति च ।'जाग्रत्यविद्यमानं तु देहात्मत्वादि केवलम् ।अविद्यमानं स्वप्ने तु जाग्रत्त्वज्ञानमेव च॥ इति षाड्गुण्ये ॥३६॥
प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशो मनुः ।दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥ ४३ ॥
'प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा विरिञ्चश्चेति कथ्यते। इति शब्दनिर्णये ॥ ४३ ॥
शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे ।मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥ ४६ ॥
'मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं वेदशब्दोक्तमात्रकम् ।वेदो वदन्नपि हरिं न सम्यग्वक्ति कुत्रचित् ।नाऽरोहयत्यनुभवमप्रसिद्धस्वरूपतः ॥अथाप्यनुभवारोहः प्रसन्ने केशवे भवेत् ।किञ्चिदेव सुसम्यक् च स्वयं त्वनुभवत्यमुम्॥ इति वाराहे ॥४६॥
यदा यस्यानुगृह्णाति भगवानात्मभावितः ।स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥ ४९ ॥
'यदा त्वनुभवी भूयाच्छब्दमात्रानुरोधनम् ।त्यक्त्वाऽथ तं विदुः प्राज्ञास्त्यक्तवेद इति स्म ह ॥यदैव त्यक्तवेदः स्यादथास्मान्मुच्यते भयात् ।प्रायस्तु वैदिका एव रुद्राद्या अपि वै पुरा ॥वैदिकस्त्यक्तवेदश्च ब्रह्मैवैकः प्रजापतिः ।ततस्तु केशवं भक्तया सम्पूज्य बहुजन्मसु ।त्यक्तवेदत्वमापन्नाः प्रसादात्परमेष्ठिनः॥ इति महासंहितायाम् ।'केवलं वेदशब्देन जानन्वैदिक उच्यते ।वेदं विनाप्यनुभवाज्जानंस्तु त्यक्तवैदिकः॥ इत्यध्यात्मे ॥'तत्त्वं वेदानुसारेण चिन्तयन्वैदिको भवेत् ।वेद ऊहामनुसरेद्यस्य स त्यक्तवैदिकः॥ इति षाड्गुण्ये ॥ ४९ ॥
स त्वं विचक्ष्व मृगचेष्ठितमात्मनोऽन्त-श्चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्तिम् ।
'चित्तिर्बुद्धिरिति ज्ञेया चित्तं तु स्मृतिकारणम्॥ इति शब्दनिर्णये ॥
एकं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिवृत् षोडशविस्तरम् ।एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥ ७६ ॥
'प्राणेन्द्रियान्तःकरणभेदेन त्रिविधं मतम् ।पञ्च पञ्चैव ते सर्वे प्राणबुद्धीन्द्रियाणि च ॥कर्मेन्द्रियाणि च तथा तस्मात्पञ्चविधं स्मृतम् ।लिङ्गं षोडशकं प्राहुर्मनसा सह तत्पुनः॥ इति ब्राह्मे ॥ ७६ ॥
भक्तिः कृष्णे दया जीवेष्वकुण्ठज्ञानमात्मनि ।यदि स्यादात्मनो भूयादपवर्गस्तु संसृतेः ॥ ८२ ॥
'देहादिव्यतिरेकेण चिद्रूपोऽहमिति स्फुटम् ।सदैवानुभवो भक्तिर्विष्णौ तद्दर्शनादनु ।यस्यासौ मुच्यते क्षिप्रं संसारान्नात्र संशयः॥ इति हरिवंशेषु ॥८२॥
अदृष्टं दृष्टवन्नङ्क्ष्येद्भूतं स्वप्नवदन्यथा ।भूतं भवद् भविष्यच्च सुप्तं सर्वरहो रहः ॥ ८३ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥
'संसारस्थमिदं सर्वमनित्यत्वाद्वृथा यतः ।अतः प्राहुः स्वप्नसमं प्राज्ञा जगदिदं मृषा॥ इति विष्णुसंहितायाम् ।'सुषुप्तिस्वप्नयोश्चैव स्वर्गव्योम्नोस्तथैव च ।अन्योन्यनामता ज्ञेया मनोबुद्ध्योस्तथैव च॥ इति शब्दनिर्णये ॥अतो भूतं भवत् भविष्यच्च स्वप्न इत्यर्थः ।'रहो ब्रह्म तथा यज्ञः स्वः सत्यमिति गीयते। इति च ॥ ८३ ॥