Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S21: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 1: | Line 1: | ||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_num = 4 | | chapter_num = 4 | ||
| title = द्वाविंशोऽध्यायः | | title = द्वाविंशोऽध्यायः | ||
}} | }} | ||
| Line 14: | Line 10: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् । | | verse_line1 = नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् । | ||
| Line 34: | Line 28: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = व्यक्तं ह्यात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः । | | verse_line1 = व्यक्तं ह्यात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः । | ||
| Line 54: | Line 46: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः | | verse_line1 = अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः | ||
| Line 76: | Line 66: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां | | verse_line1 = शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां | ||
| Line 89: | Line 77: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरया | | verse_line1 = हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरया | ||
| Line 111: | Line 97: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा- | | verse_line1 = यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा- | ||
| Line 133: | Line 117: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो | | verse_line1 = दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो | ||
| Line 155: | Line 137: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतो मनः । | | verse_line1 = इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतो मनः । | ||
| Line 175: | Line 155: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये । | | verse_line1 = भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये । | ||
| Line 186: | Line 164: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः । | | verse_line1 = नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः । | ||
| Line 197: | Line 173: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् । | | verse_line1 = अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् । | ||
| Line 208: | Line 182: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न कुर्यात् कर्हिचित् सङ्गं तमस्तीव्रं तितीर्षुणा । | | verse_line1 = न कुर्यात् कर्हिचित् सङ्गं तमस्तीव्रं तितीर्षुणा । | ||
| Line 228: | Line 200: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मनोमात्रमिदं विश्वं यथा स्वप्ने मनः क्रिया । | | verse_line1 = मनोमात्रमिदं विश्वं यथा स्वप्ने मनः क्रिया । | ||
| Line 239: | Line 209: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = आत्मा त्वनीहया साक्षात् स्वयंज्योतिः प्रसिद्ध्यति । | | verse_line1 = आत्मा त्वनीहया साक्षात् स्वयंज्योतिः प्रसिद्ध्यति । | ||
| Line 259: | Line 227: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न यत्र निद्रा मूर्च्छा वा नार्थदृक् न मनोरथः । | | verse_line1 = न यत्र निद्रा मूर्च्छा वा नार्थदृक् न मनोरथः । | ||
| Line 279: | Line 245: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् । | | verse_line1 = तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् । | ||
| Line 300: | Line 264: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति | | verse_line1 = यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति | ||
| Line 322: | Line 284: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्पादपङ्कजपरागविलासभक्त्या | | verse_line1 = यत्पादपङ्कजपरागविलासभक्त्या | ||
| Line 344: | Line 304: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याऽध्यात्मशिक्षया । | | verse_line1 = वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याऽध्यात्मशिक्षया । | ||
| Line 364: | Line 322: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव । | | verse_line1 = कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव । | ||
| Line 385: | Line 341: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु । | | verse_line1 = भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु । | ||
| Line 396: | Line 350: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C04 | | chapter_id = BTN_C04 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = कीर्त्योर्ध्वगीतयः पुंभिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह । | | verse_line1 = कीर्त्योर्ध्वगीतयः पुंभिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह । | ||
| Line 403: | Line 355: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Commentary | ||
| verse_id = BTN_C04_S21_V66 | |||
| id = BTN_C04_S21_V66_author-note | |||
| name = Bhashyam | |||
| text = | |||
॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | {{Commentary | ||
Revision as of 04:41, 9 April 2026
द्वाविंशोऽध्यायः
नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् ।यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येऽस्य हेतवः ॥ ९ ॥
'सर्वज्ञाश्च विरिञ्चाद्या न जानीयुर्हरिं परम् ।हेतवो जगतोऽप्यस्य यथाऽसौ वेद केशवः॥ इति तन्त्रसारे ॥९॥
व्यक्तं ह्यात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः ।स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः ॥ १६ ॥
'हरेस्तु प्रतिमा प्राज्ञास्तत्रस्थः केशवः स्वयम् ।ददाति ज्ञानमीशेशः परमात्मा स्वयं विभुः॥ इति च ॥ १६ ॥
अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषःपादारविन्देऽस्य गुणानुवादिनि ।
कषणेन गच्छतीति कषायः पापं, तदुभयमेव मलम् ॥ २० ॥
शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणांक्षेमस्य सम्यग्विमृशेषु हेतुः ।
हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरयागुणाभिधानेन विजृम्भमाणया ।
'रतिः परात्मनि हरावन्यत्रारतिरेव च ।पुमर्थसाधनं ज्ञेयं नातोऽन्यन्मुख्यमिष्यते॥ इति ॥ २१,२५ ॥
यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा-नाचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा ।
अबीजं हृदयं बीजहृदयं विना ।'जीवोपाधिर्द्विधा प्रोक्तः स्वरूपं बाह्यमेव च ।बाह्योपाधिर्लयं याति मुक्तावन्यस्य तु स्थितिः ॥सर्वोपाधिविनाशे हि प्रतिबिम्बः कथं भवेत् ।कथं चात्मविनाशाय प्रयत्नः सेत्स्यति क्वचित् ॥अपुमर्थता च मुक्तेः स्यादभावात्पुंस एव तु ।ज्ञानज्ञेयाद्यभावाच्च सर्वथा नोपपद्यते ॥तस्मादेतन्मतं येषां तमोनिष्ठा हि ते मताः ॥इति स्कान्दे ॥२६॥
दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणोनैवात्मनो बहिरन्तर्विचष्टे ।
दग्धाशयः बीजाशयनाशे तद्गुणानां ज्ञानादीनामभावान्न किञ्चिद्विचक्षीत । परात्मनोर्यदा व्यवधानं संसारावस्थायां तदा स्वप्न इवेत्येतावद्बीजहृदयनाशे त्वपुरुष एव । आत्मनाश एवेत्यर्थः । अतः संसारावस्थैवोत्तमा स्यात् ।'भिदा यदि न दृश्येत जीवात्मपरमात्मनोः ।मुक्तौ तदा विमोक्षाय को यत्नं कर्तुमर्हति॥ इति ब्रह्माण्डे ॥'मग्नस्य हि परेऽज्ञाने किं न दुःखकरं भवेत् ।प्रवृत्तिधर्ममेवाहं मन्ये भरतसत्तम॥ इति मोक्षधर्मेषु ॥ २७ ॥
इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतो मनः ।चेतनां हरते बुद्धेः स्तुम्बस्तोयमिव ह्रदात् ॥ ३० ॥
एवंविधाज्ञानकारणमाह । इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैरित्यादि ।'बहुस्मरणशक्तिस्तु चेतनेत्युच्यते बुधैः॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ३० ॥
भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये ।तद्रोधं कवयः प्राहुरात्मापह्नवमात्मनः ॥ ३१ ॥
नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः ।यद्यस्त्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मनः स्वव्यतिक्रमात् ॥ ३२ ॥
अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् ।स्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद् येनाविशति मुग्धताम् ॥ ३३ ॥
न कुर्यात् कर्हिचित् सङ्गं तमस्तीव्रं तितीर्षुणा ।धर्मार्थकाममोक्षाणां यदत्यन्तविघातकम् ॥ ३४ ॥
'स्वपक्षपातस्त्वभ्यासाद्भोगार्थं व्यापृतस्य तु ।भवेत्ततोऽनेकशास्त्रयथार्थस्मरणेशिता ॥नश्यत्यतः स्मृतेर्नाशाद्भगवत्पक्षपातिता ।विनश्येत्तेन चैवास्य भवेज्ज्ञानविपर्ययः ॥न च ज्ञानविपर्यासादन्यन्नाशकरं क्वचित् ।सर्वस्यैतस्य मूलं हि दुष्टसंसर्ग एव तु ॥दुष्टसङ्गो विरक्तस्याप्यन्यथाज्ञानकारणम् ।दुष्टसङ्गाद्धि विष्णोश्च स्वात्मत्वं मन्यते बुधः ।अभावं स्वात्मनोऽन्यस्य मुक्तिं चापि निरात्मताम्॥इत्यादि स्कान्दे ॥ ३१-३४ ॥
मनोमात्रमिदं विश्वं यथा स्वप्ने मनः क्रिया ।क्रिया च वासनामात्रं साऽनीहायां प्रलीयते ॥ ३७ ॥
आत्मा त्वनीहया साक्षात् स्वयंज्योतिः प्रसिद्ध्यति ।एवं व्युदस्यात्ममायां भिदामुपरमेन्मुनिः ॥ ३८ ॥
'मनोमात्रं हरेर्यस्मान्मनसा मीयते जगत् ।व्याप्ते मनसि विष्णोश्च स्थितत्वाद्वासनामयम् ॥वस आच्छादनेत्यस्माद्धातोर्वा वासनामयम् ।अतो विष्णोरनीहायां लीयते सकलं जगत् ॥अनीहावस्थ एवासौ मुमुक्षुभिरवाप्यते ।एवं विद्वान्बन्धशक्तिं व्युदस्य हरिमाप्नुते ॥प्रकृतिर्भिदा च माया च भ्रमश्चेत्यभिधीयते ।बन्धशक्तिर्यया लोको बम्भ्रमीत्यनिशं भुवि॥ इति तन्त्रसारे ॥ ३७,३८ ॥
न यत्र निद्रा मूर्च्छा वा नार्थदृक् न मनोरथः ।नानुवृत्तिर्न प्रलयस्तद् ब्रह्म विजितात्मनः ॥ ३९ ॥
'अनुवृत्तिरिति प्राज्ञैर्जीवन्मुक्तिरुदीर्यते। इति शब्दनिर्णये ॥ ३९ ॥
तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् ।यः क्षेत्रवित् त्वमनयोर्हृदि विष्वगाधिः
'सर्वसत्ताप्रदत्वात्तु सर्वतत्त्वं हरिः स्मृतः ।सर्वत्र विततत्वाद्वा सोऽहं त्वमिति चोच्यते ।सर्वान्तर्यामकत्वात्तु न जीवात्मत्वतो हरिः॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥त्वमनयोः स्थावरजङ्गमयोर्मध्ये एको जीवः विष्वगाधिः नानादुःखःसन्, हृदि स्थितमवैहि । अहं च स जीवोऽस्मि । ज्ञानान्महान् भवामि । यः क्षेत्रवित् ॥ सर्वस्य प्रत्यक्चकास्ति स भगवानिति ।'व्यवधानेनान्वयोऽपि योग्यतापेक्षया भवेत्। इति शब्दनिर्णये ॥'अभिमानस्त्वहङ्कार आत्मा चेत्यभिधीयते। इति च ॥ ४० ॥
यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभातिमायाविवेकविधुतिः स्रजिवाहिबुद्धिः ।
'यत्स्वरूपतया भातमज्ञानां गगनादिकम् ।विवेकज्ञानिनां रज्जौ सर्पमावद्विधूयते ।तं नित्यमुक्तभावेन निरस्तप्रकृतिं भजेत्॥ इति ज्ञानविवेके ॥'न भ्रान्तिर्जगतो दृष्टिर्न भ्रान्तिर्हरिदर्शनम् ।अन्योन्यात्मतया दृष्टिर्भ्रान्तिरित्यवधार्यताम्॥ इति च ।'मायेति ज्ञाननाम स्यान्मायेति प्रकृतिस्तथा ।ज्ञानं स्वरूपं विष्णोस्तु प्रकृतिर्न हरेस्तनुः ।एवं विवेकिनो विश्वं ब्रह्मरूपेण नेष्यते॥ इति वाराहे ॥ज्ञानप्रकृत्याख्यमायाद्वयस्य विवेकज्ञानात्सदसतोर्विष्ण्वात्मतया प्रतीतिः स्रज्यहिबुद्धिरिव विधूयत इत्यर्थः ।'पञ्चभूतात्मकं देहं विष्णोः पश्यन्त्ययोगिनः ।तथा न योगिराद्धान्तो ज्ञानं देहो यतो हरेः॥ इति षाड्गुण्ये ॥ ४१ ॥
यत्पादपङ्कजपरागविलासभक्त्याकर्माशयग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः ।
द्विमतयः जगति भगवति च प्रतीतियुक्ता अपि भक्तिविशेषात्तत्त्वं नोद्ग्रथयन्ति । संसारगुणास्तेषां विरुद्धा एव प्रतीयन्ते यतः ॥ ४२ ॥
वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याऽध्यात्मशिक्षया ।आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः ॥ ५२ ॥
'नैजः सर्वगुणोत्कर्षः सर्वेभ्यो महदुच्यतेइति शब्दनिर्णये ॥ ५२ ॥
कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव ।वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः ।
'अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः ।एकस्तद्वेद भगवान्प्रभुर्नारायणः स्वराट्॥ इति मोक्षधर्मेषु ॥ ६४ ॥
भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु ।ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यपरोद्यमे ॥ ६५ ॥
कीर्त्योर्ध्वगीतयः पुंभिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह ।प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ॥ ६६ ॥
॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥
'गुरुविप्रेषु भक्तया च परेषां हितकृत्तया ।प्रश्रयेण च कीर्त्या च पृथू राममनुव्रतः॥ इति ब्रह्माण्डे ।'न गुरुर्न च धर्मोऽस्ति रामदेवस्य कुत्रचित् ।तथापि धर्मरक्षार्थं गुरुभक्तिमदर्शयत्॥ इति वाराहे ॥ ६७ ॥