Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S17: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 1: | Line 1: | ||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_num = 3 | | chapter_num = 3 | ||
| title = सप्तदशोऽध्यायः | | title = सप्तदशोऽध्यायः | ||
}} | }} | ||
| Line 14: | Line 10: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तद् वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे । | | verse_line1 = तद् वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे । | ||
| Line 25: | Line 19: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः | | verse_line1 = यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः | ||
| Line 38: | Line 30: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणोः | | verse_line1 = यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणोः | ||
| Line 60: | Line 50: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | | verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | ||
| Line 81: | Line 69: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् । | | verse_line1 = ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् । | ||
| Line 101: | Line 87: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव । | | verse_line1 = त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव । | ||
| Line 121: | Line 105: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै- | | verse_line1 = यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै- | ||
| Line 143: | Line 125: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानां | | verse_line1 = यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानां | ||
| Line 165: | Line 145: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैः | | verse_line1 = धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैः | ||
| Line 187: | Line 165: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपं | | verse_line1 = न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपं | ||
| Line 209: | Line 185: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोः | | verse_line1 = तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोः | ||
| Line 231: | Line 205: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = भगवानुवाच– | | verse_line1 = भगवानुवाच– | ||
| Line 254: | Line 226: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | | verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | ||
| Line 275: | Line 245: | ||
| document_id = BTN | | document_id = BTN | ||
| chapter_id = BTN_C03 | | chapter_id = BTN_C03 | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् । | | verse_line1 = मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् । | ||
| Line 282: | Line 250: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Commentary | ||
| verse_id = BTN_C03_S17_V31 | |||
| id = BTN_C03_S17_V31_author-note | |||
| name = Bhashyam | |||
| text = | |||
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | {{Commentary | ||
Revision as of 04:41, 9 April 2026
सप्तदशोऽध्यायः
तद् वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे ।तद्ध्येवात्मकृतं मन्ये यत् स्वपुंभिरसत्कृताः ॥ ४ ॥
यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहःसद्यः पुनाति जगदाश्वपचं विकुण्ठः ।
यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणोःसद्यः क्षताखिलमलं प्रतिलब्धशीलम् ।
'सर्वोत्तमोऽपि भगवान्विप्रादेः पूजनाय तु ।गुणलब्धिं ततो ब्रूते नित्यपूर्णगुणोऽपि सन् ॥ब्रूयुश्चान्ये क्वचित्तत्तु तदुक्तेरनुसारतः ।उपादत्ते वरांश्चापि लोकानां मोहनाय च॥ इति कौर्मे ॥विप्राणां चरणपद्मपवित्ररेणोः सेवया प्रतिलब्धशीलं श्रीर्न जहातीति यत् । अतश्छिन्द्याम् ।'अनुक्ताश्च गुणा विष्णोरुक्ता दोषा न तस्य तु ।अज्ञानाद्दोषविज्ञानं गुणज्ञानं यथार्थतः॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ॥'विप्राणां चापि भक्तानामन्येषां च जनार्दनः ।ब्रह्मणः शङ्कराद्वापि देवताभ्यस्तथैव च ॥आत्मनश्च श्रियश्चैव सकाशात्प््रिायतामपि ।पूज्यतामत्ययुक्तं च वदेत्क्वापि विमोहयन्॥ इति स्कान्दे ॥ ४-७ ॥
ब्रह्मोवाच–अथ तस्योशतीं देवीमृषिकुल्यां सरस्वतीम् ।
देवीं द्योतमानाम् । ऋषिकुल्याम् ऋषिकुलस्तुतिपराम् ॥ १३ ॥
ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् ।प्रचुः प्रञ्जलयो विप्र प्राहृष्टाः कम्पितत्वचः ॥ १५ ॥
'तद्भ्रूविजृम्भः परमेष्ठिधिष्ण्यम्॥ इत्युक्तम् ॥ १५ ॥
त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव ।धर्मस्य परमो गुह्यो निर्विकारो भवान् मतः ॥ १८ ॥
धर्मस्यापि दुर्ज्ञेयः ॥ १८ ॥
यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै-रर्थार्थिभिः स्वशिरसा धृतपादरेणुः ।
मधुव्रतपतेः सारग्राहिणां पतेः । अङ्घ्रिस्थतुलसीलोकं स्थानमुरसि स्थिताऽपि स्पर्धयेव कामयाना । 'लब्ध्वाऽपि वक्षसि पदम्। इति च ॥ २० ॥
यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानांनात्याद्रियत् परमभागवतप्रसङ्गः ।
परमभागवतत्वेन तस्यामत्यादरः । न तु कामात् ।'हरिभक्तिर्हरेः प्रीतिर्ज्ञानानन्दादयो गुणाः ।अधिकारे च मुक्तौ च ब्रह्मवाय्वोश्च तत्स्त्रियोः ॥शेषवीन्द्रहराणां च तत्स्त्रीणां वासवादिनाम् ।यथाक्रमं तु विज्ञेया भूमौ कारणतोऽन्यथा ॥देहस्य लक्षणं चैव भूमावप्यन्यथा भवेत् ।ब्रह्मादिषु क्रमेणैव नित्यं स्याद्देहलक्षणम् ॥श्रियोऽधिका गुणाः सर्वे सर्वेभ्यो नियमेन तु ।उक्ताश्चैवाप्यनुक्ताश्च ततो विष्णोर्न संशयः॥इति तत्त्वनिर्णये ॥ २१ ॥
धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैःपद्भिश्चराचरमिदं द्विजदेवतार्थम् ।
'धारणाद् भगवान् धर्मो यमनाद् यम उच्यते। इति शब्दनिर्णये ।'अनन्तासनवैकुण्ठक्षीरसागरगैस्त्रिभिः ।रक्षां करोति भगवान्कपिलः सत्ववर्धनात् ।असत्वोऽपि रजश्चैव तमश्चापि निरस्य तु॥ इति मूर्तिभेदे ॥'कपिलो वरदश्चैव विकलश्चेति कथ्यतेइति च ।अतः सत्वस्य कारणत्वमात्रं कपिलो वरदा तनुः ॥ २२ ॥
न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपंगोप्ता वृष स्वर्हणेन सुसूनृतेन ।
आत्मैव गोपो गोपको यस्य तदात्मगोपम् ॥ २३ ॥
तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोःक्षेमं जनाय निजशक्तिभिरुद्धृतारेः ।
'असुरा अप््रिायाश्चापि नित्यानन्दान्न लोकवत् ।निषेध्यबुद्धिविषयमप््रिायं हि हरेर्मतम्॥ इति च ।तस्मादनभीष्टमिव ॥ २४ ॥
भगवानुवाच–एतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्यः
'अन्तर्भक्ता बहिःक्रुद्धा हिरण्याद्या हरिं प्रति ।सर्वक्रुद्धाः शम्बराद्या अन्तः क्रोधवशास्तथा॥ इति च ॥ २६ ॥
ब्रह्मोवाच–भगवन्तं परिक्रम्य प्रणिपत्यानुमान्य च ।
'स्वरूपश्रीस्तथा भार्या द्वेधा श्रीस्तु हरेर्मता। इति च ॥ २८ ॥
मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् ।प्रत्येष्यतं निकाशं मे कालेनाल्पीयसा पुनः ॥ ३१ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः ॥
'अन्तर्भक्ता बहिर्वैरा हिरण्याद्या हरेर्मताः ।तत्र भक्त्याऽभवन्पूता द्वेष आवेशकान्गतः ॥ब्रह्मजा असुरा ये तु विष्णोः पार्षदतां गताः ।बल्याद्याश्च हरेर्द्वेषमन्तः कृत्वा तमोगताः॥ इति च ॥तस्मात् संरम्भोऽल्पफलः कथ्यत एव । भक्तियोग एव ब्रह्महेलन-निस्तारकः ॥ ३१ ॥