Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S9: Difference between revisions
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Revision as of 04:41, 9 April 2026
नवमोऽध्यायः
स्वमेव धिष्ण्यं बहुमानयन्तंयं वासुदेवाभिधमामनन्ति ।
'आधार आश्रयो धिष्ण्यं निधानं चाभिधीयते॥ इत्यभिधानम् ॥ ४ ॥
स पद्मकोशः सहसोदतिष्ठत्कालेन कर्मप्रतिबोधितेन ।
आत्मा विष्णुरस्य योनिः ॥ १४ ॥
तल्लोकपद्मं स उ एव विष्णुःप्रावीविशत् सर्वगुणावभासम् ।
'पद्मसंस्थाद्धरेस्तत्र ब्रह्माऽजनि चतुर्मुखः॥ इति च ।सर्वगुणावभासं पृथिव्यात्मकम् । पृथिव्यां हि सर्वे शब्दादयो गुणा अवभासन्ते ।'तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते॥ इति मोक्षधर्मे ।'प्रधानवाचकस्त्वेकश्चानन्यः केवलः स्वयम्॥ इति ब्राह्मे ॥ १५ ॥
क एष योऽसावहमब्जपृष्ठएतत् कुतो वाऽब्जमनन्यदप्सु ।
सता ब्रह्मणा ।'स ब्रह्माऽचिन्तयत् कुतो नु पद्मं ब्रह्मणः स्यादिति।इति मैत्रायणश्रुतिः ॥ १८ ॥
पुंसां स्वकामाय विविक्तमार्गै-रभ्यर्चतां कामदुघाङ्घ्रिपद्मम् ।
भिन्नमन्येभ्यो विलक्षणम् ॥ २६ ॥
परार्घ्यकेयूरमणिप्रवेक-पर्यस्तदोर्दण्डसहस्रशाखम् ।
'तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तमइति मोक्षधर्मे ॥ २९ ॥
निवीतमाम्नायमधुव्रताश्रयस्वकीर्तिमय्या वनमालया हरिम् ।सूर्येन्दुवाय्वग्न्यगमत्त्रिधामभिः परिक्रमत्प्राधनिकैर्दुरासदम् ॥ ३१ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥
सूर्येन्दुवाय्वग्न्यादिभिस्त्रिधाम्नो विष्णोरगच्छद्भिः प्राधनिकैः ।'मुक्तवाय्वादिभिर्विष्णुं वृतं ब्रह्मा ददर्श ह ।तदन्याभावतो नान्यदतस्तत्स्रष्टुमैच्छत ॥इति ब्रह्माण्डे ॥ ३१ ॥