Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S8: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥ | |||
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Revision as of 04:41, 9 April 2026
अष्टमोऽध्यायः
क्रीडाया मुद् यतोऽर्हस्य कामं चिक्रीडिषाऽन्यतः ।स्वतस्तृप्तस्य तु कथं निर्वृतस्य सदात्मनः ॥ ३ ॥
क्रीडाया मुत् । अर्हस्य अपूर्णसुखस्य । अन्यतः अरतेः ॥ ३ ॥
देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः ।अविलुप्तावबोधात्मा स युज्येताजया कथम् ॥ ५ ॥
भगवानेष एवैकः सर्वक्षेत्रेष्ववस्थितः ।अमुष्य दुर्भगत्वं वा क्लेशो वा कर्मभिः कुतः ॥ ६ ॥
दुर्भगक्लेशशरीरस्थत्वात्तस्यापि भाव्यम् । न च तद् युज्यते ॥ ५-६ ॥
मैत्रेय उवाच–सेयं भगवतो माया न्याय्यं येन विरुध्यते ।
सेयं भगवतो माया अयं हि भगवन्महिमा । तस्य कार्पण्यं बन्धनादि न युज्यत इति यदुक्तं तन्न्याय्यमेव । दुर्भगादिशरीरस्थस्यापि तद्दोषास्पर्श एव तन्महिमेत्यर्थः ॥ ९ ॥
यथाऽर्थेन विनाऽमुष्य पुंस आत्मविपर्ययः ।प्रतीयत उपद्रष्टुः स्वशिरश्छेदनादिकः ॥ १० ॥
यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिस्तत्कृतो गुणः ।दृश्यतेऽसन्नपि द्रष्टुरात्मनोऽनात्मनो गुणः ॥ ११ ॥
स वै निवृत्तिधर्मेण वासुदेवानुकम्पया ।भगवद्भक्तियोगेन तिरोधत्ते शनैरिह ॥ १२ ॥
'कथं देहपरो देवो न लिप्येत हि बन्धनैः ।कथं न दुःखी स भवेद्दुःखी चेदीश्वरः कुतः ॥महिमा परमस्यैष यद्देहस्थो न बाध्यते ।यददुःखी स ईशानो मायेति महिमोच्यते ॥प्रधानं मय इत्याहुः प्राधान्यान्मयता भवेत् ।अतो मायामयं प्राहुर्महामायमनामयम्॥ इति भाल्लवेयश्रुतिः ॥'अलुप्तबोधरूपत्वान्नासौ प्राकृतदेहवान् ।न च सृष्ट्यादिकं भ्रान्तिर्भ्रान्तिवादा हि दानवाः ॥'अतो भ्रान्त्यादिसम्बन्धो नास्य क्वचन युज्यते ।भ्रान्त्या जीवस्य संसार ईशज्ञानाद्विलीयते ।भ्रान्तिर्देहाद्यभिमतिरीशज्ञानाद्विनश्यति॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ १०-१२ ॥
यदेन्द्रियोपरामार्थो दृष्टात्मनि परे हरौ ।विलीयन्ते तदा क्लेशाः संसुप्तस्येव कृत्स्नशः ॥ १३ ॥
इन्द्रियोपरामाख्यः पुरुषार्थो मुक्तिः ॥ १३ ॥
विदुर उवाच–सञ्छिन्नः संशयो मह्यं तव सूक्तासिना विभो ।
साधु तद् व्याहृतं विद्वन्नात्ममायायनं हरेः ।आभात्यपार्थं निर्मूलं विश्वमूलं न यद् बहिः ॥ १६ ॥
यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः ।तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ १७ ॥
अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्याप्यनात्मनः ।तां चापि युष्मच्चरणसेवयाऽहं पराणुदे ॥ १८ ॥
स्वरूपसामर्थ्याश्रयम् । यद् व्याहृतम् । अपार्थं निर्मूलं च देहसम्बन्धि-त्वाद्याभाति । विश्वमूलं ब्रह्म च यन्ममज्ञानाद् बहिः न भवति । तस्मा-दुभयत्र धावति । तस्मादन्तरितोऽस्मि । तथापि तां प्रतीतिं पराणुदे॥ १५-१८ ॥
दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु ।यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ २० ॥
'आत्मनस्तु गुणाभावं वदतो नत्वसत्यता ।अपृष्टस्य दमार्थं च गुणायैव भवत्यपि॥ इति व्यासस्मृतेः ।विद्यमानमप्यनुभवमन्यथा वदति विदुरः ।'द्रोणद्रौणिकृपाः पार्था भीष्मो विदुरसञ्जयौ ।ये चान्ये तत्र देवांशाः सम्यक्तत्त्वापरोक्षिणः॥इति स्कान्दे ॥ २० ॥
सृष्ट्वाऽग्रे महदादीनि सविकाराण्यनुक्रमात् ।तेभ्यो विराजमुद्धृत्य तमनु प्राविशद् विभुः ॥ २१ ॥
यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्र्यूरुबाहुकम् ।यत्र विश्व इमे लोकाः सविकाराः समासते ॥ २२ ॥
यस्मिन् दशविधः प्राणः सेन्द्रियार्थेन्द्रियस्त्रिवृत् ।त्वयेरिता यतो वर्णास्तद्विभूतीर्वदस्व नः ॥ २३ ॥
यत्र पुत्रैश्च पौत्रैश्च नप्तृभिः सह गोत्रजैः ।प्रजा विचित्राकृतय आसन् याभिरिदं ततम् ॥ २४ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥
विराजं ब्रह्माणम् ।'ब्रह्माणं प्राविशद्विष्णुः सहस्राक्षः सहस्रपात्॥ इति ब्राह्मे ॥'अनुप्रविश्य ब्रह्माणं प्राणं दशविधं तथा ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च वर्णांश्चैवासृजद्धरिः ॥ इति गारुडे ॥२१-२४॥वर्णाश्रमविभागांश्च रूपशीलस्वभावतः ।ऋषीणां जन्मकर्माणि वेदस्य च विकर्षणम् ।यज्ञस्य च वितानानि योगस्य च पथः प्रभो ॥ २९ ॥विकर्षणं विभागः ॥ २९ ॥