Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S7: Difference between revisions
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॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥ | |||
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Revision as of 04:41, 9 April 2026
सप्तमोऽध्यायः
ऋषिरुवाच–इति तासां स्वशक्तीनामसतीनां समेत्य सः ।
'शक्यत्वाच्छक्तयो विष्णोर्महदाद्या रमा तथा ।स्वरूपशक्तिः शक्तित्वान्मुख्यशक्तिर्हि सा यतः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥समेत्य आसतीनां असमेतानां, प्रसुप्तलोकतन्त्राणाम् अनाविर्भूतलोक-सृष्टिशक्तीनाम् ।'तनुते येन कार्यं यत्तन्त्रं साधनमुच्यते ।कारणानां स्वशक्तिर्वा प्रधानं साधनं यतः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ १ ॥
कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः ।त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥ २ ॥
'शब्दाद्या नभ आद्याश्च मनोयुक्तेन्द्रियाणि च ।अहङ्कारो महांश्चैव त्रयोविंशतिको गणः ॥देवतेन्द्रिययोरैक्यान्न पृथग्गणनं तयोः ।प्रकृतिस्तु चतुर्विंशा पञ्चविंशो हरिः स्वयम् ॥यदा जडांशस्वीकारो जीवस्तत्पञ्चविंशकः ।षडिं्वशको महाविष्णुः श्रिया वा सप्तविंशकः॥ इति तत्त्वनिर्णये ।त्रयोविंशति तत्त्वानि प्राविशद्रमया सह ।कालाख्यया स्वयं विष्णुः शक्यत्वाच्छक्तिरूपया ॥ २ ॥
सोऽनुप्रविष्टो भगवान् चेष्टारूपेण तं गणम् ।भिन्नं संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन् ॥ ३ ॥
'सर्वचेष्टकरूपेण स्वसामर्थ्येन केशवः ।तानि भिन्नानि तत्त्वानि योजयामास चांशतःइति च ॥ ३ ॥
प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गणः ।प््रोरितोऽजनयत् स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम् ॥ ४ ॥
मात्राभिः अंशैः ॥ ४ ॥
स वै विश्वसृजां गर्भो दैवकर्मात्मशक्तिमान् ।विबभाजाऽत्मनाऽत्मानमेकधा दशधा त्रिधा ॥ ७ ॥
'ईश्वरो दैवमुद्दिष्टं सर्वस्यापि प्रभुत्वतः॥ इति च ।आत्मशक्तिः प्रकृतिः ॥ ७ ॥
एष ह्यशेषसत्त्वानामात्मांशः परमात्मनः ।आद्योऽवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते ॥ ८ ॥
'पुरुषेणाऽत्मभूतेनइति योऽण्डमसृजत् स एष इत्युक्तः ।'आद्योऽवतारो विष्णोस्तु पुरुषो नाम कीर्तितः ।असृजत् स महत्तत्त्वं स एवाण्डं समाविशत्॥ ८ ॥
साध्यात्मं साधिदैवं च साधिभूतमिति त्रिधा ।विराट्प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च ॥ ९ ॥
'स ब्रह्मणो हृदिस्थत्वाद्धृदयं चेति कीर्त्यते॥ इति च ।'प्राणादिपञ्चकं चैव तथा नागादिपञ्चकम् ।सनागकूर्मकृकलदेवदत्तधनञ्जयाः ।एवं तु दशधा प्राण अध्यात्मादित्रिधाऽखिलाः॥इति च व्योमसंहितायाम् ॥ ९ ॥
निर्भिन्नान्यथ चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् ।प्राणोनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते ॥ १६ ॥
'प्राणः प्रथमजो यस्तु प्रधानो वायुरीरितः ।त्वगात्माद्यास्तु तत्पुत्रा द्विधाभूतमुदाहृतम्॥इति तत्त्वनिर्णये ॥ १६ ॥
आत्मानं चास्य निर्भिन्नं वाचस्पतिरुपाविशत् ।बुद्ध्या स्वांशेन येनासौ निश्चयं प्रतिपद्यते ॥ २४ ॥
अहं चास्य विनिर्भिन्नमभिमानोऽविशत् पदम् ।कर्त्रा सस्वांशेन येनासौ कर्तव्य प्रतिपद्यते ॥ २५ ॥
सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान् धिष्ण्यमुपाविशत् ।चित्तेनांशेन येनासौ विज्ञानं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥
'अहं सत्वमिति द्वेधा ब्रह्मनाड्या अवान्तरम् ।कर्तृनामा ह्यहङ्कारस्त्वहंनाड्यां व्यवस्थितः ॥सत्त्वनाड्यां तथा चित्तमभिमानो हरस्तथा ।अहंनाड्यां सत्वनाड्यां ब्रह्मा चैव व्यवस्थितः ॥आत्मनाड्यां तथा बुद्धिस्तत्रस्थश्च बृहस्पतिः॥ इति ॥ २६ ॥
मुखतोऽवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह ।यत्रोन्मुखत्वाद् वर्णानां मुख्योऽभूद् ब्राह्मणो गुरुः ॥ ३० ॥
बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः ।यो जातस्त्रायते वर्णान् पुरुषान् कण्टकक्षतात् ॥ ३१ ॥
विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः ।वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत् ॥ ३२ ॥
पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषाकर्मसिद्धये ।तस्यां जातः पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः ॥ ३३ ॥
'ब्रह्माभिमानी तु भृगुरजनि ब्रह्मणो मुखात् ।क्षत्राभिमानी तु मनुर्ब्रह्मबाह्वोरजायत ॥ऊर्वोर्विडभिमानी च वास्तुः पादात्कृतिस्तथा ।एते पूर्वं हरेर्जाता ब्रह्मणस्तदनन्तरम् ॥एवं रुद्राच्च वायोश्च तदन्तस्थहरेर्यतः॥ इति षाड्गुण्ये ॥३०-३३॥
एतत् क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः ।कः श्रद्दध्यादुदाहर्तुं योगमायाबलोदयम् ॥ ३५ ॥
'अधिकत्वाद्देवशब्दो दैवतेष्वधिको यतः ।दैवं हरिः कर्म मूलं कृतिरित्येव भण्यते ॥व्याप्तत्वादात्मशब्दश्च श्रीपतित्वाच्च माधवः॥ इति च ॥ ३५ ॥
अतो भगवतो मायां मायिनामपि मोहिनीम् ।यत् स्वयं चात्मवर्त्मात्मा न वेद किमुतापरे ॥ ३९ ॥
यतोऽप्राप्य निवर्तन्ते वाचश्च मनसा सह ।अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः ॥ ४० ॥
॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥
'आत्मा ब्रह्मा न वेद । अहं रुद्रः ।'गुणपूर्तेरात्मशब्दो ब्रह्मा हीनत्वतो हरः ।अहंशब्दस्तथाप्येतौ न जानीतो हरिं परम्॥ इति ब्राह्मे ।भगवतो मायां भगवतो महिमानम् ।'माया तु महिमा प्रक्ता प्रचुर्ये तु मयड्यतः॥ इति पाद्मे ।आत्मवर्त्मा परमात्मगतिः ॥ ३९ ॥