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Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S6: Difference between revisions

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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
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Revision as of 04:40, 9 April 2026

सप्तमोऽध्यायः

जातो रुचेरजनयत्सुयशाः सुयज्ञःआकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् ।


'क्रियाभिमानाद्यज्ञोऽसाविन्द्रसूनुः प्रकीर्तितः ।यज्ञेशत्वात्स्वयं विष्णुर्यज्ञो रुचिसुतः स्मृतः॥ इति पाद्मे ।हरिरिति ज्ञात्वेशावास्यमित्यादिनाऽनूक्तः ।'त्रयी श्रुतिर्नित्यवाक्च वेदोऽनुवचनं तथा॥ इति ह्यभिधानम् ॥२॥
अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टोदत्तो मयाहमिति यद्भगवान्स दत्तः ।


अमयीं विष्णुप्रधानाम् ॥ ४ ॥
तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मेआदौ सनात्सुतपसस्तपतः स नोऽभूत् ।


मे तपतः सतः । सः नः अर्थे । सनात् पूर्वम् ।'ब्रह्मणस्तपतः पूर्वं विष्णुर्जात उरुक्रमः ।सर्वलोकहितार्थाय येन रूपं प्रकाशितम् ।यश्च पाति सदा लोकानजितो जयतां वरः ।तस्माद्रुद्रः समुत्पन्नः सर्वसंहारकृद्विभुः ।एते त्रिपुरुषाः प्रोक्ताः सृष्टिस्थित्यन्तकारिणः ।निमित्तमात्रं तौ देवौ विष्णुः सर्वस्य कारणम्॥ इति स्कान्दे ॥ ५ ॥
धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्यानारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः ।


'नरो नारायणश्चैव हरिः कृष्णस्तथैव च ।चत्वारो धर्मतनया हरिरेव त्रयो मतः ॥अनन्तो नरनामाऽत्र तस्मिंस्तु नरनामवान् ।विशेषेण स्वयं विष्णुर्निवसत्यम्बुजेक्षणः । ।तस्माच्चतुर्धा धर्मस्य जातो विष्णुरितीरितः॥ इति षाड्गुण्ये ॥६॥
विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञोबालोऽपि सन्नपगतस्तपसे वनाय ।


'अवतारो महाविष्णोर्वासुदेव इतीरितः ।यो ध्रुवाय निजं प्रादात्स्थानमन्यानधिष्ठितम्॥इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ८ ॥
यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र-निष्पिष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् ।


'पृथुर्नाम महाराजस्तत्र विष्णुः स्वयं प्रभुः ।पृथुनामा चतुर्बाहुः प्रविष्टस्तेन चार्थितः॥इति महासंहितायाम् ॥ ९ ॥
नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनुःयो वै चचार समदृग् हृदि योगचर्याम् ।


यद्रूपं परमहंसप्राप्यं पदमामनन्ति ॥ १० ॥
सत्रे ममास भगवान्हयशीर्ष एषःसाक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः ।


'छन्दांसि च मखाश्चैव देवा लोकाश्च सर्वशः ।सर्वे विष्णौ स्थिता यस्मादतः सर्वमयो ह्यसौ॥इति महासंहितायाम् ॥ ११ ॥
मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धःक्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः ।


क्षोणीमयनौकाश्रयत्वात् क्षोणीमयः ॥ १२ ॥
स्मृत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयःचक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः ।


'हरिस्तापसनामाऽसौ जातस्तपसि वै मनुः ।गजेन्द्रं मोचयामास ससर्ज च जगद्विभुः ॥इति मात्स्ये ॥ १६ ॥
नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम्अम्भः शिवं धृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।


'ऐन्द्रं पदं नान्तरीयं फलं तु हरितोषणम् ।जगद्दातुर्बलेर्यस्मादानन्दोद्रिक्तता भवेत्॥ इति ब्रह्मतर्के ।शीर्षाख्यं मानम् ॥ १८ ॥
तुभ्यञ्च नारदभृशं भगवान्वि-वृद्धभावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् ।


'ऐतरेयो हरिः प्राह नारदाय स्वकां तनुम् ।यत्प्रापुर्वैष्णवा नान्ये यदृते न सुखं परम्॥ इति ब्राह्मे ॥ १९ ॥
चक्रञ्च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजोमन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति ।


'मन्वन्तरेषु भगवान् चक्रवर्तिषु संस्थितः ।चतुर्भुजो जुगोपैतद्दुष्टराजन्यनाशकः ॥राजराजेश्वरेत्याहुर्मुनयश्चक्रवर्तिनाम् ।वीर्यदं परमात्मानं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ इति सत्यसंहितायाम् ॥२०॥
कृत्स्नप्रसादसुमुखः कलया कलेशःइक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे ।


यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपोमार्गं सपद्यरिपुरं हरवद्दिधक्षोः ।


वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह-दन्तैर्विलम्बितककुब्जयरूढहासः ।


प्राणादिकलेशः । दूरस्था सुहृद्यस्य भगवतः स दूरेसुहृत् । सुशोषो अग्निः ।'अग्निः सुशोषः कक्षघ्नस्तिमिरारिर्हिरण्यदः। इति ह्यभिधाने ।विनेष्यति विनाशम् एष्यति । दारहर्तुः भगवतः ॥'धनुर्विस्फूर्जितैर्नष्टो रावणः पूर्वमेव तु ।पुनः शरै राममुक्तैः सानुबन्धो विनेश्यति॥ इति स्कान्दे ॥२३-२५ ॥
भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाःक्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः ।


'राम एको ह्यनन्तांशस्तत्र रामाभिधो हरिः ।शुक्लकेशात्मकस्तिष्ठन् रमयामास वै जगत्॥ इति ब्राह्मे ।'विष्णोर्नान्येन कर्माणि परेषां तन्निबन्धनम्॥ इति मात्स्ये ॥२६॥
तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाःत्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः ।


'सहस्रधनुषस्तूर्ध्वं द्युशब्देनापि भण्यते। इति तन्त्रमालायाम् ।इतरथा विष्णुर्न चेत् । स्वमहिमनिबन्धनत्वेन न भाव्यम् ॥ २७ ॥
तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानंदावाग्निनाऽऽशु विपिने परिदह्यमाने ।


अन्येषां स्तुत्यमेव यत्तस्य तच्च दिव्यमिव ॥ २९ ॥
नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात्गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च ।


'अन्यथाज्ञानहेतुर्या वाक् सा जल्पिः प्रकीर्तिता॥इति तन्त्रमालायाम् ॥'यत्तु सर्वात्मनाऽज्ञानं निशा सा परिकीर्तिता॥ इति कौर्मे ॥३१॥
क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यांरासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन ।


कलपदं च आयतं च ।'सप्तस्वरसमाहारो मूर्च्छनेति प्रकीर्तिता॥ इति गान्धर्वे ॥ ३३ ॥
ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट-मल्लेभकंसयवनाः कुजपौण्ड्रकाद्याः ।


ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाःकाम्भोजमत्स्यकुरुसृञ्जयकैकयार्णाः ।


'विद्वेषिणोऽप्युदासीना भक्ता अपि न संशयः ।हरेर्हि सदनं यान्ति व्यक्तं भक्तैस्तु गम्यते ॥आरभ्य तम आमुक्तेः कृष्णस्य सदनं यतः ।अव्यक्तहरिलोकत्वादन्येषामन्यलोकता॥ इति बृहत्संहितायाम् ॥'रामभीमार्जुनादीनि विष्णोर्नामानि सर्वशः ।रमणाभयवर्णाद्याः शब्दवृत्तेर्हि हेतवः ॥हरिर्हि तत्र तत्रस्थो रमणादीन्करोत्यजः ।अतस्तस्यैव नामानि व्याजादन्यगतानि तु ।व्यवहारप्रवृत्त्यर्थं दुष्टानां मोहनाय च॥ इति स्कान्दे ॥ ३४-३५ ॥
कालेन मीलितदृशामवमृश्य नॄणांस्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः ।


'तृतीये सप्तमे चैव षोडशे पञ्चविंशके ।अष्टाविंशे युगे कृष्णः सत्यवत्यामजायत ।व्यासाचार्यस्तु पूर्वेषु चरमे स्वयमेव तु ।विव्यास वेदांश्चक्रे च भारतं वेदसंमितम्॥ इति च ॥ ३६ ॥
सर्गे तु योऽहमृषयो नव ये प्रजेशाःस्थानेऽथ धर्ममखमन्वमरावनीशाः ।


'हरीच्छया विभूतिर्या ब्रह्मादीनां सदा भवेत् ।इच्छया वा बहुविधस्तेषु विष्णुः स्वयं स्थितः ।अतो मायाविभूतित्वं तेषां मत्स्यादिकाः स्वयम्"इत्यध्यात्मे ॥ ३९ ॥
नान्तं विदाम्यहममी मुनयः प्रजेशाःमायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये ।


विदुः नान्तम् । अनन्तत्वात् ॥ ४१ ॥
येषां स एव भगवान्दययेदनन्तःसर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् ।


देवमायां विदन्ति संसारमतितरन्ति च ॥ ४२ ॥
ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायांस्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः ।


तत्परायणास्तच्छीलास्तच्छिक्षाश्च ॥ ४६ ॥
शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रंशुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्वम् ।


'अव्यक्ताद्यनहंमानादात्मतत्त्वं हरिः स्मृतः ।अशब्दश्चाप्रसिद्धत्वाच्छान्तः पूर्णसुखत्वतः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥४७॥
स श्रेयसामपि विभुर्भगवान्यतोऽस्यभावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धः ।


भावस्वभावो भक्तिस्वभावः । तेन निर्मितस्य सत्पुरुषस्य प्रसिद्धः ।'भावो भक्तिः प्रणामश्च प्रावण्यमपि चादरः। इत्यभिधानात् ॥४९॥
सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान्विश्वभावनः ।समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात्सदसच्च यत् ॥ ५० ॥


'सत्तादिर्यत्स्वतो विष्णोस्तस्मादन्यः स सर्वतः ।यत्सत्तादिरतोऽन्यस्य नान्यत्वं भेदिनोऽपि तु॥ इति ब्रह्माण्डे ॥५०॥
नृजन्मनि न तुष्येत किं फलं यमनश्वरे ।कृष्णे यद्यपवर्गेशे भक्तिः स्यान्नानपायिनी ॥ ५३ ॥


किं स्याद्वर्णाश्रमाचारैः किं दानैः किं तपःश्रुतैः ।सर्वाघघ्नोत्तमश्लोके न चेद्भक्तिरधोक्षजे ॥ ५४ ॥


॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
'आक्षिप्यते किमित्येतद्यतोऽल्पफलता भवेत् ।वस्तुनो यस्य चाल्पत्वं पुंसो वा नेति चोच्यते॥इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ५३,५४ ॥