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Brahmasutra/C2/S4: Difference between revisions

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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V04| text = ‘द्विधा हैवेन्द्रियाणि नित्यानि चानित्यानि च । तत्र नित्यं मनोऽनादित्वान्न ह्यमनाः पुमांस्तिष्ठत्यनित्यान्यन्यानि’ इति गौपवनश्रुतौ मनसोऽनुत्पत्तिः सयुक्तिका श्रूयते । अत आह-}}
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‘द्विधा हैवेन्द्रियाणि नित्यानि चानित्यानि च । तत्र नित्यं मनोऽनादित्वान्न ह्यमनाः पुमांस्तिष्ठत्यनित्यान्यन्यानि’ इति गौपवनश्रुतौ मनसोऽनुत्पत्तिः सयुक्तिका श्रूयते । अत आह-
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{{AuthorNote| text = ॥ इति मनोधिकरणम् (तत्प्रागधिकरणम्)}}
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| verse_line1  = ॐ तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॐ॥ 05-276 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V05| text = ‘नित्ययाऽनित्यया स्तौमि परमात्मानमच्युत्तम्’ इति ।
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               ‘वाग्वाव नित्या न ह्येषोत्पद्यतेऽस्यां हि श्रुतिरवतिष्ठते’  इति सयुक्तिकं पौष्यायणश्रुतौ वाचोऽनुत्पत्तिरुच्यते । अतो ब्रवीति –}}
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‘नित्ययाऽनित्यया स्तौमि परमात्मानमच्युत्तम्’ इति ।
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{{AuthorNote| text = ॥ इति वागधिकरणम् (तत्पूर्वकत्वाधिकरणम्)॥}}
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| verse_line1  = ॐ सप्तगतेर्विशेषितत्वाच्च ॐ ॥ 06-277 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V06| text = ‘सप्तप्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्’ इति श्रुतिः।
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‘सप्तप्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्’ इति श्रुतिः।
               ‘सप्तैव मारुता बाह्ये प्राणाः सप्त तथाऽऽत्मनि । अधिदैवे तथाऽध्यात्मे सङ्ख्यासाम्यं विदो विदुः’ इति च स्कान्दे।
               ‘सप्तैव मारुता बाह्ये प्राणाः सप्त तथाऽऽत्मनि । अधिदैवे तथाऽध्यात्मे सङ्ख्यासाम्यं विदो विदुः’ इति च स्कान्दे।
               ‘द्वादश वा एते प्राणा द्वादश मासा द्वादशादित्या द्वादशराशयो द्वादशग्रहाः’ इति कौण्डिण्यश्रुतौ द्वादशप्राणादृष्यन्ते । अतो वक्ति-}}
               ‘द्वादश वा एते प्राणा द्वादश मासा द्वादशादित्या द्वादशराशयो द्वादशग्रहाः’ इति कौण्डिण्यश्रुतौ द्वादशप्राणादृष्यन्ते । अतो वक्ति-
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{{AuthorNote| text = ॥ इति सप्तगत्यधिकरणम् ॥ 04 ॥}}
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V08| text = ‘दिवीव चक्षुराततम्’ इति व्याप्तिः प्रतीयते ।दूरश्रवणदर्शनादियुक्तिश्च।
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‘दिवीव चक्षुराततम्’ इति व्याप्तिः प्रतीयते ।दूरश्रवणदर्शनादियुक्तिश्च।
               अणुभिः पश्यत्यणुभिः कृणोति प्राणा वा अणवः प्राणैर्ह्येतद्भवति’ इति च कौण्डिन्यश्रुतिः ।
               अणुभिः पश्यत्यणुभिः कृणोति प्राणा वा अणवः प्राणैर्ह्येतद्भवति’ इति च कौण्डिन्यश्रुतिः ।
               अतो वक्ति-}}
               अतो वक्ति-
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{{AuthorNote| text = ॥ इति अण्व(णुत्वा)धिकरणम् ॥ 05 ॥}}
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V09| text = ‘नैष प्राण उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता । अथैनमाहुर्मध्यम इति’ इति मुख्यप्राणस्यानुत्पत्तिः श्रूयते ।
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‘नैष प्राण उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता । अथैनमाहुर्मध्यम इति’ इति मुख्यप्राणस्यानुत्पत्तिः श्रूयते ।
               ‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा । तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते’ ॥ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा । तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते’ ॥ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘आत्मत एष प्राणो जायते’ इति च ।
               ‘आत्मत एष प्राणो जायते’ इति च ।
               अत आह}}
               अत आह
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| verse_line1  = ॐ न वायुक्रिये पृथुगुपदेशात् ॐ ॥ 10-281 ॥
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{{AuthorNote| text = ॥ इति मुख्यप्राणाधिकरणम् (श्रेष्ठाधिकरणम्)}}
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| verse_line1  = ॐ चक्षुरादिवत् तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॐ ॥ 11-282 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V11| text = ‘प्राणादिदमाविरासीत् प्राणो धत्ते प्राणे लयमभ्युपैति न प्राणः किञ्चिदाश्रितः’ इत्याग्निवेश्यश्रुतौ ।
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               ‘यदाश्रयादस्य चेष्टा सोऽन्यं कथमुपाश्रयेत् । यथा प्राणस्तथा राजा सर्वस्यैकाश्रयो भवेत्’  इति च युक्तिर्भारते।
               ‘यदाश्रयादस्य चेष्टा सोऽन्यं कथमुपाश्रयेत् । यथा प्राणस्तथा राजा सर्वस्यैकाश्रयो भवेत्’  इति च युक्तिर्भारते।
               ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः ।  न परः कञ्चिदाश्रित्य वर्तते परमो यतः’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
               ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः ।  न परः कञ्चिदाश्रित्य वर्तते परमो यतः’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
               अत आह-}}
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{{AuthorNote| text = ॥ इति चक्षुराद्यधिकरणम् ॥ 07 ॥}}
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| verse_line1  = ॐ पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते ॐ ॥ 13-284 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V13| text = ‘सर्वे वा एते मुख्यदासाः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समान इति । ‘अथ प्राणो वाव सम्राट्’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
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               ‘प्राणापानादयः सर्वे मुख्यदासा यतेऽनिशम् ।अतस्तदाज्ञया नित्यं स्वानि कर्माणि कुर्वते’ इति युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘प्राणापानादयः सर्वे मुख्यदासा यतेऽनिशम् ।अतस्तदाज्ञया नित्यं स्वानि कर्माणि कुर्वते’ इति युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘मुख्यस्यैव स्वरूपाणि प्राणाध्याः पञ्चवायवः ।स एव प्राणिनां देहे पञ्चधा वर्ततेऽनिशम्’ इति च गौपमश्रुतिः ।
               ‘मुख्यस्यैव स्वरूपाणि प्राणाध्याः पञ्चवायवः ।स एव प्राणिनां देहे पञ्चधा वर्ततेऽनिशम्’ इति च गौपमश्रुतिः ।
               अतो वक्ति-}}
               अतो वक्ति-
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{{AuthorNote| text = ॥ इति पञ्चवृत्त्यधिकरणम् ॥ 08 ॥}}
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V14| text = ‘प्राण एवाधस्तात् प्राण उपरिष्ठात् प्राणो मध्यतः प्राणः सर्वतः प्राण एवेदं सर्वम्’ इति प्राणस्य व्याप्तिः प्रतीयते ।
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               ‘यतः सर्वं जगद्व्याप्य तिष्ठति प्राण एव तु । अतो धृतं जगत् सर्वमन्यथा केन धार्यते’ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘यतः सर्वं जगद्व्याप्य तिष्ठति प्राण एव तु । अतो धृतं जगत् सर्वमन्यथा केन धार्यते’ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘अणुनैतत्सृज्यतेऽणुनैतद्धार्यते अणौ लयमभ्युपैति प्राणो वा अणुः प्राणो ह्येतद्भवति’ इति च सौत्रायणश्रुतिः ॥
               ‘अणुनैतत्सृज्यतेऽणुनैतद्धार्यते अणौ लयमभ्युपैति प्राणो वा अणुः प्राणो ह्येतद्भवति’ इति च सौत्रायणश्रुतिः ॥
               अत आह –}}
               अत आह –
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{{AuthorNote| text = ॥ इति प्राणाणुत्वाधिकरणम् ॥ 09 ॥}}
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| verse_line1  = ॐ ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॐ ॥ 15-286 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V15| text = करणत्वं प्राणानामुक्तम् ।
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करणत्वं प्राणानामुक्तम् ।
               ‘जीवस्य करणान्याहुः प्राणानेतांस्तु सर्वशः।यस्मात् तद्वशगा एते दृश्यन्ते सर्वदेहिषु’ इति सौत्रायणश्रुतौ सयुक्तिकं जीवकरणत्वं प्रतीयते।
               ‘जीवस्य करणान्याहुः प्राणानेतांस्तु सर्वशः।यस्मात् तद्वशगा एते दृश्यन्ते सर्वदेहिषु’ इति सौत्रायणश्रुतौ सयुक्तिकं जीवकरणत्वं प्रतीयते।
               ‘ब्रह्मणो वा एतानि करणानि चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति तद्ध्येतैः कारयति’ इति काषायणश्रुतौ । अत आह –}}
               ‘ब्रह्मणो वा एतानि करणानि चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति तद्ध्येतैः कारयति’ इति काषायणश्रुतौ । अत आह –
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V16| text = कथं जीवकरणत्वश्रुतिरित्यतो वक्ति –}}
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               ‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुर्मनोबुद्धी तु द्वादश’ इति च काषायणश्रुतिः ।अतः कस्येन्द्रियत्वं निवार्यत इत्यतो वक्ति-}}
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‘अथेन्द्रियाणि प्राणा वा इन्द्रियाणि प्राणा हीदं द्रवन्ति’ इति सयुक्तिकपौत्रायणश्रुतिः सामान्येन प्राणानामिन्द्रियत्वं वक्ति ।
               ‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुर्मनोबुद्धी तु द्वादश’ इति च काषायणश्रुतिः ।अतः कस्येन्द्रियत्वं निवार्यत इत्यतो वक्ति-
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V21| text = ‘विरिञ्चो वा इदं सर्वं विरेचयति विदधाति ब्रह्मा वाव विरिञ्च एतस्माद्धीमे रूपनामानी’ इति गौपवनश्रुतिः ॥
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‘विरिञ्चो वा इदं सर्वं विरेचयति विदधाति ब्रह्मा वाव विरिञ्च एतस्माद्धीमे रूपनामानी’ इति गौपवनश्रुतिः ॥
               ‘यस्माद्विरेचयेत् सर्वं विरिञ्चस्तेन भण्यते ।एको हि कर्ता जगतो ब्रह्मैव च चतुर्मुखः’ इति च युक्तिर्ब्राह्मे ।
               ‘यस्माद्विरेचयेत् सर्वं विरिञ्चस्तेन भण्यते ।एको हि कर्ता जगतो ब्रह्मैव च चतुर्मुखः’ इति च युक्तिर्ब्राह्मे ।
               अथ कस्मादुच्यते परम इति परमाद्ध्येते नामरूपे व्याक्रियेते तस्मादेनमाहुः परम इति । अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मेति बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च’ इत्याग्निवेश्यश्रुतिः ।
               अथ कस्मादुच्यते परम इति परमाद्ध्येते नामरूपे व्याक्रियेते तस्मादेनमाहुः परम इति । अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मेति बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च’ इत्याग्निवेश्यश्रुतिः ।
               अत आह-}}
               अत आह-
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‘अद्ब्यो हीदमुत्पद्यते आपो वाव मांसमस्थि च भवन्त्यापः शरीरमाप एवेदं सर्वम्’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
               ‘अम्मयं तु यतो मांसमतस्तृप्तिश्च मांसतः’ इति च भारते ।
               ‘अम्मयं तु यतो मांसमतस्तृप्तिश्च मांसतः’ इति च भारते ।
               ‘पृथिवी शरीरमाकाशमात्मा’ इति च  अतो ब्रवीति –}}
               ‘पृथिवी शरीरमाकाशमात्मा’ इति च  अतो ब्रवीति –
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V23| text = कथं तर्हि विशेषवचनमित्यत आह-}}
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{{AuthorNote| text = इति मांसा(ध्य)धिकरणम् ॥ 13 ॥}}
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमद्ब्रह्मसूत्रे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः॥ 02-04 ॥}}
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॥ इति श्रीमद्ब्रह्मसूत्रे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः॥ 02-04 ॥
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{{AuthorNote| text = ॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायः (अविरोधाध्यायः) ॥ 02 ॥}}
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॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायः (अविरोधाध्यायः) ॥ 02 ॥
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Revision as of 04:40, 9 April 2026

चतुर्थः पादः

युक्तिसहितश्रुतिविरोधं श्रुतीनामपाकरोत्यनेन पादेन ।

‘प्राणा एवेदमग्र आसुस्तेभ्यो भूतानि जज्ञिरे । भूतेभ्योऽण्डमण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः । अथ प्राणा एवानादयः प्राणा नित्याः’ इति काषायणश्रुतौ प्राणानामनुत्पत्तिः श्रूयते ।

‘नोपादानं हीन्द्रियाणामतोऽनुत्पत्तिरिष्यते । उपादानकृता सृष्टिः सर्वलोकेषु दृष्यते’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥

‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति च ।

अत उच्यते –

प्राणाधिकरणम्

ॐ तथा प्राणाः ॐ ॥ 01-272 ॥


यथाऽऽकाशादयः परमात्मन उत्पद्यन्ते तथा प्राणा अपि ॥ 01 ॥
ॐ गौण्यसम्भवात् ॐ ॥ 02-273 ॥


अनादित्वश्रुतिर्गौणानादित्वापेक्षया । मुख्यासम्भवात् ।
‘नित्यान्येतानि सौक्ष्म्येण हीन्द्रियाणि तु सर्वशः ।तेषां भूतैरुपचयः सृष्टिकाले विधीयते ।>परेण साम्यसम्प्राप्तेः कस्य स्यान्मुख्यनित्यता’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 02 ॥
ॐ प्रतिज्ञानुपरोधाच्च ॐ ॥ 03-274 ॥


॥ इति प्राणाधिकरणम् (प्राणोत्पत्त्यधिकरणम्)
‘इदं सर्वमसृजत’ इति ॥ 03 ॥

मनोधिकरणम्

ॐ तत् प्राक्ष्रुतेश्च ॐ ॥ 04-275 ॥


‘द्विधा हैवेन्द्रियाणि नित्यानि चानित्यानि च । तत्र नित्यं मनोऽनादित्वान्न ह्यमनाः पुमांस्तिष्ठत्यनित्यान्यन्यानि’ इति गौपवनश्रुतौ मनसोऽनुत्पत्तिः सयुक्तिका श्रूयते । अत आह-
॥ इति मनोधिकरणम् (तत्प्रागधिकरणम्)
‘मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति पूर्वोक्तत्वान्नानुत्पत्तिर्मनसो युज्यते।
‘पूर्वं मनः समुत्पन्नं ततोऽन्येषां समुद्भवः ।
               तदनुत्पत्तिवचनमल्पोपचयकारणात्’॥
इति वायुप्रोक्तवचनं चशब्देन गृहीतम् ॥ 04 ॥

वागधिकरणम्

ॐ तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॐ॥ 05-276 ॥


‘नित्ययाऽनित्यया स्तौमि परमात्मानमच्युत्तम्’ इति । ‘वाग्वाव नित्या न ह्येषोत्पद्यतेऽस्यां हि श्रुतिरवतिष्ठते’ इति सयुक्तिकं पौष्यायणश्रुतौ वाचोऽनुत्पत्तिरुच्यते । अतो ब्रवीति –
॥ इति वागधिकरणम् (तत्पूर्वकत्वाधिकरणम्)॥
‘तस्मान्मन एव पूर्वरूपं वागुत्तररूपम्’ इति मनःपूर्वकत्वाद्वाचो नानुत्पत्तिः ।
‘वागिन्द्रियस्य नित्यत्वं श्रुतिसन्निधियोग्यता ।उत्पत्तिर्मनसो यस्मान्न नित्यत्वं कुतश्चन’ इति वायुप्रोक्ते ॥ 05 ॥

सप्तगत्यधिकरणम्

ॐ सप्तगतेर्विशेषितत्वाच्च ॐ ॥ 06-277 ॥


‘सप्तप्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्’ इति श्रुतिः।
             ‘सप्तैव मारुता बाह्ये प्राणाः सप्त तथाऽऽत्मनि । अधिदैवे तथाऽध्यात्मे सङ्ख्यासाम्यं विदो विदुः’ इति च स्कान्दे।
‘द्वादश वा एते प्राणा द्वादश मासा द्वादशादित्या द्वादशराशयो द्वादशग्रहाः’ इति कौण्डिण्यश्रुतौ द्वादशप्राणादृष्यन्ते । अतो वक्ति-
ज्ञानेन्द्रियापेक्षया सप्तत्वम् ।’गुहाशयां निहिताः सप्त सप्त’ इति विशेषणात्।
‘सप्तप्राणास्त्ववगतेः पञ्चप्राणाश्च कर्मणः । एवं प्राणद्वादशकं शरीरे नित्यसंस्थितम्’ ।
इति भविष्यत्पर्ववचनं चशब्दात् ॥ 06 ॥
ॐ हस्तादयस्तुस्थितेऽतो नैवम् ॐ ॥ 07-278 ॥


॥ इति सप्तगत्यधिकरणम् ॥ 04 ॥
हस्तादीनां कर्मविषयत्वान्न सहपाठः।
‘संसारस्थितिहेतुत्वात् स्थितं कर्म विदो विदुः ।तस्मादुद्गतिहेतुत्वाज्ज्ञानं गतिरिहोच्यते’ इति वायुप्रोक्ते ॥ 07 ॥

अण्व(णुत्वा)धिकरणम्

ॐ अणवश्च ॐ ॥ 08-279 ॥


‘दिवीव चक्षुराततम्’ इति व्याप्तिः प्रतीयते ।दूरश्रवणदर्शनादियुक्तिश्च।
             अणुभिः पश्यत्यणुभिः कृणोति प्राणा वा अणवः प्राणैर्ह्येतद्भवति’ इति च कौण्डिन्यश्रुतिः ।
अतो वक्ति-
॥ इति अण्व(णुत्वा)धिकरणम् ॥ 05 ॥
‘तद्यथा ह्यणुनश्चक्षसः प्रकाशो व्यातत एवमेवास्य पुरुषस्य प्रकाशो व्याततोऽणुर्ह्येवैष पुरुषो भवति’ इति शाण्डिल्यश्रुतिः॥ 08 ॥

मुख्यप्राणाधिकरणम्

ॐ श्रेष्ठश्च ॐ ॥ 09-280 ॥


‘नैष प्राण उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता । अथैनमाहुर्मध्यम इति’ इति मुख्यप्राणस्यानुत्पत्तिः श्रूयते ।
             ‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा । तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते’ ॥ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
             ‘आत्मत एष प्राणो जायते’ इति च ।
अत आह
‘सौक्ष्म्येण ह वा एषोऽवतिष्ठते स्थूलत्वेनोदेति सूक्ष्मश्चाथो स्थूलश्च प्रकृतितः सूक्ष्मोऽन्यतः स्थूलोऽथैनमाहुः सादिरनादिरिति’ इति गौपवनश्रुतेः ॥ 09 ॥
ॐ न वायुक्रिये पृथुगुपदेशात् ॐ ॥ 10-281 ॥


॥ इति मुख्यप्राणाधिकरणम् (श्रेष्ठाधिकरणम्)
‘चेष्टायां बाह्यवायौ च मुख्यप्राणे च गीयते । प्राणशब्दस्त्रिषु ह्येषु मुखे मुख्यः प्रकीर्तितः’
इति वायुक्रिययोरपि व्यपदेशादुत्पत्तिश्रुतिस्तयोर्न स्यात् । ‘स प्राणमसृजत’ …‘खं वायुर्ज्योतिरापः..’, ‘तपो मन्त्राः कर्म’ इति पृथगुपदेशात् ।
‘भूतानि चेष्टा मन्त्राश्च मुख्यप्राणादिदं जगत् ।
               मुख्यप्राणः परस्माच्च न परः कारणान्वितः’
इति वायुप्रोक्ते ॥ 10 ॥

चक्षुराद्यधिकरणम्

ॐ चक्षुरादिवत् तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॐ ॥ 11-282 ॥


‘प्राणादिदमाविरासीत् प्राणो धत्ते प्राणे लयमभ्युपैति न प्राणः किञ्चिदाश्रितः’ इत्याग्निवेश्यश्रुतौ ।
             ‘यदाश्रयादस्य चेष्टा सोऽन्यं कथमुपाश्रयेत् । यथा प्राणस्तथा राजा सर्वस्यैकाश्रयो भवेत्’  इति च युक्तिर्भारते।
             ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः ।  न परः कञ्चिदाश्रित्य वर्तते परमो यतः’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
अत आह-
चक्षुरादिवन्मुख्यप्राणोऽपि परमात्मवश एव ।
‘सर्वं ह्येवैतत् परमेऽवतिष्ठते प्राणश्च प्राणाश्च प्राणिनश्च स ह्येक एवैतान्नयत्युन्नयति वशीकरोति’
इति गौपवनश्रुतौ चक्षुरादिभिः सह तद्वशत्वेनैव शासनात् ।
‘सर्वकर्ताऽपि सन् प्राणः परमाधारतः स्थितः । कथमेवान्यथा न स्याद्यतो नैवेश्वरद्वयम् ।
अवान्तरेश्वरत्वेन तस्येश्वरवचो भवेत् । अतो मध्यमतामाहुस्तस्य वेदेषु वेदिनः ।
अनन्येश्वरता प्राणे तदन्येश्वरवर्जनात् । यतो विशेषवाक्येन ह्रियते समतावचः’ ।
‘नान्योऽतोऽस्तिद्रष्टा’’नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ’ इत्यादिवचनयुक्तय आदिशब्दोक्ताः ॥ 11 ॥
ॐ अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति ॐ ॥ 12-283 ॥


॥ इति चक्षुराद्यधिकरणम् ॥ 07 ॥
इतरेषां प्राणानां करणत्वान्मुख्यस्याकरणत्वात् तस्यानेभ्य उत्तमत्वं युज्यते ।
माण्डव्यश्रुतिश्च ‘तानि ह वा एतानि सर्वाणि करणान्यथ प्राण एवाकरणस्तस्मान्मुख्यस्तस्मान्मुख्य इत्याचक्षते’ इति ॥ 12 ॥

पञ्चवृत्त्यधिकरणम्

ॐ पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते ॐ ॥ 13-284 ॥


‘सर्वे वा एते मुख्यदासाः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समान इति । ‘अथ प्राणो वाव सम्राट्’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
             ‘प्राणापानादयः सर्वे मुख्यदासा यतेऽनिशम् ।अतस्तदाज्ञया नित्यं स्वानि कर्माणि कुर्वते’ इति युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
             ‘मुख्यस्यैव स्वरूपाणि प्राणाध्याः पञ्चवायवः ।स एव प्राणिनां देहे पञ्चधा वर्ततेऽनिशम्’ इति च गौपमश्रुतिः ।
अतो वक्ति-
॥ इति पञ्चवृत्त्यधिकरणम् ॥ 08 ॥
‘अथ पञ्चवृत्तैतत्प्रवर्तते प्राणा वाव पञ्चवृत्तिः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समान इति । तेभ्यो वा एतेभ्यः पञ्चदासाः प्रजायन्ते । प्राणाद्वाव प्राणेऽपानादपानो व्यानाद्व्यान उदानादुदानः समानादेव समानो यथा ह वै मनः पञ्चधा व्यपदिश्यते मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेतनेति । तेभ्यो वा एतेभ्यः पञ्च दासाः प्रजायन्ते । मनसो वाव मनो बुद्धेर्बुद्धिरहङ्कारादहङ्कारश्चित्ताच्छित्तं चेतनाया एव चेतनैवमिति’ इति

प्राणाणुत्वाधिकरणम्

ॐ अणुश्च ॐ ॥ 14-285 ॥


‘प्राण एवाधस्तात् प्राण उपरिष्ठात् प्राणो मध्यतः प्राणः सर्वतः प्राण एवेदं सर्वम्’ इति प्राणस्य व्याप्तिः प्रतीयते ।
             ‘यतः सर्वं जगद्व्याप्य तिष्ठति प्राण एव तु । अतो धृतं जगत् सर्वमन्यथा केन धार्यते’ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
             ‘अणुनैतत्सृज्यतेऽणुनैतद्धार्यते अणौ लयमभ्युपैति प्राणो वा अणुः प्राणो ह्येतद्भवति’ इति च सौत्रायणश्रुतिः ॥
अत आह –
॥ इति प्राणाणुत्वाधिकरणम् ॥ 09 ॥
स वा एष प्राणोऽणुर्महान्नामाऽन्तर्वाऽणुर्बर्हिर्महान् प्राणो वा ईशितव्येश ईशो ह्यसौ सर्वस्येशितव्यश्च परस्य’ इति हि कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 14 ॥

ज्योतिराद्यधिकरणम्

ॐ ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॐ ॥ 15-286 ॥


करणत्वं प्राणानामुक्तम् ।
             ‘जीवस्य करणान्याहुः प्राणानेतांस्तु सर्वशः।यस्मात् तद्वशगा एते दृश्यन्ते सर्वदेहिषु’ इति सौत्रायणश्रुतौ सयुक्तिकं जीवकरणत्वं प्रतीयते।
‘ब्रह्मणो वा एतानि करणानि चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति तद्ध्येतैः कारयति’ इति काषायणश्रुतौ । अत आह –
यज्ज्योतिराद्यधिष्ठानं ब्रह्म तदेवैतैः करणैः प्रवर्तयति। ‘यः प्राणे तिष्ठन्’ इत्यादि तदामननात् ॥ 15 ॥
ॐ प्राणवता शब्दात् ॐ ॥ 16-287 ॥


कथं जीवकरणत्वश्रुतिरित्यतो वक्ति –
जीवेनैव स्वकरणैः कारयति परमात्मा । अतो न विरोधः । एष ह्यनेनात्मना चक्षुषा दर्शयति श्रोत्रेण श्रावयति मनसा मनयति बुद्ध्या बोधयति तस्मादेतावाहुः सृतिरसृतिरिति’ इति भाल्लवेयश्रुतेः ।
‘करणैः कारणं ब्रह्म पुरुषापेक्षयाऽखिलम् । श्रोत्रादिभिः कारयति करणानीत्यतो विदुः ।
न जीवापेक्षया मुख्यं कारयेत् परमेश्वरः ।केवलात्मेच्छया तस्मान्मुख्यत्वं तस्य निश्चितम्’ इति वाराहे ॥ 16 ॥
ॐ तस्य च नित्यत्वात् ॐ ॥ 17-288 ॥


॥ इति ज्योतिराद्यधिकरणम् ॥ 10 ॥
अनादिनित्यत्वाज्जीवकरणसम्बन्धस्य युज्यते तत्करणत्वश्रुतिः ।’अथावियोगीनि । करणैर्र्वाव न वियुज्यते देहेनैव वियुज्यत इत्येतद्वाव करणानां करणत्वं यद्वाव न वियुज्यते’ इति गौपवनश्रुतिः ।
चशब्दः करणसम्बन्धग्राही ॥ 17 ॥

इन्द्रियाधिकरणम्

ॐ त इन्द्रियाण् तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॐ ॥ 18-289 ॥


‘अथेन्द्रियाणि प्राणा वा इन्द्रियाणि प्राणा हीदं द्रवन्ति’ इति सयुक्तिकपौत्रायणश्रुतिः सामान्येन प्राणानामिन्द्रियत्वं वक्ति । ‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुर्मनोबुद्धी तु द्वादश’ इति च काषायणश्रुतिः ।अतः कस्येन्द्रियत्वं निवार्यत इत्यतो वक्ति-
मुख्यप्राणमृते त एवेन्द्रियाणि ।
‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुः प्राणो मुख्यस्त्वनिन्द्रियम् ।द्रवतां हीन्द्रियाणां तु नियन्ता प्राण एकराट्’ इति पौत्रायणश्रुतिः ।
‘श्रोत्रादीनि तु पञ्चैव तथा वागादिपञ्चकम् । मनोबुद्धिसहायानि द्वादशैवेन्द्रियाणि तु ।
विषयद्रवणात् तेषामिन्द्रियत्वमुदाहृतम् ।तेषां नियामकः प्राणः स्थित एवाखिलप्रभुः’इति बृहत्संहितायाम् ॥18॥
ॐ भेदश्रुतेः ॐ ॥ 19-290 ॥


‘स्थित एव हीदं मुख्यप्राणः करोति कारयति बलति बालयति धत्ते धारयति प्रभुं वा एनमाहुरथेन्द्रियाणि न स्थितानि न कुर्वन्ति न कारयन्ति न बलन्ति न बालयन्ति न दधते न धारयन्ति तानि ह वा एतान्यबलानि तस्मादाहुरिन्द्रियाणि करणानि’ इति पौत्रायणश्रुतेः ॥ 19 ॥
ॐ वैलक्षण्याच्च ॐ ॥ 20-291 ॥


॥ इति इन्द्रियाधिकरणम् ॥ 11 ॥
पुरुषापेक्षया प्रवृत्तिरिन्द्रियाणां दृष्यते न मुख्यस्य । ‘प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति’ इति च श्रुतेः ॥ 20 ॥

सङ्ज्ञाधिकरणम्

ॐ सङ्ज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तुत्रि वृत्कुर्वत उपदेशात् ॐ॥ 21-292 ॥


‘विरिञ्चो वा इदं सर्वं विरेचयति विदधाति ब्रह्मा वाव विरिञ्च एतस्माद्धीमे रूपनामानी’ इति गौपवनश्रुतिः ॥
             ‘यस्माद्विरेचयेत् सर्वं विरिञ्चस्तेन भण्यते ।एको हि कर्ता जगतो ब्रह्मैव च चतुर्मुखः’ इति च युक्तिर्ब्राह्मे ।
             अथ कस्मादुच्यते परम इति परमाद्ध्येते नामरूपे व्याक्रियेते तस्मादेनमाहुः परम इति । अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मेति बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च’ इत्याग्निवेश्यश्रुतिः ।
अत आह-
॥ इति सङ्ज्ञाधिकरणम् ॥ 12 ॥
नामरूपक्लृप्तिः परादेव।
‘सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन् य आस्ते’ इति श्रुतेः।
त्रिवृत्कुर्वत इति हेतुगर्भः । त्रिवृत्करणापेक्षत्वान्नामरूपयोः ॥
‘सर्वनाम्नां च रूपाणां व्यवहारेषु केशवः ।एक एव यतः स्रष्टा ब्रह्माद्यास्तदवान्तराः’ इति च पाद्मे ॥
‘त्रिवृत्क्रिया यतो विष्णो रूपं च तदपेक्षया । रूपापेक्षं तथा नाम व्यवहारस्तदात्मकः ॥
अतो नाम्नश्च रूपस्य व्यवहारस्य चैकराट् ।हरिरेव यतः कर्ता पिताऽतो भगवान् प्रभुः’इति च ब्रह्माण्डे ॥ 21 ॥

मांसा(ध्य)धिकरणम्

ॐ मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॐ ॥ 22-293 ॥


‘अद्ब्यो हीदमुत्पद्यते आपो वाव मांसमस्थि च भवन्त्यापः शरीरमाप एवेदं सर्वम्’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
             ‘अम्मयं तु यतो मांसमतस्तृप्तिश्च मांसतः’ इति च भारते ।
‘पृथिवी शरीरमाकाशमात्मा’ इति च अतो ब्रवीति –
‘यत् कठिनं सा पृथिवी यद्द्रवं तदापो यदुष्णं तत् तेजः’ इति श्रुतेर्मांसाद्येव भौमं न सर्वशरीरम्। अप्तेजसोश्च कार्यं यथाशब्दमङ्गीकर्तव्यम् ॥
‘यद्वा वाऽथो विमिश्रं मिश्राद्ध्येतद्भवति मिश्राणि हि भूतानि तस्मादेवैवमाचक्षते भूतानि’ इति हि काषायणश्रुतिः ।
‘पञ्चभूतात्मकं सर्वं तदप्येकविवक्षया । एकभूतात्मकत्वेन व्यवहारस्तु वैदिके ।
भौममित्येव काठिन्याच्छौक्ल्यादौदकमित्यपि ।तेजिष्टत्त्वात् तैजसं च यथाऽस्थ्नां वचनं श्रुतौ’इति वायुप्रोक्ते ॥22॥
ॐ वैशेष्यात् तु तद्वादस्तद्वादः ॐ ॥ 23-294 ॥


कथं तर्हि विशेषवचनमित्यत आह-
इति मांसा(ध्य)धिकरणम् ॥ 13 ॥
॥ इति श्रीमद्ब्रह्मसूत्रे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः॥ 02-04 ॥
॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायः (अविरोधाध्यायः) ॥ 02 ॥
भूतानां विशेषसंयोगादेव विशेषव्यवहारः ।
‘पार्थिवानां शरीराणामर्धेन पृथिवी स्मृताः । इतरेऽर्धे त्रिभागिन्य आपस्तेजस्तुभागतः ॥
इति सामान्यतो ज्ञेयं भेदश्च प्रतिपूरुषम् ।स्वर्गस्थानां शरीराणामर्धं तेज उदाहृतम्’इति च ब्रह्मसंहितायाम् ॥
सर्वाध्यायार्थावधारणार्थऽध्यायान्ते द्विरुक्तिः।
गारुडे च-
‘अध्यायान्ते द्विरुक्तिः स्याद्वेदे वा वैदिकेऽपि वा । विचारो यत्र सज्ज्येत पूर्वोक्तस्यावधारणे ॥
अनुक्तानां प्रमाणानां स्वीकारश्च कृतो भवेत् । विनिन्द्य चेतरान् मार्गान् सम्पूर्णफलता तथा ॥ इति ॥ 23 ॥