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Brahmasutra/C1/S4: Difference between revisions

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{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S04_V10| text = ‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’ इत्यादि कर्माभिधायकस्य क्रमादि विरोधान्न युज्यत इत्यत आह –}}
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‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’ इत्यादि कर्माभिधायकस्य क्रमादि विरोधान्न युज्यत इत्यत आह –
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{{AuthorNote| text = ॥ इति समाकर्षाधिकरणम् ॥ 05 ॥}}
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{{AuthorNote| text = ॥इति प्रकृत्यधिकरणम् ॥ 06 ॥}}
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{{AuthorNote| text = एतेन सर्वेव्याख्याताधिकरणम् ॥}}
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्री मद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य चतुर्थपादः ॥01-04 ॥}}
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Revision as of 04:40, 9 April 2026

चतुर्थः पादः

अनुमानिकाधिकरणम्

ॐ आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेर्दशर्यति च ॐ ॥ 01-107 ॥


॥ ॐ श्रुतिलिङ्गादिभिरन्यत्रैव प्रसिद्धनामापि शब्दानां सामस्त्येन विशेषहेतुभिर्विष्णावेव प्रवृत्तिं दर्शयत्यस्मिन् पादे ।
‘तत्तु समन्वयात्’ इति सर्वशब्दानां परमेश्वरे समन्वय उक्तः । तन्न युज्यते । यतो ‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’ इति साङ्ख्यानुमानपरिकल्पितं प्रधानमप्येकेषां शाखिनामुच्यत इति चेन्न, तस्यैव पारतन्त्र्याच्छिररीररूपके ऽव्यक्ते विन्यस्तस्य परमात्मन एवाव्यक्तशब्देन गृहीतेः । कप्रत्ययः कुत्सने । परमात्मना एवाव्यक्तॆशब्दः । । तत्तन्त्रत्वेन तच्छरीररूपत्वादितरस्याप्यव्यक्तशब्दः ।
‘तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासीत्’ इति दर्शयति च ।
‘अव्यक्तमचलं शान्तं निष्कलं निष्क्रियं परम् । यो वेद हरिमात्मानं स भयादनुमुच्यते’ ।इति पिप्पलादशाखायाम्।
‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’ इत्युक्त्वा‘अव्यक्तो ऽक्षर इत्युक्तः’इति वचनाच्च ॥ 01 ॥
ॐ सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॐ ॥ 02-108 ॥


सूक्ष्ममेवाव्यक्तश्यब्देनोच्यते । तद्द्यव्यक्ततामर्हति । सूक्ष्मत्वं च मुख्यं तस्यैव ।
‘यत्तत्सूक्ष्मं परमं वेदितव्यं नित्यं पदं वैष्णवं ह्यामनन्ति ।यत्तल्लोका न विदुर्लोकसारं विन्दन्त्येतत् कवयो योगनिष्ठाः’॥इति च पिप्पलादशाखायाम् ।
मुख्ये च विद्यमाने नामुख्यं युक्तम् ॥ 02 ॥
ॐ तदधीनत्वादर्थवत् ॐ ॥ 03-109 ॥


तददीनत्वाच्चाव्यक्तादीनां तस्यैवाव्यक्तत्वपरावरत्वादिकमर्थवत् ।
‘यदधीनो गुणो यस्य तद्गुणी सोऽभिधीयते । यथा जीवः परात्मेति यथा राजा जयीत्यपि’ इति च स्कान्दे ॥ 03 ॥
ॐ ज्ञेयत्वावचनाच्च ॐ ॥ 04-110 ॥


अन्यस्य न वाच्यत्वं युज्यते ॥ 04 ॥
ॐ वदतीती चेन्न प्राज्ञो हि ॐ ॥ 05-111 ॥


‘महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते’ इति ज्ञेयत्वं वदतीती चेन्न । प्राज्ञः परमात्मा हि तत्रोच्यते ।
‘अणोरणीयान्महतो महीयान्’ इति तस्यैव हि महतो महत्वम् । सर्वस्मात् परस्य महतोऽपि परत्वं युज्यते ॥ 05 ॥
ॐ प्रकरणात् ॐ ॥ 06-112 ॥


‘सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमम् पदम्’ इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥
ॐ त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ॐ ॥ 07-113 ॥


त्रयाणामेव पितृसौमनस्यस्वर्ग्याग्निपरमात्मनां प्रश्न उपन्यासश्च ।
‘अविज्ञातप्रार्थनं च प्रश्न इत्यभिधीयते’ ॥ इति वचनान्न विरोधः ॥ 07 ॥
ॐ महद्वच्च ॐ ॥ 08-114 ॥


यथा महच्छब्दो महत्तत्वे प्रसिद्धोऽपि परममहत्त्वात् परमात्मन एव मुख्यः एवमितरेऽपि ॥ 08 ॥
ॐ चमसवदविशेषात् ॐ ॥ 09-115 ॥


॥ इति अनुमानिकाधिकरणम् ॥ 01 ॥
यथा चमसशब्दोऽन्यत्र प्रसिद्धोऽपि ‘इदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुद्नः’ इति श्रुतेः शिरोवाचकः एवमव्यक्तादिशब्दाः सर्वेऽन्यत्र प्रसिद्धा अपि,
‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ इत्यादि श्रुतेः परमात्माभिधायका एव । अविशेषाच्छ्चुतेः ॥ 09 ॥

ज्योतिरुपक्रमाधिकरणम्

ॐ ज्योतिरुपक्रमात् तु तथा ह्यधीयत एके ॐ॥ 10-116 ॥


‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’ इत्यादि कर्माभिधायकस्य क्रमादि विरोधान्न युज्यत इत्यत आह –
ज्योतिरादिकर्मवाचकत्वेन प्रसिद्धाभिधेयोऽपि स एव । ‘एष इमं लोकमभ्यार्चत्’ इत्युपक्रम्य ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषाः एकैव व्याहृतिः प्राण एव प्राण ऋच इत्येव विद्यात्’ इति ह्यधीयते एके ॥ 10 ॥
ॐ कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः ॐ ॥ 11-117 ॥


॥ इति ज्योतिरुपक्रमाधिकरणम् ॥ 02 ॥
मधुविद्यादिवत् सर्वशब्दार्थत्वेन परस्य कल्पनोपदेशाच्च न कर्मक्रमादिविरोधः ॥ 11 ॥

नसङ्ख्योपसङ्ग्रहाधिकरणम्

ॐ न सङ्ख्योपसङ्ग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ॐ॥ 12-118 ॥


‘यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः’ इत्यादिषु बहुसङ्ख्योपसङ्ग्रहेऽपि न विरोधः । तस्यैवाकाशादिषु नानाभावात् तदतिरिक्तस्वरूपत्वाच्च ॥12॥
ॐ प्राणादयो वाक्यशेषात् ॐ ॥ 13-119 ॥


पञ्च पञ्चजनानाह –
‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो मनः’ इति वाक्यशेषात् ॥ 13 ॥
ॐ ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॐ ॥ 14-120 ॥


॥ इति नसङ्ख्योपसङ्ग्रहाधिकरणम् ॥ 03 ॥
‘तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः’ इत्यनेन काण्वानां पञ्चकम् । । 14 ॥

आकाशाधिकरणम्

ॐ कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॐ ॥ 15-121 ॥


अवान्तरकारणत्वेनापि एवोच्यत इति वक्ति-
॥ इति आकाशाधिकरणम् ॥ 04 ॥
आकाशादिष्ववान्तरकारणत्वेन स एव स्थितः । यथाव्यपदिष्टस्यैव परस्य ‘य आकाशे तिष्ठन्’ इत्यादिना आकाशादिषूक्तेः ॥ 15 ॥

समाकर्षाधिकरणम्

ॐ समाकर्षात् ॐ ॥ 16-122 ॥


सर्वशब्दानां परमात्मवाचकत्वे कथमन्यत्र व्यवहार इत्यतो ब्रवीति-
परमात्मवाचिनः शब्दा अन्यत्र समाकृष्य व्यवह्रियन्ते ।
‘परस्य वाचकाः शब्दा समाकृष्येतरेष्वपि ।व्यवह्रियन्ते सततं लोकवेदानुसारतः’ इति पाद्मे ॥ 16 ॥
ॐ जगद्वाचित्वात् ॐ ॥ 17-123 ॥


तर्हि कथं तेषां शब्दानां जगति प्रसिद्धिः ?-
जगति व्यवहारो लोकस्य । न तु परमात्मनि तथा । अतो जगति प्रसिद्धिः शब्दानाम् ॥ 17 ॥
ॐ जीवमुख्यप्राणलिङ्गादिति चेत् तद्व्याख्यातम् ॐ ॥ 18-124 ॥


तदधीनत्वात् तच्छब्दवाच्यत्वमित्युक्तम् । तज्जीवमुख्यप्राणयोर्लिङ्गम् ।
               ‘अस्य यदैकां शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति’ ‘वायुना हि लोका नेनीयन्ते’
इत्यादि श्रुतिभ्य इति चेन्न । उपासात्रैविध्यादिति व्याख्यातत्वात् ॥ 18 ॥
ॐ अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्नव्याख्यानाभ्यामपि चैवमेके ॐ ॥ 19-125 ॥


परमात्मज्ञानार्थं कर्मादिकमपि वदतीति जैमिनिः ।
‘कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति । तस्म्यै स होवाच द्वे विद्ये वेदितव्ये’
               ‘कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति । यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन’
इत्यादिप्रश्नव्याख्यानाभ्याम् ।
एवमपि चैके पठन्ति’यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति’ इति ॥ 19 ॥
ॐ वाक्यान्वयात् ॐ ॥ 20-126 ॥


वाक्यस्याप्येवमन्वयो युज्यते पृथक्पृथक् स्थितस्यापि परमात्मना ॥ 20 ॥
ॐ प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः ॐ ॥ 21-127 ॥


‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गत्वेन कर्मादिकमुच्यत इत्याश्मरथ्यः । यस्मादेवमनित्यफलमन्यत् तस्मान्नान्यः पन्था इति ॥ 21 ॥
ॐ उत्क्रमिष्यत एवम्भावादित्यौडुलोमिः ॐ ॥ 22-128 ॥


उत्क्रमिष्यतो मुमुक्षोः कर्मादिना भाव्यं साधनसाधनत्वेन । अतस्तद्व्यक्तीत्यौडुलोमिर्मन्यते ॥ 22 ॥
ॐ अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ॐ ॥ 23-129 ॥


॥ इति समाकर्षाधिकरणम् ॥ 05 ॥
सर्वं परमात्मन्यवस्थितमिति वक्तुं तद्वचनमिति काशकृत्स्नः ।
‘कृष्णद्द्वैपायनमतादेकदेशविदः परे ।वदन्ति ते यथाप्रज्ञं न विरोधः कथञ्चन’ इति पाद्मे ॥ 23 ॥

प्रकृत्यधिकरणम्

ॐ प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ॐ ॥ 24-130 ॥


स्त्रीशब्दा अपि तस्मिन्नेवेत्याह-
‘हन्तैतमेव पुरुषं सर्वाणि नामान्यभिवदन्ति यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रमभिविशन्त्येवमेवैतानि नामानि सर्वाणि पुरुषमभिविशन्ति’ इति प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् प्रकृतिशब्दवाच्योऽपि स एव ॥ 24 ॥
ॐ अभिध्योपदेशाच्च ॐ ॥ 25-131 ॥


‘मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्’।
               ‘महामायेत्यविद्येति नियतिर्मोहिनीति च ।
प्रकृतिर्वासनेत्येवं तवेच्छाऽनन्त कथ्यते’ ॥
इति वचनात् तदभिध्यैव प्रकृतिशब्देनोच्यते ।
‘सोऽभिध्या स जूतिः स प्रज्ञा स आनन्दः’ इति श्रुतेरभिध्या च स्वरूपमेव ।
‘ध्यायति ध्यानरूपोऽसौ सुखी सुखमतीव च ।परमैश्वर्ययोगेन विरुद्धार्थतयेष्यते’ इति ब्रह्माण्डे ॥ 25 ॥
ॐ साक्षाच्चोभयाम्नानात् ॐ ॥ 26-132 ॥


‘एष स्त्र्येष पुरुष एष प्रकृतिरेष आत्मैष ब्रह्मैष लोक एष अलोको योऽसौ हरिरादिरनादिरनन्तोऽन्तः परमः पराद्विश्वरूपः’
इति पैङ्गिश्रुतौ साक्षादेव प्रकृतिपुरुषत्वाम्नानात् ॥ 26 ॥
ॐ आत्मकृतेः परिणामात् ॐ ॥ 27-133 ॥


प्रकर्षेण करोतीति प्रकृतिरिति योगाच्च । प्रकृतावनुप्रविश्य तां परिणाम्य तत्परिणामकत्वेन तत्र स्थित्वाऽऽत्मनो बहुधाकरणात् ।
‘अथ हैष आत्मा प्रकृतिमनुप्रविश्यात्मानं बहुधा चकार । तस्मात् प्रकृतिस्तस्मात् प्रकृतिरित्याचक्षते’ इति भाल्लवेयश्रुतिः ।
‘अविकारोऽपि परमः प्रकृतिं तु विकारिणीम् । अनुप्रविश्य गोविन्दः प्रकृतिश्चाभिधीयते’ इति नारदीये ।
नचान्यत् कल्प्यम्, अप्रमाणिकत्वात् ॥ 27 ॥
ॐ योनिश्च हि गीयते ॐ ॥ 28-134 ॥


॥इति प्रकृत्यधिकरणम् ॥ 06 ॥
अव्यवधानेनोत्पत्तिद्वारत्वं प्रकृतित्वम् । तच्चास्यैव गीयते
‘यद्बूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः’ इति ।
‘व्यवधानेन सूतिस्तु पुंस्त्वम् विद्वद्भिरुच्यते । सूतिरव्यवधानेन प्रकृतित्वमिति स्थितिः ॥
उभयात्मकसूतित्वाद्वासुदेवः परः पुमान् ।प्रकृतिः पुरुषश्चेति शब्दैरेकोऽभिधीयते’ इति ब्रह्माण्डे ॥ 28 ॥

सर्वेव्याख्याताधिकरणम्

ॐ एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः ॐ ॥ 29-135 ॥


एतेन सर्वेव्याख्याताधिकरणम् ॥
॥ इति श्री मद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य चतुर्थपादः ॥01-04 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायः (समन्वयाध्यायः) ॥ 01 ॥
एतेन सर्वे शून्यादिशब्दा अपि व्याख्याताः ।
‘एष ह्येव शून्य एष ह्येव तुच्छ एष ह्येवाभाव एष ह्येवाव्यक्तोऽदृश्योऽचिन्त्यो निर्गुणश्च’इति महोपनिषदि।
‘शमूनं कुरुते विष्णुरदृश्यः सन् परः स्वयम् । तस्माच्छून्यमिति प्रोक्तस्तोदनात्तुच्छ उच्यते ॥
नैष भावयितं योग्यः केनचित् पुरुषोत्तमः । अतोऽभावं वदन्त्येनं नाश्यत्वान्नाश इत्यपि ॥
सर्वस्य तदधीनत्वात् तत्तच्छब्दाभिधेयता ।अन्येषां व्यवहारार्थ मिष्यते व्यवहर्तृभिः’इति महाकौर्मे।
एतेन तदधीनत्वाद्युक्तयुक्तिसमुदायेन ।
‘अवधारणार्थं सर्वस्याप्युक्तस्याध्यायमूलतः ।द्विरुक्तिं कुर्वते प्राज्ञा अध्यायान्ते विनिर्णये’इति वराहसंहितायाम् ॥ 29 ॥