Bruhadaranyaka/C6/S2: Difference between revisions
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== द्वितीयब्राह्मणम् == | == द्वितीयब्राह्मणम् == | ||
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| verse_line1 = श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम । स आजगाम जैबलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा३ इति । स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टो न्वसि पित्रेति । ओमिति होवाच ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयन्त्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति नेति होवाच | |||
| verse_line2 = वेत्थ यथाऽसौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न सम्पूर्यता३ इति नेति होवाच । | |||
| verse_line3 = वेत्थो यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती३ इति नेति हैवोव । | |||
| verse_line4 = अथ वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वा यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वापि हि नर्षेर्वचः श्रुतं | |||
| verse_line5 = द्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानां | |||
| verse_line6 = ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति | |||
| verse_line7 = नाहमत एकञ्चन वेदेति होवाच ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथैनं वसत्योपमंत्रयाञ्चक्रे नादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव । स आजगाम पितरं तं होवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोचदिति कथं सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् ततो नैकञ्चन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्चन वेद, सर्वमहं तत् तुभ्यमवोचं प्रैहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति ॥ स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैबलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहरयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तं होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = स होवाच प्रतिज्ञातो स एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गो अश्वानां दासीनां प्रवराणां परिधानस्य मा नो भवान् । बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यावदान्यो अभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचाहस्मैव पूर्व उपयन्ति सहोपायनकीर्त्या उवास ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराध्यस्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मण उवास । | |||
| verse_line2 = तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वेवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गाराः अवान्तरदिशो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरंगारा ह्रादुनयो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः सम्भवति ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निधूर्मो रात्रिरर्चिश्चंद्रमा अंगारा नक्षत्राणि विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवति ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरंगाराः श्रोत्रं विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः सम्भवति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽंगारा अभिनन्दा विष्फुलिंगास्तस्मिन्ने तस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः सम्भवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरंगारा अंगारा विष्फुलिंगा विष्फुलिंगाः तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णो सम्भवति ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ् आदित्य एति । | |||
| verse_line2 = मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्यात् वैद्युतं तान् वैद्युतान् पुरुषो मानव एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति | |||
| verse_line3 = ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकान् जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणाऽऽदित्य एति । | |||
| verse_line2 = मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चंद्रं ते चंद्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानं आप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति । | |||
| verse_line3 = तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद् वायुं वायोः वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ ततो जायन्ते ते लोकान् प्रत्युत्थायिनस्त एवमेवानुपरिवर्तन्ते । | |||
| verse_line4 = अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतंगा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १५ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये द्वितीयब्राह्मणम् ॥ २ ॥}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति बृहद्भाष्ये अष्टमाध्याये द्वितीयब्राह्मणम् ॥}} | |||
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द्युपर्जन्यधरापुंस्त्रीसंस्थितं पञ्चरूपिणम् । | |||
नारायणं वासुदेवं तथा संकर्षणं प्रभुम् ॥ | |||
प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च क्रमाद् ध्यायंस्तु सर्वदा । | |||
पञ्चाग्निविन्नाम भवेत् स याति परमं पदम् ॥ | |||
नास्य संसर्गदोषोऽपि कदाचन भविष्यति ॥ इति त्रैविद्ये ॥ | |||
}} | |||
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यथोपनिषदं जातो योग्यः स्वर्गापवर्गयोः । | |||
भवेद्यदि मनः पित्रोर्विष्णोर्नान्यत्र गच्छति ॥ | |||
न कुर्याद्यदि कर्मैतन्मनः पित्रोस्तु विष्णुगम् । | |||
दृष्टसामर्थ्यहीनश्च मोक्षयोग्यः स्थिरं यदि ॥ | |||
दृष्टसामर्थ्यवांश्च स्यादाज्ञाद्यैः कारणैः क्वचित् । | |||
विशेषकारणाभावे यथोक्तं नान्यथा भवेत् ॥ इति च । | |||
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नारायणो द्युशब्दोक्तः सर्वदा द्युतिहेतुतः । | |||
वासुदेवस्तु पर्जन्यः परं स जनयेद्यतः ॥ | |||
संकर्षणस्तु पृथिवी प्रथितत्वात् सदैव हि । | |||
प्रद्युम्नः पुरुषेत्युक्तः पूरयेत् स जगद्यतः ॥ | |||
स्त्रीशब्दोक्तोऽनिरुद्धः स्यात् सहितस्त्रिषु यत्सदा । | |||
अनिरुद्धो हि वेदेषु सर्वदा त्रिषु संस्थितः ॥ | |||
द्युवादिषु प्रसिद्धेषु तत्सम्बन्धाद् द्युवादिकः । | |||
शब्दो भवेत् तथाग्न्यादिरदनात् परमो भवेत् ॥ | |||
अंगत्वेनार्यते यस्मादंगारस्तेन कीर्तितः । | |||
अर्च्यत्वादर्चिरुद्दिष्टो विष्वक्त्वाद् विष्फुलिंगकः ॥ | |||
समेधनाच्च समिधस्तत्र तत्र स्थितो हरिः । | |||
तत्तच्छब्दैः सदा वाच्य इतरे तु तदन्वयात् ॥ | |||
आदित्यो रश्मिरित्याद्याः शब्दाश्चैवमवस्थिताः । | |||
एकैकस्मिन् पञ्चभेदा अर्चिरादिविभागतः ॥ | |||
नारायणादिभेदेन तथैव प्रतिपादिताः ॥ इति प्रवृत्ते । | |||
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धूत्काराद् धूम उद्दिष्टः शत्रूणां पुरुषोत्तमः । | |||
अर्चिरर्च्यतमत्वाच्च स्वांगोऽङ्गार उदीर्यते ॥ | |||
अंगित्वेनांगरूपेण यत एको व्यवस्थितः ॥ इति त्रैविद्ये । | |||
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नीचादप्युत्तमा ज्ञानं शृणुयुर्लीलया क्वचित् । | |||
श्रोतृवक्तृविभेदोऽयं नाधिक्यज्ञापकस्ततः ॥ | |||
यस्याधिक्यं तु वेदोक्तं पञ्चरात्रेऽथवा भवेत् । | |||
इतिहासपुराणे वा सोऽधिको नेतरः क्वचित् ॥ इति ब्रह्मतर्के । | |||
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आदानादादित्यः । | |||
रमणाच्छासनाच्च रश्मयः । | |||
अहीनत्वादहः । | |||
चन्दनाच्चंद्रः । अस्य क्षत्रमन्यन्नास्ति इति नक्षत्रम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । | |||
ज्ञानादायुष्ट्वाच्च वायुः । | |||
अन्यैरभरणीयत्वाद् अभ्रम् । | |||
विद्योतनाद् विद्युत् । अशनादशनिः । | |||
निह्लादनाद् ह्रादुनिः । आसमन्तात् काशनाद् आकाशः । सम्यग्वत्सान् रमयतीति संवत्सरः । आदेशनाद्दिशः । | |||
अवान्तरमादिशतीत्यवान्तरदिशः । रतिकरत्वात् रात्रिः । | |||
वचनात् वाक् । प्रणयनात् प्राणः । जहाति गमयतीति जिह्वा । चष्ट इति चक्षुः । शृणोतीति श्रोत्रम् । उपस्थितत्वादुपस्थः । | |||
यापयति नयति चेति योनिः । अभिनन्दयतीत्यभिनन्दः । उपमंत्रणमन्तःकरणं च स एव करोति । | |||
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तदधीनं यतः सर्वं सर्वशब्दैस्ततो हरिः । | |||
मुख्याभिधेयस्त्वन्यानि तत्संगादुपचारतः ॥ इति ब्रह्मतर्के । | |||
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तदधीनत्वादर्थवत् इति भगवद्वचनम् । समाकर्षात् इति च । | |||
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[[Category:Bruhadaranyaka]] | [[Category:Bruhadaranyaka]] | ||
Revision as of 05:37, 8 April 2026
द्वितीयब्राह्मणम्
श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम । स आजगाम जैबलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा३ इति । स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टो न्वसि पित्रेति । ओमिति होवाच ॥ १ ॥
वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयन्त्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति नेति होवाचवेत्थ यथाऽसौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न सम्पूर्यता३ इति नेति होवाच ।
अथैनं वसत्योपमंत्रयाञ्चक्रे नादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव । स आजगाम पितरं तं होवाचेति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोचदिति कथं सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् ततो नैकञ्चन वेदेति कतमे त इतीम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥
स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्चन वेद, सर्वमहं तत् तुभ्यमवोचं प्रैहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति ॥ स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैबलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहरयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तं होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥ ४ ॥
स होवाच प्रतिज्ञातो स एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥
स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गो अश्वानां दासीनां प्रवराणां परिधानस्य मा नो भवान् । बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यावदान्यो अभूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचाहस्मैव पूर्व उपयन्ति सहोपायनकीर्त्या उवास ॥ ६ ॥
स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराध्यस्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिंश्चन ब्राह्मण उवास ।तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वेवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥ ७ ॥
असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गाराः अवान्तरदिशो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा सम्भवति ॥ ८ ॥
पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरंगारा ह्रादुनयो विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन् अग्नौ सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः सम्भवति ॥ ९ ॥
अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निधूर्मो रात्रिरर्चिश्चंद्रमा अंगारा नक्षत्राणि विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवति ॥ १० ॥
पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरंगाराः श्रोत्रं विष्फुलिंगास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः सम्भवति ॥ ११ ॥
योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽंगारा अभिनन्दा विष्फुलिंगास्तस्मिन्ने तस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः सम्भवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १२ ॥
अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद्धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरंगारा अंगारा विष्फुलिंगा विष्फुलिंगाः तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णो सम्भवति ॥ १३ ॥
ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ् आदित्य एति ।मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्यात् वैद्युतं तान् वैद्युतान् पुरुषो मानव एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति
अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकान् जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणाऽऽदित्य एति ।मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चंद्रं ते चंद्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानं आप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति ।
द्युपर्जन्यधरापुंस्त्रीसंस्थितं पञ्चरूपिणम् ।
नारायणं वासुदेवं तथा संकर्षणं प्रभुम् ॥
प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च क्रमाद् ध्यायंस्तु सर्वदा ।
पञ्चाग्निविन्नाम भवेत् स याति परमं पदम् ॥
नास्य संसर्गदोषोऽपि कदाचन भविष्यति ॥ इति त्रैविद्ये ॥यथोपनिषदं जातो योग्यः स्वर्गापवर्गयोः ।
भवेद्यदि मनः पित्रोर्विष्णोर्नान्यत्र गच्छति ॥
न कुर्याद्यदि कर्मैतन्मनः पित्रोस्तु विष्णुगम् ।
दृष्टसामर्थ्यहीनश्च मोक्षयोग्यः स्थिरं यदि ॥
दृष्टसामर्थ्यवांश्च स्यादाज्ञाद्यैः कारणैः क्वचित् ।
विशेषकारणाभावे यथोक्तं नान्यथा भवेत् ॥ इति च ।नारायणो द्युशब्दोक्तः सर्वदा द्युतिहेतुतः ।
वासुदेवस्तु पर्जन्यः परं स जनयेद्यतः ॥
संकर्षणस्तु पृथिवी प्रथितत्वात् सदैव हि ।
प्रद्युम्नः पुरुषेत्युक्तः पूरयेत् स जगद्यतः ॥
स्त्रीशब्दोक्तोऽनिरुद्धः स्यात् सहितस्त्रिषु यत्सदा ।
अनिरुद्धो हि वेदेषु सर्वदा त्रिषु संस्थितः ॥
द्युवादिषु प्रसिद्धेषु तत्सम्बन्धाद् द्युवादिकः ।
शब्दो भवेत् तथाग्न्यादिरदनात् परमो भवेत् ॥
अंगत्वेनार्यते यस्मादंगारस्तेन कीर्तितः ।
अर्च्यत्वादर्चिरुद्दिष्टो विष्वक्त्वाद् विष्फुलिंगकः ॥
समेधनाच्च समिधस्तत्र तत्र स्थितो हरिः ।
तत्तच्छब्दैः सदा वाच्य इतरे तु तदन्वयात् ॥
आदित्यो रश्मिरित्याद्याः शब्दाश्चैवमवस्थिताः ।
एकैकस्मिन् पञ्चभेदा अर्चिरादिविभागतः ॥
नारायणादिभेदेन तथैव प्रतिपादिताः ॥ इति प्रवृत्ते ।धूत्काराद् धूम उद्दिष्टः शत्रूणां पुरुषोत्तमः ।
अर्चिरर्च्यतमत्वाच्च स्वांगोऽङ्गार उदीर्यते ॥अंगित्वेनांगरूपेण यत एको व्यवस्थितः ॥ इति त्रैविद्ये ।
नीचादप्युत्तमा ज्ञानं शृणुयुर्लीलया क्वचित् ।
श्रोतृवक्तृविभेदोऽयं नाधिक्यज्ञापकस्ततः ॥
यस्याधिक्यं तु वेदोक्तं पञ्चरात्रेऽथवा भवेत् ।
इतिहासपुराणे वा सोऽधिको नेतरः क्वचित् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।आदानादादित्यः ।
रमणाच्छासनाच्च रश्मयः ।
अहीनत्वादहः ।
चन्दनाच्चंद्रः । अस्य क्षत्रमन्यन्नास्ति इति नक्षत्रम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् ।
ज्ञानादायुष्ट्वाच्च वायुः ।
अन्यैरभरणीयत्वाद् अभ्रम् ।
विद्योतनाद् विद्युत् । अशनादशनिः ।
निह्लादनाद् ह्रादुनिः । आसमन्तात् काशनाद् आकाशः । सम्यग्वत्सान् रमयतीति संवत्सरः । आदेशनाद्दिशः ।
अवान्तरमादिशतीत्यवान्तरदिशः । रतिकरत्वात् रात्रिः ।
वचनात् वाक् । प्रणयनात् प्राणः । जहाति गमयतीति जिह्वा । चष्ट इति चक्षुः । शृणोतीति श्रोत्रम् । उपस्थितत्वादुपस्थः ।
यापयति नयति चेति योनिः । अभिनन्दयतीत्यभिनन्दः । उपमंत्रणमन्तःकरणं च स एव करोति ।तदधीनं यतः सर्वं सर्वशब्दैस्ततो हरिः ।
मुख्याभिधेयस्त्वन्यानि तत्संगादुपचारतः ॥ इति ब्रह्मतर्के ।
तदधीनत्वादर्थवत् इति भगवद्वचनम् । समाकर्षात् इति च ।