Bruhadaranyaka/C1/S3: Difference between revisions
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== उद्गीथब्राह्मणम् == | == उद्गीथब्राह्मणम् == | ||
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| verse_line1 = द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानीयसा एव देवा जायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥ | |||
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द्वया ब्रह्मसुतास्तत्र दैतेया बहवः स्मृताः । | |||
तमोरूपाः सत्वरूपाः अल्पसङ्ख्याः सुराः स्मृताः ॥ | |||
बहुत्वात् तैर्जिता देवाः शङ्करस्य वरेण च । | |||
यज्ञेन विष्णुमभ्यर्च्य तत्रोद्गातृबलेन च ॥ | |||
जयामैनानिति स्मृत्वा वह्न्यादीनप्यचूचुदन् । | |||
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| verse_line1 = ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ ह घ्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो घ्राण उदगायत् । यो घ्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं जिघ्रति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ ह चक्षुरूचुः । त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् । यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ ह श्रोत्रमूचुः । त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो श्रोत्रमुदगायत् । यो श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् ।स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ ह मन ऊचुसः । त्वं न उद्गायेति तथेति । तेभ्यो मन उदगायत् । यः मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं सङ्कल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं सङ्कल्पयति स एव स पाप्मा । एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाऽविध्यन् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तदभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विश्वञ्चो विनेशुः । ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति। य एवं वेद ॥७॥ | |||
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औद्गात्रेऽग्निमुखाः सर्वे इन्द्ररुद्रौ च वेधितौ ॥ | |||
असुरैः पापपूगेन मुख्यवायुं ततोऽब्रुवन् । | |||
दैत्यास्तं वेद्धुमीप्सन्तो ध्वस्ता नेशुश्च सर्वशः ॥ | |||
पांसुपिण्डो यथा वज्रशिलां प्राप्यैव नश्यति । | |||
तस्मादखण्डशक्तिः स मुख्यवायुरुदाहृतः ॥ | |||
शापैरथ वरैर्वापि नास्य प्रतिहतिर्भवेत् । | |||
स्वेच्छयैवानुसारेण विना कुत्रापि पुत्रक ॥ | |||
एवंविदपि पापेभ्यः शत्रुभ्योऽपि प्रमुच्यते । | |||
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| verse_line1 = ते होचुः । क्व नु सोऽभूद् यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरिति । सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = सा वा एषा देवता दूर्नाम । दूरं ह्यस्या मृत्युर्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति । य एवं वेद ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्तासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात् । तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् । सा या यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् ।सोऽयमग्निः परेण मृत्युरतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ घ्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स वायुरभवत् सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ चक्षुरत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। स आदित्योऽभवत् । सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तः तपति ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ श्रोत्रमत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। दिशोऽभवन् । ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ मनोऽत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स चन्द्रमा अभवत् सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति । एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति । य एवं वेद ॥ १६ ॥ | |||
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स वायू रुद्रशक्रादेर्वासुदेवबलाश्रयः ॥ | |||
विमोच्य पापसङ्घात् तं दिशामन्तेष्वथाक्षिपत् । | |||
उन्मुच्य मृत्योस्तांश्चैवाधोर्ध्वलोकेषु चावहत् ॥ | |||
अग्निर्नासिक्यवायुश्च दिक्पा इन्द्रादयोऽखिलाः । | |||
सूर्यः सोमश्च रुद्रश्च तेनैव स्वपदे स्थिताः ॥ | |||
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| verse_line1 = ते देवा अब्रुवन् एतावद्वा इदं सर्व यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन् अन्न आभजस्वेति । ते वै माऽभिसंविशतेति । तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त । तस्माद् यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्ति । एवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदं स्वेषु प्रति प्रति बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनुभवति यो वैतमनु भार्यान् बुभूषति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां रसस्तस्माद् यस्मात् कस्माच्चाङ्गात् प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष ह वा अङ्गानां रसः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_line1 = एष उ एव बृहस्पतिर् वाग्वै बृहती तस्या एव पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥ | |||
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स्त्रीगुणैः सर्वपूर्णत्वाद् बृहती तु सरस्वती । | |||
अनन्तवेदरूपत्वाद् सैव ब्रह्मेति कीर्तिता ॥ | |||
विष्णुना बृंहितत्वाद्वा तत्पतिर्वायुरीश्वरः । | |||
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| verse_line1 = एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर् वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = एष उ एव साम । वाग् वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् । यद्वैव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः, समोऽनेन सर्वेण तस्मादेव साम, अश्नुते साम्नः सायुज्यं सलोकतां । य एवमेतत् साम वेद ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = एष उ वा उद्गीथः । प्राणो वा उत्प्राणेन हीदं सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥ | |||
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सारत्वात् स्त्रीषु सा देवी सेत्युक्ता सामरूपतः ॥ | |||
गीथेत्युक्ता तदुद्गीथः सामाख्योऽर्धतनुस्तथा । | |||
अर्धनारीनरवपुर्वायुः कुत्रचिदीरितः ॥ | |||
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| verse_line1 = तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्वस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदीतोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥ | |||
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अयास्यो विश्वसृग्यज्ञे तेनाविष्टोऽन्वगायत । | |||
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| verse_line1 = तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं ।तस्य वै स्वर एव स्वं ।तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन् वाचि स्वरमिच्छेत । तया वाचा स्वरसम्पन्नयाऽर्त्विज्यं कुर्यात् ।तस्माद् यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद ।भवति हास्य सुवर्णं ।तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं च । एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥ | |||
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गृहकोशादिकं यत्स्वं तद्रूप्यस्य स्वरस्थितः ॥ | |||
भूषणस्वर्णरूपी च स एवापि स्वरस्थितः । | |||
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| verse_line1 = तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्युहैक आहुः ॥ २७ ॥ | |||
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वागिन्द्रियं पीठरूपं तस्य देवस्य संस्थितम् ॥ | |||
गानकालेऽन्यदा त्वन्नं प्राणपीठमिति स्मृतम् । | |||
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| verse_line1 = अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तूयात् तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्माऽमृतं गमयेति स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्त्यथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं स एष एवं विदुद्गाताऽऽत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २९ ॥ | |||
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| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
पवमाना इति प्रोक्ता मुख्यवायुत्वयोगिनः ॥ | |||
अनादिकालसम्बद्धा योग्यता सा प्रकीर्तिता । | |||
सर्वाधिक्यारोहणं तु तेषामेव विमुक्तिगम् ॥ | |||
प्रस्तावकाले प्रस्तोतुं योग्यो वायुपदस्य यः । | |||
जपेद्यजूंषि त्वेतानि त्रीणि विष्णुं सदा स्मरन् ॥ | |||
असतो मा सदित्यादि विष्णुप्रार्थनभांिज च । | |||
द्वात्रिंशल्लक्षणैः सम्यग्युक्ता वायुत्वयोग्यकाः ॥ | |||
नियमेनैव विष्णोस्तु प्रादुर्भावा विशेषतः । | |||
सहस्रारेण चक्रेण चिह्निता दक्षिणे करे ॥ | |||
गदयाऽष्टाश्रया चैव शतावर्तेन कम्बुना । | |||
वामे करे तथाब्जेन सहस्रदलशोभिना ॥ | |||
अष्टाविंशल्लक्षणाश्च गिरीशपदयोगिनः । | |||
चतुविंशतिमारभ्य षोडशादासुराः स्मृताः ॥ | |||
अष्टकादृषयश्चोक्तास्तदूनाश्चक्रवर्तिनः । | |||
असद्दुःखात्मको मृत्युः सदानन्दोऽमृतं स्मृतम् ॥ | |||
तमोऽज्ञानात्मको मृत्युर्ज्योतिर्ज्ञानामृतं स्मृतम् । | |||
मृत्योर्माऽमृतमित्यत्र मृत्युर्मरणमेव च ॥ | |||
एवंविद्वायुपदयोग्या उद्गातार एव तु । | |||
यदा भवेयुस्तेषु तदा याजी तु वृणुयाद्वरम् ॥ | |||
आत्मने याजिने वापि ह्युद्गातैवंविधो यदि । | |||
आगायेत् तद्भवेन्नात्र कार्याऽभीष्टे विचारणा ॥ | |||
एवं तं सामनामानं वायुं यो वेद सादरम् । | |||
तस्येष्टलोकराहित्ये नाशा कार्याऽरिणा क्वचित् ॥ | |||
तस्माद्वायुत्वयोग्यैर्हि येषां लोकाः प्रकीर्तिताः । | |||
तेषामलोकाशङ्का च नैव कार्या कदाचन ॥ | |||
यस्मान्नारायणस्यातिप्रियाः प्राणत्वयोगिनः ॥ इत्यादि महासंहितायाम् । | |||
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आस्यादयत इत्ययास्यः । प्रसिद्धमृत्व्यमृतत्वान्नात्र तिरोहितमिवास्ति । एष उद्गातेति वायुत्वयोग्यः । तद्धैतल्लोकजिदेवेति तस्माद्वराभियाचनम् ॥ ॥ इति उद्गीथब्राह्मणम् ॥ ३३ ॥ | |||
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Revision as of 05:36, 8 April 2026
उद्गीथब्राह्मणम्
द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानीयसा एव देवा जायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥
द्वया ब्रह्मसुतास्तत्र दैतेया बहवः स्मृताः ।
तमोरूपाः सत्वरूपाः अल्पसङ्ख्याः सुराः स्मृताः ॥
बहुत्वात् तैर्जिता देवाः शङ्करस्य वरेण च ।
यज्ञेन विष्णुमभ्यर्च्य तत्रोद्गातृबलेन च ॥
जयामैनानिति स्मृत्वा वह्न्यादीनप्यचूचुदन् ।ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥
अथ ह घ्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो घ्राण उदगायत् । यो घ्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं जिघ्रति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥
अथ ह चक्षुरूचुः । त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् । यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४ ॥
अथ ह श्रोत्रमूचुः । त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो श्रोत्रमुदगायत् । यो श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् ।स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५ ॥
अथ ह मन ऊचुसः । त्वं न उद्गायेति तथेति । तेभ्यो मन उदगायत् । यः मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं सङ्कल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति ।तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् । स यः पाप्मा ।यदेवेदमप्रतिरूपं सङ्कल्पयति स एव स पाप्मा । एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाऽविध्यन् ॥ ६ ॥
अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति। तदभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विश्वञ्चो विनेशुः । ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति। य एवं वेद ॥७॥
औद्गात्रेऽग्निमुखाः सर्वे इन्द्ररुद्रौ च वेधितौ ॥
असुरैः पापपूगेन मुख्यवायुं ततोऽब्रुवन् ।
दैत्यास्तं वेद्धुमीप्सन्तो ध्वस्ता नेशुश्च सर्वशः ॥
पांसुपिण्डो यथा वज्रशिलां प्राप्यैव नश्यति ।
तस्मादखण्डशक्तिः स मुख्यवायुरुदाहृतः ॥
शापैरथ वरैर्वापि नास्य प्रतिहतिर्भवेत् ।
स्वेच्छयैवानुसारेण विना कुत्रापि पुत्रक ॥
एवंविदपि पापेभ्यः शत्रुभ्योऽपि प्रमुच्यते ।ते होचुः । क्व नु सोऽभूद् यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरिति । सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ॥ ८ ॥
सा वा एषा देवता दूर्नाम । दूरं ह्यस्या मृत्युर्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति । य एवं वेद ॥ ९ ॥
सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्तासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात् । तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥
सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥
स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् । सा या यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् ।सोऽयमग्निः परेण मृत्युरतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥
अथ घ्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स वायुरभवत् सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥
अथ चक्षुरत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। स आदित्योऽभवत् । सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तः तपति ॥ १४ ॥
अथ श्रोत्रमत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। दिशोऽभवन् । ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥ १५ ॥
अथ मनोऽत्यवहत् तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ।स चन्द्रमा अभवत् सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति । एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति । य एवं वेद ॥ १६ ॥
स वायू रुद्रशक्रादेर्वासुदेवबलाश्रयः ॥
विमोच्य पापसङ्घात् तं दिशामन्तेष्वथाक्षिपत् ।
उन्मुच्य मृत्योस्तांश्चैवाधोर्ध्वलोकेषु चावहत् ॥
अग्निर्नासिक्यवायुश्च दिक्पा इन्द्रादयोऽखिलाः ।
सूर्यः सोमश्च रुद्रश्च तेनैव स्वपदे स्थिताः ॥अथ आत्मनेऽन्नाद् यमागायद् यद्धि किञ्चान्नमद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७ ॥
ते देवा अब्रुवन् एतावद्वा इदं सर्व यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन् अन्न आभजस्वेति । ते वै माऽभिसंविशतेति । तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त । तस्माद् यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्ति । एवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदं स्वेषु प्रति प्रति बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनुभवति यो वैतमनु भार्यान् बुभूषति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥
सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां रसस्तस्माद् यस्मात् कस्माच्चाङ्गात् प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष ह वा अङ्गानां रसः ॥ १९ ॥
एष उ एव बृहस्पतिर् वाग्वै बृहती तस्या एव पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥
स्त्रीगुणैः सर्वपूर्णत्वाद् बृहती तु सरस्वती ।
अनन्तवेदरूपत्वाद् सैव ब्रह्मेति कीर्तिता ॥विष्णुना बृंहितत्वाद्वा तत्पतिर्वायुरीश्वरः ।
एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर् वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥
एष उ एव साम । वाग् वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् । यद्वैव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः, समोऽनेन सर्वेण तस्मादेव साम, अश्नुते साम्नः सायुज्यं सलोकतां । य एवमेतत् साम वेद ॥ २२ ॥
एष उ वा उद्गीथः । प्राणो वा उत्प्राणेन हीदं सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥
सारत्वात् स्त्रीषु सा देवी सेत्युक्ता सामरूपतः ॥
गीथेत्युक्ता तदुद्गीथः सामाख्योऽर्धतनुस्तथा ।अर्धनारीनरवपुर्वायुः कुत्रचिदीरितः ॥
तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्वस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदीतोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥
अयास्यो विश्वसृग्यज्ञे तेनाविष्टोऽन्वगायत ।
तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं ।तस्य वै स्वर एव स्वं ।तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन् वाचि स्वरमिच्छेत । तया वाचा स्वरसम्पन्नयाऽर्त्विज्यं कुर्यात् ।तस्माद् यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥
तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद ।भवति हास्य सुवर्णं ।तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं च । एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥
गृहकोशादिकं यत्स्वं तद्रूप्यस्य स्वरस्थितः ॥
भूषणस्वर्णरूपी च स एवापि स्वरस्थितः ।
तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्युहैक आहुः ॥ २७ ॥
वागिन्द्रियं पीठरूपं तस्य देवस्य संस्थितम् ॥
गानकालेऽन्यदा त्वन्नं प्राणपीठमिति स्मृतम् ।
अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तूयात् तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्माऽमृतं गमयेति स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह ॥ २८ ॥
मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्त्यथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं स एष एवं विदुद्गाताऽऽत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २९ ॥
पवमाना इति प्रोक्ता मुख्यवायुत्वयोगिनः ॥
अनादिकालसम्बद्धा योग्यता सा प्रकीर्तिता ।
सर्वाधिक्यारोहणं तु तेषामेव विमुक्तिगम् ॥
प्रस्तावकाले प्रस्तोतुं योग्यो वायुपदस्य यः ।
जपेद्यजूंषि त्वेतानि त्रीणि विष्णुं सदा स्मरन् ॥
असतो मा सदित्यादि विष्णुप्रार्थनभांिज च ।
द्वात्रिंशल्लक्षणैः सम्यग्युक्ता वायुत्वयोग्यकाः ॥
नियमेनैव विष्णोस्तु प्रादुर्भावा विशेषतः ।
सहस्रारेण चक्रेण चिह्निता दक्षिणे करे ॥
गदयाऽष्टाश्रया चैव शतावर्तेन कम्बुना ।
वामे करे तथाब्जेन सहस्रदलशोभिना ॥
अष्टाविंशल्लक्षणाश्च गिरीशपदयोगिनः ।
चतुविंशतिमारभ्य षोडशादासुराः स्मृताः ॥
अष्टकादृषयश्चोक्तास्तदूनाश्चक्रवर्तिनः ।
असद्दुःखात्मको मृत्युः सदानन्दोऽमृतं स्मृतम् ॥
तमोऽज्ञानात्मको मृत्युर्ज्योतिर्ज्ञानामृतं स्मृतम् ।
मृत्योर्माऽमृतमित्यत्र मृत्युर्मरणमेव च ॥
एवंविद्वायुपदयोग्या उद्गातार एव तु ।
यदा भवेयुस्तेषु तदा याजी तु वृणुयाद्वरम् ॥
आत्मने याजिने वापि ह्युद्गातैवंविधो यदि ।
आगायेत् तद्भवेन्नात्र कार्याऽभीष्टे विचारणा ॥
एवं तं सामनामानं वायुं यो वेद सादरम् ।
तस्येष्टलोकराहित्ये नाशा कार्याऽरिणा क्वचित् ॥
तस्माद्वायुत्वयोग्यैर्हि येषां लोकाः प्रकीर्तिताः ।
तेषामलोकाशङ्का च नैव कार्या कदाचन ॥
यस्मान्नारायणस्यातिप्रियाः प्राणत्वयोगिनः ॥ इत्यादि महासंहितायाम् ।आस्यादयत इत्ययास्यः । प्रसिद्धमृत्व्यमृतत्वान्नात्र तिरोहितमिवास्ति । एष उद्गातेति वायुत्वयोग्यः । तद्धैतल्लोकजिदेवेति तस्माद्वराभियाचनम् ॥ ॥ इति उद्गीथब्राह्मणम् ॥ ३३ ॥