Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S29: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== एकोनत्रिंशोऽध्यायः == | == एकोनत्रिंशोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V07 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| section_id = BTN_C11_S29 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = श्री शुक उवाच– इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वशक्तिभिः । गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो जगाद सप्रेम मनोहरस्मितः ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V07 | |||
| id = BTN_C11_S29_V07_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'आत्मान्तरात्मा परमात्मेति मूर्तित्रयं हरेः ।जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तीनां सृष्ट्यादेश्च प्रवर्तकम्''॥ इति त्रैकाल्ये ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V11 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| section_id = BTN_C11_S29 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = पृथक् सत्रेण वा मह्यं मम यात्रामहोत्सवम् । | |||
| verse_line2 = कारयेन्नृत्यगीताद्यैर्महाराजविभूतिभिः ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V11 | |||
| id = BTN_C11_S29_V11_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
पृथक्स्वयमेव, सत्रेण बहुभिः सह वा, मम यात्रामहोत्सवं कुर्यात् ॥११॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V12 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| section_id = BTN_C11_S29 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरवस्थितम् । | |||
| verse_line2 = ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V13 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| section_id = BTN_C11_S29 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते । सभाजयेन्मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रयन् ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V14 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| section_id = BTN_C11_S29 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्यर्के स्फुलिङ्गके । अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V14 | |||
| id = BTN_C11_S29_V14_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'सर्वभूतेष्वस्ति विष्णुरिति भावः सतां मतः ।अनेन सर्वभूतानामादित्ये तद्गतात्मना''॥ इति च ॥ १२-१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V18 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| section_id = BTN_C11_S29 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया । | |||
| verse_line2 = परिपश्यन्ति च परं परमात्मानमच्युतम् ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V18 | |||
| id = BTN_C11_S29_V18_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'ब्रह्मणाऽऽत्तमिदं सर्वं यत्किञ्चित्सचराचरम् ।इति पश्येत यो विद्वान् स हि ब्रह्मात्मविन्मतः''॥ इति ब्राह्मे ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V21 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| section_id = BTN_C11_S29 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = यो योऽपरो मनोधर्मः कल्पते निष्फलाय ते । | |||
| verse_line2 = तदायासो निरर्थः स्यान्नयादेरिव सत्तम ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V21 | |||
| id = BTN_C11_S29_V21_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'नयादिर्दुर्नयः प्रोक्तो यन्नयं सोऽत्ति सर्वदा''इति शब्दतत्त्वे ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V22 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| section_id = BTN_C11_S29 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् । | |||
| verse_line2 = यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाऽप्नोति माऽमृतम् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C11_S29_V22 | |||
| id = BTN_C11_S29_V22_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'एकदा ज्ञातरूपेण यन्न तिष्ठति सर्वदा ।चञ्चलत्वात् सत्यमपि ह्यनृतं जगदुच्यते''इति च ॥'सर्वदैकप्रकारत्वात् सत्यं ब्रह्म सदोच्यते''इति च ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:36, 8 April 2026
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
श्री शुक उवाच– इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वशक्तिभिः । गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो जगाद सप्रेम मनोहरस्मितः ॥ ७ ॥
'आत्मान्तरात्मा परमात्मेति मूर्तित्रयं हरेः ।जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तीनां सृष्ट्यादेश्च प्रवर्तकम्॥ इति त्रैकाल्ये ॥ ७ ॥
पृथक् सत्रेण वा मह्यं मम यात्रामहोत्सवम् ।कारयेन्नृत्यगीताद्यैर्महाराजविभूतिभिः ॥ ११ ॥
पृथक्स्वयमेव, सत्रेण बहुभिः सह वा, मम यात्रामहोत्सवं कुर्यात् ॥११॥
मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरवस्थितम् ।ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः ॥ १२ ॥
इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते । सभाजयेन्मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रयन् ॥ १३ ॥
ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्यर्के स्फुलिङ्गके । अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४ ॥
'सर्वभूतेष्वस्ति विष्णुरिति भावः सतां मतः ।अनेन सर्वभूतानामादित्ये तद्गतात्मना॥ इति च ॥ १२-१४ ॥
सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया ।परिपश्यन्ति च परं परमात्मानमच्युतम् ॥ १८ ॥
'ब्रह्मणाऽऽत्तमिदं सर्वं यत्किञ्चित्सचराचरम् ।इति पश्येत यो विद्वान् स हि ब्रह्मात्मविन्मतः॥ इति ब्राह्मे ॥ १८ ॥
यो योऽपरो मनोधर्मः कल्पते निष्फलाय ते ।तदायासो निरर्थः स्यान्नयादेरिव सत्तम ॥ २१ ॥
'नयादिर्दुर्नयः प्रोक्तो यन्नयं सोऽत्ति सर्वदाइति शब्दतत्त्वे ॥ २१ ॥
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् ।यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाऽप्नोति माऽमृतम् ॥ २२ ॥
'एकदा ज्ञातरूपेण यन्न तिष्ठति सर्वदा ।चञ्चलत्वात् सत्यमपि ह्यनृतं जगदुच्यतेइति च ॥'सर्वदैकप्रकारत्वात् सत्यं ब्रह्म सदोच्यतेइति च ॥ २२ ॥