Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S25: Difference between revisions
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'श्रुतशास्त्रानुसारेण या श्रद्धा परमात्मनि ।सा सात्विकी तदन्यस्याप्यनुसारेण निर्गुणा ॥अश्रुत्वाऽपि प्रमाणं यो वासुदेवैकसंश्रयः ।स निर्गुणो भागवतः समुद्दिष्टो मनीषिभिः''॥ इति च ॥ २७ ॥ | |||
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'परोक्षज्ञानमात्मोत्थमापरोक्ष्येण दर्शनम् ।विष्ण्वाश्रयं सुखं नित्यं गमयेत् तत्प्रसादतः ॥न तु विष्णोः स्वरूपं तु सुखं केनचिदाप्यते ।तस्यैव विषयत्वात्तु तत्सुखं चेति भण्यते ॥परोक्षज्ञानगो यस्माद्विषयः स्वमनोगतः ।अत आत्मोत्थमित्येव सुखमाहुर्विपश्चितः''॥ इति च ॥ २९ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥}} | |||
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दृष्टं श्रुतम् । बुद्ध्या दृष्टं चानु परं ब्रह्म ध्यायेत् ॥'सत्वाद्गुणाज्जातमपि व्यवधानं विनैव तु ।मुक्तिदं निर्गुणं प्रोक्तं व्यवधानेन सात्त्विकम्''॥ इति ब्राह्मे ॥३१॥ | |||
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Revision as of 05:36, 8 April 2026
पञ्चविंशोऽध्यायः
काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदाऽसुखम् ।मनोत्साहो यशःप्रीतिर्धार्ष्ट्यवीर्यबलोद्यमाः ॥ ३ ॥
'राजसेऽपि यदा दुःखं तामसे किमुतेति तत् ।राजसे दुःखवचनं तामसेऽतिविवक्षया॥ इति प्रद्योते ॥ ३ ॥
सत्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः ।तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः ॥ २२ ॥
'नैर्गुण्यसाधनं यत् तन्निर्गुणं परिकीर्तितम्। इति च ॥ २२ ॥
कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं कर्मनिष्ठं तु राजसम् ।प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम् ॥ २४ ॥
'यथाशास्त्रोक्तविज्ञानं केवलं ज्ञानमुच्यते ।स्वदृष्टशास्त्रानुकूल्याददृष्टानां च भक्तितः ॥गुणानां तु हरौ भावं विनिश्चित्यैतदाश्रयात् ।यथाशास्त्रानुसन्धानं ज्ञानं तु हरिसंश्रयम्॥ इति च ॥ २४ ॥
सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी ।तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा ॥ २७ ॥
'श्रुतशास्त्रानुसारेण या श्रद्धा परमात्मनि ।सा सात्विकी तदन्यस्याप्यनुसारेण निर्गुणा ॥अश्रुत्वाऽपि प्रमाणं यो वासुदेवैकसंश्रयः ।स निर्गुणो भागवतः समुद्दिष्टो मनीषिभिः॥ इति च ॥ २७ ॥
सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम् ।तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम् ॥ २९ ॥
'परोक्षज्ञानमात्मोत्थमापरोक्ष्येण दर्शनम् ।विष्ण्वाश्रयं सुखं नित्यं गमयेत् तत्प्रसादतः ॥न तु विष्णोः स्वरूपं तु सुखं केनचिदाप्यते ।तस्यैव विषयत्वात्तु तत्सुखं चेति भण्यते ॥परोक्षज्ञानगो यस्माद्विषयः स्वमनोगतः ।अत आत्मोत्थमित्येव सुखमाहुर्विपश्चितः॥ इति च ॥ २९ ॥
सर्वे गुणमया भावा पुरुषाव्यक्तनिष्ठिताः ।दृष्टं श्रुतमनुध्यायेद् बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ ॥ ३१ ॥
दृष्टं श्रुतम् । बुद्ध्या दृष्टं चानु परं ब्रह्म ध्यायेत् ॥'सत्वाद्गुणाज्जातमपि व्यवधानं विनैव तु ।मुक्तिदं निर्गुणं प्रोक्तं व्यवधानेन सात्त्विकम्॥ इति ब्राह्मे ॥३१॥