Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S24: Difference between revisions
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}} | }} | ||
== चतुर्विंशोऽध्यायः == | == चतुर्विंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थश्चैकमेवाविकल्पितम् । | |||
| verse_line2 = यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगे जनाः ॥ २ ॥ | |||
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'यथैवार्थस्तथा ज्ञानं ज्ञानार्थैक्यमुदाहृतम् ।तथा कृतयुगे प्रायस्तदन्येषु तु कस्यचित्''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = तन्मया फलरूपेण केवलेन विकल्पितम् । | |||
| verse_line2 = वाङ्मनोगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥ | |||
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फलं रूपयतीति फलरूपः । ज्ञानार्थैक्येन सत्यम् । पश्चात् तद्द्विधा समभवत् । तच्छब्दार्थात्मकमुभयं बृहत्तरम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका । | |||
| verse_line2 = ज्ञानं त्वन्यतमो भागः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः । मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन वा ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = तेभ्यः समभवत् सूत्रं मत्सूत्रेण च संयुतम् । | |||
| verse_line2 = ततो विकुर्वतो जातो योऽहङ्कारो विमोहकः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत् । | |||
| verse_line2 = तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥ ७ ॥ | |||
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'ज्ञानाभिमानी पुरुषः स ब्रह्मा समुदाहृतः ।अर्थाभिमानी प्रकृतिर्गायत्री सा प्रकीर्तिता ॥तयोर्नियामको विष्णुः श्रीश्चानुग्राहिका स्मृता ।वायुस्तु ब्रह्मणः पुत्रः प्रकृतौ समजायत ॥त्रिगुणात्मा समुद्दिष्टः प्रायः सत्त्वात्मकस्तथा ।गायत्री चैव सावित्री तथैव च सरस्वती ॥एवं त्रिरूपा प्रकृतिरेका सत्त्वादिभेदतः ।तासु वीर्यं समुत्सृष्टं ब्रह्मणैकत्वमागतम् ॥स सूत्रात्मा समुद्दिष्टो वायुर्लोकप्रणायकः ।तस्यापि सूत्रं भगवान् धारणाद्विष्णुरव्ययः ॥सूत्रपुत्रस्त्वहङ्कारः स रुद्रः समुदाहृतः ।सूत्रात्मना महांश्चापि सहजातश्चतुर्मुखः ॥तस्यापि पुत्रोऽहङ्कारः स चानन्त उदाहृतः ।अनन्तादपि रुद्रोऽभूद् ब्रह्मणश्चेति स त्रिधा ॥वैकारिको ब्रह्मजस्तु तैजसो वायुजः स्मृतः ।तामसोऽनन्तजश्चैव स एको गुणभेदतः''॥ इति प्राथम्ये ॥'चिदचिद् यद्वशे सर्वं स रुद्रश्चिदचिन्मयः''॥ इति च ॥ ४-७ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थिते । | |||
| verse_line2 = मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चाऽत्मभूः ॥ १० ॥ | |||
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'चिदानन्दशरीरस्तु प्रविष्टोऽण्डे हरिः स्वयम् ।तन्नाभेर्भूतदेहोऽभूत् पद्मादपि चतुर्मुखः ॥चतुर्मुखस्तु सर्वाण्डव्याप्तदेहो महातपाः ।हरिस्तु सर्वव्याप्तोऽपि भूतदेहो न तु क्वचित् ॥नैवास्य प्राकृतो देहः प्रादुर्भावेष्वपि क्वचित्''॥ इति निवृत्ते ॥१०॥ | |||
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| verse_line1 = योगस्य तपसश्चैव ज्ञानस्य गतयोऽमलाः । | |||
| verse_line2 = महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः ॥ १४ ॥ | |||
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महरादीनामपि भक्तियोगोऽपेक्षित एव । आधिक्येनापेक्षितत्वात् 'भक्ति-योगस्य मद्गतिः''। इत्युक्तम् ।'नैव विष्णावभक्तस्य महर्लोकादिका गतिः ।भक्त्युद्रेकात् क्रमादूर्ध्वं यावद्विष्णुप्रवेशनम् ॥एवं ज्ञानं विना साऽपि महर्लोकादिका गतिः ।ज्ञानोद्रेकात् क्रमादूर्ध्वं यावद्विष्णुप्रवेशनम् ॥नित्यशो भगवद्रूपस्याऽपरोक्ष्येण दर्शनम् ।मुहूर्तमात्रं ज्ञानं स्यान्महाज्ञानं ततोऽधिकम् ॥ज्ञानेन ब्रह्मलोकः स्यान्महाज्ञानाद्धरेर्गतिः ।सदैवाखण्डितं ध्यानं तप इत्युच्यते बुधैः ॥अपरोक्षदृशा युक्तं नित्यं षण्मात्रकालया ।अपरोक्षदृशा नित्यं एकमात्रायुजा युतम् ॥योगनाम्ना समुद्दिष्टं ध्यानं नित्यमखण्डितम् ।तच्चतुर्भागया नित्यमपरोक्षदृशा युतम् ॥पादयोगाख्यमुद्दिष्टं ध्यानं नित्यमखण्डितम् ।पादयोगान्महर्लोको जनलोकस्तु योगतः ॥तपसस्तु तपोलोकः प्राप्यते नान्यतः क्वचित्''॥ इति ध्यानयोगे ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् । | |||
| verse_line2 = गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति ॥ १५ ॥ | |||
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कालात्मना ज्ञानाद्यात्मना ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्तु यस्याऽदिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य तत् । | |||
| verse_line2 = विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः ॥ १७ ॥ | |||
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'प्रकृतेस्तु विकाराणां कोट्यंशोऽभेद इष्यते ।तथैवैकांशतो भेदः सोऽपि नाभेदवर्जितः ।भेदाभेदमतः प्राहुरभेदं वा तयोर्बुधाः''॥ इति विवेके ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_line1 = यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुते परम् । | |||
| verse_line2 = आदिरन्तो यतो यस्मिंस्तत् सत्यमभिधीयते ॥ १८ ॥ | |||
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'पारमार्थिकसत्यत्वं स्वातन्त्र्यमभिधीयते ।तद्विष्णोरेव नान्यस्य तदन्येषां सदाऽस्तिता''॥ इति च ॥यद्ब्रह्मोपादाय । पूर्वः प्रकृत्यादिः । आदिरन्तश्च यद्ब्रह्मणि यस्मात् तस्मात् तह्म परमार्थसत्यम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः । | |||
| verse_line2 = सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत् त्रितयं त्वहम् ॥ १९ ॥ | |||
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परः पुरुषो हिरण्यगर्भः । कालोऽपि रूपान्तरेण स एव ।'कालाभिमानी ब्रह्मा तु काल इत्यभिशब्दितः ।सर्वजीवाभिमानी स परः परुष उच्यते ॥प्रकृतिर्नाम तत्पत्नी प्रकृतेरभिमानिनी ।सा प्रसूते जगत्सर्वं सूत्रमारभ्य सर्वशः''॥ इति च ।>आधारो व्यञ्जकश्चैव प्रसवीता च केशवः ।'कालप्रकृतिपुंसां च तन्मूलप्रकृतेरपि ।आधारो व्यञ्जकश्चैव सर्वस्यापि नियामकः''॥ इति च ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_line1 = सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः । | |||
| verse_line2 = महान् गुणविसर्गोऽर्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम् ॥ २० ॥ | |||
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यावत् स्थितिरस्ति तावदुत्पत्तिरस्त्येव । यावदीक्षणं यावत्प्रलयः स्यादिति भगवतः स्मरणम् ॥ २० ॥ | |||
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| verse_line1 = विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः । | |||
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'विशेषेण गुणोद्रेकाद्विशेषः पृथिवी स्मृता''। इति प्रवृत्ते ।पञ्चत्वानन्तरमविशेषाय ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = अन्ने प्रलीयते मर्त्य अन्नं धानासु लीयते । | |||
| verse_line2 = धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते ॥ २२ ॥ | |||
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'देव्यामोषधिमानिन्यां लीयतेऽन्नाभिमानिनी''। इत्यादि च ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते महतीश्वरे । | |||
| verse_line2 = शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_line1 = स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः । तेऽव्यक्ते सम्प्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे । आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥}} | |||
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| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'विकारजत्वात्तु महान्वैकारिक उदाहृतः ।ईशनादीश्वरश्चैव ब्रह्मा बृंहणतः स्मृतः''॥ इति च ॥'गायत्री चैव सावित्री तथैव च सरस्वती ।एवं त्रिरूपा प्रकृतिर्ब्रह्मपत्नी प्रकीर्तिता ॥महत्तत्त्वात्मको ब्रह्मा तज्जत्वात् तत्र लीयते ।गुणाधिकः पतिरपि तस्याः सत्त्वादिभेदतः ॥त्रिविधा मूलरूपायां प्रकृत्यां सा प्रलीयते ।प्रकृतिर्मूलरूपा सा ब्रह्मपत्नी जगन्मया ॥पुरुषाभिधे विरिञ्चे तु स स्वस्मिन् कालसञ्ज्ञिते ।कालाभिधो विरिञ्चस्तु महालक्ष्म्यां विलीयते ॥जीवमायेति यामाहुः सा च सत्त्वादिभेदतः ।त्रिविधैकत्वमापाद्य विष्णावेव विलीयते ॥हरेरत्यन्तसामीप्यं लयो लक्ष्म्याः प्रकीर्तितः ।पुरुषेणापि सामीप्यं प्रकृतेर्लय उच्यते ॥ब्रह्मा च प्रकृतिश्चैव मुक्तिगौ विलये यतः ।अतस्तौ भिन्नदेहौ तु ज्ञानमात्रौ समीपगौ''॥ इत्यादि च ॥ २५-२७॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:36, 8 April 2026
चतुर्विंशोऽध्यायः
आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थश्चैकमेवाविकल्पितम् ।यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगे जनाः ॥ २ ॥
'यथैवार्थस्तथा ज्ञानं ज्ञानार्थैक्यमुदाहृतम् ।तथा कृतयुगे प्रायस्तदन्येषु तु कस्यचित्॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ २ ॥
तन्मया फलरूपेण केवलेन विकल्पितम् ।वाङ्मनोगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥
फलं रूपयतीति फलरूपः । ज्ञानार्थैक्येन सत्यम् । पश्चात् तद्द्विधा समभवत् । तच्छब्दार्थात्मकमुभयं बृहत्तरम् ॥ ३ ॥
तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका ।ज्ञानं त्वन्यतमो भागः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४ ॥
तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः । मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन वा ॥ ५ ॥
तेभ्यः समभवत् सूत्रं मत्सूत्रेण च संयुतम् ।ततो विकुर्वतो जातो योऽहङ्कारो विमोहकः ॥ ६ ॥
वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत् ।तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥ ७ ॥
'ज्ञानाभिमानी पुरुषः स ब्रह्मा समुदाहृतः ।अर्थाभिमानी प्रकृतिर्गायत्री सा प्रकीर्तिता ॥तयोर्नियामको विष्णुः श्रीश्चानुग्राहिका स्मृता ।वायुस्तु ब्रह्मणः पुत्रः प्रकृतौ समजायत ॥त्रिगुणात्मा समुद्दिष्टः प्रायः सत्त्वात्मकस्तथा ।गायत्री चैव सावित्री तथैव च सरस्वती ॥एवं त्रिरूपा प्रकृतिरेका सत्त्वादिभेदतः ।तासु वीर्यं समुत्सृष्टं ब्रह्मणैकत्वमागतम् ॥स सूत्रात्मा समुद्दिष्टो वायुर्लोकप्रणायकः ।तस्यापि सूत्रं भगवान् धारणाद्विष्णुरव्ययः ॥सूत्रपुत्रस्त्वहङ्कारः स रुद्रः समुदाहृतः ।सूत्रात्मना महांश्चापि सहजातश्चतुर्मुखः ॥तस्यापि पुत्रोऽहङ्कारः स चानन्त उदाहृतः ।अनन्तादपि रुद्रोऽभूद् ब्रह्मणश्चेति स त्रिधा ॥वैकारिको ब्रह्मजस्तु तैजसो वायुजः स्मृतः ।तामसोऽनन्तजश्चैव स एको गुणभेदतः॥ इति प्राथम्ये ॥'चिदचिद् यद्वशे सर्वं स रुद्रश्चिदचिन्मयः॥ इति च ॥ ४-७ ॥
तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थिते ।मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चाऽत्मभूः ॥ १० ॥
'चिदानन्दशरीरस्तु प्रविष्टोऽण्डे हरिः स्वयम् ।तन्नाभेर्भूतदेहोऽभूत् पद्मादपि चतुर्मुखः ॥चतुर्मुखस्तु सर्वाण्डव्याप्तदेहो महातपाः ।हरिस्तु सर्वव्याप्तोऽपि भूतदेहो न तु क्वचित् ॥नैवास्य प्राकृतो देहः प्रादुर्भावेष्वपि क्वचित्॥ इति निवृत्ते ॥१०॥
योगस्य तपसश्चैव ज्ञानस्य गतयोऽमलाः ।महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः ॥ १४ ॥
महरादीनामपि भक्तियोगोऽपेक्षित एव । आधिक्येनापेक्षितत्वात् 'भक्ति-योगस्य मद्गतिः। इत्युक्तम् ।'नैव विष्णावभक्तस्य महर्लोकादिका गतिः ।भक्त्युद्रेकात् क्रमादूर्ध्वं यावद्विष्णुप्रवेशनम् ॥एवं ज्ञानं विना साऽपि महर्लोकादिका गतिः ।ज्ञानोद्रेकात् क्रमादूर्ध्वं यावद्विष्णुप्रवेशनम् ॥नित्यशो भगवद्रूपस्याऽपरोक्ष्येण दर्शनम् ।मुहूर्तमात्रं ज्ञानं स्यान्महाज्ञानं ततोऽधिकम् ॥ज्ञानेन ब्रह्मलोकः स्यान्महाज्ञानाद्धरेर्गतिः ।सदैवाखण्डितं ध्यानं तप इत्युच्यते बुधैः ॥अपरोक्षदृशा युक्तं नित्यं षण्मात्रकालया ।अपरोक्षदृशा नित्यं एकमात्रायुजा युतम् ॥योगनाम्ना समुद्दिष्टं ध्यानं नित्यमखण्डितम् ।तच्चतुर्भागया नित्यमपरोक्षदृशा युतम् ॥पादयोगाख्यमुद्दिष्टं ध्यानं नित्यमखण्डितम् ।पादयोगान्महर्लोको जनलोकस्तु योगतः ॥तपसस्तु तपोलोकः प्राप्यते नान्यतः क्वचित्॥ इति ध्यानयोगे ॥ १४ ॥
मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् ।गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति ॥ १५ ॥
कालात्मना ज्ञानाद्यात्मना ॥ १५ ॥
यस्तु यस्याऽदिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य तत् ।विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः ॥ १७ ॥
'प्रकृतेस्तु विकाराणां कोट्यंशोऽभेद इष्यते ।तथैवैकांशतो भेदः सोऽपि नाभेदवर्जितः ।भेदाभेदमतः प्राहुरभेदं वा तयोर्बुधाः॥ इति विवेके ॥ १७ ॥
यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुते परम् ।आदिरन्तो यतो यस्मिंस्तत् सत्यमभिधीयते ॥ १८ ॥
'पारमार्थिकसत्यत्वं स्वातन्त्र्यमभिधीयते ।तद्विष्णोरेव नान्यस्य तदन्येषां सदाऽस्तिता॥ इति च ॥यद्ब्रह्मोपादाय । पूर्वः प्रकृत्यादिः । आदिरन्तश्च यद्ब्रह्मणि यस्मात् तस्मात् तह्म परमार्थसत्यम् ॥ १८ ॥
प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः ।सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत् त्रितयं त्वहम् ॥ १९ ॥
परः पुरुषो हिरण्यगर्भः । कालोऽपि रूपान्तरेण स एव ।'कालाभिमानी ब्रह्मा तु काल इत्यभिशब्दितः ।सर्वजीवाभिमानी स परः परुष उच्यते ॥प्रकृतिर्नाम तत्पत्नी प्रकृतेरभिमानिनी ।सा प्रसूते जगत्सर्वं सूत्रमारभ्य सर्वशः॥ इति च ।>आधारो व्यञ्जकश्चैव प्रसवीता च केशवः ।'कालप्रकृतिपुंसां च तन्मूलप्रकृतेरपि ।आधारो व्यञ्जकश्चैव सर्वस्यापि नियामकः॥ इति च ॥ १९ ॥
सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः ।महान् गुणविसर्गोऽर्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम् ॥ २० ॥
यावत् स्थितिरस्ति तावदुत्पत्तिरस्त्येव । यावदीक्षणं यावत्प्रलयः स्यादिति भगवतः स्मरणम् ॥ २० ॥
विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः ।पञ्चत्वायाविशेषाय कल्पते भुवनैः सह ॥ २१ ॥
'विशेषेण गुणोद्रेकाद्विशेषः पृथिवी स्मृता। इति प्रवृत्ते ।पञ्चत्वानन्तरमविशेषाय ॥ २१ ॥
अन्ने प्रलीयते मर्त्य अन्नं धानासु लीयते ।धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते ॥ २२ ॥
'देव्यामोषधिमानिन्यां लीयतेऽन्नाभिमानिनी। इत्यादि च ॥ २२ ॥
योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते महतीश्वरे ।शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः ॥ २५ ॥
स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः । तेऽव्यक्ते सम्प्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥
कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे । आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७ ॥
'विकारजत्वात्तु महान्वैकारिक उदाहृतः ।ईशनादीश्वरश्चैव ब्रह्मा बृंहणतः स्मृतः॥ इति च ॥'गायत्री चैव सावित्री तथैव च सरस्वती ।एवं त्रिरूपा प्रकृतिर्ब्रह्मपत्नी प्रकीर्तिता ॥महत्तत्त्वात्मको ब्रह्मा तज्जत्वात् तत्र लीयते ।गुणाधिकः पतिरपि तस्याः सत्त्वादिभेदतः ॥त्रिविधा मूलरूपायां प्रकृत्यां सा प्रलीयते ।प्रकृतिर्मूलरूपा सा ब्रह्मपत्नी जगन्मया ॥पुरुषाभिधे विरिञ्चे तु स स्वस्मिन् कालसञ्ज्ञिते ।कालाभिधो विरिञ्चस्तु महालक्ष्म्यां विलीयते ॥जीवमायेति यामाहुः सा च सत्त्वादिभेदतः ।त्रिविधैकत्वमापाद्य विष्णावेव विलीयते ॥हरेरत्यन्तसामीप्यं लयो लक्ष्म्याः प्रकीर्तितः ।पुरुषेणापि सामीप्यं प्रकृतेर्लय उच्यते ॥ब्रह्मा च प्रकृतिश्चैव मुक्तिगौ विलये यतः ।अतस्तौ भिन्नदेहौ तु ज्ञानमात्रौ समीपगौ॥ इत्यादि च ॥ २५-२७॥