Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S11: Difference between revisions
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे एकादशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'छन्नोऽन्येषां न तु स्वस्य भगवान्पुरुषोत्तमः ।तस्यावतारा देहस्था ओहस्था इति द्विधा ॥अन्तर्याम्यादिरूपाणि देहस्थानि विदो विदुः ।मत्स्यकूर्मादिरूपाणि न देहस्थानि हृत्पतेः ॥अन्यातुल्यैरतिशयैर्मनसो नियमादिभिः ।ज्ञायन्ते तानि रूपाणि नित्यपूर्णानि सर्वशः''॥ इति महाकौर्मे ॥ ३५ ॥ | |||
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Revision as of 05:35, 8 April 2026
एकादशोऽध्यायः
यक्षावूचतुः - कृष्ण कृष्ण महायोगिन् त्वमाद्यः पुरुषः परः । व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं रूपं ते ब्राह्मणा विदुः ॥ ३० ॥
'रूप्यत्वात्तु जगद्रूपं विष्णोः साक्षात्सुखात्मकम् ।नित्यपूर्णं समुद्दिष्टं स्वरूपं परमात्मनः॥ इति वामने ॥ ३० ॥
त्वमेकः सर्वभूतानां देह आत्मेन्द्रियेश्वरः ।त्वमेव कालो भगवान् विष्णुरव्यय ईश्वरः ॥ ३१ ॥
देहे । 'विष्णुः सर्वगुणोद्रेकात्काल इत्यभिधीयते॥ इति च ॥ ३१ ॥
त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजस्सत्त्वतमोमयी ।त्वमेव पुरुषोऽध्यक्षः सर्वक्षेत्रविकारवित् ॥ ३२ ॥
'प्रकृत्यादेस्तद्वशत्वात्प्रकृत्यादिरुदीर्यते ।यथा राजा भृत्यकृतात्स्वयं कर्तेत्युदीर्यते ॥यथा देहं स्वतन्त्रत्वात्स्वयमित्याहुरञ्जसा॥ इति पाद्मे ॥ ३२ ॥
गृह्यमाणस्त्वमग्राह्यो विकारैः प्राकृतैर्गुणैः ।को न्विहार्हति विज्ञातुं प्राक् सिद्धं गुणसंस्थितेः ॥ ३३ ॥
स्वात्मना गृह्यमाणः ॥ ३३ ॥
तस्मै तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।आत्मद्योतैर्गुणैश्छन्नमहिम्ने ब्रह्मणे नमः ॥ ३४ ॥
यस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरेष्वशरीरिणः । तैस्तैरतुल्यातिशयैस्तिर्यग्योनिष्वसङ्गतैः ॥ ३५ ॥
'छन्नोऽन्येषां न तु स्वस्य भगवान्पुरुषोत्तमः ।तस्यावतारा देहस्था ओहस्था इति द्विधा ॥अन्तर्याम्यादिरूपाणि देहस्थानि विदो विदुः ।मत्स्यकूर्मादिरूपाणि न देहस्थानि हृत्पतेः ॥अन्यातुल्यैरतिशयैर्मनसो नियमादिभिः ।ज्ञायन्ते तानि रूपाणि नित्यपूर्णानि सर्वशः॥ इति महाकौर्मे ॥ ३५ ॥