Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S3: Difference between revisions
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== तृतीयोऽध्यायः == | == तृतीयोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः । | |||
| verse_line2 = आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_line1 = ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं | |||
| verse_line2 = समाहितं शूरसुतेन देवी । | |||
| verse_line3 = दधार सर्वात्मकमात्मभूतं | |||
| verse_line4 = काष्ठा यथाऽऽनन्दकरं नभस्तः ॥ १९ ॥ | |||
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'आविश्य पितरं विष्णुः स्वरूपेणैव मातरम् ।विडम्बनार्थं लोकस्य निर्जनिश्चाप्यथाविशत् ।आनन्दमात्रदेहेन जातवत्सम्प्रदृश्यते''। इति च ॥ १७,१९ ॥ | |||
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| verse_line1 = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | |||
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'सच्छब्द उत्तमं ब्रूयादानन्दं तीति वै वदेत् ।येति ज्ञानं समुद्दिष्टं पूर्णानन्ददृशिस्ततः ॥सत्यशब्दोदितं तादृग्रूपं नित्यं यतो हरेः ।सत्यव्रतस्ततो विष्णुः सद्भूतत्रयमुच्यते ॥त्यं तदन्यत्समुद्दिष्टं तत्परत्वात्तु तत्परः ।वेदमुख्यार्थरूपत्वात्त्रिसत्यो भगवान् हरिः ॥सत्यस्य चोत्तमानन्दज्ञानदातृत्वतः सदा ।सत्यस्य सत्यो भगवान्सत्यस्थो जगति स्थितः ॥जगन्नेतृत्वतः सत्यनेता विष्णुः प्रकीर्तितः ।अत्तृत्वाच्च तदादानात्सत्यात्मा चोच्यते विभुः''इति तन्त्रभागवते ॥ | |||
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| verse_line1 = एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल- | |||
| verse_line2 = श्चतूरसः पञ्चशिफः षडात्मा । | |||
| verse_line3 = सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो | |||
| verse_line4 = दशच्छदी द्विखगो ह्यादिवृक्षः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिः | |||
| verse_line2 = स्थानं निधानं त्वमनुग्रहश्च । | |||
| verse_line3 = त्वन्मायया संवृतचेतसस्त्वां | |||
| verse_line4 = पश्यन्ति नाना न विपश्चितो ये ॥ २९ ॥ | |||
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'जगद्वृक्षाश्रया ह्येषा प्रकृतिस्तु गुणत्रयम् ।मूलं मात्राः शिफास्तस्य उत्पित्सुत्वादिकास्तथा ॥षट्प्रकारास्तु विटपा देवगन्धर्वदानवाः ।राक्षसाश्च पिशाचाश्च तिर्यङ्मानुषतस्थुषः ॥इन्द्रियाण्यस्य पत्राणि द्वारो द्वारो नव स्मृताः ।प्रवृत्तं च निवृत्तं च फलद्वयमुदीरितम् ॥धर्मादयस्त्वत्र रसा मोक्ष एकफलस्य तु ।प्रवृत्ताश्च निवृत्ताश्च पक्षिणो द्विविधा मताः ॥कारणस्य सदा सत्वात्प्रवाहेण च सन्नसौ ।न कदाचिन्न भूतोऽसौ न चैव न भविष्यति ॥स्वतो वा परतो वापि सन्नतोऽसौ जगत्तरुः ।अस्य स्वर्गादिकृद्विष्णुः सदानन्दैकरूपकः ॥''इति च ॥ २८-२९ ॥ | |||
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| verse_line1 = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्न | |||
| verse_line2 = समाधिनाऽऽवेशितचेतसो ये । | |||
| verse_line3 = त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन | |||
| verse_line4 = कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम् ॥ ३१ ॥ | |||
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'सदा सर्वगुणाढ्यत्वात्सत्ववान् हरिरुच्यते ।न तु सत्वगुणात्मत्वाद्यत स्त्रिगुणवर्जितः''॥ इति नारदीये ॥ ३०,३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन् | |||
| verse_line2 = भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः । | |||
| verse_line3 = भवत्पदाम्भोरुहनावमत्र ते | |||
| verse_line4 = निधाय याताः सदनुग्रहो भवान् ॥ ३२ ॥ | |||
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'भगवत्पादपोतोऽसौ नान्यपोतसमो भवेत् ।सन्निधायैव शिष्येषु तदेव प्राप्नुयुर्यतः''॥ इति वामने ॥'भगवत्पादनौकाया नेयं नौकोपमा भवेत् ।तया तीर्त्वा तु तामेव प्राप्य तिष्ठन्ति तत्र यत्''॥ इति ब्राह्मे ॥अतस्तामेव याताः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line1 = सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ | |||
| verse_line2 = शरीरिणां श्रेयउपायनं वपुः । | |||
| verse_line3 = वेदक्रियायोगतपःसमाधिभि- | |||
| verse_line4 = स्तवार्हणं येन जनः समीहते ॥ ३५ ॥ | |||
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'विशुद्धसत्वब्रह्मादेः शरीरे संस्थितो हरिः ।तेषामादेशमार्गेण वेदाद्यैरर्चयन्ति तम्''॥ इति भागवततन्त्रे ॥३५॥ | |||
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| verse_line1 = सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद् | |||
| verse_line2 = विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् । | |||
| verse_line3 = गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान् | |||
| verse_line4 = प्रकाशते यस्य च येन वाऽगुणः ॥ ३६ ॥ | |||
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'सत्वं ब्रह्मादिदेहाख्यं ज्ञानरूपं तमोनुदम् ।यदि न स्यात्तदा सत्वप्रकाशानुमितो विभुः ॥यदि न स्यात्परो विष्णुः कथं विद्वज्जना अमुम् ।अर्चयन्तीति तत्त्वस्य जिज्ञासुभिरधोक्षजः ॥कथं ज्ञायेत कस्यापि निर्गुणत्वात्परो विभुः''॥ इति तन्त्रभागवते ॥ | |||
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| verse_line1 = न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिः | |||
| verse_line2 = निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः । | |||
| verse_line3 = मनोवचोभ्यामनुमेयवर्त्मनो | |||
| verse_line4 = देवक्रियायाः प्रतियन्त्यथापि हि ॥ ३७ ॥ | |||
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'लोकसिद्धार्थनाम्नः स राहित्यान्नामवर्जितः ।अरूपोऽप्राकृतत्वाच्च सत्वाभावात्तथाऽगुणः ॥अकर्माऽक्लिष्टकारित्वान्नित्यत्वादज एव च ।अलौकिकार्थसन्नाम्नामनन्तत्वाज्जनार्दनः ॥अनन्तनामा परमः सुसुखज्ञानरूपवान् ।तानि चास्य सुदिव्यानि सुगन्धीनि सुभान्ति च ॥शुभलक्षणपूर्णानि सुवर्णानि महान्ति च ।यदतोऽनन्तरूपोऽसौ पूर्णानन्दादिभोजनात् ॥बलैश्वर्यसुवीर्यादिपूर्णासङ्ख्यगुणत्वतः ।अनन्तगुण एवासौ ते चाभिन्ना गुणा हरेः ॥परस्परमभिन्नाश्च सर्वधर्माश्च तद्गताः ।अभिन्नानि च रूपाणि सर्वाणि जगदीशितुः ॥प्राकृतस्य तु नामादेरीक्षिता पुरुषोत्तमः ।अनामादिवचोभिस्तु स एषोऽर्थोऽनुमीयते ॥अनामत्वादि चान्यच्च ज्ञानिनां मनसेङ्ग्यते ।तेनैव चोह्य एषोऽर्थस्तस्माज्ज्ञेय इति प्रभुः''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥देवक्रियायाः प्रतियन्ति भगवत्प्रेरणादेव जानन्ति ।'नामरूपादि विष्णोस्तु न शक्यं ज्ञातुमञ्जसा ।तथापि तत्प्रसादेन जानन्ति परमर्षयः''॥ इति पाद्मे ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_line1 = शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन् | |||
| verse_line2 = नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते । | |||
| verse_line3 = क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो- | |||
| verse_line4 = राविष्टचित्तो न भवाय कल्प्यते ॥ ३८ ॥ | |||
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यस्मान्नामरूपादयः सन्ति तस्माच्छृण्वन् गृणन् । क्रियासु क्रियमाणासु प्रेरकत्वेन पूज्यत्वेन च ।'सर्वक्रियासु कर्तृत्वपूज्यत्वेन जनार्दनम् ।यो वेत्ति नैति संसारं तत्प्रसादान्न संशयः''॥ इति क्रियायोगे ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_line1 = दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो | |||
| verse_line2 = भारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः । | |||
| verse_line3 = दिष्ट्याऽङ्कितां त्वत्पदकैः सुशोभनै- | |||
| verse_line4 = र्द्रक्ष्याम गां द्यां च तवानुकम्पिताम् ॥ ३९ ॥ | |||
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| text = | |||
'खं नाभिश्चरणौ क्षितिः''इति भवतः पदो भुवः ।'पदाद्याश्रयणाद्विष्णोः पृथिव्यादि पदादिकम् ।तज्जत्वाद्वाथ सादृश्याद्यथानुर्भूमिगं पदम्''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_line1 = न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं | |||
| verse_line2 = विना विनोदं बत तर्कयामहे । | |||
| verse_line3 = भवो निरोधः स्थितिरप्यविद्ययाऽऽ- | |||
| verse_line4 = कृता यतस्त्वय्यभवाश्रयात्मनि ॥ ४० ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः ॥}} | |||
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'अज्ञानादेव मन्यन्ते विष्णोर्जनिमृती नराः ।स्थितिरूपस्य चान्यस्मात्स्थितिं मोक्षाश्रयस्य हि ॥स्वेच्छया हि जनिं भङ्गं स्थितिं चासौ करोत्यजः ।सर्वस्य जगतो यस्मात्तज्जन्मादिः कुतो भवेत्''॥ इति च ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:35, 8 April 2026
तृतीयोऽध्यायः
भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः ।आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥ १७ ॥
ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशंसमाहितं शूरसुतेन देवी ।
'आविश्य पितरं विष्णुः स्वरूपेणैव मातरम् ।विडम्बनार्थं लोकस्य निर्जनिश्चाप्यथाविशत् ।आनन्दमात्रदेहेन जातवत्सम्प्रदृश्यते। इति च ॥ १७,१९ ॥
ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥
'सच्छब्द उत्तमं ब्रूयादानन्दं तीति वै वदेत् ।येति ज्ञानं समुद्दिष्टं पूर्णानन्ददृशिस्ततः ॥सत्यशब्दोदितं तादृग्रूपं नित्यं यतो हरेः ।सत्यव्रतस्ततो विष्णुः सद्भूतत्रयमुच्यते ॥त्यं तदन्यत्समुद्दिष्टं तत्परत्वात्तु तत्परः ।वेदमुख्यार्थरूपत्वात्त्रिसत्यो भगवान् हरिः ॥सत्यस्य चोत्तमानन्दज्ञानदातृत्वतः सदा ।सत्यस्य सत्यो भगवान्सत्यस्थो जगति स्थितः ॥जगन्नेतृत्वतः सत्यनेता विष्णुः प्रकीर्तितः ।अत्तृत्वाच्च तदादानात्सत्यात्मा चोच्यते विभुःइति तन्त्रभागवते ॥
एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल-श्चतूरसः पञ्चशिफः षडात्मा ।
त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिःस्थानं निधानं त्वमनुग्रहश्च ।
'जगद्वृक्षाश्रया ह्येषा प्रकृतिस्तु गुणत्रयम् ।मूलं मात्राः शिफास्तस्य उत्पित्सुत्वादिकास्तथा ॥षट्प्रकारास्तु विटपा देवगन्धर्वदानवाः ।राक्षसाश्च पिशाचाश्च तिर्यङ्मानुषतस्थुषः ॥इन्द्रियाण्यस्य पत्राणि द्वारो द्वारो नव स्मृताः ।प्रवृत्तं च निवृत्तं च फलद्वयमुदीरितम् ॥धर्मादयस्त्वत्र रसा मोक्ष एकफलस्य तु ।प्रवृत्ताश्च निवृत्ताश्च पक्षिणो द्विविधा मताः ॥कारणस्य सदा सत्वात्प्रवाहेण च सन्नसौ ।न कदाचिन्न भूतोऽसौ न चैव न भविष्यति ॥स्वतो वा परतो वापि सन्नतोऽसौ जगत्तरुः ।अस्य स्वर्गादिकृद्विष्णुः सदानन्दैकरूपकः ॥इति च ॥ २८-२९ ॥
बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥
त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्नसमाधिनाऽऽवेशितचेतसो ये ।
'सदा सर्वगुणाढ्यत्वात्सत्ववान् हरिरुच्यते ।न तु सत्वगुणात्मत्वाद्यत स्त्रिगुणवर्जितः॥ इति नारदीये ॥ ३०,३१ ॥
स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन्भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः ।
'भगवत्पादपोतोऽसौ नान्यपोतसमो भवेत् ।सन्निधायैव शिष्येषु तदेव प्राप्नुयुर्यतः॥ इति वामने ॥'भगवत्पादनौकाया नेयं नौकोपमा भवेत् ।तया तीर्त्वा तु तामेव प्राप्य तिष्ठन्ति तत्र यत्॥ इति ब्राह्मे ॥अतस्तामेव याताः ॥ ३२ ॥
सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौशरीरिणां श्रेयउपायनं वपुः ।
'विशुद्धसत्वब्रह्मादेः शरीरे संस्थितो हरिः ।तेषामादेशमार्गेण वेदाद्यैरर्चयन्ति तम्॥ इति भागवततन्त्रे ॥३५॥
सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद्विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् ।
'सत्वं ब्रह्मादिदेहाख्यं ज्ञानरूपं तमोनुदम् ।यदि न स्यात्तदा सत्वप्रकाशानुमितो विभुः ॥यदि न स्यात्परो विष्णुः कथं विद्वज्जना अमुम् ।अर्चयन्तीति तत्त्वस्य जिज्ञासुभिरधोक्षजः ॥कथं ज्ञायेत कस्यापि निर्गुणत्वात्परो विभुः॥ इति तन्त्रभागवते ॥
न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिःनिरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः ।
'लोकसिद्धार्थनाम्नः स राहित्यान्नामवर्जितः ।अरूपोऽप्राकृतत्वाच्च सत्वाभावात्तथाऽगुणः ॥अकर्माऽक्लिष्टकारित्वान्नित्यत्वादज एव च ।अलौकिकार्थसन्नाम्नामनन्तत्वाज्जनार्दनः ॥अनन्तनामा परमः सुसुखज्ञानरूपवान् ।तानि चास्य सुदिव्यानि सुगन्धीनि सुभान्ति च ॥शुभलक्षणपूर्णानि सुवर्णानि महान्ति च ।यदतोऽनन्तरूपोऽसौ पूर्णानन्दादिभोजनात् ॥बलैश्वर्यसुवीर्यादिपूर्णासङ्ख्यगुणत्वतः ।अनन्तगुण एवासौ ते चाभिन्ना गुणा हरेः ॥परस्परमभिन्नाश्च सर्वधर्माश्च तद्गताः ।अभिन्नानि च रूपाणि सर्वाणि जगदीशितुः ॥प्राकृतस्य तु नामादेरीक्षिता पुरुषोत्तमः ।अनामादिवचोभिस्तु स एषोऽर्थोऽनुमीयते ॥अनामत्वादि चान्यच्च ज्ञानिनां मनसेङ्ग्यते ।तेनैव चोह्य एषोऽर्थस्तस्माज्ज्ञेय इति प्रभुः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥देवक्रियायाः प्रतियन्ति भगवत्प्रेरणादेव जानन्ति ।'नामरूपादि विष्णोस्तु न शक्यं ज्ञातुमञ्जसा ।तथापि तत्प्रसादेन जानन्ति परमर्षयः॥ इति पाद्मे ॥ ३७ ॥
शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन्नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते ।
यस्मान्नामरूपादयः सन्ति तस्माच्छृण्वन् गृणन् । क्रियासु क्रियमाणासु प्रेरकत्वेन पूज्यत्वेन च ।'सर्वक्रियासु कर्तृत्वपूज्यत्वेन जनार्दनम् ।यो वेत्ति नैति संसारं तत्प्रसादान्न संशयः॥ इति क्रियायोगे ॥ ३८ ॥
दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवोभारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः ।
'खं नाभिश्चरणौ क्षितिःइति भवतः पदो भुवः ।'पदाद्याश्रयणाद्विष्णोः पृथिव्यादि पदादिकम् ।तज्जत्वाद्वाथ सादृश्याद्यथानुर्भूमिगं पदम्॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ ३९ ॥
न तेऽभवस्येश भवस्य कारणंविना विनोदं बत तर्कयामहे ।
'अज्ञानादेव मन्यन्ते विष्णोर्जनिमृती नराः ।स्थितिरूपस्य चान्यस्मात्स्थितिं मोक्षाश्रयस्य हि ॥स्वेच्छया हि जनिं भङ्गं स्थितिं चासौ करोत्यजः ।सर्वस्य जगतो यस्मात्तज्जन्मादिः कुतो भवेत्॥ इति च ॥ ४० ॥