Bhagavatatatparyanirnaya/C9/S8: Difference between revisions
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये नवमस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥}} | |||
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'नित्यपूर्णसुखज्ञप्तिस्वरूपोऽसौ यतो विभुः ।अतोऽस्य राम इत्याख्या तस्य दुःखं कुतोऽण्वपि ॥तथाऽपि लोकशिक्षार्थमदुःखो दुःखवर्तिवत् ।अन्तर्हितां लोकदृष्ट्या सीतामासीत्स्मरन्निव ॥ज्ञापनार्थं पुनर्नित्यसम्बन्धं स्वात्मनः श्रिया ।अयोध्याया विनिर्गच्छन् सर्वलोकस्य चेश्वरः ॥प्रत्यक्षं तु श्रिया सार्धं जगामानादिरव्ययः''॥ ९०,९२ ॥ | |||
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Revision as of 05:35, 8 April 2026
अष्टमोऽध्यायः
रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे-स्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।
रक्षोधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षंवैदेहराजदुहितुर्यपयापितायाम् ।
'नित्यपूर्णसुखज्ञप्तिस्वरूपोऽसौ यतो विभुः ।अतोऽस्य राम इत्याख्या तस्य दुःखं कुतोऽण्वपि ॥तथाऽपि लोकशिक्षार्थमदुःखो दुःखवर्तिवत् ।अन्तर्हितां लोकदृष्ट्या सीतामासीत्स्मरन्निव ॥ज्ञापनार्थं पुनर्नित्यसम्बन्धं स्वात्मनः श्रिया ।अयोध्याया विनिर्गच्छन् सर्वलोकस्य चेश्वरः ॥प्रत्यक्षं तु श्रिया सार्धं जगामानादिरव्ययः॥ ९०,९२ ॥