Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S3: Difference between revisions
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}} | }} | ||
== तृतीयोऽध्यायः == | == तृतीयोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = सृष्ट्वा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना । | |||
| verse_line2 = अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्यः परमेष्ठी निजासनम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = तदहं वर्धमानेन तपोयज्ञसमाधिना । | |||
| verse_line2 = कालात्मनोश्च नित्यत्वात् साधयिष्ये तथाऽऽत्मनः ॥ १० ॥ | |||
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'जानतामपि कर्तव्यं कर्मात्मसदृशं सदा ।तत्रात्मसदृशाज्ञानाद्रागाद्यैर्वा विमोहिताः । ।जानन्तोऽपि ह्यसदृशं कर्म कुर्युर्ऋते विभुम् ।चतुरास्यं स नायोग्यं कर्म कुर्यात्कथञ्चन''॥ इति नारदीये ॥'तपसा विद्यया वापि ज्ञानध्यानादिनाऽथवा ।व्यस्तैः समस्तैरपि वा कुर्वतां यत्नमुत्तमम् ॥संहारविक्षेपशतैर्बहुकोटिभिरेव वा ।न शक्यन्ते समारोढुं स्वात्मायोग्यपदानि तु ॥तथाप्याचरतां कुर्युर्दैत्यानां सुरनायकाः ।विघ्नं तु तप आदीनां वैयर्थ्यस्यापनुत्तये''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ | |||
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| verse_line1 = अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा । | |||
| verse_line2 = किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्तैर्वैष्णवादिभिः ॥ ११ ॥ | |||
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वैष्णवादिभिः ब्रह्मनिर्मितैः ।'ब्रह्मा स्वयम्भूर्द्रुहिणो वैष्णवः शतदृक्तथा''। इति शब्दनिर्णये ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = तवासनं हि जगतां पारमेष्ठ्यं जगत्पते । | |||
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'भवाय श्रेयसे चैव न कश्चित्तदपेक्षते ।मधुकैटभयोश्चैव हिरण्यादेस्तथैव च ॥नान्यो ब्रह्मपदं वाञ्छत्यृजून्योग्यान्विना क्वचित् ।ततः श्रेयांसि वाञ्छन्ति न तु तत्पदमाप्तये''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥'भवो वृद्धिः समुद्दिष्टा श्रेयो मोक्ष उदाहृतः ।वृद्धस्य न पुनर्ह्रासो भूतिरित्येव कथ्यते''॥ इति शब्दनिर्णये ॥ | |||
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| verse_line1 = तपन्तं तपसा लोकान् यथा भाविततं रविम् । | |||
| verse_line2 = विलक्ष्य विस्मितः प्राह हसंस्तं हंसवाहनः ॥ १६ ॥ | |||
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'सकामं तु तपः क्रूरं लोकानां भयकृद्भवेत् ।इतरच्छान्तये सर्वलोकानां भवति ध्रुवम्''॥ इति प्रकाशिकायाम् ॥'ब्रह्माणमभजद्ब्रह्मपदार्थं स हिरण्यकः''। इति स्कान्दे ॥ | |||
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| verse_line1 = व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः । | |||
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जितः वशीकृतः ।'पराभूतं वशस्थं च जितमित्युच्यते बुधैः''॥ इति शब्दनिर्णये ॥ | |||
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| verse_line2 = कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् । | |||
| verse_line3 = अभिव्यनग् जगदिदं स्वयंज्योतिः स्वरोचिषा ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति । | |||
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'प्रायस्तु स्तुतिशब्देषु मिश्रा वाचो हरिं विना ।केचिज्जीवगुणास्तत्र तन्नियन्तुर्हरेः परे ॥एकस्थानैककार्यत्वाद्विष्णोः प्राधान्यतस्तथा ।जीवस्य तदधीनत्वान्न भिन्नाधिकृतं वचः''इति ब्रह्मतर्के ॥त्रिवृता प्रकृत्या ॥ २६, २७ ॥ | |||
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प्राणेन सह ॥ २९ ॥ | |||
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सप्ततन्तून् सप्तक्रतून् ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line3 = कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महान् | |||
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जीवानां प्राणधारकः ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वत्तः परं नापरमप्यनेज- | |||
| verse_line2 = देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति । | |||
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'परावरेषु यस्मात्त्वं व्याप्तो विष्णुः सनातनः ।तस्मान्न व्यतिरिक्तं त्वदित्याहुर्वेदवेदिनः''॥ इति पाद्मे ॥ ३२ ॥विद्याश्च कलाश्च विद्याकलाः ।'महाविद्याः कलाश्चैव त्वत्तनावाश्रिता यतः ।विद्यातनुरिति प्राहुरतस्त्वां तत्त्ववेदिनः''इति च । त्रिपृष्ठः तुरीयः ॥ | |||
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| verse_line1 = नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः । | |||
| verse_line2 = न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ॥ ३६ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः ॥}} | |||
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'ब्रह्मणोऽप्यधिकं विष्णुं जानन्नपि हिरण्यकः ।ब्रह्माणं तद्गुणैः स्तौति तद्गविष्णुविवक्षया''॥ इति च ॥ | |||
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[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:34, 8 April 2026
तृतीयोऽध्यायः
सृष्ट्वा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना ।अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्यः परमेष्ठी निजासनम् ॥ ९ ॥
तदहं वर्धमानेन तपोयज्ञसमाधिना ।कालात्मनोश्च नित्यत्वात् साधयिष्ये तथाऽऽत्मनः ॥ १० ॥
'जानतामपि कर्तव्यं कर्मात्मसदृशं सदा ।तत्रात्मसदृशाज्ञानाद्रागाद्यैर्वा विमोहिताः । ।जानन्तोऽपि ह्यसदृशं कर्म कुर्युर्ऋते विभुम् ।चतुरास्यं स नायोग्यं कर्म कुर्यात्कथञ्चन॥ इति नारदीये ॥'तपसा विद्यया वापि ज्ञानध्यानादिनाऽथवा ।व्यस्तैः समस्तैरपि वा कुर्वतां यत्नमुत्तमम् ॥संहारविक्षेपशतैर्बहुकोटिभिरेव वा ।न शक्यन्ते समारोढुं स्वात्मायोग्यपदानि तु ॥तथाप्याचरतां कुर्युर्दैत्यानां सुरनायकाः ।विघ्नं तु तप आदीनां वैयर्थ्यस्यापनुत्तये॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥
अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा ।किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्तैर्वैष्णवादिभिः ॥ ११ ॥
वैष्णवादिभिः ब्रह्मनिर्मितैः ।'ब्रह्मा स्वयम्भूर्द्रुहिणो वैष्णवः शतदृक्तथा। इति शब्दनिर्णये ॥ ११ ॥
तवासनं हि जगतां पारमेष्ठ्यं जगत्पते ।भवाय श्रेयसे भूत्यै क्षेमाय विजयाय च ॥ १३ ॥
'भवाय श्रेयसे चैव न कश्चित्तदपेक्षते ।मधुकैटभयोश्चैव हिरण्यादेस्तथैव च ॥नान्यो ब्रह्मपदं वाञ्छत्यृजून्योग्यान्विना क्वचित् ।ततः श्रेयांसि वाञ्छन्ति न तु तत्पदमाप्तये॥ इति ब्रह्माण्डे ॥'भवो वृद्धिः समुद्दिष्टा श्रेयो मोक्ष उदाहृतः ।वृद्धस्य न पुनर्ह्रासो भूतिरित्येव कथ्यते॥ इति शब्दनिर्णये ॥
तपन्तं तपसा लोकान् यथा भाविततं रविम् ।विलक्ष्य विस्मितः प्राह हसंस्तं हंसवाहनः ॥ १६ ॥
'सकामं तु तपः क्रूरं लोकानां भयकृद्भवेत् ।इतरच्छान्तये सर्वलोकानां भवति ध्रुवम्॥ इति प्रकाशिकायाम् ॥'ब्रह्माणमभजद्ब्रह्मपदार्थं स हिरण्यकः। इति स्कान्दे ॥
व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः ।तपोनिष्ठेन भवता जितोऽहं दितिनन्दन ॥ २० ॥
जितः वशीकृतः ।'पराभूतं वशस्थं च जितमित्युच्यते बुधैः॥ इति शब्दनिर्णये ॥
हिरण्यकशिपुरुवाच–कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् ।
आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति ।रजःसत्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ॥ २७ ॥
'प्रायस्तु स्तुतिशब्देषु मिश्रा वाचो हरिं विना ।केचिज्जीवगुणास्तत्र तन्नियन्तुर्हरेः परे ॥एकस्थानैककार्यत्वाद्विष्णोः प्राधान्यतस्तथा ।जीवस्य तदधीनत्वान्न भिन्नाधिकृतं वचःइति ब्रह्मतर्के ॥त्रिवृता प्रकृत्या ॥ २६, २७ ॥
त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् ।चित्तस्य चित्तिर्मनइन्द्रियाणां पतिर्महाभूतगुणाशयेशः ॥ २९ ॥
प्राणेन सह ॥ २९ ॥
त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वात्रय्या चतुर्होत्रकविद्यया च ।
सप्ततन्तून् सप्तक्रतून् ॥ ३० ॥
त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि ।
जीवानां प्राणधारकः ॥
त्वत्तः परं नापरमप्यनेज-देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति ।
'परावरेषु यस्मात्त्वं व्याप्तो विष्णुः सनातनः ।तस्मान्न व्यतिरिक्तं त्वदित्याहुर्वेदवेदिनः॥ इति पाद्मे ॥ ३२ ॥विद्याश्च कलाश्च विद्याकलाः ।'महाविद्याः कलाश्चैव त्वत्तनावाश्रिता यतः ।विद्यातनुरिति प्राहुरतस्त्वां तत्त्ववेदिनःइति च । त्रिपृष्ठः तुरीयः ॥
नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः ।न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ॥ ३६ ॥
'ब्रह्मणोऽप्यधिकं विष्णुं जानन्नपि हिरण्यकः ।ब्रह्माणं तद्गुणैः स्तौति तद्गविष्णुविवक्षया॥ इति च ॥