Bhagavatatatparyanirnaya/C6/S4: Difference between revisions
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}} | }} | ||
== चतुर्थोऽध्यायः == | == चतुर्थोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युः | |||
| verse_line2 = सखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन् । | |||
| verse_line3 = गुणो यथा गुणिनोऽव्यक्तदृष्टि- | |||
| verse_line4 = स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि ॥ २४ ॥ | |||
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गुणो यथा गुणिनः । कश्चित्पुरस्थितो गुणभूतः प्रधानभूतस्य राज्ञः ममासौ सखेति राज्ञा चिन्तितमपि न जानाति ।'यथा राज्ञः प्रियत्वं तु भृत्यो वेद न चात्मनः ।तथा जीवो न यत्सख्यं वेत्ति तस्मै नमोस्तु ते''॥ इति स्कान्दे ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा | |||
| verse_line2 = नात्मानमन्यं च विदुः परं यत् । | |||
| verse_line3 = सर्वं पुमान् वेद गुणांश्च तज्ज्ञो | |||
| verse_line4 = न वेद सर्वज्ञमनन्तमीडे ॥ २५ ॥ | |||
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'देहमानी वैश्रवणो मरुतः प्राणमानिनः ।इन्द्राद्या इन्द्रियात्मानो रुद्रोऽन्तःकरणात्मकः ॥नैते विदन्ति स्वात्मानं परं वापि विमोहिताः ।जीवाभिमानी ब्रह्मा तु सर्वं वेद प्रजापतिः ॥सोऽपि वेद हरिं नैव सम्यक्सैव हि सर्ववित्''॥ इति च ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_line1 = यदोपरामो मनसो नामरूप- | |||
| verse_line2 = रूपस्य दृष्टिस्मृतिसंप्रमोषात् । | |||
| verse_line3 = य ईयते केवलया स्वसंस्थया | |||
| verse_line4 = हंसाय तस्मै शुचिसद्मने नमः ॥ २६ ॥ | |||
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केवलया स्वसंस्थया । स्वप्नसुषुप्त्यादौ मनस उपरमाज्जीवस्यास्वातन्त्र्य-दर्शनेऽपि स्वप्नप्रबोधादिदर्शनादन्य ईश्वरस्तन्नियामकोऽस्तीति ज्ञायते । जीवेच्छाभावात्केवलत्वम् ।'यदोपरामो मनसः स्वप्नसुप्तिलयादिषु ।तदावस्थाप्रबोधादिकारणत्वेन केशवः ॥अस्वातन्त्र्यात्तु जीवस्य विद्यतेऽन्यो नियामकः ।जीवप्रवृत्त्यानुकूल्याज्ज्ञायतेऽसौ तदा विभुः''॥ इति हरिवंशेषु ॥२६॥ | |||
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| verse_line1 = मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं | |||
| verse_line2 = स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः । | |||
| verse_line3 = वह्निं यथा दारुणि पाञ्चदश्यं | |||
| verse_line4 = मनीषया निष्कृषन्तीह गूढम् ॥ २७ ॥ | |||
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इच्छादिरूपेण त्रिवृद्भिः ।'इच्छादित्वेन त्रिविधा विमलाद्यास्तु शक्तयः ।विष्णोः स्वरूपभूता यास्ताभ्यस्तन्नामिकाः पराः ॥जायन्ते तत्प्रसादेव ताश्च पीठे प्रपूजयेत् ।तद्भिन्नजीवास्तस्यैव प्रसादात्तत्समीपगाः''॥ इति तन्त्रनिर्णये ।'दशेन्द्रियाणि च मनो बुद्धिप्राणप्रधानकाः ।चतुर्दशैषां परमः पाञ्चदश्यो हरिः स्मृतः ॥बुद्धेर्भेदेन वैतेषु पाञ्चदश्योऽथ संस्थितेः''॥ इति च ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_line1 = स वै ममाशेषविशेषमाया- | |||
| verse_line2 = निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः । | |||
| verse_line3 = स सर्वनामा स च विश्वरूपः | |||
| verse_line4 = प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्तिः ॥ २८ ॥ | |||
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'इयत्ता तु विशेषः स्यादानन्दादौ तदुज्झितेः । सर्वैर्विशेषै रहित उच्यते हरिरव्ययः । अप्राकृतस्वरूपत्वान्निर्मायश्चेति कथ्यते''॥ इति च । | |||
'तद्रूपसदृशं रूपं यतः सर्वस्य सर्वदा । सर्वरूपो यतः शब्दमुख्यार्थः सर्वनामकः''॥ इति च ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं | |||
| verse_line2 = धियाऽक्षिभिर्वा मनसा वोत यस्य । | |||
| verse_line3 = मा भूत् स्वरूपं गुणरूपबृंहितं | |||
| verse_line4 = स वै गुणापायनिसर्गलक्षणः ॥ २९ ॥ | |||
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अलौकिकत्वान्नो विष्णुर्निरुक्तो नो निरूपितः ।तथापि वेदेषूक्तत्वादुक्तो रूपित एव च''॥ इति व्योमसंहितायाम् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै | |||
| verse_line2 = यं यो यथा कुरुते कार्यते वा । | |||
| verse_line3 = परावरेषां परमं प्राक् स्वसिद्धं | |||
| verse_line4 = तद् ब्रह्म तद्धेतुरनन्यदेकम् ॥ ३० ॥ | |||
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सप्तविभक्त्यर्थस्य कालस्य प्रकारस्य च हेतुर्ब्रह्मैव ।'विभक्त्यर्थस्य कालस्य प्रकाराणां च कारणम् ।एक एव परो विष्णुः सर्वसत्ताप्रदत्वतः''॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥'अनन्यः सदृशाभावादेको रूपाद्यभेदतः''॥ इति च ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो- | |||
| verse_line2 = रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मयोः । | |||
| verse_line3 = अपेक्षितं किञ्चन सांख्ययोगयोः | |||
| verse_line4 = समं परं ह्यनुकूलं बृहत् तत् ॥ ३२ ॥ | |||
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'मदन्यो नास्ति सर्वेश इति विध्द्यासुरं मतम् ।अस्तीति दैवमुभयोर्हरिरेव ह्यपेक्षितः ॥निषेधविध्योर्विषयः फलदाता च केशवः ।तादृग्बुद्धेः कारणं च स्थानयोश्चोच्चनीचयोः''॥ इति च ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line1 = योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल- | |||
| verse_line2 = मनामरूपो भगवाननन्तः । | |||
| verse_line3 = नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि- | |||
| verse_line4 = र्भेजे स मह्यं परमः प्रसीदताम् ॥ ३३ ॥ | |||
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'तत्कर्मणामदृष्टत्वादनामा चाप्यदर्शनात् ।अरूपस्त्ववतारेण रूपकर्माणि दर्शयेत् ॥नित्यरूपो नित्यकर्माऽप्यव्यक्तत्वमपेक्ष्य तु ।अरूपकर्मेत्युदितो रूपकर्मोज्झितेर्न तु''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ।'अनामा सोऽधिकार्थत्वादव्यक्तत्वादरूपकः ।कंसारित्वादिसामर्थ्यो व्यक्तरूपोऽवतारगः''॥ इति च ।'लोकदृष्ट्याधिकार्थानि मूलनामानि केशवे ।अथ दामोदरादीनि लोकदृष्ट्या समानि तु ॥आनन्दोऽव्यक्तरूपस्तु मूलरूपमुदाहृतम् ।स एव व्यक्तिमापन्नः प्रादुर्भाव उदीरितः''इति च ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_line1 = यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां | |||
| verse_line2 = यथाशयं देहगतो विभाति । | |||
| verse_line3 = यथाऽनिलः पार्थिवमाश्रितो गुणं | |||
| verse_line4 = स ईश्वरो मे कुरुतान्मनोरथम् ॥ ३४ ॥ | |||
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'स्वदेहस्थं हरिं प्राहुरधमा जीवमेव तु ।मध्यमाश्चाप्यनिर्णीतं जीवाद्भिन्नं जनार्दनम् ॥पूर्णानन्दादिगुणकं सर्वजीवविलक्षणम् ।उत्तमास्तु हरिं प्राहुस्तारतम्येन तेषु च ॥बुद्धिशुध्द्यनुसारेण यथाप्राणं शरीरगम् ।श्वासमात्रं जनाः प्राहुरनिर्णीतं च मध्यमाः ॥देवदेवेश्वरं सूत्रमानन्दं प्राणवेदिनः''इति च ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः । | |||
| verse_line2 = विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ॥ ४५ ॥ | |||
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'विशेषव्यक्तिपात्रत्वात् ब्रह्माद्यास्तु विभूतयः ।तदन्तर्यामिणश्चैव मत्स्याद्या विभवाः स्मृताः'' ॥ इति तन्त्रनिर्णये ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_line1 = तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः । | |||
| verse_line2 = अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्माऽसवः सुराः ॥ ४६ ॥ | |||
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'तपोऽभिमानी रुद्रस्तु विष्णोर्हृदयमाश्रितः ।विद्यारूपा तथैवोमा विष्णोस्तनुमुपाश्रिता ॥शृृङ्गाराद्याकृतिगतः क्रियात्मा पाकशासनः ।ओषु क्रतवः सर्वे मध्यदेहे च धर्मराट् ॥प्राणे वायुश्चित्तगतो ब्रह्मान्याः खेषु देवताः''॥ इति च ॥'यदाश्रितं यद्भवति तत्तन्नामकमीरितम्''॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_line1 = अहमेवेदमासाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः । | |||
| verse_line2 = संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ॥ ४७ ॥ | |||
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सञ्ज्ञानमात्रं यदिदं त्वया तपसा दृष्टं मम रूपं तदेवाग्र आसीत् ।'नानावर्णो हरिस्त्वेको बहुशीर्षभुजोरुपात् ।आसील्लये तदन्यत्तु सूक्ष्मरूपं श्रियं विना ॥असुप्तः सुप्त इव च मीलिताक्षोऽभवद्धरिः ।अन्यत्रानादराद्विष्णौ श्रीश्च लीनेव कथ्यते ॥सूक्ष्मत्वेन हरौ स्थानाल्लीनमन्यदपीष्यते''॥ इति मात्स्ये ॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_line1 = मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे । | |||
| verse_line2 = यदासीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये षष्ठस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥}} | |||
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गुणतोऽनन्ते ।'प्रत्येकशो गुणानां तु निःसीमत्वमुदीर्यते ।तदानन्त्यं तु गुणतस्ते चानन्ता हि सङ्ख्यया ।अतोऽनन्तगुणो विष्णुर्गुणतोऽनन्त एव च''॥ इति तन्त्रभागवते ॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:34, 8 April 2026
चतुर्थोऽध्यायः
न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युःसखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन् ।
गुणो यथा गुणिनः । कश्चित्पुरस्थितो गुणभूतः प्रधानभूतस्य राज्ञः ममासौ सखेति राज्ञा चिन्तितमपि न जानाति ।'यथा राज्ञः प्रियत्वं तु भृत्यो वेद न चात्मनः ।तथा जीवो न यत्सख्यं वेत्ति तस्मै नमोस्तु ते॥ इति स्कान्दे ॥ २४ ॥
देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रानात्मानमन्यं च विदुः परं यत् ।
'देहमानी वैश्रवणो मरुतः प्राणमानिनः ।इन्द्राद्या इन्द्रियात्मानो रुद्रोऽन्तःकरणात्मकः ॥नैते विदन्ति स्वात्मानं परं वापि विमोहिताः ।जीवाभिमानी ब्रह्मा तु सर्वं वेद प्रजापतिः ॥सोऽपि वेद हरिं नैव सम्यक्सैव हि सर्ववित्॥ इति च ॥ २५ ॥
यदोपरामो मनसो नामरूप-रूपस्य दृष्टिस्मृतिसंप्रमोषात् ।
केवलया स्वसंस्थया । स्वप्नसुषुप्त्यादौ मनस उपरमाज्जीवस्यास्वातन्त्र्य-दर्शनेऽपि स्वप्नप्रबोधादिदर्शनादन्य ईश्वरस्तन्नियामकोऽस्तीति ज्ञायते । जीवेच्छाभावात्केवलत्वम् ।'यदोपरामो मनसः स्वप्नसुप्तिलयादिषु ।तदावस्थाप्रबोधादिकारणत्वेन केशवः ॥अस्वातन्त्र्यात्तु जीवस्य विद्यतेऽन्यो नियामकः ।जीवप्रवृत्त्यानुकूल्याज्ज्ञायतेऽसौ तदा विभुः॥ इति हरिवंशेषु ॥२६॥
मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितंस्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः ।
इच्छादिरूपेण त्रिवृद्भिः ।'इच्छादित्वेन त्रिविधा विमलाद्यास्तु शक्तयः ।विष्णोः स्वरूपभूता यास्ताभ्यस्तन्नामिकाः पराः ॥जायन्ते तत्प्रसादेव ताश्च पीठे प्रपूजयेत् ।तद्भिन्नजीवास्तस्यैव प्रसादात्तत्समीपगाः॥ इति तन्त्रनिर्णये ।'दशेन्द्रियाणि च मनो बुद्धिप्राणप्रधानकाः ।चतुर्दशैषां परमः पाञ्चदश्यो हरिः स्मृतः ॥बुद्धेर्भेदेन वैतेषु पाञ्चदश्योऽथ संस्थितेः॥ इति च ॥ २७ ॥
स वै ममाशेषविशेषमाया-निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः ।
'इयत्ता तु विशेषः स्यादानन्दादौ तदुज्झितेः । सर्वैर्विशेषै रहित उच्यते हरिरव्ययः । अप्राकृतस्वरूपत्वान्निर्मायश्चेति कथ्यते॥ इति च ।
'तद्रूपसदृशं रूपं यतः सर्वस्य सर्वदा । सर्वरूपो यतः शब्दमुख्यार्थः सर्वनामकः॥ इति च ॥ २८ ॥
यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितंधियाऽक्षिभिर्वा मनसा वोत यस्य ।
अलौकिकत्वान्नो विष्णुर्निरुक्तो नो निरूपितः ।तथापि वेदेषूक्तत्वादुक्तो रूपित एव च॥ इति व्योमसंहितायाम् ॥ २९ ॥
यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मैयं यो यथा कुरुते कार्यते वा ।
सप्तविभक्त्यर्थस्य कालस्य प्रकारस्य च हेतुर्ब्रह्मैव ।'विभक्त्यर्थस्य कालस्य प्रकाराणां च कारणम् ।एक एव परो विष्णुः सर्वसत्ताप्रदत्वतः॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥'अनन्यः सदृशाभावादेको रूपाद्यभेदतः॥ इति च ॥ ३० ॥
अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो-रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मयोः ।
'मदन्यो नास्ति सर्वेश इति विध्द्यासुरं मतम् ।अस्तीति दैवमुभयोर्हरिरेव ह्यपेक्षितः ॥निषेधविध्योर्विषयः फलदाता च केशवः ।तादृग्बुद्धेः कारणं च स्थानयोश्चोच्चनीचयोः॥ इति च ॥ ३२ ॥
योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-मनामरूपो भगवाननन्तः ।
'तत्कर्मणामदृष्टत्वादनामा चाप्यदर्शनात् ।अरूपस्त्ववतारेण रूपकर्माणि दर्शयेत् ॥नित्यरूपो नित्यकर्माऽप्यव्यक्तत्वमपेक्ष्य तु ।अरूपकर्मेत्युदितो रूपकर्मोज्झितेर्न तु॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ।'अनामा सोऽधिकार्थत्वादव्यक्तत्वादरूपकः ।कंसारित्वादिसामर्थ्यो व्यक्तरूपोऽवतारगः॥ इति च ।'लोकदृष्ट्याधिकार्थानि मूलनामानि केशवे ।अथ दामोदरादीनि लोकदृष्ट्या समानि तु ॥आनन्दोऽव्यक्तरूपस्तु मूलरूपमुदाहृतम् ।स एव व्यक्तिमापन्नः प्रादुर्भाव उदीरितःइति च ॥ ३३ ॥
यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानांयथाशयं देहगतो विभाति ।
'स्वदेहस्थं हरिं प्राहुरधमा जीवमेव तु ।मध्यमाश्चाप्यनिर्णीतं जीवाद्भिन्नं जनार्दनम् ॥पूर्णानन्दादिगुणकं सर्वजीवविलक्षणम् ।उत्तमास्तु हरिं प्राहुस्तारतम्येन तेषु च ॥बुद्धिशुध्द्यनुसारेण यथाप्राणं शरीरगम् ।श्वासमात्रं जनाः प्राहुरनिर्णीतं च मध्यमाः ॥देवदेवेश्वरं सूत्रमानन्दं प्राणवेदिनःइति च ॥ ३४ ॥
ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः ।विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ॥ ४५ ॥
'विशेषव्यक्तिपात्रत्वात् ब्रह्माद्यास्तु विभूतयः ।तदन्तर्यामिणश्चैव मत्स्याद्या विभवाः स्मृताः ॥ इति तन्त्रनिर्णये ॥ ४५ ॥
तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः ।अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्माऽसवः सुराः ॥ ४६ ॥
'तपोऽभिमानी रुद्रस्तु विष्णोर्हृदयमाश्रितः ।विद्यारूपा तथैवोमा विष्णोस्तनुमुपाश्रिता ॥शृृङ्गाराद्याकृतिगतः क्रियात्मा पाकशासनः ।ओषु क्रतवः सर्वे मध्यदेहे च धर्मराट् ॥प्राणे वायुश्चित्तगतो ब्रह्मान्याः खेषु देवताः॥ इति च ॥'यदाश्रितं यद्भवति तत्तन्नामकमीरितम्॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ४६ ॥
अहमेवेदमासाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः ।संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ॥ ४७ ॥
सञ्ज्ञानमात्रं यदिदं त्वया तपसा दृष्टं मम रूपं तदेवाग्र आसीत् ।'नानावर्णो हरिस्त्वेको बहुशीर्षभुजोरुपात् ।आसील्लये तदन्यत्तु सूक्ष्मरूपं श्रियं विना ॥असुप्तः सुप्त इव च मीलिताक्षोऽभवद्धरिः ।अन्यत्रानादराद्विष्णौ श्रीश्च लीनेव कथ्यते ॥सूक्ष्मत्वेन हरौ स्थानाल्लीनमन्यदपीष्यते॥ इति मात्स्ये ॥ ४७ ॥
मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे ।यदासीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ॥ ४८ ॥
गुणतोऽनन्ते ।'प्रत्येकशो गुणानां तु निःसीमत्वमुदीर्यते ।तदानन्त्यं तु गुणतस्ते चानन्ता हि सङ्ख्यया ।अतोऽनन्तगुणो विष्णुर्गुणतोऽनन्त एव च॥ इति तन्त्रभागवते ॥ ४८ ॥