Bhagavatatatparyanirnaya/C5/S12: Difference between revisions
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यस्मान्मूलकारणभूतो विष्णुरेव । अतो मुख्यं सर्वकारणत्वं तस्यैव । मूलाश्रयविवक्षा यदि न स्यात्कुतः पृथिव्यां चलतीति व्यवहारः ? यतोऽवान्तराश्रया बहवः सन्त्यङ्घ्र्याद्याः ॥ ५-६ ॥ | |||
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आश्रयत्वात्क्षितिरिति निर्वचने क्षितिशब्दोऽपि तस्मिन्नेव ॥ परमाणु-मात्रायाः पृथिव्या अयुक्तत्वात्परमाणवोऽप्यस्याविद्ययैवाधारत्वेन कल्पिताः॥ ८-९ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये पञ्चमस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः ॥}} | |||
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एवं सर्वं तथा प्रकृत्यैव कल्पितं विष्णोरन्यत् । एवं प्रकृत्याधारः स्वयमनन्याधारो विष्णुरेव । अतः सर्वशब्दाश्च तस्मिन्नेव ।'राजा गोप्ताऽऽश्रयो भूमिः शरणं चेति लौकिकः ।व्यवहारो न तत्सत्यं तयोर्ब्रह्माश्रयो विभुः ॥गोप्ता च तस्य प्रकृतिस्तस्या विष्णुः स्वयं प्रभुः ।तव गोप्त्री तु पृथिवी न त्वं गोप्ता क्षितेः स्मृतः ॥अतः सर्वाश्रयश्चैव गोप्ता च हरिरीश्वरः ।सर्वशब्दाभिधेयश्च शब्दवृत्तेर्हि कारणम् ॥सर्वान्तरः सर्वबहिरेक एव जनार्दनः ।शिर आधारता यद्वद्ग्रीवायास्तद्वदेव तु ॥आश्रयत्वं च गोप्तृत्वमन्येषामुपचारतः''इति च ॥ १०,११ ॥ | |||
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Revision as of 05:34, 8 April 2026
द्वादशोऽध्यायः
ब्राह्मण उवाच–अयं जनो नाम चलन्पृथिव्यां
अंसे च दार्वी शिबिका च यस्यांसौवीरराजेत्यपदेश आस्ते ।
यस्मान्मूलकारणभूतो विष्णुरेव । अतो मुख्यं सर्वकारणत्वं तस्यैव । मूलाश्रयविवक्षा यदि न स्यात्कुतः पृथिव्यां चलतीति व्यवहारः ? यतोऽवान्तराश्रया बहवः सन्त्यङ्घ्र्याद्याः ॥ ५-६ ॥
शोच्यानिमांस्तानधिकस्तवाधि-र्विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि ।
एवं मूलगोप्तृत्वं च विष्णोरेव ॥ ७ ॥
यदि क्षितावेव चराचरस्यविदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् ।
एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त-मसन्निधानं परमाणवो ये ।
आश्रयत्वात्क्षितिरिति निर्वचने क्षितिशब्दोऽपि तस्मिन्नेव ॥ परमाणु-मात्रायाः पृथिव्या अयुक्तत्वात्परमाणवोऽप्यस्याविद्ययैवाधारत्वेन कल्पिताः॥ ८-९ ॥
एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य-दसच्च सज्जीवमजीवमन्यत् ।
ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक-मनन्तरं न बहिर्ब्रह्म सत्यम् ।
एवं सर्वं तथा प्रकृत्यैव कल्पितं विष्णोरन्यत् । एवं प्रकृत्याधारः स्वयमनन्याधारो विष्णुरेव । अतः सर्वशब्दाश्च तस्मिन्नेव ।'राजा गोप्ताऽऽश्रयो भूमिः शरणं चेति लौकिकः ।व्यवहारो न तत्सत्यं तयोर्ब्रह्माश्रयो विभुः ॥गोप्ता च तस्य प्रकृतिस्तस्या विष्णुः स्वयं प्रभुः ।तव गोप्त्री तु पृथिवी न त्वं गोप्ता क्षितेः स्मृतः ॥अतः सर्वाश्रयश्चैव गोप्ता च हरिरीश्वरः ।सर्वशब्दाभिधेयश्च शब्दवृत्तेर्हि कारणम् ॥सर्वान्तरः सर्वबहिरेक एव जनार्दनः ।शिर आधारता यद्वद्ग्रीवायास्तद्वदेव तु ॥आश्रयत्वं च गोप्तृत्वमन्येषामुपचारतःइति च ॥ १०,११ ॥