Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S19: Difference between revisions
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'अन्येषामावृतो विष्णुः स्वस्यानावृत एव च ।आत्मा सर्वस्य जगतस्तस्यात्माऽन्यो न विद्यते ॥सुषुप्तवच्च निर्दुःखो जाग्रद्वच्च प्रवृत्तिमान् ।अनन्यसदृशत्वाच्च केवलोऽसौ हरिः स्मृतः''॥ इति तन्त्रसारे ।'आत्मनैवावगम्यत्वाद्धरिरेष सुषुप्तवत् ।केवलत्वेन विज्ञेयो मुक्तिस्तद्वददुःखता''॥ इत्यध्यात्मे ॥ ७,८ ॥ | |||
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'हरिरक्लिष्टकारित्वादुदासीन इतीर्यते''॥ इति च ॥ १२ ॥ | |||
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'जीवाद्भिन्नस्य मनसो गुणाः सत्वादयो मताः ।तज्ज्ञात्वा न विकुर्वीत स्वस्वरूपं मनस्तथा''। इति षाड्गुण्ये ॥१३॥ | |||
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'आयासदुःखव्रीडादीन्प्रायशः सुखिनोऽपि तु ।नियमादृषिभूतेषु मोहायादर्शयन्सुराः''॥ इति ब्रह्मतर्के ।'अपक्वभक्तियुक्ता ये न तेषां विष्णुदर्शनम् ।प्रायो भवति दुःखस्य त्वभावः प्रायशो भवेत्''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ | |||
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'जगत्समस्तं विश्वं च निखिलं पूर्णमुच्यते''। इत्यभिधानम् ॥ २० ॥ | |||
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'धिष्ण्यं तेजश्च सामर्थ्यं महिमा धाम चोच्यते''। इत्यभिधानम् ॥अल्पपुण्यत्वान्न मद्भक्तियोग्य इति न मन्तव्यम् । यतः फल्ग्वप्युरु करोषि वात्सल्यात् । विना वात्सल्यं श्रियाऽपि किं तव? ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_line1 = भजन्त्यथ त्वामत एव साधवो | |||
| verse_line2 = व्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम् । | |||
| verse_line3 = भवत्पदानुस्मरणादृते सतां | |||
| verse_line4 = निमित्तमन्यद् भगवन् न विद्महे ॥ ३० ॥ | |||
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अथ अन्यच्च । अतः वात्सल्यादेव ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः । | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे विंशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'भूतेषु हरिरित्येव हर्यर्पणधिया तथा ।सर्वभूतेषु च हरेः पूजा कार्याऽऽत्मवेदिभिः''॥ इति पाद्मे ॥ ३७ ॥ | |||
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Revision as of 05:34, 8 April 2026
विंशोऽध्यायः
एकः शुद्धः स्वयंज्योतिर्निर्गुणोऽसौ गुणाश्रयः ।सर्वगोऽनावृतः साक्षी निरात्माऽनात्मनः परः ॥ ७ ॥
देहाद्यपार्थास्तद्धर्मा न स्युस्तद्द्रष्टुरात्मनः ।कैवल्यं तस्य वै धर्मः सुषुप्तं तन्निदर्शनम् ॥ ८ ॥
'अन्येषामावृतो विष्णुः स्वस्यानावृत एव च ।आत्मा सर्वस्य जगतस्तस्यात्माऽन्यो न विद्यते ॥सुषुप्तवच्च निर्दुःखो जाग्रद्वच्च प्रवृत्तिमान् ।अनन्यसदृशत्वाच्च केवलोऽसौ हरिः स्मृतः॥ इति तन्त्रसारे ।'आत्मनैवावगम्यत्वाद्धरिरेष सुषुप्तवत् ।केवलत्वेन विज्ञेयो मुक्तिस्तद्वददुःखता॥ इत्यध्यात्मे ॥ ७,८ ॥
उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम् ।कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम् ॥ १२ ॥
'हरिरक्लिष्टकारित्वादुदासीन इतीर्यते॥ इति च ॥ १२ ॥
भिन्नस्य लिङ्गस्य गुणप्रवाहंद्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मनः ।
'जीवाद्भिन्नस्य मनसो गुणाः सत्वादयो मताः ।तज्ज्ञात्वा न विकुर्वीत स्वस्वरूपं मनस्तथा। इति षाड्गुण्ये ॥१३॥
स्पृशन्तं पादयोः शीर्ष्णा व्रीडन्तं स्वेन कर्मणा ।शतक्रतुं परिष्वज्य विद्वेषं विससर्ज ह ॥ १९ ॥
'आयासदुःखव्रीडादीन्प्रायशः सुखिनोऽपि तु ।नियमादृषिभूतेषु मोहायादर्शयन्सुराः॥ इति ब्रह्मतर्के ।'अपक्वभक्तियुक्ता ये न तेषां विष्णुदर्शनम् ।प्रायो भवति दुःखस्य त्वभावः प्रायशो भवेत्॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥
भगवानपि विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः ।समुज्जिहानया भक्तया गृहीतचरणाम्बुजः ॥ २० ॥
'जगत्समस्तं विश्वं च निखिलं पूर्णमुच्यते। इत्यभिधानम् ॥ २० ॥
जन्तोर्जगत्यां जगदीश वैशसंस्यादेव यत् कर्मणि नः समीहितम् ।
'धिष्ण्यं तेजश्च सामर्थ्यं महिमा धाम चोच्यते। इत्यभिधानम् ॥अल्पपुण्यत्वान्न मद्भक्तियोग्य इति न मन्तव्यम् । यतः फल्ग्वप्युरु करोषि वात्सल्यात् । विना वात्सल्यं श्रियाऽपि किं तव? ॥ २९ ॥
भजन्त्यथ त्वामत एव साधवोव्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम् ।
अथ अन्यच्च । अतः वात्सल्यादेव ॥ ३० ॥
यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः ।सभाजिता ययुः सर्वे वैकुण्ठानुगतास्ततः ॥ ३७ ॥
'भूतेषु हरिरित्येव हर्यर्पणधिया तथा ।सर्वभूतेषु च हरेः पूजा कार्याऽऽत्मवेदिभिः॥ इति पाद्मे ॥ ३७ ॥