Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S7: Difference between revisions
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त्रिमूर्तिगेन रूपेण नारायणो नाययौ ॥ | |||
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| verse_line4 = तस्यात्मतन्त्रस्य क उद्विधित्सेत् ॥ ७ ॥ | |||
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यज्ञ इन्द्रः ।'यज्ञो यज्ञपतिस्त्विन्द्रः पुरुहूतः पुरुष्टुतः''। इत्यभिधानम् ।तस्यात्मतन्त्रस्य । तस्य विष्णोर्मनोवशस्य ।'नाहं नेन्द्रो न चैवान्ये यत्तत्त्वं न विदुः परम् ।तस्य विष्णोर्वशे रुद्रो मम वायोरथापि वा ।नान्यस्य कस्यचित्पुंसस्तस्येत्थं वः कुतः कृतम्''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः । | |||
| verse_line2 = ददृशुः शिवमासीनं त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥ ३३ ॥ | |||
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'मुमुक्षवो ब्रह्मणश्च शिवादिन्द्रादिभिस्तथा ।श्रुत्वा ज्ञानं परं गुह्यं मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह''॥ इति कौर्मे ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_line4 = महत्तमोऽर्कस्य यथैव विष्णोः ॥ ४० ॥ | |||
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महत्तमः तेजस्वितमः अर्कस्य सकाशादपि ।'तेजोऽर्थ उत्तमार्थे च पूज्यार्थे च प्रयुज्यते ।महच्छब्दो महःशब्दो मान्यशब्दस्तथैव च''॥ इति शब्दनिर्णये ॥४०॥ | |||
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अन्तर्याम्यपेक्षया शक्तेः शिवस्य च परमिति ।'क्रियन्ते स्तुतयोऽन्यत्र तदन्तर्याम्यपेक्षया ।न जीवेषु गुणाः पूर्णा यथायोग्या हि तद्गताः''॥ इति ब्राह्मे ॥४२॥ | |||
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'तद्वशत्वात्स्वरूपं तु विष्णोः सर्वमुदीर्यते ।स्वरूपं स च सर्वत्र बिम्बत्वादेव तूच्यते ॥साक्षात्स्वरूपं मत्स्याद्या विष्णोर्नान्यत्कथञ्चन ।तस्मादन्यगता दोषा न तस्मिन् पुरुषोत्तमे''॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_line3 = त्वयैव लोकेऽवसिताश्च सेतवो | |||
| verse_line4 = यान् ब्राह्मणाः श्रद्धधते धृतव्रताः ॥ ४४ ॥ | |||
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अभिपत्तये प्रतीकाराय । सूत्रेण दोषसूचकेन ॥ ४४ ॥ | |||
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तव त्वाम् । 'चतुर्षु षष्ठी''इति सूत्रात् ॥'विष्ण्वधीना जगत्सत्ता प्रतीतिश्चेष्टितं गतिः ।इति यन्नियतं ज्ञानमपृथग्दर्शनं स्मृतम् ॥मिथ्याज्ञानं पृथग्ज्ञानमिति वेदविदो विदुः ।यथैवार्थस्तथाज्ञानमपृथग्दृष्टिरुच्यते''॥ इति गारुडे ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_line1 = येऽस्मिन् यदा पुष्करनाभमायया | |||
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| verse_line3 = कुर्वन्ति तत्र ह्यनुकम्पया कृपां | |||
| verse_line4 = न साधवो दैवबलात्कृताः कथम् ॥ ४८ ॥ | |||
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यदा यस्मात् ।'हृदयस्य द्रवीभावस्त्वनुकम्पेति कथ्यते ।उपकारं कर्तुमिच्छा कृपेत्याहुर्मनीषिणः''॥ इति शब्दनिर्णये ॥४८॥ | |||
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| verse_line1 = भवान् हि पुंसः परमस्य मायया | |||
| verse_line2 = दुरन्तयाऽस्पृष्टमतिः समस्तदृक् । | |||
| verse_line3 = तया हतात्मस्वनुकर्मचेत- | |||
| verse_line4 = स्स्वनुग्रहं कर्तुमिहार्हति प्रभो ॥ ४९ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥}} | |||
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मायया विष्ण्वधीनया बन्धकशक्त्या ।'विष्णुमाया हरेरिच्छा बन्धशक्तिश्च तद्वशा ।सर्वत्रगा हरेरिच्छा बन्धशक्तिर्ज्ञवर्जिता''॥ इति शब्दनिर्णये ॥४९॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
सप्तमोऽध्यायः
उपलभ्य पुरैवैतद् भगवानब्जसम्भवः ।नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतुः ॥ ३ ॥
त्रिमूर्तिगेन रूपेण नारायणो नाययौ ॥
नाहं न यज्ञो न च यूयमन्येये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् ।
यज्ञ इन्द्रः ।'यज्ञो यज्ञपतिस्त्विन्द्रः पुरुहूतः पुरुष्टुतः। इत्यभिधानम् ।तस्यात्मतन्त्रस्य । तस्य विष्णोर्मनोवशस्य ।'नाहं नेन्द्रो न चैवान्ये यत्तत्त्वं न विदुः परम् ।तस्य विष्णोर्वशे रुद्रो मम वायोरथापि वा ।नान्यस्य कस्यचित्पुंसस्तस्येत्थं वः कुतः कृतम्॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥
तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः ।ददृशुः शिवमासीनं त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥ ३३ ॥
'मुमुक्षवो ब्रह्मणश्च शिवादिन्द्रादिभिस्तथा ।श्रुत्वा ज्ञानं परं गुह्यं मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह॥ इति कौर्मे ॥ ३३ ॥
स तूपलभ्यागतमात्मयोनिंसुरासुरेशैरभिवन्दिताङ्घ्रि ।
महत्तमः तेजस्वितमः अर्कस्य सकाशादपि ।'तेजोऽर्थ उत्तमार्थे च पूज्यार्थे च प्रयुज्यते ।महच्छब्दो महःशब्दो मान्यशब्दस्तथैव च॥ इति शब्दनिर्णये ॥४०॥
ब्रह्मोवाच–जाने त्वामीश विश्वस्य जगतो योनिबीजयोः ।
अन्तर्याम्यपेक्षया शक्तेः शिवस्य च परमिति ।'क्रियन्ते स्तुतयोऽन्यत्र तदन्तर्याम्यपेक्षया ।न जीवेषु गुणाः पूर्णा यथायोग्या हि तद्गताः॥ इति ब्राह्मे ॥४२॥
त्वमेव भगवन्नेतच्छिवशक्त्योः स्वरूपयोः ।विश्वं सृजसि पास्यत्सि क्रीडयोर्णपदो यथा ॥ ४३ ॥
'तद्वशत्वात्स्वरूपं तु विष्णोः सर्वमुदीर्यते ।स्वरूपं स च सर्वत्र बिम्बत्वादेव तूच्यते ॥साक्षात्स्वरूपं मत्स्याद्या विष्णोर्नान्यत्कथञ्चन ।तस्मादन्यगता दोषा न तस्मिन् पुरुषोत्तमे॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ ४३ ॥
त्वमेव धर्मार्थदुघाऽभिपत्तयेदक्षेण सूत्रेण विसर्जिताध्वरः ।
अभिपत्तये प्रतीकाराय । सूत्रेण दोषसूचकेन ॥ ४४ ॥
न वै सतां त्वच्चरणार्पितात्मनांभूतेषु सर्वेष्वभिपश्यतां तव ।
तव त्वाम् । 'चतुर्षु षष्ठीइति सूत्रात् ॥'विष्ण्वधीना जगत्सत्ता प्रतीतिश्चेष्टितं गतिः ।इति यन्नियतं ज्ञानमपृथग्दर्शनं स्मृतम् ॥मिथ्याज्ञानं पृथग्ज्ञानमिति वेदविदो विदुः ।यथैवार्थस्तथाज्ञानमपृथग्दृष्टिरुच्यते॥ इति गारुडे ॥ ४६ ॥
येऽस्मिन् यदा पुष्करनाभमाययादुर्लङ्ध्यया स्पृष्टधियः पृथग्दृशः ।
यदा यस्मात् ।'हृदयस्य द्रवीभावस्त्वनुकम्पेति कथ्यते ।उपकारं कर्तुमिच्छा कृपेत्याहुर्मनीषिणः॥ इति शब्दनिर्णये ॥४८॥
भवान् हि पुंसः परमस्य माययादुरन्तयाऽस्पृष्टमतिः समस्तदृक् ।
मायया विष्ण्वधीनया बन्धकशक्त्या ।'विष्णुमाया हरेरिच्छा बन्धशक्तिश्च तद्वशा ।सर्वत्रगा हरेरिच्छा बन्धशक्तिर्ज्ञवर्जिता॥ इति शब्दनिर्णये ॥४९॥