Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S33: Difference between revisions
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== त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः == | == त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः == | ||
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'ईषद्भक्तो भगवति सुकर्मा स्वर्गमेष्यति ।अभक्तो निरयं याति सुकर्माऽपि न संशयः''॥ इति वामने ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = स सङ्गत्य पुनः काले कालेनेश्वरमूर्तिना । | |||
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अभिमानेन पूर्णज्ञानेन । सङ्गत्य लये परमेश्वरं प्रविश्य ।'यथापूर्वं प्रजायते''उच्चनीचादिभावेन जायते ।'अगुणव्यतिकरे''बहिः श्वेतद्वीपे निर्गच्छति ।'गुणव्यतिकराभावेऽप्युच्चनीचादिपूर्ववत् ।विष्णोश्चैव विमुक्तानां न कदाचन गच्छति''॥ इति गारुडे ॥ ११-१३ ॥ | |||
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| verse_line1 = ऐश्वर्यं पारमेष्ठ्यं यत् तेऽपि धर्मविनिर्मितम् । | |||
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गुणव्यतिकरे असति । प्रलये प्राप्ते पुनः परमेश्वरमायान्ति ।'ब्रह्मा देवैः परिवृतः प्रलये परमेश्वरम् ।प्रविश्य सर्गे तु पुनः श्वेतद्वीपे प्रमोदते ॥ज्ञानधर्मफलांस्तत्र भोगान्भुक्त्वा लये पुनः ।नारायणं समाविश्य ज्ञानव्यक्तं निजं सुखम् ॥भुञ्जते त्वेवमेवैषां काले संसर्गनिर्गमौ ।नित्यौ नित्यसुखं चैव सृष्टौ भोगास्तथोत्तमाः ॥यथापूर्वं हरेः सर्वगुणैर्नीचोच्चता तथा ।ब्रह्मणश्च तथान्येषामन्येषां च यथापदम्''॥ इति स्कान्दे ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः । | |||
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| verse_line1 = रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः । | |||
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| verse_line1 = नूनं दैवेन विहता ये त्वच्युतकथासुधाम् । | |||
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| verse_line1 = दक्षिणेन पथाऽर्यम्णः पितृलोकं व्रजन्ति ते । | |||
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| verse_line1 = ततस्ते क्षीणसुकृताः पुनर्लोकमिमं सति । | |||
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'अत्यल्पभक्ता विष्णौ च सदा श्राद्धादिकारिणः ।पितृलोकं समाविश्य स्वसन्ताने पुनःपुनः ॥क्षिप्रमेव प्रजायन्ते ये तु भक्तिविवर्जिताः ।अन्यसामान्यवेत्तारस्तदन्योत्तमवेदिनः ॥तद्भक्तनिन्दकाश्चैव यान्त्येव निरयं ध्रुवम् ।अपि धर्मैकनियमा नात्र कार्या विचारणा''॥ इति च ॥'मुक्तियोग्यास्तु देवाद्या मानुषा यज्ञभागिनः ।मनुष्यभेदाः श्राद्धादिकृतो विद्वेषिणोऽसुराः''इति च ॥ १६-२१ ॥ | |||
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| verse_line1 = ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम् । | |||
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'मत्स्यकूर्मादिरूपं च विष्णोर्ज्ञानैकमात्रकम् ।तन्मन्यन्ते भौतिकं तु ये गच्छन्त्यधरं तमः''॥ इति ब्राह्मे ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = यथा महानहङ्कारस्त्रिवृत् पञ्चविधः स्वराट् । | |||
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'एकादशेन्द्रियात्मा च पञ्चभूतात्मकस्तथा ।सर्वाभिमानी भगवान्स्वराडिन्द्रः पुरन्दरः ॥इदमण्डं जगत्सर्वं शक्रदेहं विदुर्बुधाः ।तत्पतिस्त्रिगुणो रुद्रस्तस्य ब्रह्मा ततो हरिः''॥ इति वामने ॥यथैतान्पश्यन्ति तद्वदेव ज्ञानात्मकं मत्स्यादिरूपं पश्यन्त्यज्ञाः॥ २९ ॥ | |||
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| verse_line1 = ज्ञानं योगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः । | |||
| verse_line2 = द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षणः ॥ ३२ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'ज्ञानभक्ती विना नैव मुक्तिः कस्यापि विद्यते ।तयोरेकतरेणापि विष्णुगेनोभयं विना ॥एवमप्येतयोरेकभावेऽन्यनियतेर्ध्रुवम् ।एकेनापि भवेन्मुक्तिस्तदर्थं त्वन्यसाधनम्''॥ इति हरिवंशेषु ॥३२॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
तच्छ्रद्धयाक्राऽऽन्तमतिः पितृदेवव्रतः पुमान् ।गत्वा चान्द्रमसं लोकं सोमपाः पुनरेष्यति ॥ ३ ॥
'ईषद्भक्तो भगवति सुकर्मा स्वर्गमेष्यति ।अभक्तो निरयं याति सुकर्माऽपि न संशयः॥ इति वामने ॥ ३ ॥
आद्यः स्थिरचराणां यो वेदगर्भः सहर्षिभिः ।योगेश्वरैः कुमाराद्यैः सिद्धैर्योगप्रवर्तकैः ॥ ११ ॥
भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा ।कर्तृत्वात् सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम् ॥ १२ ॥
स सङ्गत्य पुनः काले कालेनेश्वरमूर्तिना ।जातेऽगुणव्यतिकरे यथापूर्वं प्रजायते ॥ १३ ॥
अभिमानेन पूर्णज्ञानेन । सङ्गत्य लये परमेश्वरं प्रविश्य ।'यथापूर्वं प्रजायतेउच्चनीचादिभावेन जायते ।'अगुणव्यतिकरेबहिः श्वेतद्वीपे निर्गच्छति ।'गुणव्यतिकराभावेऽप्युच्चनीचादिपूर्ववत् ।विष्णोश्चैव विमुक्तानां न कदाचन गच्छति॥ इति गारुडे ॥ ११-१३ ॥
ऐश्वर्यं पारमेष्ठ्यं यत् तेऽपि धर्मविनिर्मितम् ।निषेव्य पुनरायान्ति गुणव्यतिकरेऽसति ॥ १४ ॥
गुणव्यतिकरे असति । प्रलये प्राप्ते पुनः परमेश्वरमायान्ति ।'ब्रह्मा देवैः परिवृतः प्रलये परमेश्वरम् ।प्रविश्य सर्गे तु पुनः श्वेतद्वीपे प्रमोदते ॥ज्ञानधर्मफलांस्तत्र भोगान्भुक्त्वा लये पुनः ।नारायणं समाविश्य ज्ञानव्यक्तं निजं सुखम् ॥भुञ्जते त्वेवमेवैषां काले संसर्गनिर्गमौ ।नित्यौ नित्यसुखं चैव सृष्टौ भोगास्तथोत्तमाः ॥यथापूर्वं हरेः सर्वगुणैर्नीचोच्चता तथा ।ब्रह्मणश्च तथान्येषामन्येषां च यथापदम्॥ इति स्कान्दे ॥ १४ ॥
ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः ।कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्नशः ॥ १६ ॥
रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः ।पितॄन् यजन्त्यनुदिनं गृहेष्वभिरताशयाः ॥ १७ ॥
त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधसः ।कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विषः ॥ १८ ॥
नूनं दैवेन विहता ये त्वच्युतकथासुधाम् ।हित्वा शृृण्वन्त्यसद्गाथाः पुरीषमिव विड्भुजः ॥ १९ ॥
दक्षिणेन पथाऽर्यम्णः पितृलोकं व्रजन्ति ते ।प्रजायां तु प्रजायन्ते श्मशानान्तक्रियाकृतः ॥ २० ॥
ततस्ते क्षीणसुकृताः पुनर्लोकमिमं सति ।पतन्ति विवशा देवैः सद्यो विभ्रंशितोदयाः ॥ २१ ॥
'अत्यल्पभक्ता विष्णौ च सदा श्राद्धादिकारिणः ।पितृलोकं समाविश्य स्वसन्ताने पुनःपुनः ॥क्षिप्रमेव प्रजायन्ते ये तु भक्तिविवर्जिताः ।अन्यसामान्यवेत्तारस्तदन्योत्तमवेदिनः ॥तद्भक्तनिन्दकाश्चैव यान्त्येव निरयं ध्रुवम् ।अपि धर्मैकनियमा नात्र कार्या विचारणा॥ इति च ॥'मुक्तियोग्यास्तु देवाद्या मानुषा यज्ञभागिनः ।मनुष्यभेदाः श्राद्धादिकृतो विद्वेषिणोऽसुराःइति च ॥ १६-२१ ॥
ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम् ।अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणाम् ॥ २८ ॥
'मत्स्यकूर्मादिरूपं च विष्णोर्ज्ञानैकमात्रकम् ।तन्मन्यन्ते भौतिकं तु ये गच्छन्त्यधरं तमः॥ इति ब्राह्मे ॥ २८ ॥
यथा महानहङ्कारस्त्रिवृत् पञ्चविधः स्वराट् ।एकादशविधस्तस्य वपुरण्डं जगद् यतः ॥ २९ ॥
'एकादशेन्द्रियात्मा च पञ्चभूतात्मकस्तथा ।सर्वाभिमानी भगवान्स्वराडिन्द्रः पुरन्दरः ॥इदमण्डं जगत्सर्वं शक्रदेहं विदुर्बुधाः ।तत्पतिस्त्रिगुणो रुद्रस्तस्य ब्रह्मा ततो हरिः॥ इति वामने ॥यथैतान्पश्यन्ति तद्वदेव ज्ञानात्मकं मत्स्यादिरूपं पश्यन्त्यज्ञाः॥ २९ ॥
ज्ञानं योगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः ।द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षणः ॥ ३२ ॥
'ज्ञानभक्ती विना नैव मुक्तिः कस्यापि विद्यते ।तयोरेकतरेणापि विष्णुगेनोभयं विना ॥एवमप्येतयोरेकभावेऽन्यनियतेर्ध्रुवम् ।एकेनापि भवेन्मुक्तिस्तदर्थं त्वन्यसाधनम्॥ इति हरिवंशेषु ॥३२॥