Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S27: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== सप्तविंशोऽध्यायः == | == सप्तविंशोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V04 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = न जातो न म्रियेताऽत्मा स हि देहाद्युपाधिभिः । | |||
| verse_line2 = निमित्तैरात्ततद्धर्मा यथा स्वप्ने तदीक्षिता ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V04 | |||
| id = BTN_C03_S27_V04_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
स परमो न जायते न म्रियत इति हि प्रसिद्धम् । देहाद्युपाधि-भिरात्तधर्मो जीवोऽपि स्वप्नवद्भ्रान्त्या जायते म्रियते च । भ्रान्तित्वाद्देहात्मत्वस्य । किमु सर्वज्ञत्वस्वतन्त्रत्वादिवैलक्षण्ययुक्त ईश्वरः ।'परस्य जन्ममृत्याद्याः स्युः स्वतन्त्रस्य किं पुनः ।जीवस्यापि यतो भ्रान्त्या जन्ममृत्यादिसङ्गतिः''॥ इति महाकौर्मे ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V05 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = स एव प्रकृतिं सूक्ष्मां देवीं गुणमयीं विभुः । | |||
| verse_line2 = यदृच्छयैवोपगतामभ्यपद्यत लीलया ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V05 | |||
| id = BTN_C03_S27_V05_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
उपगतां समीपस्थाम् ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V06 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = गुणैर्विचित्राः सृजतीं सरूपाः प्रकृतिं प्रजाः । | |||
| verse_line2 = विलोक्य मुमुहे सद्यः स इह ज्ञानगूहया ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V06 | |||
| id = BTN_C03_S27_V06_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
मुमुहे मोहयामास । 'तदेतन्मे विजानीहि''। 'कृत्वा विवाहम्''इत्यादिवत् ।'यत्र कारयिताऽतीव स्वतन्त्रस्तत्र कर्तृता ।प्रच्यते तु यथा ब्रह्म त्वज्ञं संसारभागिति''॥ इति च ।'लये वाप्यथवा सृष्टौ त्वन्तरालेऽपि न क्वचित् ।प्रकृत्या रहितं ब्रह्म कदाचिदपि तिष्ठति''॥ इति कापिलेये ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V07 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृतेः पुमान् । | |||
| verse_line2 = कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्यते ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V07 | |||
| id = BTN_C03_S27_V07_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
एवं पराभिध्यानेन परमात्मेच्छया । प्रकृतेः कर्तृत्वं जीव आत्मनि मन्यते ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V08 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम् । | |||
| verse_line2 = भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V08 | |||
| id = BTN_C03_S27_V08_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'विष्णोः सुराणां गुरूणां नित्या जीवस्य तन्त्रता ।यत्तु तस्यान्यतन्त्रत्वं तज्ज्ञानाद्विनिवर्तते''॥ इति च ।अकर्तुरीशस्य सकाशात् ।'अक्लिष्टत्वादकर्तासावकार्यत्वादथापि वा''। इति च ।'एष कर्ता न क्रियते कारणं च जगत्प्रभुः''। इति भारते ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V09 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः । | |||
| verse_line2 = भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषः प्रकृतेः परः ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V09 | |||
| id = BTN_C03_S27_V09_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'ब्रह्मादिभिः सर्गकरी श्रीर्विष्णुबलसंश्रयात् ।सुखदुःखप्रदो विष्णुः स्वयमेव सनातनः ॥कर्तृत्वं सुखदुःखानामन्येषां च तदाज्ञया ।भोक्तृत्वं सुखदुःखानां करोत्येको हरिः स्वयम् ।भोक्तृत्वमात्रहेतुत्वं जीवे नान्यत्र कुत्रचित्''॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥'प्रकृतिं पुरुषं चैव विध्द्यनादी''इति च ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V11 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = भगवानुवाच– | |||
| verse_line2 = यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । | |||
| verse_line3 = प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V11 | |||
| id = BTN_C03_S27_V11_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'व्यक्ताव्यक्तात्मकं यत्तद्विद्यात्सदसदात्मकम् ।असर्गा केवलाव्यक्ता सिसृक्षुरुभयात्मिका ॥व्यक्तैव कार्यरूपा तु प्रकृतिस्त्रिविधा मता ।कार्यतः सा प्रधानत्वात्प्रधानमिति कीर्त्यते ।अविशेषा ह्यकार्यत्वात्सा च श्रीर्विष्णुसंश्रया''॥ इति हरिवंशेषु ॥'विशेषः कार्यमुद्दिष्टं विशेषाद्दृश्यते यतः''इति पाद्मे ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V15 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मनः । | |||
| verse_line2 = चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V15 | |||
| id = BTN_C03_S27_V15_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'बुद्धिरध्यवसानाय संशयं कुरुते मनः ।अभिमानो ह्यहङ्कारश्चित्तं स्मरणकारणम्''॥ इति स्कान्दे ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V16 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = एतावानेव संख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य हि । | |||
| verse_line2 = सन्निवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V16 | |||
| id = BTN_C03_S27_V16_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'हरिस्तु निर्गुणं ब्रह्म श्रीर्ब्रह्म सगुणं स्मृता ।तदङ्गजानि तत्त्वनि तमात्तद्रूपमुच्यते''॥ इति हरिवंशेषु ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V17 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतो भयम् । | |||
| verse_line2 = अहङ्कारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V17 | |||
| id = BTN_C03_S27_V17_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'पुरुषो हृदिस्थः परमः कालः सर्वगतो हरिः ।अथवा रुद्रदेहस्थो हरिः काल इतीरितः''॥ इति ब्राह्मे ॥पौरुषं प्रभावम् । पुरुषस्य प्रकर्षेण भावं व्याप्तं रूपम् । एके सम्यग्ज्ञानिनः । अप्राकृताः ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V20 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान् । | |||
| verse_line2 = आधत्त वीर्यं साऽसूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम् ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V20 | |||
| id = BTN_C03_S27_V20_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'प्रकृतेः क्षोभकं रूपं दैवं नारायणात्मकम् ।प्रकृतौ महतः स्रष्टा परमः पुरुषो मतः ॥तदेव वासुदेवाख्यं महत्तत्त्वनियामकम् ।सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सूक्ष्माहङ्कारयामकः ॥स्थूलाहङ्कारनियमी विष्णुः प्रद्युमन्नामकः ।अनिरुद्धो मनस्तत्त्वनियन्ता भगवान् हरिः ॥महत्तत्त्वादिजीवास्तु ब्रह्मशेषाङ्गजास्तथा ।सूक्ष्मस्थूलविभेदेन कामजश्चानिरुद्धकः''॥ इति कापिलेये ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V21 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = विश्वमात्मगतं व्यञ्जन् कूटस्थो जगदङ्कुरः । | |||
| verse_line2 = स्वतेजसाऽपिबत् तीव्रमात्मप्रस्वापनं तमः ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V21 | |||
| id = BTN_C03_S27_V21_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'ओ रमयते यस्मात्केशवो जगदङ्कुरः ।महान्तं योऽसृजज्जीवमोहकं च तमोऽग्रसत्''॥ इति च ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V22 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = यत् तत् सत्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवतः पदम् । | |||
| verse_line2 = यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V22 | |||
| id = BTN_C03_S27_V22_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
यद्वासुदेवाख्यं भगवद्रूपं ततो महदात्मकं चित्तं जायते ।'सत्वशब्देन चोच्यन्ते पूर्णानन्दादयो गुणाः''॥ इति च ।'महत्तत्त्वगतो योऽसौ वासुदेवाभिधो हरिः ।स चित्तजनकः प्रोक्तः प्राणिनां च पृथक्पृथक्''॥ इति च ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V23 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्त्वमिति चेतसः । | |||
| verse_line2 = वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तं यथाऽपां प्रकृतिः परा ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V23 | |||
| id = BTN_C03_S27_V23_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
चित्तस्य स्वच्छत्वादयः पृथग्गुणा उच्यन्ते स्वच्छत्वमित्यादि ।'स्तिमितोदकचित्तादेरविकारोऽल्पवत्क्रिया''। इति तत्त्वविवेके ।'वृत्तिः स्वभावो वृत्तं च स्थितिरित्यभिधीयते''। इति शब्दनिर्णये ।''वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तम्' इति स्वाभाविकं लक्षणमित्यर्थः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V24 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = महत्तत्त्वाद् विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यसम्भवात् । | |||
| verse_line2 = क्रियाशक्तिरहङ्कारस्त्रिविधः समपद्यत ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V24 | |||
| id = BTN_C03_S27_V24_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'ज्ञानप्रधानस्तु महानहङ्कारः क्रियाधिकः ।इतरापेक्षया सोऽपि ज्ञानाधिक इतीरितः''॥ इति च ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V26 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = वैकारिकोऽधिदैवं तु बुद्धिः प्राणश्च तैजसः । | |||
| verse_line2 = तामसस्त्वर्थमात्रं च गुणव्यतिकरस्त्रिवृत् ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V26 | |||
| id = BTN_C03_S27_V26_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'देवताधिकृतं यत्तदधिदैवमिति स्मृतम्''। इति च ।वैकारिकोऽधिदैवमित्यादि पञ्चम्यर्थे ।'सप्तसु प्रथमा''तत्र स्वातन्त्र्यं यद्विवक्षितम् । इति शब्दनिर्णये ॥२६॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V27 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = सहस्रशिरसं साक्षाद् यमनन्तं प्रचक्षते । | |||
| verse_line2 = संकर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम् ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V28 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम् । | |||
| verse_line2 = शान्तघोरविमूढत्वमिति वा स्यादहंकृतेः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V28 | |||
| id = BTN_C03_S27_V28_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'मनोरूपेण कर्तृत्वं देहरूपेण कार्यता ।इन्द्रियात्मतया चैव करणत्वमहङ्कृतेः ॥यतो मनस्यहंभावस्तस्मात्कर्तृ मनः स्मृतम् ।स्वभावकर्तुर्जीवस्य त्वासन्नोपाधि तद्यतः ॥कर्मज्ञाने करणता यतः करणमिन्द्रियम् ।कार्यं देहः समुद्दिष्ट उत्पाद्यत्वात्पुनःपुनः''॥ इति तत्त्वविवेके ॥'शान्तरूपो देवपिता घोरः करणसृङ्मतः ।तावज्ज्ञानस्याप्रकाशान्मूढो भूतपिता स्मृतः ।त्रिरूपोऽयमहङ्कारः शेष इत्येव तं विदुः''॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ २७-२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V31 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तैजसात् तु विकुर्वाणाद् बुद्धितत्त्वमभूत् सति । | |||
| verse_line2 = द्रव्यस्फुरणविज्ञानमिन्द्रियाणामनुग्रहात् ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V32 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च । | |||
| verse_line2 = स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तितः पृथक् ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V32 | |||
| id = BTN_C03_S27_V32_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
द्रव्यस्फुरणे यद्विशेषज्ञानम् ॥'सामान्यं मनसा जातं विशेषाद्बुद्धिजं भवेत्''॥'अचलः संशयो बुद्धेश्चलो मानस उच्यते ।चञ्चला तु स्मृतिर्बुद्धेश्चित्तजैव स्थिरा स्मृतिः''॥ इति च ॥'येन यज्ज्ञायते वस्तु तत्तल्लक्षणमुच्यते । तत्स्वरूपं पृथक्चेति द्विविधं कवयो विदुः''॥ इति कापिलेये ॥ ३१,३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V33 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः । | |||
| verse_line2 = प्राणस्य हि क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V33 | |||
| id = BTN_C03_S27_V33_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'प्रधानवायुः सूत्रात्मा महता सह जायते ।तैजसश्च खजः स्पर्श इत्याद्यास्तत्सुताः स्मृताः ।तदाविष्टा अन्यजीवास्तदाधाराश्च तद्बलाः''। इति च ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V34 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तामसाच्च विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यचोदितात् । | |||
| verse_line2 = शब्दमात्रमभूत् तस्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम् ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V35 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिङ्गत्वमेव च । | |||
| verse_line2 = तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदुः ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V35 | |||
| id = BTN_C03_S27_V35_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
अर्थाश्रयत्वम् अर्थविषयत्वम् ।'शब्देनैव यतो ज्ञेयो हरिर्लिङ्गं तु तस्य तत् ।स्पर्शाद्यभावात्तन्मात्रा नभसश्चेति कीर्त्यते ॥स्पर्शादयश्च तन्मात्रा इतरे पूर्वसंस्थितेः ।तिष्ठन्त्येको गुणो भूते प्रत्येकं पञ्चसु स्थितः ॥शब्दो वर्णात्मको नित्यो ध्वनिराकाशसम्भवः ।आकाश एव सूक्ष्मस्तु ध्वनिरित्येव शब्द्यते ॥स एव व्यज्यमानस्तु भवेत्कर्णैकगोचरः''॥ इति च ॥ ३४,३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V37 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = नभसः शब्दतन्मात्रात् कालगत्या विकुर्वतः । | |||
| verse_line2 = स्पर्शोऽभवत् ततो वायुस्त्वक् स्पर्शस्य च सङ्ग्रहः ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V37 | |||
| id = BTN_C03_S27_V37_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
नभसः शब्दतन्मात्राच्छब्दतन्मात्रगुणात् ।'स्पर्शादयोऽपि वाय्वादेः सूक्ष्मावस्था प्रकीर्तिता''इति च ।'सूक्ष्मेन्द्रियाणि सन्त्येव स्युः स्थूलान्यप्यहङ्कृतेः ।भूतेभ्यश्चोपचीयन्ते पुनर्ब्रह्मशरीरतः''॥ इति च ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V39 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = चालनं व्यूहनं प्राप्तिर्नेतृत्वं द्रव्यशब्दयोः । | |||
| verse_line2 = सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं वायोः कर्माभिलक्षणम् ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V39 | |||
| id = BTN_C03_S27_V39_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'प्राप्नोति वायुः सर्वं तु स्वत एव हरेस्तथा ।अतः प्राप्तिरिति प्राहुर्वायुं भूतपतिं प्रभुम् ।प्रधानवायुरन्येषु नित्याविष्टो यतस्ततः ।तद्गुणास्तेषु चोच्यन्ते नीचता नास्य तत्कृता''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ।'स्वरूपमपि कर्मेति विषयत्वादुदीर्यते''इति शब्दनिर्णये ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V41 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च । | |||
| verse_line2 = तेजस्त्वं तेजसः साध्वि रूपमात्रस्य वृत्तयः ॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V41 | |||
| id = BTN_C03_S27_V41_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
व्यक्तिसंस्थात्वं व्यक्तत्वेन स्थितिः । गुणता प्रकाशत्वम् ।'आलोको गुण इत्येव प्रकाशश्चेति कथ्यते''। इत्यभिधानम् ।'तेजस्त्वमथ चोग्रत्वं क्रौर्यमित्यपि चोच्यते''। इत्यभिधानम् ॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V45 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = क्लेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राणनाप्ययनोन्दनम् । | |||
| verse_line2 = तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V45 | |||
| id = BTN_C03_S27_V45_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'उन्दनं बिन्दुभावः स्यात्स्यन्दनं स्रवणं स्मृतम्''। इत्यभिधानम् ।पृथिव्यग्न्यपेक्षया भूयस्त्वं देहे ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V48 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = भावनं ब्रह्मणः स्थानं धारणं सद्विशेषणम् । | |||
| verse_line2 = सर्वसत्वगुणोद्भेदः पृथिवीवृत्तिलक्षणम् ॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V48 | |||
| id = BTN_C03_S27_V48_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
भावनमुत्पादकत्वम् ।'ब्रह्मस्थानं तु पृथिवी शरीरे ब्रह्मदर्शनात्''। इति कापिलेये ।सद्विशेषणं विशेषेण व्यक्तत्वम् ।'असदव्यक्तनाम स्याद्व्यक्तं सदिति चोच्यते''। इति ब्राह्मे ।सर्वसत्वगुणोद्भेदः शरीरे हि सर्वप्राणिनां गुणा व्यज्यन्ते संसारावस्थायाम् ।'शरीरं पार्थिवं ज्ञेयमिन्द्रियाण्यौदकानि तु ।तैजसः कोष्ठगो वह्निश्छिद्रमाकाशसम्भवम् ।प्राणा वायुमयाः सर्वे प्रत्येकं प्रञ्चधा पुनः''॥ इति कापिलेये ॥४८॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V54 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = ततस्तेनानुविद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्योऽण्डमचेतनम् । | |||
| verse_line2 = उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट् ॥ ५४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V54 | |||
| id = BTN_C03_S27_V54_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'अचेतनाद्यतस्त्वण्डाद् ब्रह्मा समजनि स्फुटम् ।अतो ब्रह्माण्डमित्याहुर्विराड् ब्रह्मा प्रकाशनात्''॥ इति च ॥ ५४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V61 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट् । | |||
| verse_line2 = पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरिः ॥ ६१ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V61 | |||
| id = BTN_C03_S27_V61_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'यज्ञनामा तु देवोऽन्यो विज्ञेयः पाददेवता ।तदाविष्टो हरिर्नित्यं तमाहुः पाददैवतम् ।तस्येन्द्रियाभिमानित्वं कुतः पूर्णामलात्मनः''॥ इति च ॥ ६१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V64 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम् । | |||
| verse_line2 = मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरांपतिः । | |||
| verse_line3 = अहङ्कारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्त्यस्ततोऽभवत् ॥ ६४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V64 | |||
| id = BTN_C03_S27_V64_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'चैत्योऽपि भगवान्विष्णुरन्तर्यामी चतुर्मुखात् ।स्वेच्छया व्यक्तिमगमत्ततोऽसौ ब्रह्मजः स्मृतः''॥ इति च ॥ ६४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V70 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत् ततो विराट् । | |||
| verse_line2 = नाडीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७० ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V70 | |||
| id = BTN_C03_S27_V70_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'यज्ञान्तस्थः स्वयं पादौ विशन्नोत्थापयद्धरिः ।शक्तोऽपि ब्रह्मवाय्वोस्तु बलज्ञप्त्यै जनार्दनः ।तत्स्थ उत्थापयामास ब्रह्मदेहं विशन्प्रभुः''॥ इति च ॥ ७० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V72 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = बुद्ध्या ब्रह्माऽपि हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् । | |||
| verse_line2 = रुद्रोऽभिमत्या हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७२ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V72 | |||
| id = BTN_C03_S27_V72_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
ब्रह्मा बृहस्पतिः ।'यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति''। इति श्रुतिः ।'बृहस्पतिः पुरोधाश्च ब्रह्मा च ब्रह्मणस्पतिः''। इत्यभिधानम् ॥ ७२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V73 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S27 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद् यदा । | |||
| verse_line2 = विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥ ७३ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे सप्तविंशोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S27_V73 | |||
| id = BTN_C03_S27_V73_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'अंशेन सुप्तो ब्रह्माऽपि अंशेन निरगात्तथा ।स्वदेहाद्वायुसहितो विष्णुना च जगत्प्रभुः ॥तमुत्थापयितुं देवास्तानृते त्रीन्महाबलान् ।नाशक्नुवुन् एकसंस्थास्ततस्ते त्वविशंस्त्रयः ॥उदतिष्ठद्ब्रह्मदेहस्तदा तेषां प्राभावतः ।विशेषेण हरेरेव प्राभावेन श्रियः पतेः ॥चित्ताभिमानी ब्रह्मैव क्षेत्रज्ञस्तद्गतो हरिः ।प्रणो वायुरिति प्रक्तस्तयोरीशो हरिः स्वयम्''॥ इति च ॥ ७३ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:33, 8 April 2026
सप्तविंशोऽध्यायः
न जातो न म्रियेताऽत्मा स हि देहाद्युपाधिभिः ।निमित्तैरात्ततद्धर्मा यथा स्वप्ने तदीक्षिता ॥ ४ ॥
स परमो न जायते न म्रियत इति हि प्रसिद्धम् । देहाद्युपाधि-भिरात्तधर्मो जीवोऽपि स्वप्नवद्भ्रान्त्या जायते म्रियते च । भ्रान्तित्वाद्देहात्मत्वस्य । किमु सर्वज्ञत्वस्वतन्त्रत्वादिवैलक्षण्ययुक्त ईश्वरः ।'परस्य जन्ममृत्याद्याः स्युः स्वतन्त्रस्य किं पुनः ।जीवस्यापि यतो भ्रान्त्या जन्ममृत्यादिसङ्गतिः॥ इति महाकौर्मे ॥ ४ ॥
स एव प्रकृतिं सूक्ष्मां देवीं गुणमयीं विभुः ।यदृच्छयैवोपगतामभ्यपद्यत लीलया ॥ ५ ॥
उपगतां समीपस्थाम् ॥ ५ ॥
गुणैर्विचित्राः सृजतीं सरूपाः प्रकृतिं प्रजाः ।विलोक्य मुमुहे सद्यः स इह ज्ञानगूहया ॥ ६ ॥
मुमुहे मोहयामास । 'तदेतन्मे विजानीहि। 'कृत्वा विवाहम्इत्यादिवत् ।'यत्र कारयिताऽतीव स्वतन्त्रस्तत्र कर्तृता ।प्रच्यते तु यथा ब्रह्म त्वज्ञं संसारभागिति॥ इति च ।'लये वाप्यथवा सृष्टौ त्वन्तरालेऽपि न क्वचित् ।प्रकृत्या रहितं ब्रह्म कदाचिदपि तिष्ठति॥ इति कापिलेये ॥ ६ ॥
एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृतेः पुमान् ।कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्यते ॥ ७ ॥
एवं पराभिध्यानेन परमात्मेच्छया । प्रकृतेः कर्तृत्वं जीव आत्मनि मन्यते ॥ ७ ॥
तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम् ।भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः ॥ ८ ॥
'विष्णोः सुराणां गुरूणां नित्या जीवस्य तन्त्रता ।यत्तु तस्यान्यतन्त्रत्वं तज्ज्ञानाद्विनिवर्तते॥ इति च ।अकर्तुरीशस्य सकाशात् ।'अक्लिष्टत्वादकर्तासावकार्यत्वादथापि वा। इति च ।'एष कर्ता न क्रियते कारणं च जगत्प्रभुः। इति भारते ॥ ८ ॥
कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः ।भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषः प्रकृतेः परः ॥ ९ ॥
'ब्रह्मादिभिः सर्गकरी श्रीर्विष्णुबलसंश्रयात् ।सुखदुःखप्रदो विष्णुः स्वयमेव सनातनः ॥कर्तृत्वं सुखदुःखानामन्येषां च तदाज्ञया ।भोक्तृत्वं सुखदुःखानां करोत्येको हरिः स्वयम् ।भोक्तृत्वमात्रहेतुत्वं जीवे नान्यत्र कुत्रचित्॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥'प्रकृतिं पुरुषं चैव विध्द्यनादीइति च ॥ ९ ॥
भगवानुवाच–यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् ।
'व्यक्ताव्यक्तात्मकं यत्तद्विद्यात्सदसदात्मकम् ।असर्गा केवलाव्यक्ता सिसृक्षुरुभयात्मिका ॥व्यक्तैव कार्यरूपा तु प्रकृतिस्त्रिविधा मता ।कार्यतः सा प्रधानत्वात्प्रधानमिति कीर्त्यते ।अविशेषा ह्यकार्यत्वात्सा च श्रीर्विष्णुसंश्रया॥ इति हरिवंशेषु ॥'विशेषः कार्यमुद्दिष्टं विशेषाद्दृश्यते यतःइति पाद्मे ॥ ११ ॥
मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मनः ।चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया ॥ १५ ॥
'बुद्धिरध्यवसानाय संशयं कुरुते मनः ।अभिमानो ह्यहङ्कारश्चित्तं स्मरणकारणम्॥ इति स्कान्दे ॥ १५ ॥
एतावानेव संख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य हि ।सन्निवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः ॥ १६ ॥
'हरिस्तु निर्गुणं ब्रह्म श्रीर्ब्रह्म सगुणं स्मृता ।तदङ्गजानि तत्त्वनि तमात्तद्रूपमुच्यते॥ इति हरिवंशेषु ॥ १६ ॥
प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतो भयम् ।अहङ्कारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः ॥ १७ ॥
'पुरुषो हृदिस्थः परमः कालः सर्वगतो हरिः ।अथवा रुद्रदेहस्थो हरिः काल इतीरितः॥ इति ब्राह्मे ॥पौरुषं प्रभावम् । पुरुषस्य प्रकर्षेण भावं व्याप्तं रूपम् । एके सम्यग्ज्ञानिनः । अप्राकृताः ॥ १७ ॥
दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान् ।आधत्त वीर्यं साऽसूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम् ॥ २० ॥
'प्रकृतेः क्षोभकं रूपं दैवं नारायणात्मकम् ।प्रकृतौ महतः स्रष्टा परमः पुरुषो मतः ॥तदेव वासुदेवाख्यं महत्तत्त्वनियामकम् ।सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सूक्ष्माहङ्कारयामकः ॥स्थूलाहङ्कारनियमी विष्णुः प्रद्युमन्नामकः ।अनिरुद्धो मनस्तत्त्वनियन्ता भगवान् हरिः ॥महत्तत्त्वादिजीवास्तु ब्रह्मशेषाङ्गजास्तथा ।सूक्ष्मस्थूलविभेदेन कामजश्चानिरुद्धकः॥ इति कापिलेये ॥ २० ॥
विश्वमात्मगतं व्यञ्जन् कूटस्थो जगदङ्कुरः ।स्वतेजसाऽपिबत् तीव्रमात्मप्रस्वापनं तमः ॥ २१ ॥
'ओ रमयते यस्मात्केशवो जगदङ्कुरः ।महान्तं योऽसृजज्जीवमोहकं च तमोऽग्रसत्॥ इति च ॥ २१ ॥
यत् तत् सत्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवतः पदम् ।यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम् ॥ २२ ॥
यद्वासुदेवाख्यं भगवद्रूपं ततो महदात्मकं चित्तं जायते ।'सत्वशब्देन चोच्यन्ते पूर्णानन्दादयो गुणाः॥ इति च ।'महत्तत्त्वगतो योऽसौ वासुदेवाभिधो हरिः ।स चित्तजनकः प्रोक्तः प्राणिनां च पृथक्पृथक्॥ इति च ॥ २२ ॥
स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्त्वमिति चेतसः ।वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तं यथाऽपां प्रकृतिः परा ॥ २३ ॥
चित्तस्य स्वच्छत्वादयः पृथग्गुणा उच्यन्ते स्वच्छत्वमित्यादि ।'स्तिमितोदकचित्तादेरविकारोऽल्पवत्क्रिया। इति तत्त्वविवेके ।'वृत्तिः स्वभावो वृत्तं च स्थितिरित्यभिधीयते। इति शब्दनिर्णये ।वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तम्' इति स्वाभाविकं लक्षणमित्यर्थः ॥ २३ ॥
महत्तत्त्वाद् विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यसम्भवात् ।क्रियाशक्तिरहङ्कारस्त्रिविधः समपद्यत ॥ २४ ॥
'ज्ञानप्रधानस्तु महानहङ्कारः क्रियाधिकः ।इतरापेक्षया सोऽपि ज्ञानाधिक इतीरितः॥ इति च ॥ २४ ॥
वैकारिकोऽधिदैवं तु बुद्धिः प्राणश्च तैजसः ।तामसस्त्वर्थमात्रं च गुणव्यतिकरस्त्रिवृत् ॥ २६ ॥
'देवताधिकृतं यत्तदधिदैवमिति स्मृतम्। इति च ।वैकारिकोऽधिदैवमित्यादि पञ्चम्यर्थे ।'सप्तसु प्रथमातत्र स्वातन्त्र्यं यद्विवक्षितम् । इति शब्दनिर्णये ॥२६॥
सहस्रशिरसं साक्षाद् यमनन्तं प्रचक्षते ।संकर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम् ॥ २७ ॥
कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम् ।शान्तघोरविमूढत्वमिति वा स्यादहंकृतेः ॥ २८ ॥
'मनोरूपेण कर्तृत्वं देहरूपेण कार्यता ।इन्द्रियात्मतया चैव करणत्वमहङ्कृतेः ॥यतो मनस्यहंभावस्तस्मात्कर्तृ मनः स्मृतम् ।स्वभावकर्तुर्जीवस्य त्वासन्नोपाधि तद्यतः ॥कर्मज्ञाने करणता यतः करणमिन्द्रियम् ।कार्यं देहः समुद्दिष्ट उत्पाद्यत्वात्पुनःपुनः॥ इति तत्त्वविवेके ॥'शान्तरूपो देवपिता घोरः करणसृङ्मतः ।तावज्ज्ञानस्याप्रकाशान्मूढो भूतपिता स्मृतः ।त्रिरूपोऽयमहङ्कारः शेष इत्येव तं विदुः॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ २७-२८ ॥
तैजसात् तु विकुर्वाणाद् बुद्धितत्त्वमभूत् सति ।द्रव्यस्फुरणविज्ञानमिन्द्रियाणामनुग्रहात् ॥ ३१ ॥
संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च ।स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तितः पृथक् ॥ ३२ ॥
द्रव्यस्फुरणे यद्विशेषज्ञानम् ॥'सामान्यं मनसा जातं विशेषाद्बुद्धिजं भवेत्॥'अचलः संशयो बुद्धेश्चलो मानस उच्यते ।चञ्चला तु स्मृतिर्बुद्धेश्चित्तजैव स्थिरा स्मृतिः॥ इति च ॥'येन यज्ज्ञायते वस्तु तत्तल्लक्षणमुच्यते । तत्स्वरूपं पृथक्चेति द्विविधं कवयो विदुः॥ इति कापिलेये ॥ ३१,३२ ॥
तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः ।प्राणस्य हि क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता ॥ ३३ ॥
'प्रधानवायुः सूत्रात्मा महता सह जायते ।तैजसश्च खजः स्पर्श इत्याद्यास्तत्सुताः स्मृताः ।तदाविष्टा अन्यजीवास्तदाधाराश्च तद्बलाः। इति च ॥ ३३ ॥
तामसाच्च विकुर्वाणाद् भगवद्वीर्यचोदितात् ।शब्दमात्रमभूत् तस्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम् ॥ ३४ ॥
अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिङ्गत्वमेव च ।तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदुः ॥ ३५ ॥
अर्थाश्रयत्वम् अर्थविषयत्वम् ।'शब्देनैव यतो ज्ञेयो हरिर्लिङ्गं तु तस्य तत् ।स्पर्शाद्यभावात्तन्मात्रा नभसश्चेति कीर्त्यते ॥स्पर्शादयश्च तन्मात्रा इतरे पूर्वसंस्थितेः ।तिष्ठन्त्येको गुणो भूते प्रत्येकं पञ्चसु स्थितः ॥शब्दो वर्णात्मको नित्यो ध्वनिराकाशसम्भवः ।आकाश एव सूक्ष्मस्तु ध्वनिरित्येव शब्द्यते ॥स एव व्यज्यमानस्तु भवेत्कर्णैकगोचरः॥ इति च ॥ ३४,३५ ॥
नभसः शब्दतन्मात्रात् कालगत्या विकुर्वतः ।स्पर्शोऽभवत् ततो वायुस्त्वक् स्पर्शस्य च सङ्ग्रहः ॥ ३७ ॥
नभसः शब्दतन्मात्राच्छब्दतन्मात्रगुणात् ।'स्पर्शादयोऽपि वाय्वादेः सूक्ष्मावस्था प्रकीर्तिताइति च ।'सूक्ष्मेन्द्रियाणि सन्त्येव स्युः स्थूलान्यप्यहङ्कृतेः ।भूतेभ्यश्चोपचीयन्ते पुनर्ब्रह्मशरीरतः॥ इति च ॥ ३७ ॥
चालनं व्यूहनं प्राप्तिर्नेतृत्वं द्रव्यशब्दयोः ।सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं वायोः कर्माभिलक्षणम् ॥ ३९ ॥
'प्राप्नोति वायुः सर्वं तु स्वत एव हरेस्तथा ।अतः प्राप्तिरिति प्राहुर्वायुं भूतपतिं प्रभुम् ।प्रधानवायुरन्येषु नित्याविष्टो यतस्ततः ।तद्गुणास्तेषु चोच्यन्ते नीचता नास्य तत्कृता॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ।'स्वरूपमपि कर्मेति विषयत्वादुदीर्यतेइति शब्दनिर्णये ॥ ३९ ॥
द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च ।तेजस्त्वं तेजसः साध्वि रूपमात्रस्य वृत्तयः ॥ ४१ ॥
व्यक्तिसंस्थात्वं व्यक्तत्वेन स्थितिः । गुणता प्रकाशत्वम् ।'आलोको गुण इत्येव प्रकाशश्चेति कथ्यते। इत्यभिधानम् ।'तेजस्त्वमथ चोग्रत्वं क्रौर्यमित्यपि चोच्यते। इत्यभिधानम् ॥ ४१ ॥
क्लेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राणनाप्ययनोन्दनम् ।तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः ॥ ४५ ॥
'उन्दनं बिन्दुभावः स्यात्स्यन्दनं स्रवणं स्मृतम्। इत्यभिधानम् ।पृथिव्यग्न्यपेक्षया भूयस्त्वं देहे ॥ ४५ ॥
भावनं ब्रह्मणः स्थानं धारणं सद्विशेषणम् ।सर्वसत्वगुणोद्भेदः पृथिवीवृत्तिलक्षणम् ॥ ४८ ॥
भावनमुत्पादकत्वम् ।'ब्रह्मस्थानं तु पृथिवी शरीरे ब्रह्मदर्शनात्। इति कापिलेये ।सद्विशेषणं विशेषेण व्यक्तत्वम् ।'असदव्यक्तनाम स्याद्व्यक्तं सदिति चोच्यते। इति ब्राह्मे ।सर्वसत्वगुणोद्भेदः शरीरे हि सर्वप्राणिनां गुणा व्यज्यन्ते संसारावस्थायाम् ।'शरीरं पार्थिवं ज्ञेयमिन्द्रियाण्यौदकानि तु ।तैजसः कोष्ठगो वह्निश्छिद्रमाकाशसम्भवम् ।प्राणा वायुमयाः सर्वे प्रत्येकं प्रञ्चधा पुनः॥ इति कापिलेये ॥४८॥
ततस्तेनानुविद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्योऽण्डमचेतनम् ।उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट् ॥ ५४ ॥
'अचेतनाद्यतस्त्वण्डाद् ब्रह्मा समजनि स्फुटम् ।अतो ब्रह्माण्डमित्याहुर्विराड् ब्रह्मा प्रकाशनात्॥ इति च ॥ ५४ ॥
हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट् ।पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरिः ॥ ६१ ॥
'यज्ञनामा तु देवोऽन्यो विज्ञेयः पाददेवता ।तदाविष्टो हरिर्नित्यं तमाहुः पाददैवतम् ।तस्येन्द्रियाभिमानित्वं कुतः पूर्णामलात्मनः॥ इति च ॥ ६१ ॥
अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम् ।मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरांपतिः ।
'चैत्योऽपि भगवान्विष्णुरन्तर्यामी चतुर्मुखात् ।स्वेच्छया व्यक्तिमगमत्ततोऽसौ ब्रह्मजः स्मृतः॥ इति च ॥ ६४ ॥
विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत् ततो विराट् ।नाडीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७० ॥
'यज्ञान्तस्थः स्वयं पादौ विशन्नोत्थापयद्धरिः ।शक्तोऽपि ब्रह्मवाय्वोस्तु बलज्ञप्त्यै जनार्दनः ।तत्स्थ उत्थापयामास ब्रह्मदेहं विशन्प्रभुः॥ इति च ॥ ७० ॥
बुद्ध्या ब्रह्माऽपि हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् ।रुद्रोऽभिमत्या हृदयं नोदतिष्ठत् ततो विराट् ॥ ७२ ॥
ब्रह्मा बृहस्पतिः ।'यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति। इति श्रुतिः ।'बृहस्पतिः पुरोधाश्च ब्रह्मा च ब्रह्मणस्पतिः। इत्यभिधानम् ॥ ७२ ॥
चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद् यदा ।विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥ ७३ ॥
'अंशेन सुप्तो ब्रह्माऽपि अंशेन निरगात्तथा ।स्वदेहाद्वायुसहितो विष्णुना च जगत्प्रभुः ॥तमुत्थापयितुं देवास्तानृते त्रीन्महाबलान् ।नाशक्नुवुन् एकसंस्थास्ततस्ते त्वविशंस्त्रयः ॥उदतिष्ठद्ब्रह्मदेहस्तदा तेषां प्राभावतः ।विशेषेण हरेरेव प्राभावेन श्रियः पतेः ॥चित्ताभिमानी ब्रह्मैव क्षेत्रज्ञस्तद्गतो हरिः ।प्रणो वायुरिति प्रक्तस्तयोरीशो हरिः स्वयम्॥ इति च ॥ ७३ ॥