Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S25: Difference between revisions
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'मालिनी शालिनी काल्या चार्या भार्येति चोच्यते''। इति च ॥१॥ | |||
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'नावतारेष्वपि हरेर्देहः शुक्लादिसम्भवः ।तथापि शुक्लसंस्थः सन्मातृदेहं प्रविश्य च ॥विलाप्य शुक्लं तत्रैव केवलज्ञानरूपकः ।उदेति भगवान्विष्णुः काले लोकं विमोहयन्''॥ इति महावाराहे ॥अग्निरिव दारुणीति व्यक्तिस्थानमात्रत्वे दृष्टान्तः ॥ ६ ॥ | |||
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'महागुणाभिपूर्णत्वं सत्वमित्युच्यते बुधैः''।इति वामने ॥ १० ॥ | |||
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'सम्यग्ज्ञानं तु साङ्ख्यं स्यात् तदर्थो योग उच्यते''।इति कापिलेये ॥ १९ ॥ | |||
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'युगत्रयावतारेण त्रियुगश्चेति कथ्यते''। इति पाद्मे ॥ २६ ॥ | |||
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यानि यानि ब्रह्मादिरूपाणि रोचन्ते स्वजनानां तान्येव ते व्यक्त्यर्थमभिरूपाणि ।'व्यक्तो भवेद्धरिस्तत्र यत्स्थानं रुचितं सताम्''। इति कौर्मे ॥ ३१ ॥ | |||
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'वेदैर्वृतत्वाद्भगवांस्त्रिवृदित्युच्यते बुधैः''। इति च ॥ ३३ ॥ | |||
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सत्यलौकिके यथार्थज्ञानविषये ।'आभासो ज्ञानमालोको लोको भासश्च कथ्यत''। इत्यभिधानम् ॥३५॥ | |||
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विश्वमेतदेतादृशं असारं यतः । अत ईश्वरं विज्ञाय । नाऽख्यात्युपप्लवः दुःखाज्ञानाद्युपद्रवो न ॥ ४० ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'भूतगर्भश्च भूतस्थः पूर्ण एवं द्विरूपवान् ।अत आत्मेति तं प्राहुः सदैवाप्तगुणो यतः''॥ इति च ॥ ४६-४७ ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
पञ्चविंशोऽध्यायः
मैत्रेय उवाच–निर्वेदवादिनीमेवं मनोर्दुहितरं मुनिः ।
'मालिनी शालिनी काल्या चार्या भार्येति चोच्यते। इति च ॥१॥
तस्यां बहुतिथे काले भगवान् मधुसूदनः ।कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेऽग्निरिव दारुणि ॥ ६ ॥
'नावतारेष्वपि हरेर्देहः शुक्लादिसम्भवः ।तथापि शुक्लसंस्थः सन्मातृदेहं प्रविश्य च ॥विलाप्य शुक्लं तत्रैव केवलज्ञानरूपकः ।उदेति भगवान्विष्णुः काले लोकं विमोहयन्॥ इति महावाराहे ॥अग्निरिव दारुणीति व्यक्तिस्थानमात्रत्वे दृष्टान्तः ॥ ६ ॥
भगवन्तं परं ब्रह्म सत्त्वेनांशेन शत्रुहन् ।तत्त्वसंख्यानविज्ञप्त्यै जातं विद्वानजः स्वराट् ॥ १० ॥
'महागुणाभिपूर्णत्वं सत्वमित्युच्यते बुधैः।इति वामने ॥ १० ॥
अयं सिद्धगणाधीशः साङ्ख्याचार्यैः सुसम्मतः ।लोके कपिल इत्याख्यां गन्ता ते कीर्तिवर्धनः ॥ १९ ॥
'सम्यग्ज्ञानं तु साङ्ख्यं स्यात् तदर्थो योग उच्यते।इति कापिलेये ॥ १९ ॥
स चावतीर्णं त्रियुगमाज्ञाय विबुधर्षभम् ।विविक्त उपसङ्गम्य प्रणम्य समभाषत ॥ २६ ॥
'युगत्रयावतारेण त्रियुगश्चेति कथ्यते। इति पाद्मे ॥ २६ ॥
तान्येव तेऽभिरूपाणि रूपाणि भगवंस्तव ।यानि यानीह रोचन्ते स्वजनानामरूपिणः ॥ ३१ ॥
यानि यानि ब्रह्मादिरूपाणि रोचन्ते स्वजनानां तान्येव ते व्यक्त्यर्थमभिरूपाणि ।'व्यक्तो भवेद्धरिस्तत्र यत्स्थानं रुचितं सताम्। इति कौर्मे ॥ ३१ ॥
परं प्रधानं पुरुषं महान्तं कालं कविं त्रिवृतं लोकपालम् ।आत्मानुभूत्यानुगतप्रपञ्चं स्वच्छन्दशक्तिं कपिलं प्रपद्ये ॥३३॥
'वेदैर्वृतत्वाद्भगवांस्त्रिवृदित्युच्यते बुधैः। इति च ॥ ३३ ॥
श्री भगवानुवाच–मया प्रोक्तं हि लोकस्य प्रमाणं सत्यलौकिके ।
सत्यलौकिके यथार्थज्ञानविषये ।'आभासो ज्ञानमालोको लोको भासश्च कथ्यत। इत्यभिधानम् ॥३५॥
विश्वमेतद्धि शास्त्रेण विज्ञायात्मानमीश्वरम् ।मुनिः शान्तमनोवाक्यस्तदा नाऽख्यात्युपप्लवः ॥ ४० ॥
विश्वमेतदेतादृशं असारं यतः । अत ईश्वरं विज्ञाय । नाऽख्यात्युपप्लवः दुःखाज्ञानाद्युपद्रवो न ॥ ४० ॥
निरहङ्कृतिर्निर्ममश्च निर्द्वन्द्वः समदृक् स्वदृक् ।प्रत्यग्रः शान्तधीर्धीरः प्रशान्तोर्मिरिवोदधिः ॥ ४५ ॥
'अनन्याधीनशक्तित्वाद्धरिः स्व इति चोच्यते। इति मात्स्ये ।प्रत्यग्रः प्रत्यग्रतिः ॥ ४५ ॥
आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चात्मनि ॥ ४६ ॥
वासुदेवे भगवति सर्वज्ञे प्रत्यगात्मनि ।परेण भक्तिभावेन लब्धात्मा मुक्तबन्धनः ॥ ४७ ॥
'भूतगर्भश्च भूतस्थः पूर्ण एवं द्विरूपवान् ।अत आत्मेति तं प्राहुः सदैवाप्तगुणो यतः॥ इति च ॥ ४६-४७ ॥