Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S17: Difference between revisions
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== सप्तदशोऽध्यायः == | == सप्तदशोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = तद् वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे । | |||
| verse_line2 = तद्ध्येवात्मकृतं मन्ये यत् स्वपुंभिरसत्कृताः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः | |||
| verse_line2 = सद्यः पुनाति जगदाश्वपचं विकुण्ठः । | |||
| verse_line3 = सोऽहं भवद्भ्य उपलब्धसुतीर्थकीर्ति- | |||
| verse_line4 = श्छिन्द्यां स्वबाहुमपि वः प्रतिकूलवृत्तिम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणोः | |||
| verse_line2 = सद्यः क्षताखिलमलं प्रतिलब्धशीलम् । | |||
| verse_line3 = न श्रीर्विरक्तमपि मां विजहाति यस्याः | |||
| verse_line4 = प््रोक्षालवार्थमितरे नियमोऽर्हते मत् ॥ ७ ॥ | |||
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'सर्वोत्तमोऽपि भगवान्विप्रादेः पूजनाय तु ।गुणलब्धिं ततो ब्रूते नित्यपूर्णगुणोऽपि सन् ॥ब्रूयुश्चान्ये क्वचित्तत्तु तदुक्तेरनुसारतः ।उपादत्ते वरांश्चापि लोकानां मोहनाय च''॥ इति कौर्मे ॥विप्राणां चरणपद्मपवित्ररेणोः सेवया प्रतिलब्धशीलं श्रीर्न जहातीति यत् । अतश्छिन्द्याम् ।'अनुक्ताश्च गुणा विष्णोरुक्ता दोषा न तस्य तु ।अज्ञानाद्दोषविज्ञानं गुणज्ञानं यथार्थतः''॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ॥'विप्राणां चापि भक्तानामन्येषां च जनार्दनः ।ब्रह्मणः शङ्कराद्वापि देवताभ्यस्तथैव च ॥आत्मनश्च श्रियश्चैव सकाशात्प््रिायतामपि ।पूज्यतामत्ययुक्तं च वदेत्क्वापि विमोहयन्''॥ इति स्कान्दे ॥ ४-७ ॥ | |||
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| verse_line1 = ब्रह्मोवाच– | |||
| verse_line2 = अथ तस्योशतीं देवीमृषिकुल्यां सरस्वतीम् । | |||
| verse_line3 = आस्वाद्य मन्युदष्टानां तेषामात्माऽप्यतृप्यत ॥ १३ ॥ | |||
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देवीं द्योतमानाम् । ऋषिकुल्याम् ऋषिकुलस्तुतिपराम् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् । | |||
| verse_line2 = प्रचुः प्रञ्जलयो विप्र प्राहृष्टाः कम्पितत्वचः ॥ १५ ॥ | |||
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'तद्भ्रूविजृम्भः परमेष्ठिधिष्ण्यम्''॥ इत्युक्तम् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव । | |||
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धर्मस्यापि दुर्ज्ञेयः ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै- | |||
| verse_line2 = रर्थार्थिभिः स्वशिरसा धृतपादरेणुः । | |||
| verse_line3 = धन्यार्पिताङ्घ्रितुलसीनवदामधाम्नो | |||
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मधुव्रतपतेः सारग्राहिणां पतेः । अङ्घ्रिस्थतुलसीलोकं स्थानमुरसि स्थिताऽपि स्पर्धयेव कामयाना । 'लब्ध्वाऽपि वक्षसि पदम्''। इति च ॥ २० ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानां | |||
| verse_line2 = नात्याद्रियत् परमभागवतप्रसङ्गः । | |||
| verse_line3 = स त्वं द्विजानुपथपुण्यरजःपुनीतिः | |||
| verse_line4 = श्रीवत्सलक्ष्म किमगा भगभाजनत्वम् ॥ २१ ॥ | |||
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परमभागवतत्वेन तस्यामत्यादरः । न तु कामात् ।'हरिभक्तिर्हरेः प्रीतिर्ज्ञानानन्दादयो गुणाः ।अधिकारे च मुक्तौ च ब्रह्मवाय्वोश्च तत्स्त्रियोः ॥शेषवीन्द्रहराणां च तत्स्त्रीणां वासवादिनाम् ।यथाक्रमं तु विज्ञेया भूमौ कारणतोऽन्यथा ॥देहस्य लक्षणं चैव भूमावप्यन्यथा भवेत् ।ब्रह्मादिषु क्रमेणैव नित्यं स्याद्देहलक्षणम् ॥श्रियोऽधिका गुणाः सर्वे सर्वेभ्यो नियमेन तु ।उक्ताश्चैवाप्यनुक्ताश्च ततो विष्णोर्न संशयः''॥इति तत्त्वनिर्णये ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैः | |||
| verse_line2 = पद्भिश्चराचरमिदं द्विजदेवतार्थम् । | |||
| verse_line3 = नूनं भृतं तदभिघातिरजस्तमश्च | |||
| verse_line4 = सत्त्वेन नो वरदया तनुवा निरस्य ॥ २२ ॥ | |||
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'धारणाद् भगवान् धर्मो यमनाद् यम उच्यते''। इति शब्दनिर्णये ।'अनन्तासनवैकुण्ठक्षीरसागरगैस्त्रिभिः ।रक्षां करोति भगवान्कपिलः सत्ववर्धनात् ।असत्वोऽपि रजश्चैव तमश्चापि निरस्य तु''॥ इति मूर्तिभेदे ॥'कपिलो वरदश्चैव विकलश्चेति कथ्यते''इति च ।अतः सत्वस्य कारणत्वमात्रं कपिलो वरदा तनुः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपं | |||
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| verse_line3 = तर्ह्येव नङ्क्षयति शिवस्तव देव पन्थाः | |||
| verse_line4 = लोकोऽग्रहीष्यदृषभस्य हि यत् प्रमाणम् ॥ २३ ॥ | |||
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आत्मैव गोपो गोपको यस्य तदात्मगोपम् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_line4 = स्तेजःक्षतिस्त्ववनतस्य स ते विनोदः ॥ २४ ॥ | |||
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'असुरा अप््रिायाश्चापि नित्यानन्दान्न लोकवत् ।निषेध्यबुद्धिविषयमप््रिायं हि हरेर्मतम्''॥ इति च ।तस्मादनभीष्टमिव ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line2 = एतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्यः | |||
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| verse_line5 = शापो मयैव विहितस्तदवैत विप्र ॥ २६ ॥ | |||
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'अन्तर्भक्ता बहिःक्रुद्धा हिरण्याद्या हरिं प्रति ।सर्वक्रुद्धाः शम्बराद्या अन्तः क्रोधवशास्तथा''॥ इति च ॥ २६ ॥ | |||
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'स्वरूपश्रीस्तथा भार्या द्वेधा श्रीस्तु हरेर्मता''। इति च ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् । | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'अन्तर्भक्ता बहिर्वैरा हिरण्याद्या हरेर्मताः ।तत्र भक्त्याऽभवन्पूता द्वेष आवेशकान्गतः ॥ब्रह्मजा असुरा ये तु विष्णोः पार्षदतां गताः ।बल्याद्याश्च हरेर्द्वेषमन्तः कृत्वा तमोगताः''॥ इति च ॥तस्मात् संरम्भोऽल्पफलः कथ्यत एव । भक्तियोग एव ब्रह्महेलन-निस्तारकः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
सप्तदशोऽध्यायः
तद् वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे ।तद्ध्येवात्मकृतं मन्ये यत् स्वपुंभिरसत्कृताः ॥ ४ ॥
यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहःसद्यः पुनाति जगदाश्वपचं विकुण्ठः ।
यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणोःसद्यः क्षताखिलमलं प्रतिलब्धशीलम् ।
'सर्वोत्तमोऽपि भगवान्विप्रादेः पूजनाय तु ।गुणलब्धिं ततो ब्रूते नित्यपूर्णगुणोऽपि सन् ॥ब्रूयुश्चान्ये क्वचित्तत्तु तदुक्तेरनुसारतः ।उपादत्ते वरांश्चापि लोकानां मोहनाय च॥ इति कौर्मे ॥विप्राणां चरणपद्मपवित्ररेणोः सेवया प्रतिलब्धशीलं श्रीर्न जहातीति यत् । अतश्छिन्द्याम् ।'अनुक्ताश्च गुणा विष्णोरुक्ता दोषा न तस्य तु ।अज्ञानाद्दोषविज्ञानं गुणज्ञानं यथार्थतः॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ॥'विप्राणां चापि भक्तानामन्येषां च जनार्दनः ।ब्रह्मणः शङ्कराद्वापि देवताभ्यस्तथैव च ॥आत्मनश्च श्रियश्चैव सकाशात्प््रिायतामपि ।पूज्यतामत्ययुक्तं च वदेत्क्वापि विमोहयन्॥ इति स्कान्दे ॥ ४-७ ॥
ब्रह्मोवाच–अथ तस्योशतीं देवीमृषिकुल्यां सरस्वतीम् ।
देवीं द्योतमानाम् । ऋषिकुल्याम् ऋषिकुलस्तुतिपराम् ॥ १३ ॥
ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् ।प्रचुः प्रञ्जलयो विप्र प्राहृष्टाः कम्पितत्वचः ॥ १५ ॥
'तद्भ्रूविजृम्भः परमेष्ठिधिष्ण्यम्॥ इत्युक्तम् ॥ १५ ॥
त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव ।धर्मस्य परमो गुह्यो निर्विकारो भवान् मतः ॥ १८ ॥
धर्मस्यापि दुर्ज्ञेयः ॥ १८ ॥
यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै-रर्थार्थिभिः स्वशिरसा धृतपादरेणुः ।
मधुव्रतपतेः सारग्राहिणां पतेः । अङ्घ्रिस्थतुलसीलोकं स्थानमुरसि स्थिताऽपि स्पर्धयेव कामयाना । 'लब्ध्वाऽपि वक्षसि पदम्। इति च ॥ २० ॥
यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानांनात्याद्रियत् परमभागवतप्रसङ्गः ।
परमभागवतत्वेन तस्यामत्यादरः । न तु कामात् ।'हरिभक्तिर्हरेः प्रीतिर्ज्ञानानन्दादयो गुणाः ।अधिकारे च मुक्तौ च ब्रह्मवाय्वोश्च तत्स्त्रियोः ॥शेषवीन्द्रहराणां च तत्स्त्रीणां वासवादिनाम् ।यथाक्रमं तु विज्ञेया भूमौ कारणतोऽन्यथा ॥देहस्य लक्षणं चैव भूमावप्यन्यथा भवेत् ।ब्रह्मादिषु क्रमेणैव नित्यं स्याद्देहलक्षणम् ॥श्रियोऽधिका गुणाः सर्वे सर्वेभ्यो नियमेन तु ।उक्ताश्चैवाप्यनुक्ताश्च ततो विष्णोर्न संशयः॥इति तत्त्वनिर्णये ॥ २१ ॥
धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैःपद्भिश्चराचरमिदं द्विजदेवतार्थम् ।
'धारणाद् भगवान् धर्मो यमनाद् यम उच्यते। इति शब्दनिर्णये ।'अनन्तासनवैकुण्ठक्षीरसागरगैस्त्रिभिः ।रक्षां करोति भगवान्कपिलः सत्ववर्धनात् ।असत्वोऽपि रजश्चैव तमश्चापि निरस्य तु॥ इति मूर्तिभेदे ॥'कपिलो वरदश्चैव विकलश्चेति कथ्यतेइति च ।अतः सत्वस्य कारणत्वमात्रं कपिलो वरदा तनुः ॥ २२ ॥
न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपंगोप्ता वृष स्वर्हणेन सुसूनृतेन ।
आत्मैव गोपो गोपको यस्य तदात्मगोपम् ॥ २३ ॥
तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोःक्षेमं जनाय निजशक्तिभिरुद्धृतारेः ।
'असुरा अप््रिायाश्चापि नित्यानन्दान्न लोकवत् ।निषेध्यबुद्धिविषयमप््रिायं हि हरेर्मतम्॥ इति च ।तस्मादनभीष्टमिव ॥ २४ ॥
भगवानुवाच–एतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्यः
'अन्तर्भक्ता बहिःक्रुद्धा हिरण्याद्या हरिं प्रति ।सर्वक्रुद्धाः शम्बराद्या अन्तः क्रोधवशास्तथा॥ इति च ॥ २६ ॥
ब्रह्मोवाच–भगवन्तं परिक्रम्य प्रणिपत्यानुमान्य च ।
'स्वरूपश्रीस्तथा भार्या द्वेधा श्रीस्तु हरेर्मता। इति च ॥ २८ ॥
मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् ।प्रत्येष्यतं निकाशं मे कालेनाल्पीयसा पुनः ॥ ३१ ॥
'अन्तर्भक्ता बहिर्वैरा हिरण्याद्या हरेर्मताः ।तत्र भक्त्याऽभवन्पूता द्वेष आवेशकान्गतः ॥ब्रह्मजा असुरा ये तु विष्णोः पार्षदतां गताः ।बल्याद्याश्च हरेर्द्वेषमन्तः कृत्वा तमोगताः॥ इति च ॥तस्मात् संरम्भोऽल्पफलः कथ्यत एव । भक्तियोग एव ब्रह्महेलन-निस्तारकः ॥ ३१ ॥