Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S6: Difference between revisions
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== सप्तमोऽध्यायः == | == सप्तमोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = जातो रुचेरजनयत्सुयशाः सुयज्ञः | |||
| verse_line2 = आकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् । | |||
| verse_line3 = लोकत्रयस्य महतीमहरद्य आर्तिं | |||
| verse_line4 = स्वायम्भुवेन मनुना हरिरित्यनूक्तः ॥ २ ॥ | |||
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'क्रियाभिमानाद्यज्ञोऽसाविन्द्रसूनुः प्रकीर्तितः ।यज्ञेशत्वात्स्वयं विष्णुर्यज्ञो रुचिसुतः स्मृतः''॥ इति पाद्मे ।हरिरिति ज्ञात्वेशावास्यमित्यादिनाऽनूक्तः ।'त्रयी श्रुतिर्नित्यवाक्च वेदोऽनुवचनं तथा''॥ इति ह्यभिधानम् ॥२॥ | |||
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| verse_line1 = अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टो | |||
| verse_line2 = दत्तो मयाहमिति यद्भगवान्स दत्तः । | |||
| verse_line3 = यत्पादपङ्कजपरागपवित्रदेहा | |||
| verse_line4 = योगर्धिमापुरमयीं यदुहैहयाद्याः ॥ ४ ॥ | |||
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अमयीं विष्णुप्रधानाम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे | |||
| verse_line2 = आदौ सनात्सुतपसस्तपतः स नोऽभूत् । | |||
| verse_line3 = प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्वं | |||
| verse_line4 = सम्यग्जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥ ५ ॥ | |||
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मे तपतः सतः । सः नः अर्थे । सनात् पूर्वम् ।'ब्रह्मणस्तपतः पूर्वं विष्णुर्जात उरुक्रमः ।सर्वलोकहितार्थाय येन रूपं प्रकाशितम् ।यश्च पाति सदा लोकानजितो जयतां वरः ।तस्माद्रुद्रः समुत्पन्नः सर्वसंहारकृद्विभुः ।एते त्रिपुरुषाः प्रोक्ताः सृष्टिस्थित्यन्तकारिणः ।निमित्तमात्रं तौ देवौ विष्णुः सर्वस्य कारणम्''॥ इति स्कान्दे ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या | |||
| verse_line2 = नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । | |||
| verse_line3 = दृष्टात्मनो भगवतो नियमावलोपं | |||
| verse_line4 = देव्यस्त्वनङ्गपृतना घटितुं न शेकुः ॥ ६ ॥ | |||
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'नरो नारायणश्चैव हरिः कृष्णस्तथैव च ।चत्वारो धर्मतनया हरिरेव त्रयो मतः ॥अनन्तो नरनामाऽत्र तस्मिंस्तु नरनामवान् ।विशेषेण स्वयं विष्णुर्निवसत्यम्बुजेक्षणः । ।तस्माच्चतुर्धा धर्मस्य जातो विष्णुरितीरितः''॥ इति षाड्गुण्ये ॥६॥ | |||
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| verse_line1 = विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञो | |||
| verse_line2 = बालोऽपि सन्नपगतस्तपसे वनाय । | |||
| verse_line3 = तस्मा अदाद्ध्रुवगतिं गृणते प्रसन्नो | |||
| verse_line4 = दिव्याः स्तुवन्ति मुनयो यदुपर्यधस्तात् ॥ ८ ॥ | |||
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'अवतारो महाविष्णोर्वासुदेव इतीरितः ।यो ध्रुवाय निजं प्रादात्स्थानमन्यानधिष्ठितम्''॥इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र- | |||
| verse_line2 = निष्पिष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् । | |||
| verse_line3 = ज्ञात्वार्थितो जगति पुत्रपदञ्च लेभे | |||
| verse_line4 = दुग्धा वसूनि वसुधा सकलानि येन ॥ ९ ॥ | |||
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'पृथुर्नाम महाराजस्तत्र विष्णुः स्वयं प्रभुः ।पृथुनामा चतुर्बाहुः प्रविष्टस्तेन चार्थितः''॥इति महासंहितायाम् ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनुः | |||
| verse_line2 = यो वै चचार समदृग् हृदि योगचर्याम् । | |||
| verse_line3 = यत्पारमहंस्यमृषयः पदमामनन्ति | |||
| verse_line4 = स्वस्थः प्रशान्तकरणः परिमुक्तसङ्गः ॥ १० ॥ | |||
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यद्रूपं परमहंसप्राप्यं पदमामनन्ति ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = सत्रे ममास भगवान्हयशीर्ष एषः | |||
| verse_line2 = साक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः । | |||
| verse_line3 = छन्दोमयो मखमयोऽखिलदेवतात्मा | |||
| verse_line4 = वाचो बभूवुरुशतीः श्वसतोऽस्य नस्तः ॥ ११ ॥ | |||
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'छन्दांसि च मखाश्चैव देवा लोकाश्च सर्वशः ।सर्वे विष्णौ स्थिता यस्मादतः सर्वमयो ह्यसौ''॥इति महासंहितायाम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_line1 = मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः | |||
| verse_line2 = क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः । | |||
| verse_line3 = विस्रंसितानुरुभये सलिले मुखान्मे | |||
| verse_line4 = आदाय तत्र विजहार ह वेदमार्गान् ॥ १२ ॥ | |||
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क्षोणीमयनौकाश्रयत्वात् क्षोणीमयः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_line1 = स्मृत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयः | |||
| verse_line2 = चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः । | |||
| verse_line3 = चक्रेण नक्रवदनं विनिपाट्य तस्मात् | |||
| verse_line4 = हस्ते प्रगृह्य भगवान्कृपयोज्जहार ॥ १६ ॥ | |||
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'हरिस्तापसनामाऽसौ जातस्तपसि वै मनुः ।गजेन्द्रं मोचयामास ससर्ज च जगद्विभुः ॥''इति मात्स्ये ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_line1 = नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम् | |||
| verse_line2 = अम्भः शिवं धृतवतो विबुधाधिपत्यम् । | |||
| verse_line3 = यो वै प्रतिश्रुतमृतेऽपि च शीर्षमाणं | |||
| verse_line4 = आत्मन्यमङ्ग मनसा हरयेऽभिमेने ॥ १८ ॥ | |||
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'ऐन्द्रं पदं नान्तरीयं फलं तु हरितोषणम् ।जगद्दातुर्बलेर्यस्मादानन्दोद्रिक्तता भवेत्''॥ इति ब्रह्मतर्के ।शीर्षाख्यं मानम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = तुभ्यञ्च नारदभृशं भगवान्वि- | |||
| verse_line2 = वृद्धभावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् । | |||
| verse_line3 = ज्ञानञ्च भागवतमात्मसुतत्वदीपं | |||
| verse_line4 = यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैव ॥ १९ ॥ | |||
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'ऐतरेयो हरिः प्राह नारदाय स्वकां तनुम् ।यत्प्रापुर्वैष्णवा नान्ये यदृते न सुखं परम्''॥ इति ब्राह्मे ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_line1 = चक्रञ्च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो | |||
| verse_line2 = मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति । | |||
| verse_line3 = दुष्टेषु राजसु दमं विदधत्स्वकीर्तिं | |||
| verse_line4 = सत्ये निविष्ट उशतीं प्रथयंश्चरित्रैः ॥ २० ॥ | |||
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'मन्वन्तरेषु भगवान् चक्रवर्तिषु संस्थितः ।चतुर्भुजो जुगोपैतद्दुष्टराजन्यनाशकः ॥राजराजेश्वरेत्याहुर्मुनयश्चक्रवर्तिनाम् ।वीर्यदं परमात्मानं शङ्खचक्रगदाधरम्''॥ इति सत्यसंहितायाम् ॥२०॥ | |||
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| verse_line1 = कृत्स्नप्रसादसुमुखः कलया कलेशः | |||
| verse_line2 = इक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे । | |||
| verse_line3 = तिष्ठन्वनं सदयितानुज आविवेश | |||
| verse_line4 = यस्मिन्विरुध्य दशकन्धर आर्तिमार्च्छत् ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो | |||
| verse_line2 = मार्गं सपद्यरिपुरं हरवद्दिधक्षोः । | |||
| verse_line3 = दूरेसुहृन्मथितरोषसुशोषदृष्ट्या | |||
| verse_line4 = तातप्यमानमकरोरगनक्रचक्रः ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह- | |||
| verse_line2 = दन्तैर्विलम्बितककुब्जयरूढहासः । | |||
| verse_line3 = सद्योऽसुभिः सह विनेष्यति दारहर्तुः | |||
| verse_line4 = विस्फूर्जितैर्धनुष उच्चरितैः ससैन्यः ॥ २५ ॥ | |||
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| text = | |||
प्राणादिकलेशः । दूरस्था सुहृद्यस्य भगवतः स दूरेसुहृत् । सुशोषो अग्निः ।'अग्निः सुशोषः कक्षघ्नस्तिमिरारिर्हिरण्यदः''। इति ह्यभिधाने ।विनेष्यति विनाशम् एष्यति । दारहर्तुः भगवतः ॥'धनुर्विस्फूर्जितैर्नष्टो रावणः पूर्वमेव तु ।पुनः शरै राममुक्तैः सानुबन्धो विनेश्यति''॥ इति स्कान्दे ॥२३-२५ ॥ | |||
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| verse_line1 = भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः | |||
| verse_line2 = क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः । | |||
| verse_line3 = जातः करिष्यति जनानुपलक्ष्यमार्गः | |||
| verse_line4 = कर्माणि चात्ममहिमोपनिबन्धनानि ॥ २६ ॥ | |||
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| text = | |||
'राम एको ह्यनन्तांशस्तत्र रामाभिधो हरिः ।शुक्लकेशात्मकस्तिष्ठन् रमयामास वै जगत्''॥ इति ब्राह्मे ।'विष्णोर्नान्येन कर्माणि परेषां तन्निबन्धनम्''॥ इति मात्स्ये ॥२६॥ | |||
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| verse_line1 = तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाः | |||
| verse_line2 = त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः । | |||
| verse_line3 = यद्रिङ्गताऽन्तरगतेन दिविस्पृशोर्वा | |||
| verse_line4 = उन्मूलनन्त्वितरथाऽर्जुनयोर्न भाव्यम् ॥ २७ ॥ | |||
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| text = | |||
'सहस्रधनुषस्तूर्ध्वं द्युशब्देनापि भण्यते''। इति तन्त्रमालायाम् ।इतरथा विष्णुर्न चेत् । स्वमहिमनिबन्धनत्वेन न भाव्यम् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_line1 = तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं | |||
| verse_line2 = दावाग्निनाऽऽशु विपिने परिदह्यमाने । | |||
| verse_line3 = उन्नेष्यति व्रजमितोऽवसितान्तकालं | |||
| verse_line4 = नेत्रे पिधाय्य सबलोऽनधिगम्यवीर्यः ॥ २९ ॥ | |||
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अन्येषां स्तुत्यमेव यत्तस्य तच्च दिव्यमिव ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_line1 = नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात् | |||
| verse_line2 = गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च । | |||
| verse_line3 = जल्प्यावृतं निशि शयानमतिश्रमेण | |||
| verse_line4 = लोके विकुण्ठ उपधास्यति गोकुलं सः ॥ ३१ ॥ | |||
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'अन्यथाज्ञानहेतुर्या वाक् सा जल्पिः प्रकीर्तिता''॥इति तन्त्रमालायाम् ॥'यत्तु सर्वात्मनाऽज्ञानं निशा सा परिकीर्तिता''॥ इति कौर्मे ॥३१॥ | |||
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| verse_line1 = क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां | |||
| verse_line2 = रासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन । | |||
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| verse_line4 = हर्तुर्हरिष्यति शिरो धनदानुगस्य ॥ ३३ ॥ | |||
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कलपदं च आयतं च ।'सप्तस्वरसमाहारो मूर्च्छनेति प्रकीर्तिता''॥ इति गान्धर्वे ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_line1 = ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट- | |||
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| verse_line4 = सप्तोक्षशंबरविडूरथरुग्मिमुख्याः ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाः | |||
| verse_line2 = काम्भोजमत्स्यकुरुसृञ्जयकैकयार्णाः । | |||
| verse_line3 = यास्यन्त्यदर्शनमिता बलपार्थभीम- | |||
| verse_line4 = व्याजाह्वयेन हरिणा निलयं तदीयम् ॥ ३५ ॥ | |||
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'विद्वेषिणोऽप्युदासीना भक्ता अपि न संशयः ।हरेर्हि सदनं यान्ति व्यक्तं भक्तैस्तु गम्यते ॥आरभ्य तम आमुक्तेः कृष्णस्य सदनं यतः ।अव्यक्तहरिलोकत्वादन्येषामन्यलोकता''॥ इति बृहत्संहितायाम् ॥'रामभीमार्जुनादीनि विष्णोर्नामानि सर्वशः ।रमणाभयवर्णाद्याः शब्दवृत्तेर्हि हेतवः ॥हरिर्हि तत्र तत्रस्थो रमणादीन्करोत्यजः ।अतस्तस्यैव नामानि व्याजादन्यगतानि तु ।व्यवहारप्रवृत्त्यर्थं दुष्टानां मोहनाय च''॥ इति स्कान्दे ॥ ३४-३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = कालेन मीलितदृशामवमृश्य नॄणां | |||
| verse_line2 = स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः । | |||
| verse_line3 = आविर्हितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यां | |||
| verse_line4 = वेदद्रुमं विटपशो विभजिष्यति स्म ॥ ३६ ॥ | |||
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'तृतीये सप्तमे चैव षोडशे पञ्चविंशके ।अष्टाविंशे युगे कृष्णः सत्यवत्यामजायत ।व्यासाचार्यस्तु पूर्वेषु चरमे स्वयमेव तु ।विव्यास वेदांश्चक्रे च भारतं वेदसंमितम्''॥ इति च ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_line1 = सर्गे तु योऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः | |||
| verse_line2 = स्थानेऽथ धर्ममखमन्वमरावनीशाः । | |||
| verse_line3 = अन्ते त्वधर्महरमन्युवशासुराद्याः | |||
| verse_line4 = मायाविभूतय इमाः पुरुशक्तिभाजः ॥ ३९ ॥ | |||
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'हरीच्छया विभूतिर्या ब्रह्मादीनां सदा भवेत् ।इच्छया वा बहुविधस्तेषु विष्णुः स्वयं स्थितः ।अतो मायाविभूतित्वं तेषां मत्स्यादिकाः स्वयम्"इत्यध्यात्मे ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_line1 = नान्तं विदाम्यहममी मुनयः प्रजेशाः | |||
| verse_line2 = मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये । | |||
| verse_line3 = गायन् गुणान्दशशतानन आदिदेवः | |||
| verse_line4 = शेषोऽधुनाऽपि समवस्यति नास्य पारम् ॥ ४१ ॥ | |||
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विदुः नान्तम् । अनन्तत्वात् ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_line1 = येषां स एव भगवान्दययेदनन्तः | |||
| verse_line2 = सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् । | |||
| verse_line3 = ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां | |||
| verse_line4 = नैषां ममाहमिति धीः श्वसृगालभक्ष्ये ॥ ४२ ॥ | |||
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देवमायां विदन्ति संसारमतितरन्ति च ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_line1 = ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां | |||
| verse_line2 = स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः । | |||
| verse_line3 = यद्यद्भुतक्रमपरायणशीलशिक्षाः | |||
| verse_line4 = तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥ ४६ ॥ | |||
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तत्परायणास्तच्छीलास्तच्छिक्षाश्च ॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_line1 = शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं | |||
| verse_line2 = शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्वम् । | |||
| verse_line3 = शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो | |||
| verse_line4 = माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना ॥ ४७ ॥ | |||
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'अव्यक्ताद्यनहंमानादात्मतत्त्वं हरिः स्मृतः ।अशब्दश्चाप्रसिद्धत्वाच्छान्तः पूर्णसुखत्वतः''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥४७॥ | |||
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| verse_line1 = स श्रेयसामपि विभुर्भगवान्यतोऽस्य | |||
| verse_line2 = भावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धः । | |||
| verse_line3 = देहे स्वधातुविगमे तु विशीर्यमाणे | |||
| verse_line4 = व्योमेव तत्र पुरुषो न विशीर्यतेऽजः ॥ ४९ ॥ | |||
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भावस्वभावो भक्तिस्वभावः । तेन निर्मितस्य सत्पुरुषस्य प्रसिद्धः ।'भावो भक्तिः प्रणामश्च प्रावण्यमपि चादरः''। इत्यभिधानात् ॥४९॥ | |||
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| verse_line1 = सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान्विश्वभावनः । | |||
| verse_line2 = समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात्सदसच्च यत् ॥ ५० ॥ | |||
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'सत्तादिर्यत्स्वतो विष्णोस्तस्मादन्यः स सर्वतः ।यत्सत्तादिरतोऽन्यस्य नान्यत्वं भेदिनोऽपि तु''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥५०॥ | |||
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| verse_line1 = नृजन्मनि न तुष्येत किं फलं यमनश्वरे । | |||
| verse_line2 = कृष्णे यद्यपवर्गेशे भक्तिः स्यान्नानपायिनी ॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_line1 = किं स्याद्वर्णाश्रमाचारैः किं दानैः किं तपःश्रुतैः । | |||
| verse_line2 = सर्वाघघ्नोत्तमश्लोके न चेद्भक्तिरधोक्षजे ॥ ५४ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥}} | |||
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| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'आक्षिप्यते किमित्येतद्यतोऽल्पफलता भवेत् ।वस्तुनो यस्य चाल्पत्वं पुंसो वा नेति चोच्यते''॥इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ५३,५४ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:33, 8 April 2026
सप्तमोऽध्यायः
जातो रुचेरजनयत्सुयशाः सुयज्ञःआकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् ।
'क्रियाभिमानाद्यज्ञोऽसाविन्द्रसूनुः प्रकीर्तितः ।यज्ञेशत्वात्स्वयं विष्णुर्यज्ञो रुचिसुतः स्मृतः॥ इति पाद्मे ।हरिरिति ज्ञात्वेशावास्यमित्यादिनाऽनूक्तः ।'त्रयी श्रुतिर्नित्यवाक्च वेदोऽनुवचनं तथा॥ इति ह्यभिधानम् ॥२॥
अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टोदत्तो मयाहमिति यद्भगवान्स दत्तः ।
अमयीं विष्णुप्रधानाम् ॥ ४ ॥
तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मेआदौ सनात्सुतपसस्तपतः स नोऽभूत् ।
मे तपतः सतः । सः नः अर्थे । सनात् पूर्वम् ।'ब्रह्मणस्तपतः पूर्वं विष्णुर्जात उरुक्रमः ।सर्वलोकहितार्थाय येन रूपं प्रकाशितम् ।यश्च पाति सदा लोकानजितो जयतां वरः ।तस्माद्रुद्रः समुत्पन्नः सर्वसंहारकृद्विभुः ।एते त्रिपुरुषाः प्रोक्ताः सृष्टिस्थित्यन्तकारिणः ।निमित्तमात्रं तौ देवौ विष्णुः सर्वस्य कारणम्॥ इति स्कान्दे ॥ ५ ॥
धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्यानारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः ।
'नरो नारायणश्चैव हरिः कृष्णस्तथैव च ।चत्वारो धर्मतनया हरिरेव त्रयो मतः ॥अनन्तो नरनामाऽत्र तस्मिंस्तु नरनामवान् ।विशेषेण स्वयं विष्णुर्निवसत्यम्बुजेक्षणः । ।तस्माच्चतुर्धा धर्मस्य जातो विष्णुरितीरितः॥ इति षाड्गुण्ये ॥६॥
विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञोबालोऽपि सन्नपगतस्तपसे वनाय ।
'अवतारो महाविष्णोर्वासुदेव इतीरितः ।यो ध्रुवाय निजं प्रादात्स्थानमन्यानधिष्ठितम्॥इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ८ ॥
यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र-निष्पिष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् ।
'पृथुर्नाम महाराजस्तत्र विष्णुः स्वयं प्रभुः ।पृथुनामा चतुर्बाहुः प्रविष्टस्तेन चार्थितः॥इति महासंहितायाम् ॥ ९ ॥
नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनुःयो वै चचार समदृग् हृदि योगचर्याम् ।
यद्रूपं परमहंसप्राप्यं पदमामनन्ति ॥ १० ॥
सत्रे ममास भगवान्हयशीर्ष एषःसाक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः ।
'छन्दांसि च मखाश्चैव देवा लोकाश्च सर्वशः ।सर्वे विष्णौ स्थिता यस्मादतः सर्वमयो ह्यसौ॥इति महासंहितायाम् ॥ ११ ॥
मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धःक्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः ।
क्षोणीमयनौकाश्रयत्वात् क्षोणीमयः ॥ १२ ॥
स्मृत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयःचक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः ।
'हरिस्तापसनामाऽसौ जातस्तपसि वै मनुः ।गजेन्द्रं मोचयामास ससर्ज च जगद्विभुः ॥इति मात्स्ये ॥ १६ ॥
नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम्अम्भः शिवं धृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।
'ऐन्द्रं पदं नान्तरीयं फलं तु हरितोषणम् ।जगद्दातुर्बलेर्यस्मादानन्दोद्रिक्तता भवेत्॥ इति ब्रह्मतर्के ।शीर्षाख्यं मानम् ॥ १८ ॥
तुभ्यञ्च नारदभृशं भगवान्वि-वृद्धभावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् ।
'ऐतरेयो हरिः प्राह नारदाय स्वकां तनुम् ।यत्प्रापुर्वैष्णवा नान्ये यदृते न सुखं परम्॥ इति ब्राह्मे ॥ १९ ॥
चक्रञ्च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजोमन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति ।
'मन्वन्तरेषु भगवान् चक्रवर्तिषु संस्थितः ।चतुर्भुजो जुगोपैतद्दुष्टराजन्यनाशकः ॥राजराजेश्वरेत्याहुर्मुनयश्चक्रवर्तिनाम् ।वीर्यदं परमात्मानं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ इति सत्यसंहितायाम् ॥२०॥
कृत्स्नप्रसादसुमुखः कलया कलेशःइक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे ।
यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपोमार्गं सपद्यरिपुरं हरवद्दिधक्षोः ।
वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह-दन्तैर्विलम्बितककुब्जयरूढहासः ।
प्राणादिकलेशः । दूरस्था सुहृद्यस्य भगवतः स दूरेसुहृत् । सुशोषो अग्निः ।'अग्निः सुशोषः कक्षघ्नस्तिमिरारिर्हिरण्यदः। इति ह्यभिधाने ।विनेष्यति विनाशम् एष्यति । दारहर्तुः भगवतः ॥'धनुर्विस्फूर्जितैर्नष्टो रावणः पूर्वमेव तु ।पुनः शरै राममुक्तैः सानुबन्धो विनेश्यति॥ इति स्कान्दे ॥२३-२५ ॥
भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाःक्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः ।
'राम एको ह्यनन्तांशस्तत्र रामाभिधो हरिः ।शुक्लकेशात्मकस्तिष्ठन् रमयामास वै जगत्॥ इति ब्राह्मे ।'विष्णोर्नान्येन कर्माणि परेषां तन्निबन्धनम्॥ इति मात्स्ये ॥२६॥
तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाःत्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः ।
'सहस्रधनुषस्तूर्ध्वं द्युशब्देनापि भण्यते। इति तन्त्रमालायाम् ।इतरथा विष्णुर्न चेत् । स्वमहिमनिबन्धनत्वेन न भाव्यम् ॥ २७ ॥
तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानंदावाग्निनाऽऽशु विपिने परिदह्यमाने ।
अन्येषां स्तुत्यमेव यत्तस्य तच्च दिव्यमिव ॥ २९ ॥
नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात्गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च ।
'अन्यथाज्ञानहेतुर्या वाक् सा जल्पिः प्रकीर्तिता॥इति तन्त्रमालायाम् ॥'यत्तु सर्वात्मनाऽज्ञानं निशा सा परिकीर्तिता॥ इति कौर्मे ॥३१॥
क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यांरासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन ।
कलपदं च आयतं च ।'सप्तस्वरसमाहारो मूर्च्छनेति प्रकीर्तिता॥ इति गान्धर्वे ॥ ३३ ॥
ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट-मल्लेभकंसयवनाः कुजपौण्ड्रकाद्याः ।
ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाःकाम्भोजमत्स्यकुरुसृञ्जयकैकयार्णाः ।
'विद्वेषिणोऽप्युदासीना भक्ता अपि न संशयः ।हरेर्हि सदनं यान्ति व्यक्तं भक्तैस्तु गम्यते ॥आरभ्य तम आमुक्तेः कृष्णस्य सदनं यतः ।अव्यक्तहरिलोकत्वादन्येषामन्यलोकता॥ इति बृहत्संहितायाम् ॥'रामभीमार्जुनादीनि विष्णोर्नामानि सर्वशः ।रमणाभयवर्णाद्याः शब्दवृत्तेर्हि हेतवः ॥हरिर्हि तत्र तत्रस्थो रमणादीन्करोत्यजः ।अतस्तस्यैव नामानि व्याजादन्यगतानि तु ।व्यवहारप्रवृत्त्यर्थं दुष्टानां मोहनाय च॥ इति स्कान्दे ॥ ३४-३५ ॥
कालेन मीलितदृशामवमृश्य नॄणांस्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः ।
'तृतीये सप्तमे चैव षोडशे पञ्चविंशके ।अष्टाविंशे युगे कृष्णः सत्यवत्यामजायत ।व्यासाचार्यस्तु पूर्वेषु चरमे स्वयमेव तु ।विव्यास वेदांश्चक्रे च भारतं वेदसंमितम्॥ इति च ॥ ३६ ॥
सर्गे तु योऽहमृषयो नव ये प्रजेशाःस्थानेऽथ धर्ममखमन्वमरावनीशाः ।
'हरीच्छया विभूतिर्या ब्रह्मादीनां सदा भवेत् ।इच्छया वा बहुविधस्तेषु विष्णुः स्वयं स्थितः ।अतो मायाविभूतित्वं तेषां मत्स्यादिकाः स्वयम्"इत्यध्यात्मे ॥ ३९ ॥
नान्तं विदाम्यहममी मुनयः प्रजेशाःमायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये ।
विदुः नान्तम् । अनन्तत्वात् ॥ ४१ ॥
येषां स एव भगवान्दययेदनन्तःसर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् ।
देवमायां विदन्ति संसारमतितरन्ति च ॥ ४२ ॥
ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायांस्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः ।
तत्परायणास्तच्छीलास्तच्छिक्षाश्च ॥ ४६ ॥
शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रंशुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्वम् ।
'अव्यक्ताद्यनहंमानादात्मतत्त्वं हरिः स्मृतः ।अशब्दश्चाप्रसिद्धत्वाच्छान्तः पूर्णसुखत्वतः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥४७॥
स श्रेयसामपि विभुर्भगवान्यतोऽस्यभावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धः ।
भावस्वभावो भक्तिस्वभावः । तेन निर्मितस्य सत्पुरुषस्य प्रसिद्धः ।'भावो भक्तिः प्रणामश्च प्रावण्यमपि चादरः। इत्यभिधानात् ॥४९॥
सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान्विश्वभावनः ।समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात्सदसच्च यत् ॥ ५० ॥
'सत्तादिर्यत्स्वतो विष्णोस्तस्मादन्यः स सर्वतः ।यत्सत्तादिरतोऽन्यस्य नान्यत्वं भेदिनोऽपि तु॥ इति ब्रह्माण्डे ॥५०॥
नृजन्मनि न तुष्येत किं फलं यमनश्वरे ।कृष्णे यद्यपवर्गेशे भक्तिः स्यान्नानपायिनी ॥ ५३ ॥
किं स्याद्वर्णाश्रमाचारैः किं दानैः किं तपःश्रुतैः ।सर्वाघघ्नोत्तमश्लोके न चेद्भक्तिरधोक्षजे ॥ ५४ ॥
'आक्षिप्यते किमित्येतद्यतोऽल्पफलता भवेत् ।वस्तुनो यस्य चाल्पत्वं पुंसो वा नेति चोच्यते॥इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ५३,५४ ॥