Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S5: Difference between revisions
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== षष्ठोऽध्यायः == | == षष्ठोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = रूपाणां तेजसां चक्षुर्दिवः सूर्यस्य चाक्षिणी । | |||
| verse_line2 = कर्णौ दिशाञ्च तीर्थानां श्रोत्रमाकाशशब्दयोः ॥ ३ ॥ | |||
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तीर्थानां शास्त्राणाम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = रोमाण्युद्भिजजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृतः । | |||
| verse_line2 = केशश्मश्रुनखान्यस्य शिलालोहाभ्रविद्युताम् ॥ ५ ॥ | |||
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'याज्ञिका रोममूलस्था रोमान्तस्थास्तु तत्परे ।उद्भिजो वासुदेवस्य लिङ्गगास्तु जरायुजाः''। इति पाद्मे ।'हरेः श्मश्वाश्रया विद्युच्छिलालोहा नखाश्रयाः''। इत्याग्नेये ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् । | |||
| verse_line2 = विक्रमो भूर्भुवःस्वश्च क्षेमस्य शरणस्य च | |||
| verse_line3 = सर्वकामवरस्यापि हरेश्चरण आस्पदम् ॥ ६ ॥ | |||
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ब्राह्मणवैश्यादीन् वर्जयितुं प्रायश इति ।'मोक्षः शान्तिश्च शरणं निर्वाणं चाभिधीयते''इति ब्राह्मे ।'भेजे खगेन्द्रध्वजपादमूलम्''। इति च ।'स्वोत्पत्त्यङ्गेषु देवानामन्येषां पादमूलतः ।मुक्तिस्तु विहिता विष्णोर्निर्दिष्टेषु यथावचः''। इत्यध्यात्मे ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = धर्मस्य मम तुभ्यञ्च कुमाराणां भवस्य च । | |||
| verse_line2 = विज्ञानस्य च तत्वस्य परस्यात्मा परायणम् ॥ ११ ॥ | |||
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'कुमारब्रह्मरुद्राद्या हरेर्मध्यात्समुद्गताः''। इति वामने ।'आत्मेति मध्यदेहश्च सर्वदेहोऽपि वा भवेत् ।मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं जीवश्च कथ्यते ॥अथवा स्वयमेवेति वायुर्ब्रह्माऽपि वा भवेत् ।मुख्यतो ब्रह्म परममात्मशब्देन भण्यते''॥ इति नाममहोदधौ ।'देहेन्द्रियादिभेदेन निर्भेदोऽपि हरिः स्वयम् ।भण्यते केवलैश्वर्यादनाद्यानन्दचिद्घनः''॥ इति गारुडे । | |||
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| verse_line1 = सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् । | |||
| verse_line2 = तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठता ॥ १५ ॥ | |||
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'सर्वं पुरुष एवेति भण्यतेऽभेदवज्जगत् ।तदधीनं तु सत्तादि यतो ह्यस्य सदा भवेत्''। इति ब्रह्मतर्के ।'वितस्तिमात्रं हृदयमास्थाय व्याप्नुते जगत्''। इति गारुडे ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = स्वधिष्ण्यं प्रतपन् प्राणो बहिश्च प्रतपत्यसौ । | |||
| verse_line2 = एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहिः पुमान् ॥ १६ ॥ | |||
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'पश्यन् स्वधिष्ण्यं देहं स बहिष्ठान्विषयानपि ।एवमण्डान्तरं पश्यन्बहिः सर्वं च पश्यति''। इति वामने ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_line1 = सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात् । | |||
| verse_line2 = महिमैष ततो ब्रह्मन् पुरुषस्य दुरत्ययः ॥ १७ ॥ | |||
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'अव्यक्तमात्मनोऽन्नं च महदादि विनाशि च ।यदतीतः परो विष्णुः स एवातो विमोक्षदः''॥ इति नारदीये ॥१७॥ | |||
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| verse_line1 = पादोऽस्य सर्वा भूतानि पुंसः स्थितिविदो विदुः । | |||
| verse_line2 = अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १८ ॥ | |||
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'स्वरूपांशो विभिन्नांश इति द्वेधांश इष्यते ।अनन्तासनवैकुण्ठपद्मनाभाः स्वयं हरिः ॥जीवा इमे विभिन्नांशा धर्माधर्मादिसंयुताः''॥ इति वामने ।सर्वस्य यथावत्स्थितिविदः ।'त्रिमूर्धा सन् हरिर्धत्ते द्युत्रयं मूर्धभिस्त्रिभिः ।अनन्तासनवैकुण्ठनारायणपुराणि तु ।बहुलक्षोच्छ्रितेष्वेषु स वसत्यमृतो हरिः''॥ इति मात्स्ये ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = पादास्त्रयो बहिस्त्वासन्नप्रजानां य आश्रयाः । | |||
| verse_line2 = अन्तस्त्रिलोक्यास्त्वपरो गृहमेधैर्बृहद्धुतः ॥ १९ ॥ | |||
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'अनन्तासनवैकुण्ठनारायणपुराणि तु ।त्रीणि धामानि वै विष्णोस्त्रिलोकाद्बहिरेव च ॥अदायादास्तु पुत्राणामुद्रिक्तज्ञानचक्षुषः ।नारायणपरा देवा एवं तान्याप्नुवन्ति''च ॥'स एवान्यस्वरूपेण शक्रलोकसमीपगः ।इज्यो यज्ञपुमान्नाम ज्ञानिनां गृहिणां पदम् ॥यतीनां ध्रुवलोकस्थो वनिनां मेरुमध्यगः ।आदित्यमण्डलस्थस्तु ज्ञानिनां ब्रह्मचारिणाम्''॥इति ब्रह्माण्डे ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_line1 = सृती विचक्रमे विष्वक्साशनानशने उभे । | |||
| verse_line2 = यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः ॥ २० ॥ | |||
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'त्रिपात्स एव भगवान् सर्वप्राणिषु संस्थितः ।निरन्नेषु च विद्वत्सु त्रिदशेष्वितरेषु च''॥ इत्यध्यात्मे ॥ २० ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मादण्डाद्विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणाश्रयः । | |||
| verse_line2 = तद्द्रव्यमत्यगाद्विश्वं गोभिः सूर्य इवाश्रयम् ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = यदास्य नाभ्यात् नलिनात् अहमासं महात्मनः । | |||
| verse_line2 = नाविन्दं यज्ञसम्भारान् पुरुषावयवान् ऋते ॥ २२ ॥ | |||
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'तस्माद्धरेरण्डमभूदण्डादपि चतुर्मुखः ।स विराण्नामकस्तस्मादधिको हरिरेव तु ॥अण्डाज्जातस्य तस्यान्यद्रूपं पद्मादभूद्धरेः ।यदोभयात्मको जज्ञे ब्रह्मा लोकपितामहः ॥तदैव सोऽतिरिक्तोऽभूच्छर्वपूर्वापराज्जनात् ।त्रिलोकस्थानगं विष्णुमयजच्च समाहितः ।तद्रूपभूतांस्त्रींल्लोकान् पशून् कृत्वा महामनाः''॥ इति गारुडे ॥ २१-२२ ॥ | |||
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| verse_line1 = नामधेयानि मन्त्राश्च दक्षिणाश्च व्रतानि च । | |||
| verse_line2 = देवतानुक्रमः कल्पः सङ्कल्पः सूत्रमेव च ॥ २५ ॥ | |||
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सूत्रं मीमांसासूत्रम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_line1 = नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम् । | |||
| verse_line2 = गृहीतमायोरुगुणे सर्गादावगुणे स्वतः ॥ ३० ॥ | |||
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यस्मात् तमेवायजन् तस्मादिदं तस्मिन्नाहितम् ।'नित्यं गृहीताः सत्वाद्या जीववज्जडवन्न तु ।मिथ्यामानात्स्वरूपत्वात्स्वातन्त्र्याद्बहिरेव तु''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥३०॥ | |||
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| verse_line1 = इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि । | |||
| verse_line2 = नान्यद्भगवतः किञ्चिद्भाव्यं सदसदात्मकम् ॥ ३२ ॥ | |||
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'सदिति व्यक्तमुद्दिष्टमसदव्यक्तमुच्यते ।गम्यागम्यस्वरूपत्वात्तत्सत्तादिर्हरेर्यतः ॥अतस्तस्मादन्यदेव ह्यनन्यदिति भण्यते''॥ इति च ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line1 = नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषां | |||
| verse_line2 = भवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमङ्गलम् । | |||
| verse_line3 = यः स्वात्ममायाविभवं स्वयं गतो | |||
| verse_line4 = नाहं नभस्वांस्तमथापरे कुतः ॥ ३५ ॥ | |||
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'सर्वजीवनिकायेषु ब्रह्मवायू हरेर्विदौ ।न चान्यस्तादृशो वेत्ता यावद्वेत्ति हरिः स्वयम् ॥तावत्तावपि नो विष्णुं जानीतो लोकवन्दितौ''॥इति ब्रह्माण्डे ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः । | |||
| verse_line2 = आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं स संयच्छति पाति च ॥ ३८ ॥ | |||
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'स्वयमेव स्वरूपाणि मत्स्यकूर्मादिकान्यजः ।स्वात्मन्येवेच्छया सृष्ट्वा तैर्देवादीन्प्रपात्यसौ ॥संयच्छत्यसुरान्विष्णुः कल्पे कल्पे जगत्प्रभुः ।तिरोहितं स्वरूपं च प्रकाशयति शास्त्रतः''॥इति भागवततन्त्रे ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_line1 = विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम् । | |||
| verse_line2 = सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम् ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_line1 = ऋतं विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः । | |||
| verse_line2 = यदा तदैवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥ ४० ॥ | |||
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| text = | |||
'ऋतं तदात्मना ज्ञप्तेः सत्यं साधुत्वतः परम् ।सम्यक्संस्थमदूष्यत्वाच्छुद्धं दोषोज्झितत्वतः ।केवलं तादृशाभावात्प्रत्यगन्तरवस्थितेः ।एतदेतादृशं तत्त्वं यो वेद स विमुच्यते''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥३९,४०॥ | |||
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| verse_line1 = आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य | |||
| verse_line2 = कालः स्वभावः सदसन्मनश्च । | |||
| verse_line3 = द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि | |||
| verse_line4 = विराड् स्वराट्स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_line1 = अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशाः | |||
| verse_line2 = दक्षादयो ये भवदादयश्च । | |||
| verse_line3 = स्वर्लोकपालाः खगलोकपालाः | |||
| verse_line4 = नृलोकपालास्तललोकपालाः ॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_line1 = गन्धर्वविद्याधरचारणेशाः | |||
| verse_line2 = ये यक्षरक्षोरगनागनाथाः । | |||
| verse_line3 = ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां | |||
| verse_line4 = दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेन्द्राः ॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_line1 = अन्ये च ये प््रोतपिशाचभूतकूष्माण्डयादोमृगपश्वधीशाः । | |||
| verse_line2 = यत्किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्बलवत्क्षमावत् । | |||
| verse_line3 = ह्रीश्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं तत्तत्परं रूपवदस्वरूपम् ॥४४॥ | |||
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| verse_line1 = प्राधान्यतो यानृषय आमनन्ति | |||
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| verse_line4 = नुक्रमिष्ये त इमान् सुपेशलान् ॥ ४५ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥}} | |||
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'यः शेते प्रलये विष्णुः शून्यनामा महाकृतिः ।स तु नारायणो नाम नराणामयनत्वतः ।रूपं द्वितीयं भवति दीपाद्दीपान्तरं यथा ॥सिसृक्षोस्तस्य पुरुष इत्याहुस्तद्विदो जनाः ।स रमाया द्वितीये तु रूपे प्रकृतिसंज्ञिते ॥वीर्यमाधत्त पुरुषो महांस्तस्मादजायत ।योऽसौ हिरण्यगर्भाख्यः पुरुषः सोऽपि भण्यते ॥श्रद्धेत्युक्ता तु तत्पत्नी साऽपि प्रकृतिरुच्यते ।प्रलये त्वशरीरौ तौ विभागेन व्यवस्थितौ ॥शरीरं प्राप्य पुरुषात्संयोगं तौ प्रचक्रतुः ।ततः पुनर्महत्तत्त्वं प्रजातं जगदङ्कुरम् ॥स्वस्यैव पुत्रतां यातमहङ्कारस्ततोऽजनि''॥ इति व्योमसंहितायाम् ।पुरुषः तस्यैव आद्योऽवतारः । कालादयो रूपवत् । अस्वरूपमपि प््रिायत्वात् ।'पुरुषाद्या हरेरूपं ब्रह्माद्यास्तत्प््रिायाः स्मृताः ।स्वरूपभूता नैवैते तत्सन्निधियुता अपि''॥ इति पाद्मे ।'कालो वस्तुस्वभावश्च प्रकृतिः प्राण एव च ।मनश्च पञ्चभूतानि विकारस्त्रिगुणा अपि ।न स्वरूपं हरेरेतत्तथाप्येषु हरिः स्थितः''॥ इति पाद्मे ।सत् प्राणः । 'सदिति प्राणः''इति श्रुतेः ।'द्रव्यं तु पञ्चभूतानि विकारोऽण्डमुदाहृतम् ।विराजं गरुडं प्राहुः स्वराडिन्द्र उदाहृतः''॥ इति षाड्गुण्ये ।'सर्वं तु रूपवद्विष्णोर्विशेषेण विभूतिमत् ।अतिप््रिायत्वान्नैवैतत्स्वरूपमपि भण्यते''॥ इति स्कान्दे ।'स्वतो महत्वं तु महोविशेषप्राप्तिशक्तिता ।विभूतिर्लक्षणोन्नाहो लक्ष्मीशब्देन भण्यते''॥ इति ब्रह्मतर्के ।'प्रधानत्वेन सर्वस्मान्मत्स्यकूर्मादयो हरेः ।अवताराः श्रुतौ ख्याताः स एवैते ततः स्मृताः ।न स्वरूपं तु ब्रह्माद्याः स्मृता मायाविभूतयः ।स्वेच्छयैषां विशिष्टत्वं कुरुते तत्तथा स्मृताः ।''इति व्योमसंहितायाम् ॥'यज्ञशब्दोदितौ द्वौ तु देवौ लोकपुरस्कृतौ ।एको नारायणस्तत्र रुद्रच्छिन्नस्तथापरः ।स तु यज्ञाभिमानी स्यात्तत्पतिः केशवः स्मृतः''॥ इति पाद्मे ॥ ४१-४५ ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
षष्ठोऽध्यायः
रूपाणां तेजसां चक्षुर्दिवः सूर्यस्य चाक्षिणी ।कर्णौ दिशाञ्च तीर्थानां श्रोत्रमाकाशशब्दयोः ॥ ३ ॥
तीर्थानां शास्त्राणाम् ॥ ३ ॥
रोमाण्युद्भिजजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृतः ।केशश्मश्रुनखान्यस्य शिलालोहाभ्रविद्युताम् ॥ ५ ॥
'याज्ञिका रोममूलस्था रोमान्तस्थास्तु तत्परे ।उद्भिजो वासुदेवस्य लिङ्गगास्तु जरायुजाः। इति पाद्मे ।'हरेः श्मश्वाश्रया विद्युच्छिलालोहा नखाश्रयाः। इत्याग्नेये ॥ ५ ॥
बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् ।विक्रमो भूर्भुवःस्वश्च क्षेमस्य शरणस्य च
ब्राह्मणवैश्यादीन् वर्जयितुं प्रायश इति ।'मोक्षः शान्तिश्च शरणं निर्वाणं चाभिधीयतेइति ब्राह्मे ।'भेजे खगेन्द्रध्वजपादमूलम्। इति च ।'स्वोत्पत्त्यङ्गेषु देवानामन्येषां पादमूलतः ।मुक्तिस्तु विहिता विष्णोर्निर्दिष्टेषु यथावचः। इत्यध्यात्मे ॥ ६ ॥
धर्मस्य मम तुभ्यञ्च कुमाराणां भवस्य च ।विज्ञानस्य च तत्वस्य परस्यात्मा परायणम् ॥ ११ ॥
'कुमारब्रह्मरुद्राद्या हरेर्मध्यात्समुद्गताः। इति वामने ।'आत्मेति मध्यदेहश्च सर्वदेहोऽपि वा भवेत् ।मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं जीवश्च कथ्यते ॥अथवा स्वयमेवेति वायुर्ब्रह्माऽपि वा भवेत् ।मुख्यतो ब्रह्म परममात्मशब्देन भण्यते॥ इति नाममहोदधौ ।'देहेन्द्रियादिभेदेन निर्भेदोऽपि हरिः स्वयम् ।भण्यते केवलैश्वर्यादनाद्यानन्दचिद्घनः॥ इति गारुडे ।
सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठता ॥ १५ ॥
'सर्वं पुरुष एवेति भण्यतेऽभेदवज्जगत् ।तदधीनं तु सत्तादि यतो ह्यस्य सदा भवेत्। इति ब्रह्मतर्के ।'वितस्तिमात्रं हृदयमास्थाय व्याप्नुते जगत्। इति गारुडे ॥ १५ ॥
स्वधिष्ण्यं प्रतपन् प्राणो बहिश्च प्रतपत्यसौ ।एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहिः पुमान् ॥ १६ ॥
'पश्यन् स्वधिष्ण्यं देहं स बहिष्ठान्विषयानपि ।एवमण्डान्तरं पश्यन्बहिः सर्वं च पश्यति। इति वामने ॥ १६ ॥
सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात् ।महिमैष ततो ब्रह्मन् पुरुषस्य दुरत्ययः ॥ १७ ॥
'अव्यक्तमात्मनोऽन्नं च महदादि विनाशि च ।यदतीतः परो विष्णुः स एवातो विमोक्षदः॥ इति नारदीये ॥१७॥
पादोऽस्य सर्वा भूतानि पुंसः स्थितिविदो विदुः ।अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १८ ॥
'स्वरूपांशो विभिन्नांश इति द्वेधांश इष्यते ।अनन्तासनवैकुण्ठपद्मनाभाः स्वयं हरिः ॥जीवा इमे विभिन्नांशा धर्माधर्मादिसंयुताः॥ इति वामने ।सर्वस्य यथावत्स्थितिविदः ।'त्रिमूर्धा सन् हरिर्धत्ते द्युत्रयं मूर्धभिस्त्रिभिः ।अनन्तासनवैकुण्ठनारायणपुराणि तु ।बहुलक्षोच्छ्रितेष्वेषु स वसत्यमृतो हरिः॥ इति मात्स्ये ॥ १८ ॥
पादास्त्रयो बहिस्त्वासन्नप्रजानां य आश्रयाः ।अन्तस्त्रिलोक्यास्त्वपरो गृहमेधैर्बृहद्धुतः ॥ १९ ॥
'अनन्तासनवैकुण्ठनारायणपुराणि तु ।त्रीणि धामानि वै विष्णोस्त्रिलोकाद्बहिरेव च ॥अदायादास्तु पुत्राणामुद्रिक्तज्ञानचक्षुषः ।नारायणपरा देवा एवं तान्याप्नुवन्तिच ॥'स एवान्यस्वरूपेण शक्रलोकसमीपगः ।इज्यो यज्ञपुमान्नाम ज्ञानिनां गृहिणां पदम् ॥यतीनां ध्रुवलोकस्थो वनिनां मेरुमध्यगः ।आदित्यमण्डलस्थस्तु ज्ञानिनां ब्रह्मचारिणाम्॥इति ब्रह्माण्डे ॥ १९ ॥
सृती विचक्रमे विष्वक्साशनानशने उभे ।यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः ॥ २० ॥
'त्रिपात्स एव भगवान् सर्वप्राणिषु संस्थितः ।निरन्नेषु च विद्वत्सु त्रिदशेष्वितरेषु च॥ इत्यध्यात्मे ॥ २० ॥
तस्मादण्डाद्विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणाश्रयः ।तद्द्रव्यमत्यगाद्विश्वं गोभिः सूर्य इवाश्रयम् ॥ २१ ॥
यदास्य नाभ्यात् नलिनात् अहमासं महात्मनः ।नाविन्दं यज्ञसम्भारान् पुरुषावयवान् ऋते ॥ २२ ॥
'तस्माद्धरेरण्डमभूदण्डादपि चतुर्मुखः ।स विराण्नामकस्तस्मादधिको हरिरेव तु ॥अण्डाज्जातस्य तस्यान्यद्रूपं पद्मादभूद्धरेः ।यदोभयात्मको जज्ञे ब्रह्मा लोकपितामहः ॥तदैव सोऽतिरिक्तोऽभूच्छर्वपूर्वापराज्जनात् ।त्रिलोकस्थानगं विष्णुमयजच्च समाहितः ।तद्रूपभूतांस्त्रींल्लोकान् पशून् कृत्वा महामनाः॥ इति गारुडे ॥ २१-२२ ॥
नामधेयानि मन्त्राश्च दक्षिणाश्च व्रतानि च ।देवतानुक्रमः कल्पः सङ्कल्पः सूत्रमेव च ॥ २५ ॥
सूत्रं मीमांसासूत्रम् ॥ २५ ॥
नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम् ।गृहीतमायोरुगुणे सर्गादावगुणे स्वतः ॥ ३० ॥
यस्मात् तमेवायजन् तस्मादिदं तस्मिन्नाहितम् ।'नित्यं गृहीताः सत्वाद्या जीववज्जडवन्न तु ।मिथ्यामानात्स्वरूपत्वात्स्वातन्त्र्याद्बहिरेव तु॥ इति ब्रह्मतर्के ॥३०॥
इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि ।नान्यद्भगवतः किञ्चिद्भाव्यं सदसदात्मकम् ॥ ३२ ॥
'सदिति व्यक्तमुद्दिष्टमसदव्यक्तमुच्यते ।गम्यागम्यस्वरूपत्वात्तत्सत्तादिर्हरेर्यतः ॥अतस्तस्मादन्यदेव ह्यनन्यदिति भण्यते॥ इति च ॥ ३२ ॥
नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषांभवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमङ्गलम् ।
'सर्वजीवनिकायेषु ब्रह्मवायू हरेर्विदौ ।न चान्यस्तादृशो वेत्ता यावद्वेत्ति हरिः स्वयम् ॥तावत्तावपि नो विष्णुं जानीतो लोकवन्दितौ॥इति ब्रह्माण्डे ॥ ३५ ॥
स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः ।आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं स संयच्छति पाति च ॥ ३८ ॥
'स्वयमेव स्वरूपाणि मत्स्यकूर्मादिकान्यजः ।स्वात्मन्येवेच्छया सृष्ट्वा तैर्देवादीन्प्रपात्यसौ ॥संयच्छत्यसुरान्विष्णुः कल्पे कल्पे जगत्प्रभुः ।तिरोहितं स्वरूपं च प्रकाशयति शास्त्रतः॥इति भागवततन्त्रे ॥ ३८ ॥
विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम् ।सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम् ॥ ३९ ॥
ऋतं विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः ।यदा तदैवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥ ४० ॥
'ऋतं तदात्मना ज्ञप्तेः सत्यं साधुत्वतः परम् ।सम्यक्संस्थमदूष्यत्वाच्छुद्धं दोषोज्झितत्वतः ।केवलं तादृशाभावात्प्रत्यगन्तरवस्थितेः ।एतदेतादृशं तत्त्वं यो वेद स विमुच्यते॥ इति ब्रह्मतर्के ॥३९,४०॥
आद्योऽवतारः पुरुषः परस्यकालः स्वभावः सदसन्मनश्च ।
अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशाःदक्षादयो ये भवदादयश्च ।
गन्धर्वविद्याधरचारणेशाःये यक्षरक्षोरगनागनाथाः ।
अन्ये च ये प््रोतपिशाचभूतकूष्माण्डयादोमृगपश्वधीशाः ।यत्किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्बलवत्क्षमावत् ।
प्राधान्यतो यानृषय आमनन्तिलीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः ।
'यः शेते प्रलये विष्णुः शून्यनामा महाकृतिः ।स तु नारायणो नाम नराणामयनत्वतः ।रूपं द्वितीयं भवति दीपाद्दीपान्तरं यथा ॥सिसृक्षोस्तस्य पुरुष इत्याहुस्तद्विदो जनाः ।स रमाया द्वितीये तु रूपे प्रकृतिसंज्ञिते ॥वीर्यमाधत्त पुरुषो महांस्तस्मादजायत ।योऽसौ हिरण्यगर्भाख्यः पुरुषः सोऽपि भण्यते ॥श्रद्धेत्युक्ता तु तत्पत्नी साऽपि प्रकृतिरुच्यते ।प्रलये त्वशरीरौ तौ विभागेन व्यवस्थितौ ॥शरीरं प्राप्य पुरुषात्संयोगं तौ प्रचक्रतुः ।ततः पुनर्महत्तत्त्वं प्रजातं जगदङ्कुरम् ॥स्वस्यैव पुत्रतां यातमहङ्कारस्ततोऽजनि॥ इति व्योमसंहितायाम् ।पुरुषः तस्यैव आद्योऽवतारः । कालादयो रूपवत् । अस्वरूपमपि प््रिायत्वात् ।'पुरुषाद्या हरेरूपं ब्रह्माद्यास्तत्प््रिायाः स्मृताः ।स्वरूपभूता नैवैते तत्सन्निधियुता अपि॥ इति पाद्मे ।'कालो वस्तुस्वभावश्च प्रकृतिः प्राण एव च ।मनश्च पञ्चभूतानि विकारस्त्रिगुणा अपि ।न स्वरूपं हरेरेतत्तथाप्येषु हरिः स्थितः॥ इति पाद्मे ।सत् प्राणः । 'सदिति प्राणःइति श्रुतेः ।'द्रव्यं तु पञ्चभूतानि विकारोऽण्डमुदाहृतम् ।विराजं गरुडं प्राहुः स्वराडिन्द्र उदाहृतः॥ इति षाड्गुण्ये ।'सर्वं तु रूपवद्विष्णोर्विशेषेण विभूतिमत् ।अतिप््रिायत्वान्नैवैतत्स्वरूपमपि भण्यते॥ इति स्कान्दे ।'स्वतो महत्वं तु महोविशेषप्राप्तिशक्तिता ।विभूतिर्लक्षणोन्नाहो लक्ष्मीशब्देन भण्यते॥ इति ब्रह्मतर्के ।'प्रधानत्वेन सर्वस्मान्मत्स्यकूर्मादयो हरेः ।अवताराः श्रुतौ ख्याताः स एवैते ततः स्मृताः ।न स्वरूपं तु ब्रह्माद्याः स्मृता मायाविभूतयः ।स्वेच्छयैषां विशिष्टत्वं कुरुते तत्तथा स्मृताः ।इति व्योमसंहितायाम् ॥'यज्ञशब्दोदितौ द्वौ तु देवौ लोकपुरस्कृतौ ।एको नारायणस्तत्र रुद्रच्छिन्नस्तथापरः ।स तु यज्ञाभिमानी स्यात्तत्पतिः केशवः स्मृतः॥ इति पाद्मे ॥ ४१-४५ ॥