Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S4: Difference between revisions
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== पञ्चमोऽध्यायः == | == पञ्चमोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = नारद उवाच— | |||
| verse_line2 = देवदेव नमस्तेऽस्तु भूतभावन पूर्वज । | |||
| verse_line3 = तद्विजानीहि यज्ज्ञानमात्मतत्वनिदर्शनम् ॥ १ ॥ | |||
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विजानीहि विज्ञापय । 'व्यत्ययो भेदस्वातन्त्र्यकरणेषु''। इति वचनात् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं विभो । | |||
| verse_line2 = यत्संस्थं यत्परं यच्च तत्तत्वं वद तत्वतः ॥ २ ॥ | |||
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'तद्वशत्वादिदं रूपं हरेर्नैव स्वरूपतः''। इति मानससंहितायाम् ।'अधिष्ठानमिति प्रोक्तं मूलाधारं विचक्षणैः ।यत्स्थितं दृश्यते वस्तु संस्थानं तदुदीरितम् ।उभयं हरिरेवास्य जगतो मुनिपुङ्गव''। इति वामने ॥'हरिः परोऽस्य जगतो ह्यव्यक्तादेश्च कृत्स्नशः ।अतस्तत्परमेवेदं वदन्ति मुनयोऽमलाः''॥ इति सात्वतसंहितायाम् ।'यदधीना यस्य सत्ता तत्तदित्येव भण्यते ।विद्यमाने विभेदेऽपि मिथो नित्यं स्वरूपतः''इति भविष्यत्पर्वणि ॥२॥ | |||
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| verse_line1 = यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः । | |||
| verse_line2 = एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया ॥ ४ ॥ | |||
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तदधिकं ज्ञातुं पूर्वपक्षं दर्शयति–'एकः सृजसि''इत्यादिना ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line1 = नाहं वेद परं त्वस्मात् नावरं न समं विभो । | |||
| verse_line2 = नामरूपगुणैर्भाव्यं सदसत् किञ्चिदन्यतः ॥ ६ ॥ | |||
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'त्वदधीना यतः सत्ता अवरस्यापि केशव ।अतः स्वरूपतः सम्यक्सति भेदेऽपि तद्भवान्''इति मात्स्ये ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = नानृतं बत तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः । | |||
| verse_line2 = अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥ १० ॥ | |||
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नानृतमित्याक्षेपः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय धीमहि । | |||
| verse_line2 = यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगद्गुरुम् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_line1 = विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया । | |||
| verse_line2 = विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ १३ ॥ | |||
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'मुख्या माया हरेः शक्तिरमुख्या प्रकृतिर्मता ।अथामुख्यतमा चैव माया दीना प्रकीर्तिता''॥ १२-१३ ॥ | |||
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| verse_line1 = द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । | |||
| verse_line2 = वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तात्वतः ॥ १४ ॥ | |||
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परः अधिकः ।'तद्वदेव स्थितं यत्तु तात्वतं तत्प्रचक्षते''। इति कौर्मे ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः । | |||
| verse_line2 = नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥ १५ ॥ | |||
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वेदप्रतिपाद्येषु स पर इत्यादि ।'गम्येज्यज्ञेयवाच्येषु योज्येषु च परो हरिः ।तपसा पूज्यमानानां सर्वलोकेभ्य एव च''॥ इति वाराहे ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = सत्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः । | |||
| verse_line2 = स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः ॥ १८ ॥ | |||
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युगपत्क्रमशोऽपि वेत्यस्य परिहारः 'सत्वं रजस्तम''इति ।'नित्यं गृहीताः सत्वाद्याः स्थित्यादिषु विशेषतः ।युगपत् क्रमशश्चैव गृह्णाति भगवान्स्वयम्''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः । | |||
| verse_line2 = बध्नन्ति नित्यदा मुक्तं मायिनं पुरुषं गुणाः ॥ १९ ॥ | |||
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'ज्ञानेन्द्रियैश्च मनसा सत्वं बध्नाति पूरुषम् ।रजः कर्मेन्द्रियैर्नित्यं शरीरेण तमस्तथा ।आन्तरं यत्तु कर्तृत्वं तत्सत्वेनाभिमन्यते ॥रजसा त्वभिमन्येत करणैः कर्मकारणैः ।शारीरं वेदनाद्यं तु तमसा ह्यभिमन्यते ॥अकर्ता करणैर्हीनः शरीरेण विवर्जितः ।नित्यज्ञानस्वरूपोऽसौ गुणैरेवाभिमन्यते ॥एवं जीवः परेणैव प््रोरितः संसृतिं व्रजेत् ।न परः संसृतिं क्वापि स्वातन्त्र्यादधिकत्वतः ॥एवं जीवपरौ भिन्नौ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि''॥ इति पाद्मे ॥मायिनं ज्ञानिनं स्वतः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_line1 = स एष भगवाल्लिङ्गैस्त्रिभिरेतैरधोक्षजः । | |||
| verse_line2 = स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन्सर्वेषां मम चेश्वरः ॥ २० ॥ | |||
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लिङ्गैः ज्ञापकैः । त्रिगुणैः । एतैर्लिङ्गैः । स्वप्रसादाज्जीवेन लक्षितगतिः ।'स्वप्रसादादिमं जीवः पश्येत्तेन स्वलक्षितः''इति षाड्गुण्ये ॥ २० ॥ | |||
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| verse_line1 = कालं कर्म स्वभावञ्च मायेशो मायया स्वया । | |||
| verse_line2 = आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥ २१ ॥ | |||
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स्वया मायया स्वशक्त्या ।'यत्रान्यहेत्वभावः स्यादीश्वरेच्छादिना विना ।तदिच्छा हि यदृच्छा स्यादतस्तत्र यदृच्छया''। इति ब्रह्मतर्के ।'कालकर्मस्वभावादि नित्ययेशेच्छया सदा ।प्राप्तमेव विशेषेण सृष्ट्यादावुन्नयत्यजः''॥ इति च ।विबुभूषुः बहुधा बुभूषुः ।'ईशो बह्वीः पुरः सृष्ट्वा तत्रैव बहुरूपताम् ।तत्तन्नियामकतया प्राप्तुं कालाद्युपाददे''॥ इति च ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = कालाद्गुणव्यतिकरात्परिणामस्वभावतः । | |||
| verse_line2 = कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥ २२ ॥ | |||
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प्रकृतेः परिणामस्वभावतः ।'गुणकालस्वभावेभ्य ईशेनाधिष्ठितत्वतः ।जगदादि महत्तत्त्वमभूत्तस्येच्छया हरेः ॥''इति षाड्गुण्ये ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = महतस्तु विकुर्वाणाद्रजस्सत्वोपबृंहितात् । | |||
| verse_line2 = तमः प्रधानस्त्वभवद्द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ॥ २३ ॥ | |||
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'भूतानि द्रव्यनामानि ज्ञानं ज्ञानेन्द्रियाण्यपि ।क्रिया कर्मेन्द्रियाण्याहुस्तन्मूलत्वादहं त्रिधा''। इति गारुडे ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_line1 = सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन्समभूत्त्रिधा । | |||
| verse_line2 = वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेति यद्भिदा । | |||
| verse_line3 = द्रव्यशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिरिति प्रभोः ॥ २४ ॥ | |||
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'विशिष्टकार्यशक्तित्वाद्देवा वैकारिकाः स्मृताः ।अतिजाज्वल्यमानत्वात्तैजसानीन्द्रियाण्यपि ॥तामसानि तु भूतानि यतस्तावन्न तूभयम्''॥ इति पाद्मे ।ज्ञानेन्द्रियाणां देवानां ज्ञानशक्तिरुदीरिता ।क्रिया कर्मेन्द्रियाणां च भूतानां द्रव्यशक्तिता''॥ इति स्कान्दे ।'द्रव्यं तु द्रवणप्राप्यं द्वयोर्विवदमानयोः ।पूर्वं वेगाभिसम्बन्धादाकाशस्तु प्रदेशतः''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः । | |||
| verse_line2 = तस्य मात्रागुणः शब्दो लिङ्गं यद्द्रष्टृदृश्ययोः ॥ २५ ॥ | |||
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'पञ्चेन्द्रियाभिमेयत्वान्मात्रागुण इतीरितः''॥ इति मात्स्ये ।'शब्देनैव परो द्रष्टा ज्ञायते जगदेव च ।"इति विष्णुसंहितायाम् ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_line1 = नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत्स्पर्शगुणोऽनिलः । | |||
| verse_line2 = परान्वयाच्छब्दवांश्च प्राण ओजः सहो बलम् ॥ २६ ॥ | |||
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'सर्वचेष्टयितृत्वात्तु प्राणोऽभिभवशक्तितः ।ओजस्त्वनभिभाव्यत्वात्सहश्च स्वेच्छया कृतेः ॥बलं विधारकत्वाच्च विधृतिर्वायुरुच्यते''। इति भारते ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश । | |||
| verse_line2 = दिग्वातार्कप्रचेतोश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ॥ ३० ॥ | |||
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'अनाद्यनन्तोऽपि हरिर्वैकारिकगणेष्वजः ।अवतीर्णः पदाङ्गुष्ठमध्यास्ते विश्वभुग्विभुः ॥पाददेवस्तु यज्ञोऽन्यस्तं प्रविश्य हरिः स्वयम् ।सर्वं विधारयन्देहे वर्ततेऽनन्तशक्तिधृक्''॥ इति वह्निपुराणे ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः । | |||
| verse_line2 = सदसत्वमुपादाय नो भयं ससृजुर्ह्यदः ॥ ३३ ॥ | |||
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सदसत्वं व्यक्ताव्यक्तत्वम् । नः भयम् । अदो ब्रह्माण्डम् । ब्रह्माण्डं हि वदन्तीति जीवानां भयकारणम् । तत्र हि संसृतिः ।'आकाशवायू त्वव्यक्तावितरेऽण्डे प्रकाशिताः ।तथात्वाद्बाह्यभूतानामण्डस्थानां च सा गतिः''॥ इति मात्स्ये ॥३३॥ | |||
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| verse_line1 = वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् । | |||
| verse_line2 = कालकर्मस्वभावस्थोऽ)जीवोऽ)जीवमजीजनत् ॥ ३४ ॥ | |||
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कालकर्मस्वभावस्थ अजीवः परमेश्वरः । अजीवं स्वात्मानम् अजीजनत् । तदण्डं यथा स्वात्मानं प्रासूते तथा चकार ।'यः प्रणधारणं प्रणप्रासादात्कुरुतेऽनिशम् ।स जीव इति सन्दिष्टस्तदन्योऽजीव उच्यते ।यत्प्रासादात्स तु प्रणः कुरुते स्वस्य धारणम्''॥ इति वायुप्रक्ते ॥'कालकर्मस्वभावस्थो वासुदेवः परः पुमान् ।अकरोदण्डमुद्वृद्धमात्मप्रसवकारणम् ॥''इति ब्रह्माण्डे ।जीव इति वा ।'प्र•णं धारयते यस्मात्स जीवः परमेश्वरः ।अजीवोऽपि महातेजास्त्वथवा जीवयन् जगत्''॥इति स्कान्दे ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = स एष पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः । | |||
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'अण्डे जातौ पुमांसौ द्वौ हरिर्ब्रह्मा तथैव च ।अनादिस्तु हरिस्तत्र ब्रह्मा सादिरुदाहृतः''। इति च ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः । | |||
| verse_line2 = ऊर्वादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः ॥ ३६ ॥ | |||
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'हरेरवयवैर्लोकाः सृष्टा इति विकल्पनम् ।साक्षात्सत्यमतोऽन्यस्मात् व्यावहारिकमुच्यते''॥ इति मात्स्ये ॥३६॥ | |||
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| verse_line1 = पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः । | |||
| verse_line2 = ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ ३७ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥}} | |||
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'ब्राह्मणो मुखमित्येव मुखाज्जातत्वहेतुतः ।यथावदत् श्रुतौ तद्वज्जीवो ब्रह्मेति वाग्भवेत्''॥ इति ब्राह्मे ॥ ३७ ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
पञ्चमोऽध्यायः
नारद उवाच—देवदेव नमस्तेऽस्तु भूतभावन पूर्वज ।
विजानीहि विज्ञापय । 'व्यत्ययो भेदस्वातन्त्र्यकरणेषु। इति वचनात् ॥ १ ॥
यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं विभो ।यत्संस्थं यत्परं यच्च तत्तत्वं वद तत्वतः ॥ २ ॥
'तद्वशत्वादिदं रूपं हरेर्नैव स्वरूपतः। इति मानससंहितायाम् ।'अधिष्ठानमिति प्रोक्तं मूलाधारं विचक्षणैः ।यत्स्थितं दृश्यते वस्तु संस्थानं तदुदीरितम् ।उभयं हरिरेवास्य जगतो मुनिपुङ्गव। इति वामने ॥'हरिः परोऽस्य जगतो ह्यव्यक्तादेश्च कृत्स्नशः ।अतस्तत्परमेवेदं वदन्ति मुनयोऽमलाः॥ इति सात्वतसंहितायाम् ।'यदधीना यस्य सत्ता तत्तदित्येव भण्यते ।विद्यमाने विभेदेऽपि मिथो नित्यं स्वरूपतःइति भविष्यत्पर्वणि ॥२॥
यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः ।एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया ॥ ४ ॥
तदधिकं ज्ञातुं पूर्वपक्षं दर्शयति–'एकः सृजसिइत्यादिना ॥ ४ ॥
नाहं वेद परं त्वस्मात् नावरं न समं विभो ।नामरूपगुणैर्भाव्यं सदसत् किञ्चिदन्यतः ॥ ६ ॥
'त्वदधीना यतः सत्ता अवरस्यापि केशव ।अतः स्वरूपतः सम्यक्सति भेदेऽपि तद्भवान्इति मात्स्ये ॥ ६ ॥
नानृतं बत तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः ।अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥ १० ॥
नानृतमित्याक्षेपः ॥ १० ॥
नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय धीमहि ।यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगद्गुरुम् ॥ १२ ॥
विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया ।विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ १३ ॥
'मुख्या माया हरेः शक्तिरमुख्या प्रकृतिर्मता ।अथामुख्यतमा चैव माया दीना प्रकीर्तिता॥ १२-१३ ॥
द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योऽर्थोऽस्ति तात्वतः ॥ १४ ॥
परः अधिकः ।'तद्वदेव स्थितं यत्तु तात्वतं तत्प्रचक्षते। इति कौर्मे ॥ १४ ॥
नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः ।नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥ १५ ॥
वेदप्रतिपाद्येषु स पर इत्यादि ।'गम्येज्यज्ञेयवाच्येषु योज्येषु च परो हरिः ।तपसा पूज्यमानानां सर्वलोकेभ्य एव च॥ इति वाराहे ॥ १५ ॥
सत्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः ।स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः ॥ १८ ॥
युगपत्क्रमशोऽपि वेत्यस्य परिहारः 'सत्वं रजस्तमइति ।'नित्यं गृहीताः सत्वाद्याः स्थित्यादिषु विशेषतः ।युगपत् क्रमशश्चैव गृह्णाति भगवान्स्वयम्॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ १८ ॥
कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः ।बध्नन्ति नित्यदा मुक्तं मायिनं पुरुषं गुणाः ॥ १९ ॥
'ज्ञानेन्द्रियैश्च मनसा सत्वं बध्नाति पूरुषम् ।रजः कर्मेन्द्रियैर्नित्यं शरीरेण तमस्तथा ।आन्तरं यत्तु कर्तृत्वं तत्सत्वेनाभिमन्यते ॥रजसा त्वभिमन्येत करणैः कर्मकारणैः ।शारीरं वेदनाद्यं तु तमसा ह्यभिमन्यते ॥अकर्ता करणैर्हीनः शरीरेण विवर्जितः ।नित्यज्ञानस्वरूपोऽसौ गुणैरेवाभिमन्यते ॥एवं जीवः परेणैव प््रोरितः संसृतिं व्रजेत् ।न परः संसृतिं क्वापि स्वातन्त्र्यादधिकत्वतः ॥एवं जीवपरौ भिन्नौ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ इति पाद्मे ॥मायिनं ज्ञानिनं स्वतः ॥ १९ ॥
स एष भगवाल्लिङ्गैस्त्रिभिरेतैरधोक्षजः ।स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन्सर्वेषां मम चेश्वरः ॥ २० ॥
लिङ्गैः ज्ञापकैः । त्रिगुणैः । एतैर्लिङ्गैः । स्वप्रसादाज्जीवेन लक्षितगतिः ।'स्वप्रसादादिमं जीवः पश्येत्तेन स्वलक्षितःइति षाड्गुण्ये ॥ २० ॥
कालं कर्म स्वभावञ्च मायेशो मायया स्वया ।आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥ २१ ॥
स्वया मायया स्वशक्त्या ।'यत्रान्यहेत्वभावः स्यादीश्वरेच्छादिना विना ।तदिच्छा हि यदृच्छा स्यादतस्तत्र यदृच्छया। इति ब्रह्मतर्के ।'कालकर्मस्वभावादि नित्ययेशेच्छया सदा ।प्राप्तमेव विशेषेण सृष्ट्यादावुन्नयत्यजः॥ इति च ।विबुभूषुः बहुधा बुभूषुः ।'ईशो बह्वीः पुरः सृष्ट्वा तत्रैव बहुरूपताम् ।तत्तन्नियामकतया प्राप्तुं कालाद्युपाददे॥ इति च ॥ २१ ॥
कालाद्गुणव्यतिकरात्परिणामस्वभावतः ।कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥ २२ ॥
प्रकृतेः परिणामस्वभावतः ।'गुणकालस्वभावेभ्य ईशेनाधिष्ठितत्वतः ।जगदादि महत्तत्त्वमभूत्तस्येच्छया हरेः ॥इति षाड्गुण्ये ॥ २२ ॥
महतस्तु विकुर्वाणाद्रजस्सत्वोपबृंहितात् ।तमः प्रधानस्त्वभवद्द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ॥ २३ ॥
'भूतानि द्रव्यनामानि ज्ञानं ज्ञानेन्द्रियाण्यपि ।क्रिया कर्मेन्द्रियाण्याहुस्तन्मूलत्वादहं त्रिधा। इति गारुडे ॥ २३ ॥
सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन्समभूत्त्रिधा ।वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेति यद्भिदा ।
'विशिष्टकार्यशक्तित्वाद्देवा वैकारिकाः स्मृताः ।अतिजाज्वल्यमानत्वात्तैजसानीन्द्रियाण्यपि ॥तामसानि तु भूतानि यतस्तावन्न तूभयम्॥ इति पाद्मे ।ज्ञानेन्द्रियाणां देवानां ज्ञानशक्तिरुदीरिता ।क्रिया कर्मेन्द्रियाणां च भूतानां द्रव्यशक्तिता॥ इति स्कान्दे ।'द्रव्यं तु द्रवणप्राप्यं द्वयोर्विवदमानयोः ।पूर्वं वेगाभिसम्बन्धादाकाशस्तु प्रदेशतः॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ २४ ॥
तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः ।तस्य मात्रागुणः शब्दो लिङ्गं यद्द्रष्टृदृश्ययोः ॥ २५ ॥
'पञ्चेन्द्रियाभिमेयत्वान्मात्रागुण इतीरितः॥ इति मात्स्ये ।'शब्देनैव परो द्रष्टा ज्ञायते जगदेव च ।"इति विष्णुसंहितायाम् ॥ २५ ॥
नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत्स्पर्शगुणोऽनिलः ।परान्वयाच्छब्दवांश्च प्राण ओजः सहो बलम् ॥ २६ ॥
'सर्वचेष्टयितृत्वात्तु प्राणोऽभिभवशक्तितः ।ओजस्त्वनभिभाव्यत्वात्सहश्च स्वेच्छया कृतेः ॥बलं विधारकत्वाच्च विधृतिर्वायुरुच्यते। इति भारते ॥ २६ ॥
वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश ।दिग्वातार्कप्रचेतोश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ॥ ३० ॥
'अनाद्यनन्तोऽपि हरिर्वैकारिकगणेष्वजः ।अवतीर्णः पदाङ्गुष्ठमध्यास्ते विश्वभुग्विभुः ॥पाददेवस्तु यज्ञोऽन्यस्तं प्रविश्य हरिः स्वयम् ।सर्वं विधारयन्देहे वर्ततेऽनन्तशक्तिधृक्॥ इति वह्निपुराणे ॥ ३० ॥
तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः ।सदसत्वमुपादाय नो भयं ससृजुर्ह्यदः ॥ ३३ ॥
सदसत्वं व्यक्ताव्यक्तत्वम् । नः भयम् । अदो ब्रह्माण्डम् । ब्रह्माण्डं हि वदन्तीति जीवानां भयकारणम् । तत्र हि संसृतिः ।'आकाशवायू त्वव्यक्तावितरेऽण्डे प्रकाशिताः ।तथात्वाद्बाह्यभूतानामण्डस्थानां च सा गतिः॥ इति मात्स्ये ॥३३॥
वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् ।कालकर्मस्वभावस्थोऽ)जीवोऽ)जीवमजीजनत् ॥ ३४ ॥
कालकर्मस्वभावस्थ अजीवः परमेश्वरः । अजीवं स्वात्मानम् अजीजनत् । तदण्डं यथा स्वात्मानं प्रासूते तथा चकार ।'यः प्रणधारणं प्रणप्रासादात्कुरुतेऽनिशम् ।स जीव इति सन्दिष्टस्तदन्योऽजीव उच्यते ।यत्प्रासादात्स तु प्रणः कुरुते स्वस्य धारणम्॥ इति वायुप्रक्ते ॥'कालकर्मस्वभावस्थो वासुदेवः परः पुमान् ।अकरोदण्डमुद्वृद्धमात्मप्रसवकारणम् ॥इति ब्रह्माण्डे ।जीव इति वा ।'प्र•णं धारयते यस्मात्स जीवः परमेश्वरः ।अजीवोऽपि महातेजास्त्वथवा जीवयन् जगत्॥इति स्कान्दे ॥ ३४ ॥
स एष पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः ।सहस्रोर्वङ्घ्रिबाह्वक्षिः सहस्राननशीर्षवान् ॥ ३५ ॥
'अण्डे जातौ पुमांसौ द्वौ हरिर्ब्रह्मा तथैव च ।अनादिस्तु हरिस्तत्र ब्रह्मा सादिरुदाहृतः। इति च ॥ ३५ ॥
यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः ।ऊर्वादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः ॥ ३६ ॥
'हरेरवयवैर्लोकाः सृष्टा इति विकल्पनम् ।साक्षात्सत्यमतोऽन्यस्मात् व्यावहारिकमुच्यते॥ इति मात्स्ये ॥३६॥
पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः ।ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ ३७ ॥
'ब्राह्मणो मुखमित्येव मुखाज्जातत्वहेतुतः ।यथावदत् श्रुतौ तद्वज्जीवो ब्रह्मेति वाग्भवेत्॥ इति ब्राह्मे ॥ ३७ ॥