Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S2: Difference between revisions
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}} | }} | ||
== द्वितीयोऽध्यायः == | == द्वितीयोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः । | |||
| verse_line2 = परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥२॥ | |||
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एष हरिः । यदपार्थैर्ध्यायति । तत्रार्थान्न विन्दते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः । | |||
| verse_line2 = सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्तत् परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥३॥ | |||
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'सर्वनामा यतो विष्णुस्तदन्यार्थान्न तु स्मरेत् ।स्मरंस्तु यावदर्थः स्यादन्यथा स्वात्महा स्मृतः''। इति ब्रह्माण्डे ॥३॥ | |||
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| verse_line1 = एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः । | |||
| verse_line2 = तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६ ॥ | |||
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'एतमितः प््रोत्याभिसम्भविताऽस्मि''इति नियतार्थः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः । | |||
| verse_line2 = तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत सर्वात्मनाऽतोऽन्यत आत्मघातः ॥ ७ ॥ | |||
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'यथैकस्तु बहून्सुप्तानसुप्तः पश्यति प्रभुः ।एवमीशो बहून् जीवानज्ञान्पश्यति नित्यदृक्''। इति व्योमसंहितायाम् ।'स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति''। इति च ।'यथेष्टभवनाद्विष्णुरनुभूः परिकीर्तितः ।उदधिः कर्मणामीशः सर्वः पूर्णगुणो यतः ॥सत्यः केवलसारत्वान्नियमो नियतेरजः''। इति बृहत्संहितायाम् ॥७ ॥ | |||
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| verse_line1 = अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् । | |||
| verse_line2 = ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयाऽवतिष्ठते ॥ १३ ॥ | |||
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चिन्तामयं चिन्ताप्रधानम् ।'यस्मात्सञ्चिन्तितो विष्णुश्चिन्तितं प्रददात्यजः ।तस्माच्चिन्तामयं देवं वदन्ति ज्ञानचक्षुषः''। इति च ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः । | |||
| verse_line2 = तावत्स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥ १५ ॥ | |||
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स्थवीयः पातालमेतस्येत्यादि ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिः | |||
| verse_line2 = यदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् । | |||
| verse_line3 = काले च देशे च मनो न सज्जेत् | |||
| verse_line4 = प्राणान्नियच्छेन्मनसा जितासुः ॥ १६ ॥ | |||
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'भक्त्या प्राणं वशं नीत्वा जितप्राणो भवत्युत''। इति षाड्गुण्ये ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_line1 = मनश्च बुध्याऽमलया नियम्य | |||
| verse_line2 = क्षेत्रज्ञ एतां निनयेत्तमात्मनि । | |||
| verse_line3 = आत्मानमात्मन्यवरुध्य धीरो | |||
| verse_line4 = लब्धोपशान्तिर्विरमेत कृत्यात् ॥ १७ ॥ | |||
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'जीवस्थो भगवान्विष्णुः क्षेत्रज्ञ इति गीयते ।देहस्थोऽपि स एवात्मा व्याप्तोऽप्यात्मेति भण्यते''। इति तत्त्वनिर्णये ।'हरौ हरेर्भवेन्नीतिस्तदेकत्वस्य चिन्तनम् ।अन्यत्र तन्नियम्यादिचिन्तनं नीतिरुच्यते''। इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_line1 = न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः | |||
| verse_line2 = कुतो नु देवा जगतां य ईशिरे । | |||
| verse_line3 = न यत्र सत्वं न रजस्तमश्च | |||
| verse_line4 = न वै विकारो न महान् प्रधानम् ॥ १८ ॥ | |||
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कालो वायुः ।'हरिश्च प्रकृतिश्चैव ब्रह्मवायू तथैव च ।सुपर्णशेषरुद्राश्च शक्रः सूर्ययमावपि ॥अग्निर्यमानुजश्चैव कालशब्देरिताः क्रमात् ।पूर्वोक्तास्त्वपरोक्तानां प्रभवः सर्वशो मताः''।इत्युद्दामसंहितायाम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line1 = नाभ्यां स्थितं हृद्यवरोप्य तस्माद् | |||
| verse_line2 = उदानगत्योरसि तं नयेन्मुनिः । | |||
| verse_line3 = ततोऽनुसन्धाय धिया मनस्वी | |||
| verse_line4 = स्वतालुमूलं शनकैर्नयेत ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्माद्भ्रुवोरन्तरमुन्नयेत | |||
| verse_line2 = निरुद्धसप्ताश्वपथोऽनपेक्षः । | |||
| verse_line3 = स्थित्वा मुहूर्तार्धमकुण्ठदृष्टि- | |||
| verse_line4 = र्निर्भिद्य मूर्धन्विसृजेत्परं गतः ॥ २२ ॥ | |||
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उदानगत्या ब्रह्मनाड्या । 'अथैकयोर्ध्व उदानः''इति श्रुतेः ।'प्राणापानाविडायां च पिङ्गलायां च वर्ततः ।व्यानः सन्धिषु सर्वत्र उदानो ब्रह्मनाडिगः ॥सर्वत्रैव समानस्तु समं चरति सर्वगः''। इति भारते ॥परं चिन्तयन् ॥ २१,२२ ॥॥ | |||
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| verse_line1 = यदि प्रयास्यत्यथ पारमेष्ठ्यं वैहायसानामुत यद्विहारम् । | |||
| verse_line2 = अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_line1 = योगेश्वराणां गतिमामनन्ति बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मा । | |||
| verse_line2 = न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥ २४ ॥ | |||
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'चिन्मात्राणीन्द्रियाण्याहुर्मुक्तानामन्यदैव तु ।तान्येव जडयुक्तानि ह्यभिन्नानि स्वरूपतः''। इति ब्राह्मे ॥पवनस्यापि अन्तरात्मा यः तम् । पवनश्चान्तरात्मा चेति वा ।'ईयुस्त्रीन् कर्मणा लोकान् ज्ञानेनैव तदुत्तरान् ।तत्र मुख्या हरिं यान्ति तदन्ये वायुमेव तु ॥अपक्वा ये न ते यान्ति वायुं वा हरिमेव वा ।स्थानमात्राश्रितास्ते तु पुनर्जनिविवर्जिताः''। इति ब्रह्मतर्के ॥ २३,२४ ॥ | |||
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| verse_line1 = वैश्वानरं याति विहायसा गतः | |||
| verse_line2 = सुषुम्नया ब्रह्मपथेन शोचिषा । | |||
| verse_line3 = विधूतकल्कोऽथ हरेरुदस्तात् | |||
| verse_line4 = प्रयाति चक्रं नृप शैंशुमारम् ॥ २५ ॥ | |||
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हरेः शैंशुमारं चक्रम् । वैश्वानरोदस्तात् ।'वैश्वानरे द्युनद्यां वा सूर्ये वा देह एव वा ।विधूय सर्वपापानि यान्ति किंस्तुघ्नकेशवम्''। इति ब्रह्माण्डे ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_line1 = योऽन्तः पचति भूतानां यस्तपत्यण्डमध्यगः । | |||
| verse_line2 = सोऽग्निर्वैश्वानरो मार्गो देवानां पितृणां मुनेः ॥ २६ ॥ | |||
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'पितृयानं देवयानं ब्रह्मयानमिति त्रिधा ।गच्छन्वैश्वानरं याति तस्मान्मार्गः स ईरितः''॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = देवयानं पिङ्गलाभिरहान्येति शतायुषा । | |||
| verse_line2 = रात्रीरिडाभिः पितृणां विषुवत्तां सुषुम्नया ॥ २७ ॥ | |||
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'दक्षिणाः पिङ्गलाः सर्वा इडा वामाः प्रकीर्तिताः ।नाड्योऽथ मध्यमा प्रोक्ता सुषुम्ना वेदपारगैः''। इति भागवततन्त्रे ।'देवयानस्यमार्गस्था अहःशब्दाभिसञ्ज्ञिताः ।पितृयानस्यमार्गस्था रात्रिशब्दाह्वया मताः''। इति बृहत्तन्त्रे ॥'शतायुर्मरणं चैव कालिकं परमावृतिः''। इत्यभिधाने ॥पिङ्गलाभिः शतायुषा अहःसञ्ज्ञं देवयानम् इति । इडाभी रात्रिसञ्ज्ञं पितृयानम् ।'विषुवत्ता ब्रह्मयानं विशेषेण सुखं यतः ।पिङ्गला देवयानं स्यात्पिङ्गाख्यसुखदं यतः ॥इडाऽन्नदानात्पितृणामेवं मार्गाः प्रकीर्तिताः''। इति ब्रह्मतर्के ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_line1 = तद्विश्वनाभिं त्वभिपद्य विष्णोरणीयसा विरजेनात्मनैकम् । | |||
| verse_line2 = नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद्विबुधा रमन्ते ॥२८ ॥ | |||
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'अशेषजगदाधारः शिंशुमारो हरिः परः ।सर्वे ब्रह्मविदो नत्वा तं यान्ति परमं पदम्''। इति ब्रह्माण्डे ॥तद्विष्णोर्विश्वाधारं रूपं प्रतिपद्य यत्र कल्पायुषः तं महर्लोकं उपैति ।'मन्वन्तरायुषः स्वर्ग्या महर्लोके तु काल्पिकाः ।आब्रह्मणो जनाद्यास्तु महर्लोकेऽपि ये वराः''। इति ब्राह्मे ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नाधिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् । | |||
| verse_line2 = यश्चित्ततोदः क्रिययाऽनिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥ ३० ॥ | |||
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ऋते सत्यलोके । अनिदंविदाम् अब्रह्मविदाम् । दुरन्तदुःखं च प्रभवश्च ।'सर्वदुःखविहीना ये मुक्ताः प्रायस्तु तादृशाः ।अमुक्तास्तु जनाद्येषु विशेषेण तु सत्यगाः''। इति वाराहे ॥'विष्णोर्लोकं तदैवैके यान्ति कालान्तरे परे ।आज्ञयैव हरेः केचिदपूर्तेः केचिदञ्जसा ।विहृत्यैवान्यलोकेषु मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह''। इति वामने ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय- | |||
| verse_line2 = स्तेनात्मनाऽपोऽनलमूधर्ि्न च त्वरन् । | |||
| verse_line3 = ज्योतिर्मयो वायुमुपेत्य काले | |||
| verse_line4 = वाय्वात्मना खं बृहदात्मलिङ्गम् ॥ ३१ ॥ | |||
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| text = | |||
ब्रह्मणा सह । विशेषं पृथिवीम् । तेनात्मना पृथिव्यात्मना । ज्योतिर्मय अग्निप्रधानः ।'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः''इति परमात्मसदृशं किञ्चित् ।'ज्ञानिनः प्रलये सर्वे ब्रह्मणा सह पार्थिवम् ।परमात्मानमाविश्य वारिस्थं तत्समन्विताः ॥अग्निस्थं तद्युताश्चैव तेन नीताश्च वायुगम् ।नभोगतं तेन नीता मनःस्थं तद्युतास्तथा ॥ततो बुद्धिस्थमीशेशं ततोऽहङ्कारगं हरिम् ।ततो विज्ञाननामानं महत्तत्त्वगतं हरिम् ॥तत आनन्दनामानमव्यक्तस्थं जनार्दनम् ।प्राप्य नावृत्तिमायान्ति शान्तिभूता निरामयाः ॥येषां पदान्तरापेक्षा वाय्वादीनां महात्मनाम् ।आवृत्य ते पुनर्यान्ति ज्ञानिनोऽपि निरामयाः ।अनावृत्तिमसंमूढाः परानन्दैकभागिनः''। इति ब्रह्मतर्के ॥'भूम्यब्गमन्ननामानं प्राणमग्न्यादिसंस्थितम् ।मानसं मन आदिस्थं विज्ञानं महति स्थितम् ॥आनन्दमव्यक्तगतं क्रमशो यान्ति देवताः ।ब्रह्माद्याः केचिदेवात्र तदन्ये क्रमशोऽपरान्''।इति बृहत्तन्त्रे ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं | |||
| verse_line2 = रूपन्तु दृष्ट्या स्पर्शं त्वचैव । | |||
| verse_line3 = श्रोत्रेण चोपेत्य नभोगुणं तत् | |||
| verse_line4 = प्रायेण नावृत्तिमुपैति योगी ॥ ३२ ॥ | |||
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| text = | |||
'पञ्चेन्द्रियैर्ये विषया एष्टव्याः सर्वतो वराः ।मानसांश्चाखिलान् प्राप्य मुक्तौ मोदन्ति देवताः ।तथोद्रिक्तनिजानन्दा नित्यानन्दा असंवृताः''। इति षाड्गुण्ये ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line1 = स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षात् | |||
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| verse_line4 = संसाद्य मत्या सह तेन याति ॥ ३३ ॥ | |||
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भूतसूक्ष्मेन्द्रियैश्च सह अनादिर्भगवानाकाशगो मनोमयं याति । नादवत्त्वात् सनातनः ।'नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः''। इति मोक्षधर्मे ॥विविधकार्ययुक्तं विकार्यम् । देवमयं देवप्रधानम् ।'मनःस्थितो हरिर्नित्यं सर्वदेवेषु संस्थितः ।देवप्रधानकाल्लोकान्करोत्यनुगतः सदा''। इति वाराहे ॥भूतसूक्ष्माणि पञ्चभूतानि जीवाश्च ।'पञ्चभूतैश्च शब्दाद्यैरिन्द्रियैर्जीवराशिभिः ।युक्त आकाशगो विष्णुर्मनःस्थमुपगच्छति''। इति वामने ।योऽसावनादिर्मनोमयस्तमिति वा । विपर्ययश्चेत्तस्यैव गन्तृत्वमिति ज्ञापयितुम् । मतिस्थेन तेन मनःस्थेन च सह विज्ञानतत्वं याति ॥३३॥ | |||
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| verse_line1 = विज्ञानतत्वं गुणसन्निरोधं तेनाऽत्मनाऽऽत्मानमुपैति शान्तिम् । | |||
| verse_line2 = आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = एतां गतिं भागवतो गतो यः स वै पुनर्नेह विषज्जतेऽङ्ग । | |||
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| verse_line3 = ये द्वे पुरा ब्रह्मण आह पृष्टः आराधितो भगवान् वासुदेवः ॥३५॥ | |||
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गुणसन्निरोधं निर्गुणं वासुदेवम् । वासुदेवे एतां गतिं गतो न विषज्जते ।'वासुदेवाश्रिता देवा ब्रह्माद्या मुक्तबन्धनाः ।भेददृष्ट्याभिमानेन चावृत्तिं नैव यान्ति ते ॥भुञ्जते तु पृथग्भोगान्नानन्दं तत्स्वरूपकम् ।स्वरूपं च पृथक्तेषामाविष्टग्रहवद्भवेत्''इति ब्रह्माण्डे ॥ ३४,३५ ॥ | |||
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यद् भगवानाह । अतो भागवताख्याद्ग्रन्थात् शिवः पन्था न ॥ ३६ ॥ | |||
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तद्भागवतं पुराणम् अपश्यत् ।'नित्यज्ञानेन सिद्धं च पुनः पुनरवेक्षते ।लीलयैव हरिर्देवो दुष्टानां मोहनाय च''।इति ब्रह्मतर्के ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_line2 = दृश्यैर्बुध्यादिभिर्द्रष्टा लक्षणैरनुमापकैः ॥ ३८ ॥ | |||
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लक्षितश्चास्मिन् पुराणे बुद्ध्यादीनां पारवश्यदर्शनादन्यो नियन्ताऽस्तीति ।'समाधावसमाधौ च निःस्वतन्त्रस्य देहिनः ।अन्यो नियन्ता भगवान्वासुदेवः परः प्रभुः''इति ब्रह्मतर्के ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मात्सर्वात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा । | |||
| verse_line2 = श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान्नृणाम् ॥ ३९ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥}} | |||
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यस्मात् भगवतैष एवोक्तः तस्मात् स एव श्रोतव्यादिः ॥ ३९ ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
द्वितीयोऽध्यायः
शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः ।परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥२॥
एष हरिः । यदपार्थैर्ध्यायति । तत्रार्थान्न विन्दते ॥ २ ॥
अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः ।सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्तत् परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥३॥
'सर्वनामा यतो विष्णुस्तदन्यार्थान्न तु स्मरेत् ।स्मरंस्तु यावदर्थः स्यादन्यथा स्वात्महा स्मृतः। इति ब्रह्माण्डे ॥३॥
एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः ।तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६ ॥
'एतमितः प््रोत्याभिसम्भविताऽस्मिइति नियतार्थः ॥ ६ ॥
स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः ।तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत सर्वात्मनाऽतोऽन्यत आत्मघातः ॥ ७ ॥
'यथैकस्तु बहून्सुप्तानसुप्तः पश्यति प्रभुः ।एवमीशो बहून् जीवानज्ञान्पश्यति नित्यदृक्। इति व्योमसंहितायाम् ।'स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति। इति च ।'यथेष्टभवनाद्विष्णुरनुभूः परिकीर्तितः ।उदधिः कर्मणामीशः सर्वः पूर्णगुणो यतः ॥सत्यः केवलसारत्वान्नियमो नियतेरजः। इति बृहत्संहितायाम् ॥७ ॥
अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् ।ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयाऽवतिष्ठते ॥ १३ ॥
चिन्तामयं चिन्ताप्रधानम् ।'यस्मात्सञ्चिन्तितो विष्णुश्चिन्तितं प्रददात्यजः ।तस्माच्चिन्तामयं देवं वदन्ति ज्ञानचक्षुषः। इति च ॥ १३ ॥
यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः ।तावत्स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥ १५ ॥
स्थवीयः पातालमेतस्येत्यादि ॥ १५ ॥
स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिःयदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् ।
'भक्त्या प्राणं वशं नीत्वा जितप्राणो भवत्युत। इति षाड्गुण्ये ॥ १६ ॥
मनश्च बुध्याऽमलया नियम्यक्षेत्रज्ञ एतां निनयेत्तमात्मनि ।
'जीवस्थो भगवान्विष्णुः क्षेत्रज्ञ इति गीयते ।देहस्थोऽपि स एवात्मा व्याप्तोऽप्यात्मेति भण्यते। इति तत्त्वनिर्णये ।'हरौ हरेर्भवेन्नीतिस्तदेकत्वस्य चिन्तनम् ।अन्यत्र तन्नियम्यादिचिन्तनं नीतिरुच्यते। इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ १७ ॥
न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुःकुतो नु देवा जगतां य ईशिरे ।
कालो वायुः ।'हरिश्च प्रकृतिश्चैव ब्रह्मवायू तथैव च ।सुपर्णशेषरुद्राश्च शक्रः सूर्ययमावपि ॥अग्निर्यमानुजश्चैव कालशब्देरिताः क्रमात् ।पूर्वोक्तास्त्वपरोक्तानां प्रभवः सर्वशो मताः।इत्युद्दामसंहितायाम् ॥ १८ ॥
नाभ्यां स्थितं हृद्यवरोप्य तस्माद्उदानगत्योरसि तं नयेन्मुनिः ।
तस्माद्भ्रुवोरन्तरमुन्नयेतनिरुद्धसप्ताश्वपथोऽनपेक्षः ।
उदानगत्या ब्रह्मनाड्या । 'अथैकयोर्ध्व उदानःइति श्रुतेः ।'प्राणापानाविडायां च पिङ्गलायां च वर्ततः ।व्यानः सन्धिषु सर्वत्र उदानो ब्रह्मनाडिगः ॥सर्वत्रैव समानस्तु समं चरति सर्वगः। इति भारते ॥परं चिन्तयन् ॥ २१,२२ ॥॥
यदि प्रयास्यत्यथ पारमेष्ठ्यं वैहायसानामुत यद्विहारम् ।अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥ २३ ॥
योगेश्वराणां गतिमामनन्ति बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मा ।न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥ २४ ॥
'चिन्मात्राणीन्द्रियाण्याहुर्मुक्तानामन्यदैव तु ।तान्येव जडयुक्तानि ह्यभिन्नानि स्वरूपतः। इति ब्राह्मे ॥पवनस्यापि अन्तरात्मा यः तम् । पवनश्चान्तरात्मा चेति वा ।'ईयुस्त्रीन् कर्मणा लोकान् ज्ञानेनैव तदुत्तरान् ।तत्र मुख्या हरिं यान्ति तदन्ये वायुमेव तु ॥अपक्वा ये न ते यान्ति वायुं वा हरिमेव वा ।स्थानमात्राश्रितास्ते तु पुनर्जनिविवर्जिताः। इति ब्रह्मतर्के ॥ २३,२४ ॥
वैश्वानरं याति विहायसा गतःसुषुम्नया ब्रह्मपथेन शोचिषा ।
हरेः शैंशुमारं चक्रम् । वैश्वानरोदस्तात् ।'वैश्वानरे द्युनद्यां वा सूर्ये वा देह एव वा ।विधूय सर्वपापानि यान्ति किंस्तुघ्नकेशवम्। इति ब्रह्माण्डे ॥ २५ ॥
योऽन्तः पचति भूतानां यस्तपत्यण्डमध्यगः ।सोऽग्निर्वैश्वानरो मार्गो देवानां पितृणां मुनेः ॥ २६ ॥
'पितृयानं देवयानं ब्रह्मयानमिति त्रिधा ।गच्छन्वैश्वानरं याति तस्मान्मार्गः स ईरितः॥ २६ ॥
देवयानं पिङ्गलाभिरहान्येति शतायुषा ।रात्रीरिडाभिः पितृणां विषुवत्तां सुषुम्नया ॥ २७ ॥
'दक्षिणाः पिङ्गलाः सर्वा इडा वामाः प्रकीर्तिताः ।नाड्योऽथ मध्यमा प्रोक्ता सुषुम्ना वेदपारगैः। इति भागवततन्त्रे ।'देवयानस्यमार्गस्था अहःशब्दाभिसञ्ज्ञिताः ।पितृयानस्यमार्गस्था रात्रिशब्दाह्वया मताः। इति बृहत्तन्त्रे ॥'शतायुर्मरणं चैव कालिकं परमावृतिः। इत्यभिधाने ॥पिङ्गलाभिः शतायुषा अहःसञ्ज्ञं देवयानम् इति । इडाभी रात्रिसञ्ज्ञं पितृयानम् ।'विषुवत्ता ब्रह्मयानं विशेषेण सुखं यतः ।पिङ्गला देवयानं स्यात्पिङ्गाख्यसुखदं यतः ॥इडाऽन्नदानात्पितृणामेवं मार्गाः प्रकीर्तिताः। इति ब्रह्मतर्के ॥ २७ ॥
तद्विश्वनाभिं त्वभिपद्य विष्णोरणीयसा विरजेनात्मनैकम् ।नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद्विबुधा रमन्ते ॥२८ ॥
'अशेषजगदाधारः शिंशुमारो हरिः परः ।सर्वे ब्रह्मविदो नत्वा तं यान्ति परमं पदम्। इति ब्रह्माण्डे ॥तद्विष्णोर्विश्वाधारं रूपं प्रतिपद्य यत्र कल्पायुषः तं महर्लोकं उपैति ।'मन्वन्तरायुषः स्वर्ग्या महर्लोके तु काल्पिकाः ।आब्रह्मणो जनाद्यास्तु महर्लोकेऽपि ये वराः। इति ब्राह्मे ॥ २८ ॥
न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नाधिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् ।यश्चित्ततोदः क्रिययाऽनिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥ ३० ॥
ऋते सत्यलोके । अनिदंविदाम् अब्रह्मविदाम् । दुरन्तदुःखं च प्रभवश्च ।'सर्वदुःखविहीना ये मुक्ताः प्रायस्तु तादृशाः ।अमुक्तास्तु जनाद्येषु विशेषेण तु सत्यगाः। इति वाराहे ॥'विष्णोर्लोकं तदैवैके यान्ति कालान्तरे परे ।आज्ञयैव हरेः केचिदपूर्तेः केचिदञ्जसा ।विहृत्यैवान्यलोकेषु मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह। इति वामने ॥ ३० ॥
ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय-स्तेनात्मनाऽपोऽनलमूधर्ि्न च त्वरन् ।
ब्रह्मणा सह । विशेषं पृथिवीम् । तेनात्मना पृथिव्यात्मना । ज्योतिर्मय अग्निप्रधानः ।'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यःइति परमात्मसदृशं किञ्चित् ।'ज्ञानिनः प्रलये सर्वे ब्रह्मणा सह पार्थिवम् ।परमात्मानमाविश्य वारिस्थं तत्समन्विताः ॥अग्निस्थं तद्युताश्चैव तेन नीताश्च वायुगम् ।नभोगतं तेन नीता मनःस्थं तद्युतास्तथा ॥ततो बुद्धिस्थमीशेशं ततोऽहङ्कारगं हरिम् ।ततो विज्ञाननामानं महत्तत्त्वगतं हरिम् ॥तत आनन्दनामानमव्यक्तस्थं जनार्दनम् ।प्राप्य नावृत्तिमायान्ति शान्तिभूता निरामयाः ॥येषां पदान्तरापेक्षा वाय्वादीनां महात्मनाम् ।आवृत्य ते पुनर्यान्ति ज्ञानिनोऽपि निरामयाः ।अनावृत्तिमसंमूढाः परानन्दैकभागिनः। इति ब्रह्मतर्के ॥'भूम्यब्गमन्ननामानं प्राणमग्न्यादिसंस्थितम् ।मानसं मन आदिस्थं विज्ञानं महति स्थितम् ॥आनन्दमव्यक्तगतं क्रमशो यान्ति देवताः ।ब्रह्माद्याः केचिदेवात्र तदन्ये क्रमशोऽपरान्।इति बृहत्तन्त्रे ॥ ३१ ॥
घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसंरूपन्तु दृष्ट्या स्पर्शं त्वचैव ।
'पञ्चेन्द्रियैर्ये विषया एष्टव्याः सर्वतो वराः ।मानसांश्चाखिलान् प्राप्य मुक्तौ मोदन्ति देवताः ।तथोद्रिक्तनिजानन्दा नित्यानन्दा असंवृताः। इति षाड्गुण्ये ॥ ३२ ॥
स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षात्सनातनोऽसौ भगवाननादिः ।
भूतसूक्ष्मेन्द्रियैश्च सह अनादिर्भगवानाकाशगो मनोमयं याति । नादवत्त्वात् सनातनः ।'नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः। इति मोक्षधर्मे ॥विविधकार्ययुक्तं विकार्यम् । देवमयं देवप्रधानम् ।'मनःस्थितो हरिर्नित्यं सर्वदेवेषु संस्थितः ।देवप्रधानकाल्लोकान्करोत्यनुगतः सदा। इति वाराहे ॥भूतसूक्ष्माणि पञ्चभूतानि जीवाश्च ।'पञ्चभूतैश्च शब्दाद्यैरिन्द्रियैर्जीवराशिभिः ।युक्त आकाशगो विष्णुर्मनःस्थमुपगच्छति। इति वामने ।योऽसावनादिर्मनोमयस्तमिति वा । विपर्ययश्चेत्तस्यैव गन्तृत्वमिति ज्ञापयितुम् । मतिस्थेन तेन मनःस्थेन च सह विज्ञानतत्वं याति ॥३३॥
विज्ञानतत्वं गुणसन्निरोधं तेनाऽत्मनाऽऽत्मानमुपैति शान्तिम् ।आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे ॥ ३४ ॥
एतां गतिं भागवतो गतो यः स वै पुनर्नेह विषज्जतेऽङ्ग ।एते सृती ते नृप वेदगीते त्वयाऽभिपृष्टेऽथ सनातने च ।
गुणसन्निरोधं निर्गुणं वासुदेवम् । वासुदेवे एतां गतिं गतो न विषज्जते ।'वासुदेवाश्रिता देवा ब्रह्माद्या मुक्तबन्धनाः ।भेददृष्ट्याभिमानेन चावृत्तिं नैव यान्ति ते ॥भुञ्जते तु पृथग्भोगान्नानन्दं तत्स्वरूपकम् ।स्वरूपं च पृथक्तेषामाविष्टग्रहवद्भवेत्इति ब्रह्माण्डे ॥ ३४,३५ ॥
न ह्यतोऽन्यः शिवः पन्थाः विश्रुतः संसृताविह ।वासुदेवे भगवति भक्तियोगो यतो भवेत् ॥ ३६ ॥
यद् भगवानाह । अतो भागवताख्याद्ग्रन्थात् शिवः पन्था न ॥ ३६ ॥
भगवान् ब्रह्म कार्त्स्न्येन त्रिरन्वीक्ष्य मनीषया ।तद्धि ह्यपश्यत्कूटस्थे रतिरात्मन् यतो भवेत् ॥ ३७ ॥
तद्भागवतं पुराणम् अपश्यत् ।'नित्यज्ञानेन सिद्धं च पुनः पुनरवेक्षते ।लीलयैव हरिर्देवो दुष्टानां मोहनाय च।इति ब्रह्मतर्के ॥ ३७ ॥
भगवान्सर्वभूतेषु लक्षितश्चात्मना हरिः ।दृश्यैर्बुध्यादिभिर्द्रष्टा लक्षणैरनुमापकैः ॥ ३८ ॥
लक्षितश्चास्मिन् पुराणे बुद्ध्यादीनां पारवश्यदर्शनादन्यो नियन्ताऽस्तीति ।'समाधावसमाधौ च निःस्वतन्त्रस्य देहिनः ।अन्यो नियन्ता भगवान्वासुदेवः परः प्रभुःइति ब्रह्मतर्के ॥ ३८ ॥
तस्मात्सर्वात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा ।श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान्नृणाम् ॥ ३९ ॥
यस्मात् भगवतैष एवोक्तः तस्मात् स एव श्रोतव्यादिः ॥ ३९ ॥