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Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S1: Difference between revisions

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== प्रथमोऽध्यायः ==
== प्रथमोऽध्यायः ==
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| verse_line1  = श्रीशुक उवाच—
| verse_line2  = वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप ।
| verse_line3  = आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ॥ १ ॥
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यः पर इति ॥ १ ॥
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| verse_line1  = श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।
| verse_line2  = अपश्यतामात्मतत्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥
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अपश्यताम् निद्रया ॥ २ ॥
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| verse_line1  = निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः ।
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| verse_line1  = देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि ।
| verse_line2  = तेषु प्रसक्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४ ॥
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असत्सु अभद्रेषु । 'सद्भावे साधुभावे च''इति वचनात् ॥ ४ ॥
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| verse_line1  = प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः ।
| verse_line2  = नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७ ॥
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ध्यानापेक्षया प्रायेण । नैर्गुण्यस्था मुक्ताः ।'एतत्सामगायन्नास्ते''इति श्रुतेः ॥ ७ ॥
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| verse_line1  = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।
| verse_line2  = अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८ ॥
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द्वापरे आदौ च । कृष्णावतारापेक्षया ।'व्यासः षट्शतवर्षीयो धृतराष्ट्रमजीजनत्''। इति स्कान्दे ॥ ८ ॥
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| verse_line1  = परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया ।
| verse_line2  = गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥
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परिनिष्ठितोऽपि मुक्तिरस्य भविष्यतीति निश्चितोऽपि ।'उदरं संशयः प्रोक्तः परिनिष्ठा विनिश्चयः''। इत्यभिधाने ॥'ऋष्युत्तमा देवताश्च विमुक्तौ परिनिश्चिताः ।तथाप्यधिकसौख्यार्थं यतन्ते शुभकर्मसु ।विमुक्तास्तु स्वभावेन नित्यं ध्यानादितत्पराः''। इति गारुडे ॥ ९ ॥
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| verse_line1  = नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः ।
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शुभार्थे भगवति ॥ १८ ॥
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| verse_line1  = तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।
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| verse_line3  = पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ १९ ॥
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विषयेभ्यो निर्गत्य तत्रैव मनो युंक्त्वाऽन्यन्न स्मरेत् ॥ १९ ॥
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भद्रं हरिम् ॥ २१ ॥
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यच्छब्दः प्रश्ने । 'यतश्चोदेति सूर्यः''। इत्यादिवत् ।'यच्छब्दस्तु परामर्शे प्रश्नार्थे चापि भण्यते''। इत्यभिधाने ॥ २२ ॥
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| verse_line3  = स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया ॥ २३ ॥
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यथेत्यस्य जितासन इत्यादि । यत्र स्थूले । यादृशीत्यस्य विशेष इत्यादि ॥ २३ ॥
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विशेष आण्डकोशः ।'शिलावत्तस्य देहोऽयमाण्डकोशस्तु सावृतिः ।तत्तन्त्रत्वान्न तत्संस्थदुःखभोगोऽस्य न क्वचित्''।इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ २४ ॥
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'आण्डकोशो विराट्प्रोक्तो विशेषेण प्रकाशनात् ।वैराजस्तद्गतो विष्णुरथवा सर्वतो वरः''। इति भागवततन्त्रे ॥२५॥
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प्रतिमापेक्षयाऽङ्गानि स्वरूपापेक्षया तज्जानि तदाश्रितानि च ॥ २६ ॥
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः ॥}}
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बहुरूपत्वाद्दंष्ट्रार्यमेन्दू इत्यादि ।'प्रतिमापेक्षयाङ्गानि भूरादीनि स्वरूपतः ।तदाश्रितानि तज्जानि बह्वङ्गत्वं बहुत्वतः''। इति ब्रह्मतर्के ॥ ३१ ॥
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[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]]
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]]

Revision as of 05:33, 8 April 2026

प्रथमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच—वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप ।


यः पर इति ॥ १ ॥
श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।अपश्यतामात्मतत्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥


अपश्यताम् निद्रया ॥ २ ॥
निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः ।दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥ ३ ॥


देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि ।तेषु प्रसक्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४ ॥


असत्सु अभद्रेषु । 'सद्भावे साधुभावे चइति वचनात् ॥ ४ ॥
प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः ।नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७ ॥


ध्यानापेक्षया प्रायेण । नैर्गुण्यस्था मुक्ताः ।'एतत्सामगायन्नास्तेइति श्रुतेः ॥ ७ ॥
इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८ ॥


द्वापरे आदौ च । कृष्णावतारापेक्षया ।'व्यासः षट्शतवर्षीयो धृतराष्ट्रमजीजनत्। इति स्कान्दे ॥ ८ ॥
परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया ।गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥


परिनिष्ठितोऽपि मुक्तिरस्य भविष्यतीति निश्चितोऽपि ।'उदरं संशयः प्रोक्तः परिनिष्ठा विनिश्चयः। इत्यभिधाने ॥'ऋष्युत्तमा देवताश्च विमुक्तौ परिनिश्चिताः ।तथाप्यधिकसौख्यार्थं यतन्ते शुभकर्मसु ।विमुक्तास्तु स्वभावेन नित्यं ध्यानादितत्पराः। इति गारुडे ॥ ९ ॥
नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः ।मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥ १८ ॥


शुभार्थे भगवति ॥ १८ ॥
तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।मनो निर्विषयं युंक्त्वा ततः किञ्चिन्न संस्मरेत् ।


विषयेभ्यो निर्गत्य तत्रैव मनो युंक्त्वाऽन्यन्न स्मरेत् ॥ १९ ॥
यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः ।आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥ २१ ॥


भद्रं हरिम् ॥ २१ ॥
राजोवाच—यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता ।


यच्छब्दः प्रश्ने । 'यतश्चोदेति सूर्यः। इत्यादिवत् ।'यच्छब्दस्तु परामर्शे प्रश्नार्थे चापि भण्यते। इत्यभिधाने ॥ २२ ॥
श्रीशुक उवाच—जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः ।


यथेत्यस्य जितासन इत्यादि । यत्र स्थूले । यादृशीत्यस्य विशेष इत्यादि ॥ २३ ॥
विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् ।यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च यत् ॥ २४ ॥


विशेष आण्डकोशः ।'शिलावत्तस्य देहोऽयमाण्डकोशस्तु सावृतिः ।तत्तन्त्रत्वान्न तत्संस्थदुःखभोगोऽस्य न क्वचित्।इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ २४ ॥
आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन्सप्तावरणसंयुते ।वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान्धारणाश्रयः ॥ २५ ॥


'आण्डकोशो विराट्प्रोक्तो विशेषेण प्रकाशनात् ।वैराजस्तद्गतो विष्णुरथवा सर्वतो वरः। इति भागवततन्त्रे ॥२५॥
पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् ।महातलं विश्वसृजस्सुगुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥२६॥


प्रतिमापेक्षयाऽङ्गानि स्वरूपापेक्षया तज्जानि तदाश्रितानि च ॥ २६ ॥
छन्दांस्यनन्तस्य गिरो गृणन्ति दंष्ट्राऽर्यमेन्दूडुगणा द्विजानि ।हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥३१॥


Template:AuthorNote

बहुरूपत्वाद्दंष्ट्रार्यमेन्दू इत्यादि ।'प्रतिमापेक्षयाङ्गानि भूरादीनि स्वरूपतः ।तदाश्रितानि तज्जानि बह्वङ्गत्वं बहुत्वतः। इति ब्रह्मतर्के ॥ ३१ ॥