Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S4: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== चतुर्थोऽध्यायः == | == चतुर्थोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V04 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तस्य पुत्रो महायोगी समदृक् निर्विकल्पकः । | |||
| verse_line2 = एकान्तगतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V04 | |||
| id = BTN_C01_S04_V04_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
निर्विकल्पकः । मदीयं तदीयमिति भेदमपहाय सर्वमीश्वराधीनमिति विज्ञाय स्थितः ।'साम्यमीश्वररूपेषु सर्वत्र तदधीनताम् ।पश्यति ज्ञानसम्पत्त्या विनिद्रो यः स योगवित्''। इति ब्राह्मे ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V13 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = सूत उवाच— | |||
| verse_line2 = द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये । | |||
| verse_line3 = जातः पराशराद्योगी वासव्यां कलया हरेः ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V13 | |||
| id = BTN_C01_S04_V13_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
तृतीये द्वापरे युगे पर्यवसानं प्राप्ते सति ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V17 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुसा । | |||
| verse_line2 = सर्ववर्णाश्रमाणां यद् दध्यौ चिरममोघदृक् ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V17 | |||
| id = BTN_C01_S04_V17_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
नित्यज्ञानस्य चिद्दृष्टिर्लोकदृष्ट्यपेक्षया–'सर्वज्ञोऽप्यज्ञवद्देवः सर्वशक्तिरशक्तवत् ।प्रत्यापयति लोकानामज्ञानं मोहनाय च''। इति कौर्मे ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V24 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । | |||
| verse_line2 = कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह । | |||
| verse_line3 = इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V24 | |||
| id = BTN_C01_S04_V24_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'भारतं ब्राह्मणादीनां वेदार्थपरिवित्तये ।त एव वेदास्त्वन्येषां नर्ते तत्कस्यचित् सुखम्''। इति स्कान्दे ॥२४॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V25 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः । | |||
| verse_line2 = सर्वात्मकेनाऽपि यदा नातुष्यद् हृदयं ततः ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V26 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = नातिप्रसन्नहृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ । | |||
| verse_line2 = वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं चोवाच धर्मवित् ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V26 | |||
| id = BTN_C01_S04_V26_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
अतोषोऽनलम्बुद्धिः ।'श्रुत्वा कथां न तुष्यामि हरेरद्भुतकर्मणः''इति मात्स्ये ।अप्रसादश्च स एव ।'कः प्रसन्नो भवेद् दिव्यां कथां शृण्वन् हरेः पराम्''इति च ॥२५,२६॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V27 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः । | |||
| verse_line2 = मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V27 | |||
| id = BTN_C01_S04_V27_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
आचारापेक्षया धृतव्रतत्वादिपरिपूर्णस्य ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V29 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः । | |||
| verse_line2 = असम्पन्न इवाऽभाति ब्रह्मवर्चस्विसत्तमः ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V29 | |||
| id = BTN_C01_S04_V29_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
दैह्यः देहरूपः । आत्मना विभुः स्वत एव व्याप्तः ।'तस्य सर्वावतारेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ।देहदेहिविभेदश्च न परे विद्यते क्वचित् ॥सर्वेऽवतारा व्याप्ताश्च सर्वे सूक्ष्माश्च तत्त्वतः ।ऐश्वर्ययोगाद् भगवान् क्रीडत्येवं जनार्दनः''॥ इति महासंहितायाम् ।अवतारप्रयोजनासम्पत्त्याऽसम्पन्न इव । ब्रह्मवर्चसयुक्तानामुत्तमः ॥२९॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V30 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः । | |||
| verse_line2 = प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V30 | |||
| id = BTN_C01_S04_V30_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
पुनरपेक्षितत्वान्न प्रायेण निरूपिताः ।'यथा तु भारते देवो न तथाऽन्येषु केषुचित् ।उच्यते न तथाऽपीशं जानन्त्यज्ञा जनार्दनम्''। इति स्कान्दे ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V31 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| section_id = BTN_C01_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः । | |||
| verse_line2 = कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V31 | |||
| id = BTN_C01_S04_V31_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
खेदोऽनलम्बुद्धिः ।'अतुष्टिरप्रसादश्च खेदोऽतृप्तिस्तथैव च ।अनलत्वं वदन्त्येते सर्वे पर्यायवाचकाः''। इति ब्राह्मे ।मन्यमानस्य स्वेच्छया ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:32, 8 April 2026
चतुर्थोऽध्यायः
तस्य पुत्रो महायोगी समदृक् निर्विकल्पकः ।एकान्तगतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ ४ ॥
निर्विकल्पकः । मदीयं तदीयमिति भेदमपहाय सर्वमीश्वराधीनमिति विज्ञाय स्थितः ।'साम्यमीश्वररूपेषु सर्वत्र तदधीनताम् ।पश्यति ज्ञानसम्पत्त्या विनिद्रो यः स योगवित्। इति ब्राह्मे ॥ ४ ॥
सूत उवाच—द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये ।
तृतीये द्वापरे युगे पर्यवसानं प्राप्ते सति ॥ १३ ॥
दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुसा ।सर्ववर्णाश्रमाणां यद् दध्यौ चिरममोघदृक् ॥ १७ ॥
नित्यज्ञानस्य चिद्दृष्टिर्लोकदृष्ट्यपेक्षया–'सर्वज्ञोऽप्यज्ञवद्देवः सर्वशक्तिरशक्तवत् ।प्रत्यापयति लोकानामज्ञानं मोहनाय च। इति कौर्मे ॥ १७ ॥
स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।
'भारतं ब्राह्मणादीनां वेदार्थपरिवित्तये ।त एव वेदास्त्वन्येषां नर्ते तत्कस्यचित् सुखम्। इति स्कान्दे ॥२४॥
एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः ।सर्वात्मकेनाऽपि यदा नातुष्यद् हृदयं ततः ॥ २५ ॥
नातिप्रसन्नहृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ ।वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं चोवाच धर्मवित् ॥ २६ ॥
अतोषोऽनलम्बुद्धिः ।'श्रुत्वा कथां न तुष्यामि हरेरद्भुतकर्मणःइति मात्स्ये ।अप्रसादश्च स एव ।'कः प्रसन्नो भवेद् दिव्यां कथां शृण्वन् हरेः पराम्इति च ॥२५,२६॥
धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः ।मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २७ ॥
आचारापेक्षया धृतव्रतत्वादिपरिपूर्णस्य ॥ २७ ॥
अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः ।असम्पन्न इवाऽभाति ब्रह्मवर्चस्विसत्तमः ॥ २९ ॥
दैह्यः देहरूपः । आत्मना विभुः स्वत एव व्याप्तः ।'तस्य सर्वावतारेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ।देहदेहिविभेदश्च न परे विद्यते क्वचित् ॥सर्वेऽवतारा व्याप्ताश्च सर्वे सूक्ष्माश्च तत्त्वतः ।ऐश्वर्ययोगाद् भगवान् क्रीडत्येवं जनार्दनः॥ इति महासंहितायाम् ।अवतारप्रयोजनासम्पत्त्याऽसम्पन्न इव । ब्रह्मवर्चसयुक्तानामुत्तमः ॥२९॥
किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः ।प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३० ॥
पुनरपेक्षितत्वान्न प्रायेण निरूपिताः ।'यथा तु भारते देवो न तथाऽन्येषु केषुचित् ।उच्यते न तथाऽपीशं जानन्त्यज्ञा जनार्दनम्। इति स्कान्दे ॥ ३० ॥
तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ।कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३१ ॥
खेदोऽनलम्बुद्धिः ।'अतुष्टिरप्रसादश्च खेदोऽतृप्तिस्तथैव च ।अनलत्वं वदन्त्येते सर्वे पर्यायवाचकाः। इति ब्राह्मे ।मन्यमानस्य स्वेच्छया ॥ ३१ ॥