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| == दशमोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C10]] |
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| | title = दशमोऽध्यायः
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| उपासनार्थं विभूतीर्विशेषकारणत्वं च केषाञ्चिदनेन अध्यायेनाह-
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| | verse_line1 = भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।
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| | verse_line2 = यत्तेहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥
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| | verse_line1 = न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
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| | verse_line2 = अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥
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| उपलक्षणार्थं सुरगणा इत्यादि ॥ १,२ ॥
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| | verse_line1 = यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
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| | verse_line2 = असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥
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| अनस्यापि आदिः अनादिः ॥ ३ ॥
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| | verse_line1 = बुदि्धर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
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| | verse_line2 = सुखं दुःखं भवोभावो भयं चाभयमेव च॥४ ॥
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| | verse_line1 = अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोयशः ।
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| | verse_line2 = भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५ ॥
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| 'बुदि्धर्बोधनिधित्वात् तदन्तःकरणमुच्यते'' । इति शब्दनिर्णये ।॥ ४-५ ॥
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| | verse_line1 = महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
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| | verse_line2 = मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| 'मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।वसिष्ठश्च महातेजाः पूर्वे सप्तर्षयः स्मृऽताः'' ॥ इति ब्राह्मे ।'मनवो बोधवैशेष्याद् देवा ब्रह्मादयः स्मृऽताः ।विप्रादिवर्णभेदेन चत्वारो बहवोपि ते ।दीनत्वाद् देवनामानस्त्वन्ये ब्रह्मादिनामकाः ।अवैष्णवकृतो यज्ञो दीनैर्देवैस्तु भुज्यते ।वैष्णवैस्तु कृतो यज्ञो देवैर्हि मनुनामकैः ।मरीच्याद्यास्तु तत्पुत्रा मानवा नामतः स्मृऽताः ।तत्पुत्रपौत्रा मुनयस्तथा मानवमानवाः ।तेभ्यो मनुष्या इत्येषा सृष्टिर्विष्णोः समुत्थिता'' ॥ इति महाविष्णुपुराणे ॥॥ ६ ॥
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| | verse_line1 = एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
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| | verse_line2 = सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥
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| 'युज्यते येन योगोसावुपायः शक्तिरेव वा'' । इति च । विशिष्टभवनं विभूतिः । महत्त्वम् । विविधभवनं वा । योगः सामर्थ्यम् ॥ ७ ॥
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| | verse_line1 = अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
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| | verse_line2 = इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥
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| | verse_line1 = मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
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| | verse_line2 = कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥
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| | verse_line1 = तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
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| | verse_line2 = ददामि बुदि्धयोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥
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| | verse_line1 = तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
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| | verse_line2 = नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| | text =
| |
| 'भजन्ते माम्'' इत्यनेन जीवेश्वरैक्यशङ्कां निवर्तयति ॥ ८ ॥
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| मद्गतप्राणाः मद्विषयचेष्टाः ॥ ९ ॥
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| | verse_line1 = परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
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| | verse_line2 = पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥
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| | verse_line1 = आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
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| | verse_line2 = असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥
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| | verse_line1 = सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
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| | verse_line2 = न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥
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| | verse_line1 = स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
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| | verse_line2 = भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥
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| | verse_line1 = वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
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| | verse_line2 = याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥
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| | verse_line1 = कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
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| | verse_line2 = केषु केषु च भावेषु चिन्त्योसि भगवन्मया॥१७ ॥
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| | verse_line1 = विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
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| | verse_line2 = भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेमृतम्॥१८ ॥
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| | verse_line1 = हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
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| | verse_line2 = प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥
| |
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| | verse_line1 = अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
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| | verse_line2 = अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥२० ॥
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| | verse_line1 = आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
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| | verse_line2 = मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥
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| | verse_line1 = वेदानां सामवेदोस्मि देवानामस्मि वासवः ।
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| | verse_line2 = इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२ ॥
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| | verse_line1 = रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
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| | verse_line2 = वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३ ॥
| |
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| | verse_line1 = पुरोधसां च मुख्यं मां विदि्ध पार्थ बृहस्पतिम् ।
| |
| | verse_line2 = सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥
| |
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| | verse_line1 = महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
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| | verse_line2 = यज्ञानां जपयज्ञोस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५ ॥
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| | verse_line1 = अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
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| | verse_line2 = गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६ ॥
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| | verse_line1 = उच्चैःश्रवसमश्वानां विदि्ध माममृतोद्भवम् ।
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| | verse_line2 = ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७ ॥
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| | verse_line1 = आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
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| | verse_line1 = अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
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| | verse_line1 = प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
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| | verse_line2 = मृगाणां च मृगेन्द्रोहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥
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| | verse_line1 = पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
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| | verse_line1 = नान्तोस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
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| 'येषां विष्णुस्वरूपाणां सन्निधेरन्यवस्तुषु ।
| |
| विशिष्टत्वं स्वजातेः स्याद् विभूत्याख्यानि तानि तु ।
| |
| ब्रह्मनामा ब्रह्मगतः सर्वदैवतसञ्चयात् ।
| |
| आधिक्यहेतुर्भगवान् सामस्थः सामनामकः ।
| |
| आधिक्यहेतुर्वेदेभ्यस्तथाश्वत्थस्थितो हरिः ।
| |
| उत्कर्षहेतुर्वृक्षेभ्यो य एवाश्वत्थनामकः'' ॥ इत्यादि विभूतितत्त्वे ।
| |
| 'केषु केषु च भावेषु'' इत्युक्तत्वाच्च ब्रह्मादिजीवेभ्योन्यदेव विभूतिरूपम् ।
| |
| 'द्विविधं वैभवं रूपं प्रत्यक्षं च तिरोहितम् ।
| |
| कपिलव्यासकृष्णाद्यं प्रत्यक्षं वैभवं स्मृऽतम् ।
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| भिन्नं ब्रह्मादिजीवेभ्यो जडेभ्यश्चापि तद्गतम् ।
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| स्वजात्याधिक्यदं तेषां तत् तिरोहितवैभवम्'' ॥ इत्यादि च ।
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| 'आत्माततगुणत्वेन रवज्ञेयो यतो रविः ।
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| उदवन्मेघचलनान्मरीचिः साम साम्यतः ।
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| सुखात् सुखत्वात्तु शशी वेदो वेदनतो हरिः ।
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| वासवर्ती वासवोसौ चेतोनेता तु चेतना ।
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| पालकैर्वननीयत्वात् पवनो बोधनान्मनः ।
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| पावकः शोधनान्मेरुरीरो यन्मास्य सागरः ।
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| सारस्य गरणात् स्कन्दो जगतः स्कन्दनाद् भृगुः ।
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| भर्जनाज्जपयज्ञश्च जातपो याज्य एव च ।
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| अश्वाकारस्थितोश्वत्थ ऐरा श्रीश्च तदाश्रयः ।
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| ऐरावतो नराणां यद् दद्यात् सर्वं स नारदः ।
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| ह्रीश्रीसमाश्रयत्वाच्च हिमालय इतीरितः ।
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| वर्ज्यत्वादरिभिर्वज्रो वैनतेयो नतास्पदः ।
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| वासुकिर्वाससुखदः कन्दर्पः सुखभेदपः ।
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| अर्यमा ज्ञेयमातृत्वात् काल आकालनादपि ।
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| वरुणो वरणाद् द्वन्द्वो द्विरूपोन्तर्बहिर्यतः ।
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| मकरो मानकर्तृत्वाद् यमः संयमनाद् विभुः ।
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| प्रह्लादः स महानन्दो मृगेन्द्रो मृगयत्पतिः ।
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| जाह्नवी जहतां स्थानमध्यात्मं चात्मनां पतिः ।
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| विद्या ज्ञप्तिस्वरूपत्वाद् वादो वाच्यत्वतो हरिः ।
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| कीर्त्यो वक्ताश्रयः कीर्तिर्वाक् श्रीरिति च नामतः ।
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| स्मरणीयः स्मृऽतिर्मेधा क्षमारूपस्तथेर्यते ।
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| द्यूतं क्रीडापरत्वाच्च गायत्री त्राति गायकान् ।
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| सत्त्वं साधुगुणत्वाच्च दण्डनाद्दण्ड उच्यते ।
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| बृहत्सारोप्यमेयश्च बृहत्सामोशनोशतेः ।
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| शुभाशुभज्ञानकरः कुसुमाकर ईरितः ।
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| ज्ञानं ज्ञानात्मतो मौनं मुनीड््यो नीतिरानयन् ।
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| मार्गाणामन्तगत्वात्तु मार्गशीर्षः प्रकीर्तितः ।
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| सुखं पिबन् लीलयैव कपिलो व्यास एव च ।
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| विशिष्टत्वाद् विष्णुनामा विशिष्टप्राणसौख्यतः ।
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| एवं नानागुणैर्विष्णुर्नानानामभिरीरितः ।
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| नानाप्राण्यादिसंस्थश्च विभूतिरिति शब्दितः ।
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| शश्यादिषु विजातीयस्वाम्यदः सारदः क्वचित् ।
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| शर्वादिषु सजातीयश्रैष्ठ्यदत्वेन संस्थितः ।
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| शक्रोशनार्जुनाद्येषु सजातीयैकदेशतः ।
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| देवेष्वभ्यधिको ब्रह्मा यतो विष्णोरनन्तरः ।
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| कवित्वादिगुणेष्वेवं यत्समो नास्ति कश्चन ।
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| तथा भीमश्च पार्थेषु ज्ञानं यज्ञेषु चोत्तमम् ।
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| सुदर्शनश्चायुधेषु वेदेष्वृग्वेद एव च'' ॥ इत्यादि विभूतितत्त्वे ।
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| क्वचित् साम्न आधिक्यमभिमान्यपेक्षया 'ऋचः श्रीर्गीरुमाद्याश्च साम्नः प्राणशिवादयः'' इत्याद्यभिमानिभेदात् । तत्रापि यथायोग्यम् ।
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| ॥ २१-४० ॥
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| मम तेजोंशेन संयुक्तं भवति ॥ ४१ ॥
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| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोध्यायः ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये दशमोध्यायः ॥
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| 'किं ज्ञातेन'' इति वक्ष्यमाणस्याधिकफलत्वज्ञापकमेव । अन्यथोक्तेरेव वैयर्थ्यात् ।
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| 'अन्याधिक्यज्ञापनार्थं शुभं चाक्षिप्यते क्वचित् ।
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| न तावतास्य निन्द्यत्वं ज्ञेयैवान्यवरिष्ठता ।
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| उभयं मिलितं चैव ततोप्यधिकशोभनम्'' ॥ इति च ॥४२ ॥
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