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| == प्रथमोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C01]] |
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| | chapter_num = 1
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| | title = प्रथमोऽध्यायः
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| समस्तगुणसम्पूर्णं सर्वदोषविवर्जितम् ।
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| नारायणं नमस्कृत्य गीतातात्पर्यमुच्यते ॥
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| शास्त्रेषु भारतं सारं तत्र नामसहस्रकम् ।
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| वैष्णवं कृष्णगीता च तज्ज्ञानान्मुच्यतेञ्जसा ॥
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| न भारतसमं शास्त्रं कुत एवानयोः समम् ।
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| भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ॥
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| देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैर्ऋषिभिश्च समन्वितैः ।
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| व्यासस्यैवाज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम् ।
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| महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते ॥
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| निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
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| स्वयं नारायणो देवैर्ब्रह्मरुद्रेन्द्रपूर्वकैः ॥
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| अर्थितो व्यासतां प्राप्य केवलं तत्त्वनिर्णयम् ।
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| चकार पञ्चमं वेदं महाभारतसञ्ज्ञितम् ॥ इति ब्रह्माण्डे ।
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| तत्र साक्षादिन्द्रावतारमुत्तमाधिकारिणमात्मनः प्रियतमर्जुनं क्षत्रियाणां विशेषतोपि परमधर्मं नारायणद्वितदनुबन्धिनिग्रहं बन्धुस्नेहादधर्मत्वेनाशङ्क्य ततो निवृत्तप्रायं स्वविहितवृत्त्या भक्त्या भगवदाराधनमेव परमो धर्मः, तद्विरुद्धः सर्वोप्यधर्मः, भगवदधीनत्वात् सर्वस्येति बोधयति भगवान् नारायणः । सर्वं चैतदत्रैवावगम्यते -
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| ''अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।
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| ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि'' ॥ (२-३३)
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| इत्यादिना युद्धस्य स्वधर्मत्वम् ।
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| यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
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| स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिदि्धं विन्दति मानवः ॥ (१८-४६)
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| श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
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| स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ (१८-४७)
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| सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।
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| इष्टोसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
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| मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
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| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे ॥
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| सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
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| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (१८-६४-६६)
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| इत्यादिना स्वधर्मेणैव भगवदाराधनस्यैव कर्तव्यत्वं तदन्यस्य त्याज्यत्वं च ।
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| नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
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| शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥
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| भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन ।
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| ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ (११-५३, ५४)
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| इत्यादिना विष्णुभक्तेरेव सर्वसाधनोत्तमत्वं परोक्षापरोक्षज्ञानयोर्ज्ञानिनोपि मोक्षस्य तदधीनत्वं च ।
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| मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
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| निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ (११-५५)
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| इत्यादिना भक्तस्यापि तत्कर्म विकर्मत्यागश्च ।
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| ''कुरु कर्मैव तस्मात् त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ।" (४-१५)
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| इत्यादिना ज्ञानिनोपि भगवत्कर्म ।
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| सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
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| देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ (११-५२)
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| इष्टोसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् । (१८-६४)
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| दैवीसम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
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| मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोसि पाण्डव ॥ (१६-५)
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| महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
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| भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ (९-१३)
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| 'दर्शयात्मानमव्ययं''
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| दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् । (११-९)
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| इत्यादिनार्जुनस्योत्तमाधिकारित्वमपरोक्षज्ञानित्वं च ।
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| न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
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| अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥
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| यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
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| असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
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| बुदि्धर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । (१०, २-४)
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| 'महर्षयः सप्त पूर्वे'' ... । (१०-६)
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| 'एतां विभूतिं योगं च'' ... । (१०-७)
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| अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
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| इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ (१०-८)
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| 'तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
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| नाशयामि'' (१०-११)
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| 'तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्'' । (१२-७)
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| भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
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| सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ (५-२९)
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| ज्ञानं तेहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
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| यज्ज्ञात्वा नेह भूयोन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ (७-२)
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| अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ।
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| मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय ॥
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| मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । (७-६,७)
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| इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ॥
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| ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात् ।
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| 'राजविद्या राजगुह्यम्'' ... । (९-१,२)
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| मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
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| मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ (९-४)
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| 'भूतभृन्न च भूतस्थः'' ... । (९-५)
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| 'न त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः कुतोन्यः'' (११-४३)
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| परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । (१४-१)
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| मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ॥
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| सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत । (१४-३)
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| ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ॥
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| शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च । (१४-२७)
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| द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
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| क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोक्षर उच्यते ॥
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| उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
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| यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
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| यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः ।
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| अतोस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
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| यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
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| स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
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| इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
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| एतद्बुध्वा बुदि्धमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ (१५, १६-२०)
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| न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
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| नानवाप्तमवाप्तव्यम् ... ॥ (३-२२)
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| इत्यादिना सर्वस्माद् भगवतो भेदः, सर्वस्य तदधीनत्वं, तस्यानन्याधीनत्वं, सर्वोत्तमत्वं, सर्वगुणपूर्णत्वं, सर्वशास्त्राणां तत्परत्वं, तथा तज्ज्ञानादेव मोक्ष इत्यादि ।
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| 'अधा ते विष्णो विदुषा• चिदर्ध्यः स्तोमो• यज्ञश्च राध्यो• हविष्म•ता'' । (ऋ.मं १, सू. १५६-१)
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| पश्यन्नपीममात्मानं कुर्यात् कर्माविचारयन् ।
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| यदात्मनः सुनियतमानन्दोत्कर्षमाप्नुयात् ।
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| भक्त्या प्रसन्नः परमो दद्याज्ज्ञानमनाकुलम् ।
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| भक्तिं च भूयसीं ताभ्यां प्रसन्नो दर्शनं व्रजेत् ॥
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| ततोपि भूयसीं भक्तिं दद्यात्ताभ्यां विमोचयेत्
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| मुक्तोपि तद्वशो नित्यं भूयो भक्तिसमन्वितः ।
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| सान्द्रानन्दस्वरूपैव भक्तिर्नैवात्र साधनम्
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| ब्रह्मरुद्ररमादिभ्योप्युत्तमत्वं स्वतन्त्रताम् ॥
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| सर्वस्य तदधीनत्वं सर्वसद्गुणपूर्णताम् ।
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| निर्दोषत्वं च विज्ञाय विष्णोस्तत्राखिलाधिकः ॥
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| स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तः सर्वोपायोत्तमोत्तमः ।
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| तेनैव मोक्षो नान्येन दृष्ट्यादिस्तस्य साधनम् ॥
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| अधमाधिकारिणो मर्त्या मुक्तावृष्यादिकाः समाः ।
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| अधिकार्युत्तमा देवाः प्राणस्तत्रोत्तमोत्तमः ।
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| नैव देवपदं प्राप्ता ब्रह्मदर्शनवर्जिताः ।
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| तिरोहितं तथाप्येते शृण्वन्ति क्रीडयाथवा ॥
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| बहुवारतदभ्यासात्तिरोभावोपि नो भवेत् ।
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| यथा व्यासानुशिष्टानां देवानां क्षत्रजन्मनाम् ॥
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| पार्थानामतिरोधानं ज्ञानं सुस्थिरतां गतम् ।
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| अस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।
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| विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विना विरावत् ॥ (ऋ. ७-४०-५)
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| 'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।
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| स मुनिर्भूत्वा समचिन्तयत्तत एते व्यजायन्त
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| विश्वो हिरण्यगर्भोग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्रा इति'' ।श्व
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| 'एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः'' ।
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| 'वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः'' ।
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| 'यं यं कामयते विष्णुस्तं ब्रह्माणं च शङ्करम् ।
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| शक्रं सूर्यं यमं स्कन्दं कुर्यात् कर्तास्य न क्वचित्'' ॥
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| सर्वोत्कर्षे देवदेवस्य विष्णोर्महातात्पर्यं नैव चान्यत्र सत्यम् ।
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| अवान्तरं तत्परत्वं तदन्यत् सर्वागमानां पुरुषार्थस्ततोतः ॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
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| 'परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति'' । (ऋ. ६-९९-१)
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| 'अनन्तगुणमाहात्म्यो निर्दोषो भगवान् हरिः ।
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| न समो वाधिको वापि विद्यते तस्य कश्चन ।
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| नासीन्न च भविष्यो वा परतः स्वत एव च'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।
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| 'यस्त्वात्मरतिरेव स्याद्'' इत्यादि तु मुक्तविषयम् ।
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| यस्त्वेवात्मरतो मुक्तः कार्यं तस्यैव नास्ति हि ।
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| तस्मात् कुर्वीत कर्माणीत्याह कृष्णोर्जुनं स्मयन् ॥ इति च स्कान्दे ।
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| ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानाम् इत्यादि तु बाह्यकर्मसङ्कोचापेक्षया ।
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| न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । (३-५)
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| शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः । (३-८)
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| एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
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| कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्'' । (१८-६)
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| 'ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत ।''
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| न सर्वकर्मणां त्यागः कस्यचिद् भवति क्वचित् ।
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| त्यागिनो यतयोपि स्युः सङ्कोचाद् बाह्यकर्मणाम् । इत्यादि ।
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| 'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः'' इत्यादि चोत्पन्नज्ञानतिरो-भावनिवृत्त्यर्थम् ॥
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| | verse_line1 = योत्स्यमानानवेक्षेहं य एतेत्र समागताः ।
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| | verse_line2 = धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥२३ ॥
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| | verse_line1 = एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
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| | verse_line1 = भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
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| | verse_line1 = तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
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| | verse_line1 = श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
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| | verse_line1 = कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
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| | verse_line1 = सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
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| | verse_line1 = गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
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| | verse_line1 = निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
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| | verse_line1 = न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
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| | verse_line1 = येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
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| | verse_line1 = आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
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| | verse_line1 = निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
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| ॥ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोध्यायः ॥
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| [[Category:Bhagavadgitatatparya]] | |