Yamakabharatam: Difference between revisions
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== | == यमकभारतम् == | ||
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| verse_line1 = ध्यायेत् तं(ध्यायेत्) परमानन्दं यन्माता पतिमयदपरमानन्दम् ।उज्झितपरमानं दम्पत्याद्याद्याश्रमैः सदैव परमानन्दम् ॥१॥ | |||
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| verse_line1 = यस्य करालोलं चक्रं कालः परः स हि कराऽलोऽम् ।यस्य गदा पवमानः सन्(गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा) यो व्यासोऽभवत् सदापवमानः ॥२॥ | |||
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| verse_line1 = यस्य रमा न मनोगं जगृहे विश्वम्भराऽपि न मनोऽगम् ।यस्य पुमानानन्दं भुङ्क्ते यद् धाम कपतिमानानन्दम् ॥३॥ | |||
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| verse_line1 = परमेषु यदा तेजः परमेषु चकार वासुदेवोऽजः ।मानधि बिभ्रत्सु मनो माऽनधिमाऽऽसीन्न वासुदेवो जः ॥४॥ | |||
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| verse_line1 = सोऽजनि देवक्यन्ते यस्मादनुकम्पनावदेव क्यन्ते ।अवदन् देव क्यं ते भुवनं हि सुराः सदैवदेऽव क्यन्ते ॥५॥ | |||
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| verse_line1 = नीतो वसुदेवेन स्वततेन स गोकुलं सुवसुदेवे न(सवसुदेवेन) ।तत्र यशोदा तनयं मेने कृष्णं स्वकीयमवदातनयम् ॥६॥ | |||
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| verse_line1 = ववृधे गोकुसमध्याद्यो(यो) देवो विश्वमद्भुताकुलमध्यात् ।तत्र च पूतनिकाया वधमकरोत् यन्निजाः सुपूतनिकायाः(पूतनिकायाः) ॥७॥ | |||
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| verse_line1 = अधुनोच्छकटं लोली पादाङ्गुष्ठेन वातपेशशकटं लोली ।अतनोद् रक्षामस्य स्वाज्ञानाद् गोपिका सदेरक्षामस्य ॥८॥ | |||
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| verse_line1 = मुखलालनलोला तन्मुखगं जगदचष्ट सालनलोलातत् ।नाध्यैन्मायामस्य जगत्प्रभोः स्वधिकतततमायामस्य(स्वाधिकतततमायामस्य) ॥९॥ | |||
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| verse_line1 = तस्य सुशर्माण्यकरो दरिणो गर्गः सदुक्तिकर्माण्यकरोत् ।अवदन्नामानमयं जगदादि वासुदेवनामानमयम् ॥१०॥ | |||
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| verse_line1 = तस्य सखा बलनामा ज्येष्ठो भ्राताऽथ यन्निजाबलना मा ।यस्य च पर्यङ्कोऽयं पूर्वतनो विष्णुमजसपर्यं कोऽयम् ॥११॥ | |||
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| verse_line1 = तेन हतो वातरयस्तृणचक्रो नाम दितिसुतोऽवातरयः ।हरमाणो (बा)वालतमं स्वात्मानं कण्ठरोधिनाऽवालतमम् ॥१२॥ | |||
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| verse_line1 = सोऽवनिमध्ये रङ्गन् अरिदरयुग् बालरूपमध्येरं गन् ।अमुषन्नवनीतमदः (स्व)सगोकुले गोपिकासु नवनीतमदः ॥१३॥ | |||
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| verse_line1 = तन्माता कोपमिता तमनुससारात्मवादवाकोपमिता(त्मवाकोपमिता) ।जगृहे सा नमनं तं देवं (तं चिन्तयैव)तच्चिन्तयैव सानमनन्तम् ॥१४॥ | |||
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| verse_line1 = अथ साऽन्तरिताऽमानं विष्णुं विश्वोद्भवं (तदाऽ)सदान्तरितामानम् ।अनयद् दामोदरतां योऽरमयत् सुन्दरीं निजामोदरताम् ॥१५॥ | |||
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| verse_line1 = चक्रे सोऽर्जुननाशं प्राप्नोति च (त)यत्स्मृतिः सदाऽर्जुनना शम् ।तौ च गतौ निजमोकस्तेनैव नुतेन यन्निजो निजमोकः(यन्निजानिजमोकः) ॥१६॥ | |||
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| verse_line1 = अथ वृन्दावनवासं गोपाश्चक्रुर्जगत्क्षिताऽवनवासम् ।तत्र बकासुरमारः शौरिरभून्नित्यसंश्रितासुरमारः ॥१७॥ | |||
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| verse_line1 = अहनद् वत्सतनूकं(वत्सतनुकं) योऽपाल्लोकं स्वयत्नवत्सतनूकम्(वत्सतनुकं) ।सोपाद् वत्सानमरः सहाग्रजो गोपवत्सवत्सानमरः(गोपवत् सुवत्सानमरः) ॥१८॥ | |||
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| verse_line1 = सः विभुः श्रीमानहिके ननर्त यस्य श्रमानमा मा न हि के ।अकरोन्नद्युदकान्तं कान्तं नीत्वोरगं स नाद्युदकान्तम् ॥१९॥ | |||
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| verse_line1 = हत्वा धेनुकमूढं बलात् प्रलम्बं च खेट् सधेनुकमूढम् ।व्रजमावीदमृताशः पीत्वा वह्निं चरस्थिरादमृताशः(चरस्थितादमृताशः) ॥२०॥ | |||
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| verse_line1 = गिरिणा रक्षाऽपि कृता व्रजस्य तेन स्वरक्षरक्षापिकृता ।शक्राय व्यञ्जयता स्वां शक्तिं विश्वमात्मनाऽव्यं जयता ॥२१॥ | |||
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| verse_line1 = रेमे गोपीष्वरिहा स मन्मथाक्रान्तसुन्दरीपीष्वरिहा।पूर्णानन्दैकतनुः स विश्वरुक्पावनोऽप्यनन्दैकतनुः (प्यानन्दैकतनुः)॥२२॥ | |||
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| verse_line1 = अथ हतयोर्गलिकेशयोः श्वफल्कजप्रापितः पुरीं गलिकेश्योः ।भङ्क्त्वा धनुराजवरं जघान तेनैव च स्वयं राजवरम् ॥२३॥ | |||
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| verse_line1 = मृत्नन्(मृद्गन्) गजमुग्रबलं सबऽलो रङ्गं विवेश सृतिमुग्रबऽम् ।हत्वा मल्लौ बलिनौ कंसं च विमोक्षितौ(विमोक्षिता) ततौ लौ बलिनौ(रौ बलिनौ) ॥२४॥ | |||
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| verse_line1 = प्रादात् सान्दीपनये मृतपुत्रं ज्ञानदीपसन्दीपनये(सान्दीपनये) ।गुर्वर्थेऽज्ञानतमःप्रभेदिता नित्यसम्भृताज्ञानतमः ॥२५॥ | |||
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| verse_line1 = जित्वा मागधराजं तोषितमकरोत् सदात्मयोगधराजम् ।अनु कुर्वन् निजसदनं चक्रे रम्यां पुरीं(रम्यं पुरं) सुबोधनिजसदनम् ॥२६॥ | |||
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| verse_line1 = प्रसभं सगजबलस्य क्षत्रस्योच्चैः समगधराजबलस्य ।मानं शिशुपालवरं हत्वा भैष्मीमवाप शिशुपालवरम् ॥२७॥ | |||
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| verse_line1 = हंसो (डिभि)डिभकश्चपलावमुना संसूदितौ यवनकश्च पला ।कीर्तिर्विमला विरता प्रतता विश्वाधिपावनीलाविरता ॥२८॥ | |||
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| verse_line1 = सत्याजाम्बवतीर्या भार्या विन्दाद्या भानुसाम्बवतीर्याः ।प्रद्युम्नं (स्वमोदरतः)मोदरतः प्राप ज्येष्ठं हरिः सुतं मोदरतः ॥२९॥ | |||
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| verse_line1 = यत्परिवारतयेशा जाता देवा नृपात्मजा रतयेशाः ।यद्भरितं विषसर्पप्रभृति ध्वान्तं न मारुतिं विषसर्प ॥३०॥ | |||
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| verse_line1 = येन हिडिम्बबकाद्या रक्षोधीशा निपातिता बबकाद्याः ।भीमे प्रीतिममेयां व्यञ्जयता तेनैव(तेन) शेषपाति ममे याम् ॥३१॥ | |||
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| verse_line1 = अथ कृष्णावरणे तान् प्राप्तान् राज्ञोऽशृणोत् सदावरणेतान् ।द्रष्टुं यातः सबलस्तां चानैषीत् पृथासुतांस्ततः सबलः ॥३२॥ | |||
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| verse_line1 = तानिन्द्रस्थलवासांश्चक्रे कृष्णः परो(पुरो) निजस्थलवासान् ।स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥ | |||
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| verse_line1 = वालिवधानुनयाय प्रणयी सख्यं सुसन्दधे नु नयाय ।वासवजेन विशेषात् तेनैव पुनर्नृजन्मजेन विशेषात् ॥३४॥ | |||
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| verse_line1 = मातुः परिभवहान्यै राज्ञा द्युसदामितश्च परिभवहाऽन्यैः(न्यै) ।अभवन्नरकमुरारिर्योऽवासीदत्(योऽवात्सीदत्) समस्तनरकमुरारिः ॥३५॥ | |||
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| verse_line1 = नीतो दिवि देववरै रेमे सत्यासमन्वितोऽदेववरैः ।सर्वर्तुवने शशिना निशि सत्यां वासरे वनेऽशशिना ॥३६॥ | |||
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| verse_line1 = सुरतरुमापाऽलिमतात् प्रकाशयञ्छक्तिमात्मनः पाळिमतात् ।सुरवरवीरेषु दरी प्रधानजीवेश्वरः परेषुदरी ॥३७॥ | |||
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| verse_line1 = शिवभक्तप्रवराद्यं पुमान् न सेहे गिरीशविप्रवराद्यम्(गिरिशविप्रवराद्यम्) ।तं स्वात्मेन्द्रवरेण व्यधुनोद् भीमेन धूतरुद्रवरेण ॥३९॥ | |||
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| verse_line1 = यद्बलभारवहत्वान्नाचलदुरगादिभिः सुभारवहत्वात्(त्वम्) ।धर्मादरिहाऽपि पदं भीमो येनैव साहसं (लिहाऽऽपि)रिहाऽऽपि पदम् ॥४७॥ | |||
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| verse_line1 = न हि नहुषोऽलं नहितुं धर्मो द्रौणिस्तथेतरो(रे)ऽलं नहितुम् ।नो राट् कर्णो(र्णौ) ब्रह्मवरी येन ध्वस्तोस्त्रमग्रहीत् सुब्रह्म वरी(सब्रह्मवरी) ॥४८॥ | |||
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| verse_line1 = यस्य सुनीतिसहायान्न(सुनीतसहायान्न) रिपून् मेनेऽर्जुनः समेतसहा यान् ।अकरोच्चासु परासुप्रततिं सेनासु धावनासुपरासु ॥५७॥ | |||
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| verse_line1 = येन जयद्रथमारः पार्थः(पात्रा) शत्रूनवापतद्रथमारः ।यद्विरहादपि देहे स रथः शश्वत् स्थितेः सदादपि देहे ॥५८॥ | |||
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| verse_line1 = यद्भरितो भरताभः प्रभुरम्भाभावितोऽभिभरताभः ।भीमो रभसाऽभिभवी प्रसभं भा भाभिभूर्भसा(भासा) भिभवी ॥५९॥ | |||
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| verse_line1 = यदनुग्रहिपूर्णत्वाद्(यदनुग्रहपूर्णत्वाद्) भीमः सर्वानरीननहिपूर्णत्वात् ।अदहत् बाहुबलेन क्रोधाग्नावाहितान् निजाहुबलेन ॥६० ॥ | |||
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| verse_line1 = भीमविपाटितदेहानदर्शयत्(विपातित/निपातित) स्वानरीन् विपाटितदेहान् ।कृष्णाया हितकारी सम्यगीरप्रियः सदाऽहितकारी ॥६२॥ | |||
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| verse_line1 = अथ हरिणा पीतबलं द्रौणेरस्त्रं महारिणाऽपीतबलम् ।दधता वासोमरणं नीतं चक्रेऽभिमन्युजं सोमरणम् ॥६३॥ | |||
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| verse_line1 = ज्ञानं परमं प्रादाद् भीष्मगतः सृतिविमोक्षचरमं प्रादात् ।पाण्डुसुतानामधिकं चक्रे वेदं गुणोत्तरं स्वनामधिकम् ॥६५॥ | |||
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| verse_line1 = तेनावापि सुजातैर्हरिमेधस्तुरगवर्तनेऽपि(तुरगावर्तनेऽपि) सुजातैः ।पाण्डुसुतैः (सवसूकैराप्तैर्व्यासात्मना)सवसूकैः प्राप्तैर्व्यासात्मना च सुसवसूकैः ॥६६॥ | |||
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| verse_line1 = तदनु स (सु)पाण्डुतनूजै रेमे क्ष्मां पालयन् सुपाण्डुतनूजैः ।अनुपमसुखरूपोऽजः परमः श्रीवल्लभः सति खरूपो जः(सुखरूपो जः/सति सुखरूपोजः) ॥६७॥ | |||
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| verse_line1 = सुगतिं (पर)चरमामददान्निजयोग्यां ज्ञानिसुततिं(ति) परमामददात् ।पार्थानां सयदूनां स (परम)पितृप्रेष्यादिनामिनां सयदूनाम् ॥६८॥ | |||
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| verse_line1 = एवं सर्वाणि हरे रूपाणि श्रीपतेः सुपर्वाणिहरेः ।पूर्णसुखानि सुभान्ति प्रततानि निरन्तराणि (नि)सुभान्ति ॥७०॥ | |||
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| verse_line1 = देवानां पतयो नित्यं मतं यस्य न जानते(नो मतं यस्य जानते) ।तस्मै देव नमस्तेऽहं भवतेऽसुरमारये ॥७३॥ | |||
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| verse_line1 = भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ।भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ॥७८॥ | |||
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| verse_line1 = नैव परः केशवतः परमादरस्मात् समश्च सुकेशवतः(सुखकेशवतः)।सोऽयं शपथवरो नः शश्वत् सन्धारितः सुशपथवरोऽनः ॥७९॥ | |||
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| verse_line1 = कृष्णकथेयं यमिता (सुश)सुखतीर्थेनोदिताऽनने यं यमिता ।भक्तिमता परमेशे सर्वोद्रेका सदानुताऽप रमेशे ॥८०॥ | |||
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| verse_line1 = इति (नारायणनामाव कतीर्थं)नारायणनामा सुखतीर्थपूजितः सुरायणना मा ।पूर्ण गुणैर्धिक(गुणैरधिक) पूर्णज्ञानेच्छाभक्तिभिः(पूर्णज्ञानेच्छाशक्तिभिः) स्वधिकपूर्ण(र्णः) ॥८१॥ | |||
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं यमकभारतम्(महाभारततात्पर्यम्) ॥ | |||
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Revision as of 19:35, 10 April 2026
यमकभारतम्
यमकभारतम्
ध्यायेत् तं(ध्यायेत्) परमानन्दं यन्माता पतिमयदपरमानन्दम् ।उज्झितपरमानं दम्पत्याद्याद्याश्रमैः सदैव परमानन्दम् ॥१॥
यस्य करालोलं चक्रं कालः परः स हि कराऽलोऽम् ।यस्य गदा पवमानः सन्(गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा) यो व्यासोऽभवत् सदापवमानः ॥२॥
यस्य रमा न मनोगं जगृहे विश्वम्भराऽपि न मनोऽगम् ।यस्य पुमानानन्दं भुङ्क्ते यद् धाम कपतिमानानन्दम् ॥३॥
परमेषु यदा तेजः परमेषु चकार वासुदेवोऽजः ।मानधि बिभ्रत्सु मनो माऽनधिमाऽऽसीन्न वासुदेवो जः ॥४॥
सोऽजनि देवक्यन्ते यस्मादनुकम्पनावदेव क्यन्ते ।अवदन् देव क्यं ते भुवनं हि सुराः सदैवदेऽव क्यन्ते ॥५॥
नीतो वसुदेवेन स्वततेन स गोकुलं सुवसुदेवे न(सवसुदेवेन) ।तत्र यशोदा तनयं मेने कृष्णं स्वकीयमवदातनयम् ॥६॥
ववृधे गोकुसमध्याद्यो(यो) देवो विश्वमद्भुताकुलमध्यात् ।तत्र च पूतनिकाया वधमकरोत् यन्निजाः सुपूतनिकायाः(पूतनिकायाः) ॥७॥
अधुनोच्छकटं लोली पादाङ्गुष्ठेन वातपेशशकटं लोली ।अतनोद् रक्षामस्य स्वाज्ञानाद् गोपिका सदेरक्षामस्य ॥८॥
मुखलालनलोला तन्मुखगं जगदचष्ट सालनलोलातत् ।नाध्यैन्मायामस्य जगत्प्रभोः स्वधिकतततमायामस्य(स्वाधिकतततमायामस्य) ॥९॥
तस्य सुशर्माण्यकरो दरिणो गर्गः सदुक्तिकर्माण्यकरोत् ।अवदन्नामानमयं जगदादि वासुदेवनामानमयम् ॥१०॥
तस्य सखा बलनामा ज्येष्ठो भ्राताऽथ यन्निजाबलना मा ।यस्य च पर्यङ्कोऽयं पूर्वतनो विष्णुमजसपर्यं कोऽयम् ॥११॥
तेन हतो वातरयस्तृणचक्रो नाम दितिसुतोऽवातरयः ।हरमाणो (बा)वालतमं स्वात्मानं कण्ठरोधिनाऽवालतमम् ॥१२॥
सोऽवनिमध्ये रङ्गन् अरिदरयुग् बालरूपमध्येरं गन् ।अमुषन्नवनीतमदः (स्व)सगोकुले गोपिकासु नवनीतमदः ॥१३॥
तन्माता कोपमिता तमनुससारात्मवादवाकोपमिता(त्मवाकोपमिता) ।जगृहे सा नमनं तं देवं (तं चिन्तयैव)तच्चिन्तयैव सानमनन्तम् ॥१४॥
अथ साऽन्तरिताऽमानं विष्णुं विश्वोद्भवं (तदाऽ)सदान्तरितामानम् ।अनयद् दामोदरतां योऽरमयत् सुन्दरीं निजामोदरताम् ॥१५॥
चक्रे सोऽर्जुननाशं प्राप्नोति च (त)यत्स्मृतिः सदाऽर्जुनना शम् ।तौ च गतौ निजमोकस्तेनैव नुतेन यन्निजो निजमोकः(यन्निजानिजमोकः) ॥१६॥
अथ वृन्दावनवासं गोपाश्चक्रुर्जगत्क्षिताऽवनवासम् ।तत्र बकासुरमारः शौरिरभून्नित्यसंश्रितासुरमारः ॥१७॥
अहनद् वत्सतनूकं(वत्सतनुकं) योऽपाल्लोकं स्वयत्नवत्सतनूकम्(वत्सतनुकं) ।सोपाद् वत्सानमरः सहाग्रजो गोपवत्सवत्सानमरः(गोपवत् सुवत्सानमरः) ॥१८॥
सः विभुः श्रीमानहिके ननर्त यस्य श्रमानमा मा न हि के ।अकरोन्नद्युदकान्तं कान्तं नीत्वोरगं स नाद्युदकान्तम् ॥१९॥
हत्वा धेनुकमूढं बलात् प्रलम्बं च खेट् सधेनुकमूढम् ।व्रजमावीदमृताशः पीत्वा वह्निं चरस्थिरादमृताशः(चरस्थितादमृताशः) ॥२०॥
गिरिणा रक्षाऽपि कृता व्रजस्य तेन स्वरक्षरक्षापिकृता ।शक्राय व्यञ्जयता स्वां शक्तिं विश्वमात्मनाऽव्यं जयता ॥२१॥
रेमे गोपीष्वरिहा स मन्मथाक्रान्तसुन्दरीपीष्वरिहा।पूर्णानन्दैकतनुः स विश्वरुक्पावनोऽप्यनन्दैकतनुः (प्यानन्दैकतनुः)॥२२॥
अथ हतयोर्गलिकेशयोः श्वफल्कजप्रापितः पुरीं गलिकेश्योः ।भङ्क्त्वा धनुराजवरं जघान तेनैव च स्वयं राजवरम् ॥२३॥
मृत्नन्(मृद्गन्) गजमुग्रबलं सबऽलो रङ्गं विवेश सृतिमुग्रबऽम् ।हत्वा मल्लौ बलिनौ कंसं च विमोक्षितौ(विमोक्षिता) ततौ लौ बलिनौ(रौ बलिनौ) ॥२४॥
प्रादात् सान्दीपनये मृतपुत्रं ज्ञानदीपसन्दीपनये(सान्दीपनये) ।गुर्वर्थेऽज्ञानतमःप्रभेदिता नित्यसम्भृताज्ञानतमः ॥२५॥
जित्वा मागधराजं तोषितमकरोत् सदात्मयोगधराजम् ।अनु कुर्वन् निजसदनं चक्रे रम्यां पुरीं(रम्यं पुरं) सुबोधनिजसदनम् ॥२६॥
प्रसभं सगजबलस्य क्षत्रस्योच्चैः समगधराजबलस्य ।मानं शिशुपालवरं हत्वा भैष्मीमवाप शिशुपालवरम् ॥२७॥
हंसो (डिभि)डिभकश्चपलावमुना संसूदितौ यवनकश्च पला ।कीर्तिर्विमला विरता प्रतता विश्वाधिपावनीलाविरता ॥२८॥
सत्याजाम्बवतीर्या भार्या विन्दाद्या भानुसाम्बवतीर्याः ।प्रद्युम्नं (स्वमोदरतः)मोदरतः प्राप ज्येष्ठं हरिः सुतं मोदरतः ॥२९॥
यत्परिवारतयेशा जाता देवा नृपात्मजा रतयेशाः ।यद्भरितं विषसर्पप्रभृति ध्वान्तं न मारुतिं विषसर्प ॥३०॥
येन हिडिम्बबकाद्या रक्षोधीशा निपातिता बबकाद्याः ।भीमे प्रीतिममेयां व्यञ्जयता तेनैव(तेन) शेषपाति ममे याम् ॥३१॥
अथ कृष्णावरणे तान् प्राप्तान् राज्ञोऽशृणोत् सदावरणेतान् ।द्रष्टुं यातः सबलस्तां चानैषीत् पृथासुतांस्ततः सबलः ॥३२॥
तानिन्द्रस्थलवासांश्चक्रे कृष्णः परो(पुरो) निजस्थलवासान् ।स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥
वालिवधानुनयाय प्रणयी सख्यं सुसन्दधे नु नयाय ।वासवजेन विशेषात् तेनैव पुनर्नृजन्मजेन विशेषात् ॥३४॥
मातुः परिभवहान्यै राज्ञा द्युसदामितश्च परिभवहाऽन्यैः(न्यै) ।अभवन्नरकमुरारिर्योऽवासीदत्(योऽवात्सीदत्) समस्तनरकमुरारिः ॥३५॥
नीतो दिवि देववरै रेमे सत्यासमन्वितोऽदेववरैः ।सर्वर्तुवने शशिना निशि सत्यां वासरे वनेऽशशिना ॥३६॥
सुरतरुमापाऽलिमतात् प्रकाशयञ्छक्तिमात्मनः पाळिमतात् ।सुरवरवीरेषु दरी प्रधानजीवेश्वरः परेषुदरी ॥३७॥
पुरमभियायारिदरी दत्वा भद्रां पृथासुतायारिदरी ।शक्रपुरीमभियातः प्रादाद् वह्नेर्वनं सतामभियातः ॥३९॥
शिवभक्तप्रवराद्यं पुमान् न सेहे गिरीशविप्रवराद्यम्(गिरिशविप्रवराद्यम्) ।तं स्वात्मेन्द्रवरेण व्यधुनोद् भीमेन धूतरुद्रवरेण ॥३९॥
यस्याज्ञाबलसारैः पार्थैर्दिग्भ्यो हृतं धनं बलसारैः ।जित्वा क्ष्मामविशेषां प्रसह्य भूपान् समस्तकामविशेषाम् ॥४०॥
अथ पार्थान् क्रतुराजं प्रापयदमरेट् सरुद्रशक्रतुराजम् ।पूजा तेनावापि च्छिन्नश्चैद्यः सृतिं गते नावाऽपि ॥४१॥
निहतौ सौभकरूशौ शीतो भातश्च येन तौ भकरूशौ(भाकरूशौ) ।अजयद् रुद्रं च रणे बाणार्थेऽवनतिपतितकचन्द्रं चरणे ॥४२॥
असृजज्ज्वरमुग्रतमःक्षयप्रदो लीलयाऽधिवरमुग्रतमः ।क्रीडामात्रं विश्वं प्रकाशयन्नात्मनः स विहरकमात्रं विश्वम् ॥४३॥
यस्यावेशोरुबलान्न्यहनत् पार्थोऽसुरान् प्रजेशोरुबलान्(त्) ।वरदानादस्यैव जगत्प्रभोरीरणात् समनुगतनादस्यैव ॥४४॥
यस्यावेशात् स बलः प्रचकर्ष पुरं प्रसह्य वेशात् सबलः ।कुरुपतिनाम नु यमुना कृष्टा(कृष्णा) येनाहुरर्ह्यमतनु(येनाहुरर्घ्यमतनु) यमुना ॥४५॥
यद्बलवान् क्रोधवशान्निनाय नाशं वृकोदरः क्रोधवशान् ।लेभे चान्यागम्यं स्थानं पुष्पाणि धाम चान्यागम्यम् ॥४६॥
यद्बलभारवहत्वान्नाचलदुरगादिभिः सुभारवहत्वात्(त्वम्) ।धर्मादरिहाऽपि पदं भीमो येनैव साहसं (लिहाऽऽपि)रिहाऽऽपि पदम् ॥४७॥
न हि नहुषोऽलं नहितुं धर्मो द्रौणिस्तथेतरो(रे)ऽलं नहितुम् ।नो राट् कर्णो(र्णौ) ब्रह्मवरी येन ध्वस्तोस्त्रमग्रहीत् सुब्रह्म वरी(सब्रह्मवरी) ॥४८॥
क्षात्रं धर्मं स्ववता गुरुवृत्त्यै केशवाज्ञया च मं (मे/मलं) स्ववता ।सर्वं सेहे मनसा भीमेनेशैकमानिना हेमनसा ॥४९॥
यद्भक्तप्रवरेण प्रोतः स्वस्मिन् स कीचकः प्रवरेण ।पतितास्तस्य सहायाः कृष्णार्थे मानिनः समस्य सहायाः ॥५०॥
यद्भक्त्याऽनुगृहीतौ पार्थो भीमश्च गोनृपौ नु गृहीतौ(निगृहीतौ)।ऋणमुक्त्यै सुव्यत्यस्त्यै क्रमशो वीरावमुञ्चतां सुव्यत्यस्त्यै ॥५१॥
यद्भक्त्याऽमितयाऽलं कृष्णा कार्ये विवेश कृष्णाकार्ये ।यामीरार्द्धतनुत्वान्नापाद् भीमादृतेऽपि नापाद् भीमात् ॥५२॥
यां स्प्रष्टुमिच्छन्तमजातशत्रुं न्यवारयत् स्वस्थमजातशत्रुम् ।शंरूपाने नित्यरतेरियं श्रीरिति स्म देवेड्यदितेरियं श्रीः ॥५३॥
मनसामनसाऽमनसा मनसा यमनन्तमजस्रमवेदनुया ।विलयं विलयं विलयं विलयन्निखिऽलं त्वशुभं प्रचकार च यः(या) ॥५४॥
सोऽगाद् दूतमुखेन प्रभुणेदं वर्तते यदूतमुखेन ।पार्थार्थे बहुतनुतां यत्र प्रकाशयन्(त्) स्वयं सबहुतनुताम् ॥५५॥
गुरुकर्णनदीजानवधीच्चक्षुर्बलेन जनदीजादी ।शक्त्या निजया परवान् स्वजनानुद्रेचयन्ननन्तयाऽपरवान् ॥५६॥
यस्य सुनीतिसहायान्न(सुनीतसहायान्न) रिपून् मेनेऽर्जुनः समेतसहा यान् ।अकरोच्चासु परासुप्रततिं सेनासु धावनासुपरासु ॥५७॥
येन जयद्रथमारः पार्थः(पात्रा) शत्रूनवापतद्रथमारः ।यद्विरहादपि देहे स रथः शश्वत् स्थितेः सदादपि देहे ॥५८॥
यद्भरितो भरताभः प्रभुरम्भाभावितोऽभिभरताभः ।भीमो रभसाऽभिभवी प्रसभं भा भाभिभूर्भसा(भासा) भिभवी ॥५९॥
यदनुग्रहिपूर्णत्वाद्(यदनुग्रहपूर्णत्वाद्) भीमः सर्वानरीननहिपूर्णत्वात् ।अदहत् बाहुबलेन क्रोधाग्नावाहितान् निजाहुबलेन ॥६० ॥
कृष्णाभीमाप्ततमः शीर्णं येन स्वकीयहृदयमाप्ततमः ।धृतराष्ट्रसुतानवधीत् भीमेन स्थापितो मनसि सुसुतानवधीत् ॥६१॥
भीमविपाटितदेहानदर्शयत्(विपातित/निपातित) स्वानरीन् विपाटितदेहान् ।कृष्णाया हितकारी सम्यगीरप्रियः सदाऽहितकारी ॥६२॥
अथ हरिणा पीतबलं द्रौणेरस्त्रं महारिणाऽपीतबलम् ।दधता वासोमरणं नीतं चक्रेऽभिमन्युजं सोमरणम् ॥६३॥
तस्य च रक्षा सुकृता जनार्दनेनेशशेषकेक्षासुकृता ।पार्थेषु प्रेमवता नित्यं भर्त्रासुतासुविप्रेमवता ॥६४॥
ज्ञानं परमं प्रादाद् भीष्मगतः सृतिविमोक्षचरमं प्रादात् ।पाण्डुसुतानामधिकं चक्रे वेदं गुणोत्तरं स्वनामधिकम् ॥६५॥
तेनावापि सुजातैर्हरिमेधस्तुरगवर्तनेऽपि(तुरगावर्तनेऽपि) सुजातैः ।पाण्डुसुतैः (सवसूकैराप्तैर्व्यासात्मना)सवसूकैः प्राप्तैर्व्यासात्मना च सुसवसूकैः ॥६६॥
तदनु स (सु)पाण्डुतनूजै रेमे क्ष्मां पालयन् सुपाण्डुतनूजैः ।अनुपमसुखरूपोऽजः परमः श्रीवल्लभः सति खरूपो जः(सुखरूपो जः/सति सुखरूपोजः) ॥६७॥
सुगतिं (पर)चरमामददान्निजयोग्यां ज्ञानिसुततिं(ति) परमामददात् ।पार्थानां सयदूनां स (परम)पितृप्रेष्यादिनामिनां सयदूनाम् ॥६८॥
रेमे तत्रापिसुखी परमोऽनन्तो ननन्द तत्रापि सुखी ।प्राणेनेन्दिरया च प्रयुतो नित्यं महागुणेन्दिरया च ॥६९॥
एवं सर्वाणि हरे रूपाणि श्रीपतेः सुपर्वाणिहरेः ।पूर्णसुखानि सुभान्ति प्रततानि निरन्तराणि (नि)सुभान्ति ॥७०॥
राम राम महाबाहो माया ते सुदुरासदा ।वाद सादद को लोके पादावेव तवासजेत् ॥७१॥
जेत् सवातव वेदापाऽके लोकोदद सादवा ।दासरादुसुतेयामाहोवाहा मम राम रा(राः) ॥७२॥
देवानां पतयो नित्यं मतं यस्य न जानते(नो मतं यस्य जानते) ।तस्मै देव नमस्तेऽहं भवतेऽसुरमारये ॥७३॥
समस्तदेवजनकवासुदेवपरामृत ।वासुदेव परामृत ज्ञानमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥७४॥
देवादे देवऽलोकप पूर्णानन्दमहोदधे ।सर्वज्ञेश रमानाथ देवाऽदेऽदेऽव लोकप ॥७५॥
यो निर्ममेऽशेषपुराणविद्यां यो निर्ममेशे षपुराणविद्याम् ।योनिर्ममेशेषपुराणविद्यां योऽनिर्ममेशेषपुराणविद्याम् ॥७६॥
अनन्तपारामितविक्रमेश प्रभो रमापारमनन्तपार ।महागुणाढ्यापरिमेयसत्त्व रमालयाशेषमहागुणाढ्य ॥७७॥
भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ।भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा भा ॥७८॥
नैव परः केशवतः परमादरस्मात् समश्च सुकेशवतः(सुखकेशवतः)।सोऽयं शपथवरो नः शश्वत् सन्धारितः सुशपथवरोऽनः ॥७९॥
कृष्णकथेयं यमिता (सुश)सुखतीर्थेनोदिताऽनने यं यमिता ।भक्तिमता परमेशे सर्वोद्रेका सदानुताऽप रमेशे ॥८०॥
इति (नारायणनामाव कतीर्थं)नारायणनामा सुखतीर्थपूजितः सुरायणना मा ।पूर्ण गुणैर्धिक(गुणैरधिक) पूर्णज्ञानेच्छाभक्तिभिः(पूर्णज्ञानेच्छाशक्तिभिः) स्वधिकपूर्ण(र्णः) ॥८१॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं यमकभारतम्(महाभारततात्पर्यम्) ॥