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| == द्वितीयः परिच्छेदः ==
| | #REDIRECT [[Vishnutattvavinirnaya#VTN_C02]] |
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| | title = द्वितीयः परिच्छेदः
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| ब्रह्मा शिवः सुराद्याश्च शरीरक्षरणात् क्षराः । लक्ष्मीरक्षरदेहत्वादक्षरा तत्परो हरिः ॥
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| स्वातन्त्र्यशक्तिविज्ञानसुखाद्यैरखिलैर्गुणैः । निस्सीमत्वेन ते सर्वे तद्वशाः सर्वदैव च ॥
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| सर्गस्थितिक्षययतिप्रकाशावृतिबन्धनम् । सर्वक्षराणामेकः स कुर्यात् सात्विकमोक्षणम् ॥
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| सर्गस्थितियतिज्योतिर्नित्यानन्दप्रदोक्षरे । चेष्टाप्रदश्च सर्वेषामेक एव परो हरिः ॥तस्य नान्योस्ति सर्गादिकर्ता निर्दोषकश्च सः ॥’ इति परमश्रुतिः ।
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| ‘ब्रह्मशेषसुपर्णेशशक्रसूर्यगुहादयः । सर्वे क्षरा अक्षरा तु श्रीरेका तत्परो हरिः ॥’ इति स्कान्दे ।
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| ‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥(ऋ.सं.१०.१२५.५)
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| अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वा उ । अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आविवेश ॥(ऋ.सं.१०.१२५.६)
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| अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तस्समुद्रे ॥’(ऋ.सं.१०.१२५.७)
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| ‘यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति तदक्षरे परमे प्रजाः ॥ यतः प्रसूताः जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम् । यदोषधीभिः पुरुषान् पशूंश्च विवेश भूतानि चराचराणि ॥ अतः परं नान्यदणीयसं हि परात् परं यन्महतो महान्तम् । यदेकमव्यक्तमनन्तरूपं विश्वं पुराणं तमसः परस्तात् ॥ तदेवर्तं तदु सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम् ।’(म.ना.उ.१.३-६)
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| ‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥’(ऋ.सं.७.४०.५)
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| ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । मुखादिन्द्राश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ।’(ऋ.सं.१०.९०.१३)
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| ‘एको(ह वै) नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो (नापो) नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी।’(महोपनिषत्१.२),‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः ।’,‘ स मुनिर्भूत्वा समचिन्तयत् तत एते व्यजायन्त ।’, ‘विश्वो हिरण्यगर्भोग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्रा ’ इति ।
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| ‘वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न चशङ्करः । नेन्द्रसूर्यौ न च गुहो न सोमो न विनायकः॥’ इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।
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| ‘यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्’(३.९) इत्यत्राप्यपरमस्तीत्येवार्थः । अन्यथा ‘तेनेदं पूर्णं..(पुरुषेण सर्वम्॥) ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्।’(३.९-१०) इति वाक्यशेषविरोधात् । ‘तेनेदम्’ इत्युक्तमेव ‘तत’ इति परामृश्यते । अन्यथा ‘यस्मात् परं न’ इत्युक्तिविरोधात् ।
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| ‘‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ।’
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| ‘‘तस्यैव सर्वनामानि व्यतिरिक्तस्य सर्वतः(शः) । यः स्वतन्त्रः सदैवैकः स विष्णुः परमो मतः ॥’
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| इत्यादि श्रुतिभ्योऽन्यनामान्यस्यैवेति नान्येषां सर्वेश्वरत्वादिकमुच्यते । सर्ववेदेष्वप्यस्यादोषवचनादादावभावावचनाच्च तद्वचनाच्चान्येषां सर्वेषां वेदेषु सर्वेषु । तेषां सर्वनामत्वानुक्तेश्च ।
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| ‘उत्पत्तिर्वासुदेवस्य प्रादुर्भावो न चापरः ।देहोत्पत्तिस्तदन्येषां ब्रह्मादीनां तदीरणात् ॥
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| देहोऽनादिर्हरेर्नित्यो ब्रह्मादीनामनित्यकाः । मुख्योत्पत्तिस्तदन्येषां प्रादुर्भावो हरेर्जनिः ॥’ इति परमश्रुतेश्च ॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः द्वितीयः परिच्छेदः ॥
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| [[Category:Vishnutattvavinirnaya]] | |